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गत मास में हम सभी ने भगवान गणेश का मनोभाव से पूजन किया है। गणेश चतुर्थी से लेकर अनंत चतुर्दशी तक गणपति बप्पा का आशिर्वाद प्राप्त किया है। इन दस दिनों में गणपति बप्पा की आराधना करते हुए ‘गणपति अथर्वशीर्ष’ का पठन किया जाता है। प्रस्तुत लेख में गणपति अथर्वशीर्ष के विविध अंगों पर प्रकाश डाला गया है।

गणेश भारतीय आस्था की अप्रतिम धरोहर हैं। मंगल मूर्ति, सुख कर्ता, दु:ख हर्ता श्री गणेश सर्वाधिक लोकप्रिय देवाधिदेव के रूप में जन मानस में प्रतिष्ठित हैं। गाणपत्य परंपरा ने श्री गणपति को प्रमुख देवता, ईश्वरीय शक्ति, ज्योति पुंज, दिव्य चेतना का साकार विग्रह माना। श्री शंकराचार्य ने श्री गणपति को ‘पंचदेव पूजा’ के प्रथम देवता के रूप में भारतीय धार्मिक परंपरा को एक अद्भुत योगदान दिया।

श्री गणपति की पूजा अर्चना में श्री अथर्वशीर्ष का पाठ प्रमुख है। श्री अथर्वशीर्ष की रचना पौराणिक काल की है या बाद की, इसमें वैचारिक मतभेद हो सकता है। कतिपय शोधकर्ताओं के अनुसार श्री गणपति की पूजा अर्चना का प्रारंभ दूसरी शताब्दी में हुआ और श्री अथर्वशीर्ष की रचना १६हवीं, १७हवीं शताब्दी के काल में हुई। इतिहास के तथ्य, प्रमाण, अनुमान जो भी हो श्री अथर्वशीर्ष निश्चित ही श्री गणपति के तत्वरूप, निजरूप, लोकप्रिय रूप का अद्भुत स्त्रोत्र है। प्रस्तुत आलेख में श्री गणपति के इन्हीं रूपों की शक्ति का दर्शन श्री अथर्वशीर्ष के ऋषि की दिव्य दृष्टि से आस्था, कल्पना को शब्द रूप देने का अति विनम्र लघु प्रयास है। श्री गणपति अथर्वशीर्ष में दस श्लोक हैं। दस अर्थात एक के साथ शून्य (१०)। शून्य ब्रह्मांड का रूपक है। शून्य के पहले एक अर्थात-ब्रह्मांड की उत्पत्ति का कारक एक है। यह एक हैं-‘श्री गणेश। अथर्वशीर्ष के पांचवें श्लोक का यही स्पष्ट संकेत है:
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।
सर्वर्ं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्वर्ं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति….

एक श्री गणेश ही इस जगत के उत्पत्ति कारक हैं, दस दिशाओं में उनकी ही ऊर्जा व्याप्त है, वे ही लय-प्रलय के कारक हैं, वे ही दस इन्द्रियों को नियंत्रित कर जीवन को गति, दिशा देते हैं। एक के अंक की विशेषता है कि किसी भी अंक से एक का गुणा करने पर वही अंक उत्तर में आता है। इसका अर्थ यह हुआ कि गणेश की सामंजस्य शक्ति अद्भुत है, वे किसी और के अस्तित्व को कम नहीं करते, अपितु स्वयं उसमें व्याप्त हो उसी का अमिन्न हिस्सा बन जाते हैं। देवत्व का यह गुण अप्रतिम है।

श्री अथर्वशीर्ष के ऋषि के ‘श्री गणेश’ वेदोक्त भी है और पुराणोक्त भी। वेदोक्त इसलिए कि वे प्रत्यक्ष ब्रह्म तत्व हैं, प्रकृति पुरूष से पट्य ज्ञान मय, विज्ञानमय आनंदमय है, कर्त्ता, धर्ता, हर्ता हैं, गुणातीत, कालातीत, अवस्थातीत, देहातीत हैं, प्रणव ऊँ का साक्षात स्वरूप हैं, बिन्दुरूप हो षटचक्रों का दिव्य शक्ति रूप हैं, योगियों के ध्यान का केन्द्र है, सच्चिदानंद स्वरूप हैं।

