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रक्षा मंत्रालय में अब कुछ बदला-बदला सा माहौल है। निर्णय पंगुता खत्म हो गई है। नकारात्मक बातें विदा ले रही हैं। सकारात्मक कदम प्रवेश कर रहे हैं। चूंकि रक्षा कोई चर्चा का विषय नहीं होता, इसलिए जनसाधारण में बहुत बहस नहीं होती, न इसका कोई औचित्य होता है। फिर भी पिछले ६० वर्षों के कांग्रेस शासन में जो नहीं हुआ, वह हो रहा है; यह जानना जरूरी है, औचित्य भी रखता है।

रक्षा मंत्रालय में चौतरफा काम होता दिखाई दे रहा है। पहला- परम्परागत हथियारों से आधुनिक हथियारों की ओर मुड़ना, दूसरा- स्वदेशी रक्षा उत्पादन का आधुनिकीकरण करना, तीसरा- अपने विरोधियों की नकेल कसने के लिए वैश्विक स्तर पर मित्रता बढ़ाना और राष्ट्रहित में रक्षा समझौते करना और चौथा- अपने रक्षा उत्पादन के लिए बाजार खोजना। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के वैश्विक दौरे की पार्श्वभूमि में इन बातों पर विचार करें तो बहुत कुछ स्पष्ट हो जाता है। इससे यह मुद्दा भी साफ हो जाएगा कि विदेश नीति और रक्षा नीति में किस तरह अनुकूल समन्वय स्थापित हो चुका है।

इस समन्वय की फलश्रुति हाल में विभिन्न देशों से हुए रक्षा समझौते हैं। रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर का अमेरिकी रक्षा मंत्री एस्टन कार्टर से हुआ समझौता, लम्बी दूरी तक मार करने वाले भारतीय प्रक्षेपास्त्र ‘ब्रह्मोस’ को वियतनाम में तैनात करने का समझौता, फ्रांस के साथ लड़ाकू विमान ‘राफेल’ की खरीदी और भारत में उसके विनिर्माण एवं मरम्मत सुविधा स्थापित करने का लगभग तय समझौता, फ्रांस के सहयोग से पनडुब्बियों का स्वदेश में हो रहा निर्माण, नौसेना के लिए नए युद्धपोतों के निर्माण के लिए सहयोगी की तलाश आदि बातें नमूने के तौर पर प्रस्तुत की जा सकती हैं।

पहले अमेरिका से हुए समझौते ही बात। दोनों देशों के बीच यथोचित फौजी सहयोग का यह समझौता है। अंग्रेजी में इसे ‘लॉजिस्टिक्स’ कहते हैं। इस समझौते का पूरा नाम ‘लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट’ अर्थात संक्षिप्ताक्षर के रूप में एलईएमओए याने ‘लेमोआ’ है। इस समझौते से दोनों देश एक दूसरे के फौजी अड्डों का उपयोग कर सकेंगे। अमेरिकी फौजी विमान भारतीय फौजी हवाई अड्डों पर उतर सकेंगे, जबकि भारतीय विमान विश्वभर के किसी भी अमेरिकी फौजी हवाई अड्डे पर उतर सकेंगे। वहां ईंधन भर सकेंगे, मरम्मत करवा सकेंगे, एक-दूसरे को कलपुर्जों या अन्य सामानों की आपूर्ति करेंगे, अपने सैनिकों को राहत पहुंचा पाएंगे और अन्य यथोचित सहयोग पा सकेंगे। यह भारत के फौजी इतिहास में एक उल्लेखनीय घटना है।

