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देखा जाए तो सभी को त्यौहारों का बेसब्री से इंतजार रहता है। स्वादिष्ट खाना, सुंदर कपड़े, गहने और ढेर सारी मस्ती। हम युवाओं को और चाहिए क्या? लेकिन क्या त्यौहार का मतलब सिर्फ स्वादिष्ट भोजन और सुंदर परिधान है? तो इसका उत्तर है नहीं। हमारी भारतीय संस्कृति सदियों से हमें बहुत कुछ सिखाती आई है। भारत के विभिन्न भागों में मनाए जाने वाले विभिन्न त्यौहार भी इसी का एक प्रतीक है। भारत में त्यौहार केवल त्यौहार नहीं तो पूरे परिवार का एक सामूहिक मिलन, अनेकता में एकता के सूचक और हमारी दैनंदिन जिंदगी के लिए मिलने वाली छोटी-छोटी सीख का दूसरा नाम है।

घर से बाहर निकलने पर त्यौहारों की सीख आई काम: जब हम हमारे घर में होते हैं तब घर के बड़े बुजुर्ग त्यौहारों पर हमें परंपराएं समझाते हैं, बहुत कुछ बताते हैं। घर पर रहते तक यदि वह हमें याद रहें तो इसमें कोई बड़ी बात नहीं लेकिन यदि ये ही परंपराएं घर से बाहर निकलने पर हमारा साथ दें तो हमने सचमुच इन परंपराओं से कुछ सीखा है। कुछ ऐसा ही अनुभव रहा है, पुणे से कोईम्बतुर पढ़ने के लिए गई सृजा सखदेव का। वह बताती है, कमर्शिअल डिझाइन में मास्टर्स करने जब वह कोईम्बतूर गईं तब दक्षिण भारत की संस्कृति से उनकी पहली बार पहचान हुई। लेकिन गणपती के त्यौहार पर महाराष्ट्र की संस्कृति जब दक्षिण भारत में पहुंचाने का मौका मिला तब त्यौहारों का असली मतलब समझ आया। सृजा कहती हैं, इतने साल सीखी हुईं प्रथाएं वहां खुद के बल पर निभाई, मैंने और मेरे कुछ महाराष्ट्रियन दोस्तों नें पूरे कॉलेज के लिए मराठी खाना बनाया। ‘उकडीचे मोदक’ यह महाराष्ट्र की खाद्य परंपरा दक्षिण भारत में भी प्रसिद्ध हुई। साथ ही हमारे अभ्यास में डिझायनिंग के विविध रूपों का उपयोग कर महाराष्ट्र की परंपरा की एक थीम लेकर हमने हमारे दक्षिण भारतीय दोस्तों को समझाया।
पिछले साल कागज की पैठणी साडी पर गणपती बिठाने की परंपरा लिख कर तो इस बार मराठा साम्राज्य का इतिहास डेकोरेशन के माध्यम से बताकर हमें भी खुशी हुई। सृजा बताती है, अगर घर पर त्यौहारों में यह सीख न मिली होती तो आज हम यहां घर से दूर इतना सब कभी न कर पाते। केवल गणपती नहीं, तो गुडी पाडवा और दक्षिण भारत का ओणम त्यौहार भी हम इसी तरह साथ मनाते हैं। कॉलेज में भारत के हर कोने से विद्यार्थी आए हैं इस कारण भारत के हर त्यौहार को हम इसी तरह मिलजुल कर मनाते हैं। त्यौहार का असली मतलब अपनी परंपराएं अपने तक न रखकर सबके साथ बांटना और सबको शामिल करना है।

