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नए पुरानों में समन्वय निर्माण करते हुए, समिति कार्य में औपचारिकता या संस्थागत या उद्योग-गत भाव निर्माण होने से बचते हुए समिति कार्य विस्तार करने का हम सब का संकल्प है – सत्य संकल्प का दाता तो भगवान है – हमारा भगवान सब कुछ भारत माता ही है- वह आशीष देगी। देती रहेगी।

भारत श्रुति-स्रमृतियों का देश है। श्रुति शाश्वत सिद्धान्त प्रस्तुत करती है तो स्मृति उन सिद्धान्तों का समयानुकूल स्पष्टीकरण देती है। नवीनता का स्पर्श देती है। मानव नवीनताप्रिय प्राणी है। उसको वही आनंदकारक लगता है।

राष्ट्र सेविका समिति का शाश्वत कार्य है महिलाओं को राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में अपनी भूमिका के प्रति सचेत, सक्षम बनाते हुए संगठित करना। समिति कार्य का प्रारंभ हुआ तब सामाजिक, राजनीतिक परिदृश्य अलग था। महिलाएं (कुछ अपवाद छोड़ कर) सामान्यत: घरों में बद्ध थी- शिक्षा का प्रसार सीमित था, देश पराधीन होने के कारण दबाव था, रूढ़ियों के जाल में फंस कर अपनी सामाजिक, राष्ट्रीय भूमिका भूल सी गई थीं। दीनता, लाचारी एक ओर थी तो दूसरी ओर स्वकेंद्रित पश्चिमी विचारों का प्रभाव बढ़ रहा था।

ऐसी परिस्थिति में स्त्री में आत्मसम्मान की भावना जगाना, राष्ट्ररचना में अपनी महती भूमिका के प्रति स्मरण दिलाना आवश्यक था। वह भी सांघिक आधार पर तथा नित्य अभ्यासपूर्वक। पुन: पुन: किसी काम को नियमित रूप से करने को ही अभ्यास कहते हैं। भगवान कृष्ण ने भी अर्जुन को नित्य अभ्यास का उपदेश कुशलता प्राप्त करने की दृष्टि से किया है। इसी आधार पर समिति के माध्यम से सभी आयु की महिलाओं, बालिकाओं की प्रतिदिन एकत्रित आने की योजना बनाई गई, जो शाखा पद्धति के नाम से परिचित है। उन दिनों में छंद वर्ग, अभ्यास केंद्र, क्रीडा मंडल, (टयूशन क्लासेस- यह प्रतिष्ठा की बात नहीं बनी थी अपितु टयूशन चोरी छिपे रखी जाती थी।) आदि का प्रचलन नहीं था। इसलिए विद्यालय के पश्चात् शाखा मैदान में एकत्रित आने में वैसी समय की कठिनाई नहीं थी। परन्तु सामाजिक रूढ़ियों का प्रभाव था। फिर भी शाखाओं में और शाखाओं की संख्या भी उत्तरोत्तर बढ़ती गई। वं. मौसीजी का प्रत्यक्ष उदाहरण था- घर परिवार और सामाजिक भूमिका में सामंजस्य रखने का। अत: समिति के कार्य के प्रति विश्वास के साथ मान्यता भी बढ़ती गई। अलग-अलग उत्सवों, उपक्रमों के माध्यम से कार्य सर्वस्पर्शी, सर्वव्यापी होने की दिशा में बढ़ता गया।

देश स्वतंत्र हुआ- प्राथमिकताएं बदल गईं। फिर भी अंग्रेजियत का प्रभाव था- जीवन अर्थप्रधान बन रहा था। करिअर का आकर्षण भी बढ़ता गया। व्यक्ति केंद्रितता के कारण किसी कार्य को आजीवन व्रत के रूप में स्वीकार कर उसके लिए त्याग, परिश्रम करने की भावना भी कम होती गई। और राष्ट्र-धर्म-संस्कृति आदि शब्दों का महत्व क्या कम होता जाएगा, यह विचार आज आने लगा।