दोनों देशों की आवश्यकता के कारण यह समझौता हुआ है। अमेरिका को अरब एवं एशियाई देशों में अपने हितों की रक्षा के लिए अब भारत की जरूरत है; क्योंकि पाकिस्तान चीन की ओर झुक जाने से उनके बहुत काम का नहीं रहा है। अमेरिका की सब से बड़ी दिक्कत चीन है, जो दक्षिण चीन सागर को अपने अधिकार में करने के लिए वहां कृत्रिम द्वीप तो बना ही चुका है, वहां उसने मिसाइलें आदि आधुनिक हथियार एवं लड़ाकू विमान भी तैनात किए हैं। अंतरराष्ट्रीय अदालत ने इस सागरी क्षेत्र पर चीन के अधिकार को ठुकरा दिया है; फिर भी चीन इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। उसने उस क्षेत्र में अपनी फौजी गतिविधियां बढ़ा दी हैं। कल यदि यह सागरी मार्ग चीन ने बंद कर दिया तो उससे लगे देशों के साथ अमेरिका को भी भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। इसलिए उसे भारत की सहायता चाहिए और चीन ने भारत को घेरने की जो नीति अपनाई है उसका प्रतिरोध करने के लिए भारत को अमेरिका की जरूरत है।

दक्षिण चीन सागर में भारत के भी आर्थिक हित हैं। वियतनाम, फिलीपीन्स में तो भारतीय उद्यम कार्यरत हैं। वहां ओएनजीसी के मातहत खनिज तेल की खोज एवं खुदाई का कार्य हाथ में लिया गया है। चीन इसका विरोध कर रहा है, लेकिन धीमी गति से क्यों न हो परंतु कार्य आरंभ हो चुका है। इससे उन देशों से और परोक्ष रूप से भारत से चीन का संघर्ष छिड़ सकता है। ऐसी स्थिति में वहां के अमेरिकी अड्डों का भारतीय विमान उपयोग कर सकेंगे और अपने सहयोगी देशों की सहायता कर पाएंगे। अमेरिका जैसी महाशक्ति साथ होने से चीन भी बहुत ऊधम नहीं मचा पाएगा। अमेरिकी नौसेना भी अपना ६०% बेड़ा हिंद व प्रशांत महासागरों में रखना चाहती है।

दक्षिण चीन सागर तो बहुत दूर, चीन तो अपने पड़ोस में बैठा हुआ है और भारत के अन्य परंपरागत विरोधी और पड़ोसी पाकिस्तान के साथ भारत को अंगूठा दिखा रहा है। इस तरह दोनों पड़ोसियों की हम पर गिद्ध दृष्टि है। चीन पाकिस्तान के साथ समझौता कर वहां महाविशाल आर्थिक मार्ग बना रहा है। यह मार्ग चीन के काशगर से आरंभ होकर पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक ३२१८ किमी लम्बा है तथा इस पर ७५ बिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च होंगे। यह परियोजना चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर अर्थात सीपीईसी के नाम से जानी जाती है, जो २०२० तक पूरी होनी है। यह महज आर्थिक ही नहीं, फौजी दृष्टि से भी पाकिस्तान को मजबूत बनाएगी और इस शक्ति का प्रयोग पाकिस्तान निश्चित रूप से भारत के खिलाफ ही करेगा। इस सामरिक स्थिति की काट के रूप में ईरान के चाबहार बंदरगाह का विकास और अमेरिका से हुआ यह लेमोआ समझौता है। संकट की स्थिति में अमेरिकी विमान भारतीय फौजी अड्डों पर उतर कर सहायता कर पाएंगे। भारत के परम्परागत मित्र सोवियत संघ के बिरखने और वैश्विक स्तर पर रूस के कमजोर होने से जो एक रिक्तता पैदा हुई थी उसे इस अमेरिकी समझौते ने भर दिया। इस तरह दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन की स्थिति पैदा हो गई है। पाकिस्तान की चिंता यही है कि उसने भारत के खिलाफ जो सामरिक रणनीति तैयार की थी, उसकी माकूल काट भारत ने पैदा कर दी है।