पूरे परिवार का साथ मिलना ही असली त्यौहार: त्यौहार में अकेले सज संवर कर भी कौन सा मजा आता होगा? है ना। जब तक परिवार का साथ न हो तब तक कोई त्यौहार त्यौहार नहीं होता। जबलपुर में एमबीए कर रहीं नित्या बक्शी बताती हैं, आज अनेक लोगों के लिए त्यौहार का मतलब बदल गया है। नए कपड़े, सुंदर तैयार होना यह सब खुशी का प्रतीक न रहकर केवल सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के लिए रह गया है, लेकिन त्यौहार का असली मतलब परिवार का साथ और खुशियां बांटना होता है। चाहे वह दिवाली हो, राखी हो, होली हो या लोहड़ी हो, परिवार के साथ के बिना कोई त्यौहार पूरा नहीं है। पंजाबियों में तो बड़ा परिवार होता है। त्यौहारों की परंपराएं समझने का यही समय होता है। परिवार के साथ हमेशा साथ रहने वाली यादें बनाते वक्त सेल्फी खींचना किसे याद रहेगा। त्यौहार का असली मतलब परिवार का साथ है।

खुशियां बांटना ही त्यौहार है: त्यौहार में खुश तो सभी होते हैं, लेकिन जिन्हें खुशियों की सबसे ज्यादा जरूरत है उनके साथ खुशियां बांटना ही असली त्यौहार है। जिनके पास त्यौहार मनाने के लिए साधन होते हैं और परिवार भी, उनके लिए तो हर दिन त्यौहार है। लेकिन जिनके पास यह कुछ भी नहीं उनके साथ खुशियां बांटना ही असली त्यौहार है। इंजीनियरिंग की छात्रा जोईता चक्रबर्ती बताती हैं, त्यौहारों पर परिवार का साथ होना बहुत जरुरी है। लेकिन जिनके पास परिवार नहीं उनका परिवार बनकर उनके साथ खुशियां बांटना ये त्यौहार के असली मायने हैं। हमारे परिवारों में भी लोग अलग-अलग शहरों में रहते हैं, त्यौहार के समय ही सब मिल पाते हैं। इसी तरह जिन लोगों का कोई नहीं उन्हें भी त्यौहारों में अपनापन देना ही त्यौहार का असली मतलब है।

मिलबांटकर काम करना: त्यौहार ये घर की महिलाओं की या केवल घर के बड़ों की जिम्मेदारी नहीं, तो त्यौहार मतलब सभी का मिलबांटकर काम करना। सातवीं कक्षा में पढ़ रही फडणवीस बताती हैं, हमारी सोसायटी में छोटे से लेकर बड़े तक अनेक बच्चे हैं। हमें घर पर हमेशा सिखाया जाता है कि,कोई भी काम मिल-बांटकर करना चाहिए। गरीब बच्चों के त्यौहार भी खुशी से बीत पाए इसलिए हम सभी बच्चों नें मिल कर दिवाली पर दीये, डेकोरेशन और कंदील के स्टॉल लगाए और उससे जमा हुए पैसों से हमने गरीब बच्चों का त्यौहार और भी खुशियों से भरा हुआ बनाने की कोशिश की। होली में भी पानी की बचत करने के लिए हमने सभी सोसायटी के सभी लोगों से मदद मांगी। इन सभी से हमने टीम वर्क सीखा, एकसाथ काम करना क्या होता है यह सीखा। किसी अच्छे काम को करने के लिए एक व्यक्ति की नहीं एक टीम की जरूरत होती है। और हमने त्यौहारों से यही सीखा।

सही मायने में त्यौहार केवल सुंदर कपड़े पहन कर सेल्फी खींचना नहीं। अपनी परंपराओं को केवल सोशल मीडिया तक सीमित रखना नहीं तो त्यौहार सभी के साथ मिलकर मनाना, सबके बारे में सोचना है। हम युवाओं के लिए त्यौहार के मायने अलग हैं। चाहे परिवार हो या समाज जिस त्यौहार में किसी को खुशी ना मिले वह त्यौहार त्यौहार नहीं। बदलते समय में युवा भले ही बदलें हों पर परंपराओं से मिली सीख अभी भी जिंदा है इसका परिचय त्यौहार की इन व्याख्याओं से मिलता है।

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