पुराणोक्त इसलिए कि वे अति पुरातन महादेव शिव और गौरी के सुत हैं, गणपति हैं, प्रमथपति हैं। उनके गजानन, एकदंत रूप की विभिन्न पुरातन कथाएं हैं। चतुर्हस्तधारी, विघ्नहर्ता के रूप में चारों युगों के जन मानस को उन्होंने प्रभावित किया है। प्रथम पूज्य होने का उनका अपना अद्वितीय इतिहास है। श्री गणेश के पुरातन पुराणोक्त होने का सबसे सटीक प्रमाण तुलसी ने रामचरितमानस के बालकांड के सौवें दोहे में शिवविवाह के वर्णन के समय इस प्रकार दिया है-
मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ शंभु भवानि।
कोउ सुनि संशय करै जनि सुर अनादि जियें जानि॥
(रा.च.मा १/१००)

श्री अथर्वशीर्ष के श्रीगणेश निर्गुण भी हैं और सगुण भी। जन-जन के हृदय देवता, लोक नेता मंगलमूर्ति भी हैं- और तत्व रूप चेतना और चिंतन के बिन्दु भी। नाद, स्वर और वाक के कारक, प्रणेता, प्रचेता होकर दिव्य, दयामय मंगलमय-रूप, गुण, कर्म, घर्ष, घाम सभी में अद्भुत-अनूठे श्री गणेश।
श्री अथर्वशीर्ष में श्री गणेश के एकादश रूपों का दर्शन होता है। ‘त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि’-अथर्वशीर्ष के प्रथम श्लोक के प्रथम चरण में वे तत्व रूप है-और वह तत्व है ईश्वरीय शक्ति का अनादि, अजर, अमर, अपौरुषेय तत्व। श्री गणपति का दूसरा रूप है ‘ब्रह्मरूप’त्वमेव सर्वं खाल्विदं ब्रह्मासी। चौथे श्लोक ‘त्वमानन्दमयस्त्वं ब्रह्ममयः….. तव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि… त्वम देहत्रयातीतः। त्वमकालत्रयातीतः।

तीसरा रूप हमारी सृष्टि के कर्ता का है, चौथा धर्ता का है, पांचवां हर्ता का है:
त्वमेव केवलम कर्तासि।
त्वमेव केवलम धर्तासि।
त्वमेव केवलम हर्तासि। (अथर्वशीर्ष १)

श्री गणेश का छठवां रूप ‘आत्म रूप’ है। अथर्वशीर्ष के प्रथम श्लोक के अंतिम चरण में त्वम साक्षादात्मासि नित्यम कह कर जिसकी अभ्यर्थना की गई है। सातवां रूप ‘वाङ्मय रूप’ है, जिसके दर्शन हमें चतुर्थ श्लोक का अंतिम चरण में होते हैं, जो श्री गणेश के वाङ्मय रूप को समर्पित है त्वम चत्वारि वाक्कपदानि। आठवां रूप श्री गणेश का ‘प्रणव रूप’ है; जो छठवें श्लोक के त्वम मूलाधारस्थितोसिनित्यम से स्पष्ट है। नौवां रूप है ‘गायत्रीरूप’ जो आठवें श्लोक में एकदंताय विदमहे। वक्रतुण्डाय धीमही तन्नो दंतिः प्रचोदयात कह कर गाया गया है।

दसवां रूप है हमारे श्री गणेश का साकार रूप जो नौवें एवं दसवें श्लोक से स्पष्ट होता हैैैै एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशम़ङ्कुश धारिणमं, रदंच वरदंहस्तंभ्राण मूसकध्वजम। रक्त लम्बोदरम शूर्पकर्णकं रक्तवाससम-रक्त गन्धानुलिप्तांगंम रक्त पुष्पै: सुपुजितं एवं नमस्तैस्तु लम्बोदरायै एकदंताय विघ्ननाशिने शिवसुताय। श्री गणेश का एकादश रूप है ‘मंत्ररूप’- ऊँ गं गणपतेय नम:-जो अथर्वशीर्ष के ७वें श्लोक में पूर्वत: स्पष्ट हुआ है।