एक और सब से महत्वपूर्ण बात यह कि अमेरिका ने भारत को विशेष रक्षा सहयोगी देश का दर्जा दिया है। इसका अर्थ यह कि भारत अब आधुनिक अमेरिकी रक्षा टेक्नालॉजी का लगभग पूरा इस्तेमाल कर सकेगा। इससे हमारी फौज का तेजी से आधुनिकीकरण हो सकता है, जिसकी बहुत नितांत आवश्यकता इस समय है। आधुनिक समय में महज मशीन गन से गोलियां चलाने या हथगोले फेंकने से युद्ध नहीं लड़े जा सकते, असली युद्ध टेक्नालॉजी लड़ती है। वर्तमान समझौते से भारत-अमेरिका के बीच पाकिस्तान-चीन आर्थिक महामार्ग जैसी किसी विशाल परियोजना का मार्ग प्रशस्त हो सकता है, जिससे भारत में रक्षा सामग्री का उत्पादन (मेक इन इंडिया) हो, उसका निर्यात हो और आर्थिक प्रगति के साथ रोजगार के अवसर भी पैदा हो।

भारत में कम्यूनिस्टों के अलावा इस समझौते का किसी ने विरोध नहीं किया। साम्यवादियों का कहना है कि इससे भारत अमेरिका के चंगुल में फंस जाएगा। लेकिन चीन के पाकिस्तान के साथ हो जाने की क्या काट हो, इसका इनके पास कोई जवाब नहीं है। कांग्रेस के विरोध का तो कोई प्रश्न ही नहीं है; क्योंकि १९५२ में तत्कालीन प्रधान मंत्री नेहरू ने और यूपीए के दिनों में तत्कालीन प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने भी ऐसे समझौते की पेशकश की थी। नेहरू के जमाने में भारत के साम्यवादियों की ओर झुकने के कारण अमेरिका ऐसे समझौते के लिए तैयार नहीं थी, और मनमोहन सिंह के जमाने में रक्षा मंत्री एंटनी डरपोक किस्म के थे, इसलिए साहस नहीं जुटा पा रहे थे।

चीन को घेरने की एक सामरिक नीति के रूप में इस समझौते को देखा जा सकता है। इसी दिशा में वियतनाम से हुआ अन्य रक्षा समझौता भी उल्लेखनीय है। हाल में प्रधान मंत्री श्री मोदी की वियतनाम यात्रा के दौरान यह समझौता हुआ। इस समझौते के तहत भारत वियतनाम को ५०० मिलियन अमेरिकी डॉलर का ॠण (क्रेडिट लाइन) उपलब्ध करेगा। इस राशि से वियतनाम में ब्रह्मोस नामक भारतीय मिसाइलें स्थापित की जाएंगी। याद रहे कि भारत और रूस के बीच एक संयुक्त रक्षा परियोजना के तहत ब्रह्मोस (भारत की ब्रह्मपुत्र एवं रूस की मास्को नदियों के नामों का संक्षिप्त रूप) नामक उपखंडीय प्रक्षेपास्त्र को विकसित किया गया है। इसका भारत में उत्पादन किया जाता है। यह प्रक्षेपास्त्र फिलहाल ३,५०० किमी तक अचूक मार कर सकता है। इसकी रेंज अब ५,००० किमी तक की जा रहा है। वियतनाम में इन प्रक्षेपास्त्रों की तैनाती का अर्थ वियतनाम की चीन से रक्षा करना तो है, भारतीय हितों की भी रक्षा करना है। वहां भारत की कई तेल खनन परियोजनाएं हैं। इसके अलावा दक्षिण चीन सागर के व्यापारिक मार्ग को चीन के चंगुल में जाने से बचाना भी है। जाहिर है कि अमेरिका तो यह चाहता भी है और रूस भी ब्रह्मोस को वियतनाम में तैनाती पर सहमति जताकर भारत से सहयोग कर रहा है। इसे चीन को दुनिया में अलग-थलग करने की नीति के रूप में भी देखा जा रहा है।

