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व्यक्ति को जीवन में अनेक भूमिकाओं में से गुजरना पड़ता है। वह जिस भूमिका में होता है उस भूमिका से उसे समरस होना चाहिये। उस भूमिका के साथ पूरा न्याय करने वाला उसका व्यवहार होना चाहिये।  यही बताने वाली एक बहुरूपिये की कथा है।

एक बार राजा भोज के दरबार में एक बहुरूपिया आता है एवं राजा से दस रूपये मांगता है। राजा भोज उसे कहते हैं, “मै प्रत्येक याचक को दान नहीं दे सकता। तुम बहुरूपिये हो, तुम ऐसा कोई स्वांग रचो जिससे लोग प्रसन्न हों। इसके बाद मैं तुम्हें तुम्हारे काम का इनाम दूंगा।”

बहुरूपिया कहता है, “ठीक है महाराज, मुझे तीन माह का समय दें।” तीन माह बाद धारा नगरी, जो राजा भोज की राजधानी थी, में एक तपस्वी आता है। शहर के बाहर एक निर्जन मंदिर में वह रहने लगता है। पद्मासन में ध्यानमुद्रा लगाकर वह बैठ जाता है। कुछ नगर रक्षक उसे देखते हैं एवं उसके पास आकर पूछते हैं कि वह कौन है? क्या उसके लिये कुछ फल वगैरे लायें?

वह साधु कुछ भी नहीं बोलता। मौन बैठा रहता है। नेत्र भी बंद रखता है। सिपाहियों को लगता है कि साधु महाराज समाधि में है। उन्हें परेशान करना ठीक नहीं। वे सिपाही गांव में जाकर लोगों को उस साधु के विषय में बताते हैं।

उस साधु के दर्शन हेतु पहले कुछ लोग अपने साथ फल-फूल-मिठाई लेकर जाते हैं एवं साधु से उसे स्वीकार करने का आग्रह करते हैं। परंतु साधु न तो कुछ बोलता है, न ही आंख खोलता है। साधु का वह निरिच्छ स्वभाव देखकर लोग उसे प्रणाम करते हैं, बहुत देर बैठे रहते हैं और फिर विनम्र भाव से घर चले जाते हैं।

इसके बाद शहर के कुछ धनी व्यक्ति अपने साथ धन लेकर आते हैं ओर उसे अर्पण करने की इच्छा व्यक्त करते है। साधु फिर भी अपना मौन व्रत नहीं तोड़ता। इसके बाद राज दरबारी एवं फिर राजा भोज स्वत: आते हैं। राजा तपस्वी साधु को बहुत धन देता है। साधु उस ओर झांकता भी नहीं है, कुछ बोलता भी नहीं है।

चौथे दिन साधु राजदरबार में जाता है। राजा को प्रणाम करता है। राजा को आश्चर्य होता है कि कल का यह तपस्वी उसे प्रणाम क्यों कर रहा है। उसी समय तपस्वी बना वह बहुरूपिया अपने स्वांग को उतारकर मूल स्वरूप में आता है एवं राजा से अपने परिश्रम के बदले धन मांगता है।

राजा उससे कहता है, “अरे, कल जब मैं तुम्हें एक लाख स्वर्ण मुद्रायें दे रहा था तो तुमने उस ओर झांका तक नहीं। और आज कुछ रूपयों के लिये याचना कर रहे हो।

बहुरूपीये ने कहा, “महाराज कल मैं एक तपस्वी था। सभी प्रकार की मोहमायाओं से दूर था। मिट्टी एवं सोना मेरे लिये समान था। तपस्वी की भूमिका में मैं इससे अलग व्यवहार कैसे कर सकता था! और यदि मोहवश करता तो साधु कुल को कालिमा लगाता।”

“आज मै आपके सामने स्वांग रचने वाला एक कलाकार बहुरूपिया हूं। सामान्य आदमी हूं। पेट की आग शांत करने के लिये मुझे धन की आवश्यकता है।“

राजा भोज प्रसन्न होकर बहुरूपिये को धन देते हैं.

जीवन में हम भी बहुरूपिये के भेष में रहते हैं। उस रूप को न्याय देनेवाला व्यवहार करना अनेक बार महाकठिन होता है, परंतु ऐसा इमानदारी से प्रयत्न करने में क्या हर्ज है?

 

 

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  1. मनुष्य को जीवन मे विभिन्न भुमिकाऐ निभानी होती है। प्रत्येक भूमिका को न्याय देना अत्यंत आवश्यक होता है । यह कहानी यही बात बताती है।

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