श्री गणपति का साकार रूप भी अथर्वशीर्ष में अनोखा है। छठवें श्लोक के अनुसार वे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इंद्र, अग्नि, वायु, सूर्य, चंद्रमा, बुह्म, यू भुव: एवं ओंकार स्वरूप स्वर रूप है। नौवें श्लोक में वे एकदन्त हैं, शूर्प की तरह उनके विशाल कान हैं, चार हाथों में से एक में हाथी का टूटा हुआ दांत अस्त्र रूप में है। उल्लेखनीय है कि इस समस्त वर्णन में उनके ‘गजमुख’ की स्पष्टोक्ति नहीं है। जो किसी भी साकार रूप के लिए प्रथम आवश्यक है। उक्त वर्णन में कानों को छोड़ कर अन्य भागों (मस्तिष्क, नेत्र, नाकआदि) आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृते: पुरुषात्परं नौवें श्लोक के आधार पर श्री गणपति का सृष्टि से पूर्व सगुण रूप लेना एवं जगत की उत्पत्ति का कारक होना सिद्ध होता है। सृष्टि के प्रारंभ में सृष्टि को प्रभावित करने वाली समस्त दैवीय शक्तियों का आवाहन कर गणपति को सृष्टि के प्रारंभ के समय अविर्भूत मानना जो पंच महाभूतमय जागतिक सृष्टि के कारण है। ऐसे परम श्रेष्ठतम तत्व को आराध्य देव के रूप में प्रतिष्ठित करना अथर्वशीर्ष के ऋषि का अद्युत तात्विक रहस्य है। नौवें श्लोक मे वर्णित श्री गणपति के साकार विग्रह में जैसे छठवें श्लोक की समस्त दैवीय शक्तियों के तेज स्वरूप का आरोपन करना ही श्री गणपति के गजमुख रूपधारी होने का तात्विक आध्यात्मिक संकेत है, जिसकी पुराणोक्त व्याख्या गौरीसुत गणेश के जन्म की बहुप्रचलित कथा के रूप में जनमानस को सदियों से श्री गणेश पूजा की ओर आकर्षित करती रही है।

श्री अथर्वशीर्ष के ऋषि ने गणपति को विघ्ननाशिने शिवसुताय दसवें श्लोक में कहा है, गौरी सुत नहीं। इसी प्रकार गणपति के नामोच्चार करते हुए ‘गणेश, एकदन्त, लम्बोदर, शूर्पकर्ण, विघ्ननाशिने, व्रातपतए, प्रथम पतये आदि आदि तो कहा है, पर दो बहुप्रचलित नाम ‘गजानन’ एवम्- विनायक का उल्लेख नहीं किया। गजानन श्री गणेश के ‘शिव सुताय’ होने की कथा का स्मरण कराता है तो ‘विनायक‘ उनके विघ्नहर्ता विघ्न राजेन्द्र के रूप में पुराणों तथा बौद्धिक तांत्रिक ग्रंथों में प्रयुक्त नाम है। ‘विघ्ननाशिने’ की संज्ञा जैसे विनायक नाम से जुड़ी किंवदंतियों के प्रतिउत्तर में श्री गणेश के मंगलमूर्ति मंगलकारी रूप की प्रतिष्ठा है और ‘शिवसुताय’ की संज्ञा जैसे श्रीगणेश के ‘शिव शक्तिरूप’ सदाशिव की परम चेतना की ‘एकोऽहम बहुस्थापि के संकल्प के रूप में प्रथम पूज्य श्री गणेश की दिव्यशक्ति के परमेश्वर रूप की अर्चना वेद वाड़्मय का आधार है।