जिस और एक रक्षा समझौते का आरंभ में उल्लेख किया गया है वह फ्रांस से है। इस पर अभी दस्तखत होने हैं, लेकिन कहा जा रहा है कि नया प्रारूप लगभग दोनों देशों ने स्वीकार कर लिया है। यह समझौता राफेल नामक जेट लड़ाकू विमानों की खरीदी के बारे में था। मूल प्रस्ताव अनुसार भारत फ्रांस से ऐसे १२६ विमान खरीदना चाहता है, लेकिन इसकी राशि एवं बाद में इसके भारत में निर्माण के बारे में दोनों देशों में हिचक थी। इसलिए मोदीजी की पिछली फ्रांस यात्रा में यह समझौता नहीं हो पाया था। अब फ्रांस इस बात पर सहमत हो गया है कि शुरुआत में ३६ विमानों की आपूर्ति का सौदा हो। इस सौदे की राशि कोई ५५,००० करोड़ रु. (७.३ बिलियन यूरो) बैठती है। सौदे की आधी राशि भारत में पुनः निवेशित की जाए, लेकिन मेक इन इंडिया का इसमें कोई जिक्र नहीं है। अब नई व्यवस्था के तहत ३६ विमान सीधे प्राप्त होंगे, जबकि इसकी आधी राशि का निवेश फ्रांस को भारत में ही करना होगा। यह शर्त अब दोनों देशों को मंजूर हो गई लगता है। सब से बड़ी बात यह कि गतिरोध टूटा और यह मात्र सौदे का एक छोटा सा हिस्सा है। शेष के लिए और रास्ते निकल सकते हैं और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर भी समझौता हो सकता है। वायुसेना की वर्तमान आवश्यकता के कारण हम सौदे को बहुत ज्यादा खींच पाने की स्थिति में नहीं थे, यह वास्तविकता समझ लेनी चाहिए।

फ्रांस के ही एक अन्य रक्षा समझौते का उल्लेख करना जरूरी है। नौसेना के लिए परमाणु अस्त्रों से लैस पनडुब्बियां बहुत आवश्यक है। वर्तमान में ऐसी पनडुब्बियों की संख्या न के बराबर है, जबकि पाकिस्तान ने ऐसी पनडुब्बियां चीन से हासिल कर ली हैं। हमारे पास जो रूसी पनडुब्बियां थीं, वे पुरानी हो चुकी हैं, कुछेक किसी तरह चल रही हैं, लेकिन दुर्घटना की संभावना हमेशा बनी रहती हैं। इसलिए फ्रांस के सहयोग से मुंबई की मझगांव गोदी में ९ पनडुब्बियां बनाई जा रही थीं और एक का जलावतरण भी अब होने वाला था कि उसकी तकनीकी व अन्य फौजी जानकारी आस्ट्रेलिया के एक अखबार ने प्रकाशित कर दी। अखबार का कहना है कि उसे परियोजना से जुड़े कुछ फ्रेंचों से यह रूपरेखा मिली थी। अब इस मामले की जांच हो रही है। लेकिन इससे जो नुकसान हुआ, उससे कोई इनकार नहीं कर सकता। हो सकता है कि पनडुब्बियों के अगले निर्माण में उसकी प्रौद्योगिकी बारीकियां बदल दी जाए। शायद इस कांड के बाद ही फ्रांस कुछ झुक गया और ३६ राफेल विमानों की आपूर्ति के लिए और सौदे की आधी राशि का भारत में ही निवेश करने के लिए तैयार हो गया।

कांग्रेस के ६० साल के राज में कभी-कभी रक्षा समझौतों की बातें सुनाई देती थीं। उसमें भी रूस एक पक्ष हुआ करता था, अन्य किसी देश के साथ समझौते बहुत कम होते थे या होते ही नहीं थे। कुछ सौदे तो भ्रष्टाचार के बलि चढ़ गए। बोफोर्स तोप सौदा पाठकों को याद होगा, जो राजीव गांधी के शासन में भ्रष्टाचार की बलि चढ़ गया। मनमोहन सिंह के जमाने में तो सरकार लंगड़ाते हुए किसी तरह चलती रही, निर्णय पंगुता ने रक्षा क्षेत्र को भी संकट में डाल दिया। जनता को लगता ही नहीं था कि केंद्र में भी कोई सरकार होती है। लेकिन अब सारा परिदृश्य बदलता दिखाई दे रहा है।

 

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