संवेदनशील मन
वर्तमान परिस्थिति में मोबाईल, ई मेल-स्मार्ट फोन, व्हॉट्स एप, दूरदर्शन के कार्यक्रम, लुभावने विज्ञापन आदि के कारण उपभोग प्रधानता, व्यसनाधीनता को वैश्विक आधार मिल गया तो भारत अपवाद कैसे रहेगा? ‘उड़ता पंजाब’ ने युवा पीढ़ी की मानसिकता चित्रित की है। फिर क्या चारों ओर निराशाा का अंधेरा है, कोई मार्ग नहीं है? नहीं ऐसा तो नहीं होना चाहिए-नहीं भी है । प्रवास करते समय रेल में, हवाई जहाज में युवक युवतियां मिलती हैं। तब ध्यान में आता है हमारी बातें सुनने की, सहज सहायता करने की संवेदनशीलता उनमें हैं । कुछ करना भी चाहते हैं परंतु समय और अन्य बाधाओं के कारण कर नहीं सकते- क्या, कैसे करना है समझ में नहीं आता, तो कभी समवयस्कों के दबाव में ऐसा कुछ करना यानि प्रतिगामिता का ठप्पा लगने का डर है। बिखरती हुई परिवार व्यवस्था और शिक्षा व्यवस्था भी अधिक दिशाहीनता निर्माण करती है उसको संवारने हेतु ई-योजना बनती है।

स्मृति लेखन की प्रतिभा
मैदान में शाखा यह संकेत यथास्थान कायम रखते हुए भी कुछ परिवर्तन लाने की योजना बनाना यही नई स्मृति लिखने की प्रतिभा है। नए-नए तंत्रों का उपयोग करते हुए संवाद के तरीके अपनाने होंगे। इसके कारण मानसिक दूरी कम हुई तो प्रत्यक्ष सहयोग की भी इच्छा प्रबल होगी। यही परिवार भावना संगठन का मूलाधार बनेगी। संगणक, भ्रमण ध्वनि, एस.एम.एस, ई मेल, व्हॉट्स अप आदि का उपयोग तो करना है परन्तु हम रोबोट या डिजिटल मानसिकता के भी ना बने यह सावधानी रखनी है। ऑनलाईन व्यवहार में ठगे नहीं जाने की भी सतर्कता आवश्यक है ऐसे संभाव्य स्थान भी हम सूचित कर सकते हैं। कुछ स्थानों पर ई शाखा का प्रयोग हो रहा है वह सर्वव्यापी होगा ऐसा भी नहीं है। परंतु युवा पीढ़ी के मन में देशभक्ति का, त्याग, सेवा भावना का अंकुर है उसको सुपोषित करना और जो स्फुल्लिंग है उसको सतत प्रज्वलित रखने के मार्ग हमें ही खोजना है। वे आज अर्जुन की मानसिकता में होने के कारण मन में संभ्रम है। ‘लोग क्या कहेंगे’ इसका भी भय है। ‘मैं हिंदू’, ‘भारत माता की कन्या/पुत्र’ ऐसे खुल कर बोलने का धैर्य नहीं है। इसके लिए मरमिटने का संकल्प मन में आया तो भी व्यक्त नहीं कर सकते। अत: कुछ उसके लिए करने का भी निर्णय नहीं हो पा रहा है। सांप्रदायिक पुरानपंथी कहलाए जाने का डर हैं । पिछले साल समिति ने कुछ प्रयोग किए।

हम है भारत भाग्य विधाता
‘तेजोमय भारत’ और ‘हम है भारत भाग्य विधाता’ ये विषय केंद्रित कर तरुणी-गृहिणी संमेलनों का आयोजन किया। कुछ विद्यालयों/महाविद्यालयों में विद्यार्थी वर्ग से सीधा संवाद स्थापित किया। आधुनिक साधनों का उपयोग करके तेजोमय भारत का दर्शन कराया। स्वतंत्र देश के नागरिकों के कर्तव्य आदि विषयों पर प्रबुद्ध बहनों से चर्चा की- संवाद स्थापित किया। उसके अनुभव हीे समिति की भावी कार्य योजना है।
प्रथम तो इस योजना के लिए एक केंद्रीय टोली बना कर विभिन्न व्हॉट्स अप ग्रुप के साथ संपर्क करना होगा। आयु -क्षेत्र- रुचि के अनुसार किस ग्रुप को कौन से विषयों पर विचार देना है, चर्चा करना है यह भी निश्चित करना होगा, ऐसे गट प्रमुखों को योजनाबद्ध रीति से विचार देने होंगेे। कितने लोगों ने अपना संदेश देखा- स्वीकार किया यह संख्यात्मक जानकारी देते देते प्रत्यक्ष कार्य करने की मानसिकता बनाना है। शिक्षा, संस्कार, सेवा, उद्योग- विशेष रूप से गृहोद्योग आदि आदि के बारे में जानकारी देना है। पर्यावरण सुरक्षा, स्वच्छ भारत, परिसर स्वच्छता, नियम पालन आदि सामयिक बिंदुओं पर रुचि निर्माण करना है। मराठी में कहावत है ‘आवड आहे तिथे सवड आहे’ उसके अनुसार रुचि निर्माण करने की योजनाएं बनाना है। स्वतंत्रता दिन-गणतंत्र दिन- रक्षाबंधन, भाईदूज आदि कार्यक्रम अपने गृह-संकुलों में मनाने की योजना भी साकार होगी। वह भी एक प्रकार की शाखा ही है जहां भारत माता के प्रति श्रद्धा निर्माण करने का संकल्प है।