श्री अथर्वशीर्ष के अनुसार श्री गणेश मूलाघार चक्र में अपने गजानन रूप में नित्य स्थित है, त्वम मूलाधारस्थिता निर्मूलाधार चक्र में ही कुंडलिनी सुष्तावस्था में पड़ी है ऐसा योग शस्त्रियों का मत है। श्री अथर्वशीर्ष के छठवें श्लोक से भी यह सिद्ध होता है: यथा ‘त्वम-शक्तित्रयात्मक:। त्वा योगिनो घ्यायन्ति नित्यम।(श्री गणेश और कुंडलिनी रूपा शक्तित्रय का मूलाधार चक्र में स्थित होना अद्भुत आध्यात्मिक अर्थों से भरा हुआ है।)

मूलाधार चक्र, मेरु दंड में स्थित इडा, पिंगला एवं सुषुम्ना नाड़ियों के अंतिम छोर पर स्थित है। यह ऊर्जा का ठोस रूप से जाना जाने वाला पृथ्वी तत्व है। पृथ्वी तत्व धारण करने की नए जीवन को जन्म देने की, गंध एवं धैर्य के गुणों का प्रतिनिधि तत्व है। आधार चक्र के रूप में इसकी स्थिति नीचे की ओर है और यह शेष सभी चक्रों को आधार प्रदान करता है। इस चक्र का असंतुलन व्यक्ति के पूरे व्यक्तित्व को असंतुलित कर सकता है। मूलाधार से ऊपर कंठ पर्यत शक्ति का स्थान माना गया है। इस परिप्रेक्ष्य में मूलाधार चक्र में श्री गणेश और कुंडलिनी रूपा शक्तित्रय का मूलाधार चक्र में स्थित होना अद्भुत आध्यात्मिक संकेतों से भरा है।

चक्र सूक्ष्म शरीर का विषय है, स्थूल का नहीं। मूलाधार चक्र का काम केन्द्र है। काम का व्यापक अर्थ है नई-नई इच्छाओं, आकांक्षाओं का जन्म एवं पूर्ति इच्छाओं की पूर्ति के प्रयास में संशय, असुरक्षा, डर बहुत बड़ी बाधाओं के रूप में आते हैं जिसका शमन बुद्धि विवेक के ईश्वर ‘गणेश’ सहज ही कर सकते हैं। काम या इच्छाओं का उदात्तीकरण बिना सात्विक बुद्धि के संभव नहीं हो सकता। इस दृष्टि से भी श्री गणेश की मूलाधार में उपस्थिति का अति महत्व स्पष्ट होता है।

श्री अथर्वशीर्ष के अनुसार हमारी सृष्टि के आदि देवता है श्री गणेश (आविर्भूत च सृष्ट्यादौ प्रकृत: पुरूषात्परम ॥सृष्टि के प्रारंभ में विभिन्न तत्वों के पारस्परिक संघर्ष को एक उचित-अनुचित निश्चित दिशा श्री गणेश ने दी और प्रकृति के संचालन के नियम निर्धारित किए। सृष्टि की समस्त विधायिका शक्तियों के केन्द्र के रूप में श्री गणेश जैसे गुरूत्वाकर्षण के स्वयंसिद्ध सिद्धान्त बन गए। ऊर्जा के आकर्षण के प्रमुख आधार केन्द्र मूलाधार चक्र पर श्रीगणेश की उपस्थिति जैसे ऊर्जा (चेतना) को निर्माण की, प्रजनन की, धारण करने की क्षमता से युक्त करते हैं।

श्री गणेश संपूर्ण जगत की दिव्य आद्यशक्ति, मातृशक्ति के संकल्प का दिव्य साक्षात विग्रह है। मूलाधार चक्र से कंठ पर्यंत शक्ति समस्त चक्रों को आवेष्टित किए हुए है। शक्ति और गणेश दोनों की उपस्थिति से चेतना को उर्ध्वगामी बनाने के प्रयास आध्यात्मिक उपलब्धियों के नए-नए कीर्तिमान स्थापित करने में सफल हो सकते हैं।