निरंतर चौमुखी सावधानी
भारत को उखाड़ने की योजना कौन, कैसी, कहां बना रहे हैं- वह विफल बनाने हेतु हमें क्या करना चाहिए- किन राष्ट्रीय समस्याओं को प्राथमिकता से सुलझाना है, उसमें मैं, हम क्या सहयोग दे सकते है ऐसे विचारों का आदान-प्रदान स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा और प्रत्यक्ष मिलने की भी प्रेरणा जगेगी। अनेक बाधाओं को पार कर मिलना भी प्रारंभ होगा। अपनापन-सहज स्नेह यही तो संगठन का आधार है।

नया तंत्रज्ञान कार्योपयुक्त
समिति कार्य में नए तंत्रज्ञान का उपयोग करने का एक उदाहरण। पिछले वर्ष वं.प्रमुख संचालिका मा. शांताक्का का अमेरिका का प्रवास था परंतु अचानक किसी कारण उनका जाना असंभव हुआ। तो समिति कार्यालय में बैठ कर ही उन्होंने कार्यक्रम का उद्घाटन भाषण किया। सभी ने उनको सुना और देखा भी। कार्यक्रम में बाधा नहीं आई। यह बात अलग कि प्रत्यक्ष सानिध्य नहीं हो पाया। परंतु कार्यक्रम तो यथावत् संपन्न हुआ।

आधुनिक तंत्ररूप साधनों का उपयोग करते करते स्वयं यंत्र न बनते हुए संवेदनशील, जीवन्त, क्रियाशील मन के मानव है, यह स्मरण रखने की भी सावधानी रखना अति महत्वपूर्ण है। हम सभी का डी.एन.ए. एक है यह भावना ही जाति वर्ग से ऊपर उठकर समरसता की अनुभ्ाूति देगी। एक दूसरे से जोड़ेगी। एक के पैर को कांटा चुभा तो दूसरे की आंखों में पानी आएगा फिर एक दूसरे को उखाड़ने का विचार मन को स्पर्श नहीं करेगा। व्यक्तित्व की सीमा रेखाएं मिटा कर समष्टि की परिधि में समा जाएंगे। यही संगठन का मंत्र एवं नया तंत्र- पुराने तंत्र से संतुलन रखते हुए अपनाना यह आवश्यक लग रहा है। किसी कारण कभी कभी हम हाथ से पत्र लिखेंगे-फोन पर बात भी करेंगे- केवल ई मेल, एस. एम. एस., नहीं करेंगे। हमारी शिल्पाजी कहती हैं- ताईजी, आप अपने हाथों से हमें पत्र लिखिये-बीच बीच में- वे अक्षर हमसे बोलते हैं। संगणक का कौनसा भी फॉंट हो उसमें एक ठप्पासा है-वह जीवन्त नहीं है। निरक्षर सुशिक्षित बनने से हमें बचाइए। फोन पर अपनी आवाज सुनने से भी प्रेरणा मिलती है। आवाज जीवन्त है।

इसलिए नए पुरानों में समन्वय निर्माण करते हुए, समिति कार्य में औपचारिकता या संस्थागत या उद्योग-गत भाव निर्माण होने से बचते हुए समिति कार्य विस्तार करने का हम सब का संकल्प है- सत्य संकल्प का दाता तो भगवान है- हमारा भगवान सब कुछ भारत माता ही है- वह आशीष देगी। देती रहेगी।

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