हमारा शरीर प्राण से संचलित है। प्राण शक्ति हमें श्वास से मिलती है। श्वास प्रवृत्तियों का हेतु है। श्वास का संयम निवृत्ति का, स्वास्थ का, जीवनी शक्ति का। कुंडलिनी इसी ऊर्जा का नाम है। कुंडलिनी एक आध्यात्मिक शक्ति है। शिव शक्ति है, महामाया लक्ष्मी सरस्वती दुर्गा रूपा है। प्रतीकात्मक रूप से कुंडलिनी को सर्पिणी के रूप में देखा जाता है। सर्प जीवन को जन्म देने वाले जल पृथ्वी की उर्वरा शक्ति एवं इच्छाओं आकांक्षाओं के प्रतीक के रूप में विश्व के विभिन्न भागों में आदर से स्वीकृत मान्यताओं के रूप मे देखे जाते हैं। मूलाधार चक्र में कुंडलिनी रूपा सर्पिणी संभवत: इन्हीं प्रतीकों का मिलाजुला रूप है।

श्री गणेश संपूर्ण जगत की दिव्य आद्यशक्ति, मातृशक्ति के संकल्प का दिव्य साक्षात विग्रह है। मूलाधार चक्र से कंठ पर्यंत समस्त चक्रों को शक्ति अपनी चेतना के विभिन्न आयामों से आवेष्टित किए हुए हैं। श्री गणेश ही इस महाशक्ति को षटचक्रों के जागरण के लिए प्रेरित कर, ऊर्ध्वरेता, ऊर्घ्वगामी बनाकर ब्रह्मांडीय विश्वव्यापी शिवरूप महानतम चेतना के साथ संयुक्त कर मानवीय जीवन की परम आनंद की अनुभूति कराने में सक्षम है। संभवता मूलाधार चक्र में श्री गणेश की उपस्थिति का यही दिव्य संकेत श्री अथर्वशीर्ष के ऋषि द्वारा देने की कृपा की गई है।

मूलाधार चक्र में श्री गणेश एवं शक्ति रूपा कुंडलिनी का एकसाथ उपस्थित होने का एक और दिव्य संकेत है।
तंत्र योग या शाक्त मत के अनुसार संपूर्ण जगत की जननी आद्य शक्ति ही है। मूलाधार चक्र का क्षेत्र प्रजनन का क्षेत्र है। प्रजनन, निर्माण के लिए आधार चाहिए। अर्थात शक्ति अपने प्राकट्य के लिए आधार की अपेक्षा रखती है। बिना समुचित आधार के शक्ति की प्राभव्यक्ति संभव नहीं है। जिस आधार के व्याज से शक्ति प्रकट होती है, उस आधार का भी जागरुक चैतन्य गतिमान प्रतिभावान शक्तिमान बना देना शक्ति का वैशिष्ट्य है। शव को शिव बनाने की क्षमता से युक्त ‘शक्ति’ मूलाधार चक्र मेंे श्री गणेश के प्राकट्य की, उनकी नित्य उपस्थिति की आध्यात्मिक अमिकात्म को पुष्ट करने हेतु साक्षी रूप में स्वयं अपस्थित है, अथर्वशीर्ष का मनीषी ऋषि इसी रहस्य को प्रकट करता हुआ प्रतीत होता है।

गागर में सागर की उक्ति को सागर करता हुआ अथर्वशीर्ष भारतीय दार्शनिक चिंतन का अनुपम उदाहरण है। धर्म, कर्मकांड, एवं उपासना का सारमूल संक्षिप्त संस्करण अथर्वशीर्ष योग, अध्यात्म एवं ज्ञान विज्ञान के रहस्यों से भरा है। श्री गणेश की कृपा प्राप्त कोई मनीषी, शोधार्थी, विद्वान इस ज्ञान सागर से बहुमूल्य चितंन की चिंतामणि खोज कर विश्व चेतना को ज्योतिर्मय करेगा ऐसी विनम्र आकांक्षा प्रत्याक्षा श्री गणेश के चरणों में व्यक्त करते हुए अपनी तूलिका की विराम देता हूं।

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