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पिछले दिनों आम आदमी पार्टी के मंत्री संदीप कुमार को पार्टी ने निष्कासित कर दिया। वजह थी उस रेकॉर्डिंग का सामने आना जिसमें वे किसी महिला के साथ आपत्तिजनक स्थिति में दिखाई दिए। पार्टी के अन्य सभी कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल तथा अन्य वरिष्ठ नेताओं की तारीफ करते नहीं थक रहे थे कि किस तरह उन लोगों ने बिना किसी की परवाह किए सच्चाई का साथ दिया और अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ता को दोषी पाते ही उस पर कार्रवाई कर दी। वे साथ ही यह कहने से भी नहीं चूके कि अन्य पार्टियों को इससे सबक लेना चाहिए। अन्य पार्टियों को सबक देने वाली आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता खुद कितने पानी में हैं ये तो आए दिन पता चलता रहता है। पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल भी अपने विवादित बयानों के कारण सुर्खियों में बने रहते हैं। अब प्रश्न यह है कि अगर यह पार्टी इन्हीं झमेलों में फंसी रही तो वे सारे काम कब करेगी जिसके लिए पार्टी का गठन हुआ है?

किसी भी स्थापित व्यवस्था को बदलने के लिए उतनी ही या उससे अधिक मजबूत आधार वाली नई व्यवस्था की आवश्यकता होती है। यह नियम समाज के हर अंग पर लागू होता है; तो इससे भारतीय राजनीति अछूती कैसे रहेगी? स्वतंत्रता के बाद की भारतीय राजनीति के इतिहास को अगर देखा जाए तो मुख्य रूप से दो ही पार्टियां दिखाई देती हैं जिन्हें राष्ट्रीय पार्टी कहा जा सकता है- कांगे्रस तथा भाजपा। निर्माण के समय इन दोनों ही पार्टियों का आधार ‘विचार’ था। स्वतंत्रता आंदोलन के समाप्त होने, स्वतंत्रता मिलने और पं. जवाहरलाल नेहरू के प्रधान मंत्री बनने के बाद यह पार्टी परिवारवाद से ग्रसित हो गई और आज तक ग्रसित ही है। अब केवल भाजपा ही ऐसी पार्टी है जिसे वैचारिक आधार वाली तथा लोकतांत्रिक पार्टी कहा जा सकता है। जहां अभी तक शीर्षस्थ नेताओं में से किसी के भी वंशजों ने पार्टी पर अपना एकाधिकार नहीं जमाया है।

किसी भी पार्टी या संगठन की उम्र उतनी ही लंबी होती है जितनी उसके कार्यकर्ताओं की निष्ठा का आधार प्रबल होता है। भाजपा में कार्यकर्ताओं की निष्ठा उसके ‘विचार’ पर है और कांग्रेस में परिवार पर। हालांकि अब कांग्रेस की भी कमान जिन पारिवारिक कंधों पर है वे भी उतने मजबूत दिखाई नहीं देते, फिर भी कार्यकर्ताओं की निष्ठा ने उन्हें किसी तरह ताकत दी हुई है।

इन दोनों पार्टियों की लीक से हटकर भारतीय राजनीति में आम आदमी पार्टी नामक एक नई पार्टी का उदय हुआ। अण्णा हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ छेड़े गए आंदोलन में अरविंद केजरीवाल उनका दाहिना हाथ थे। राजनीतिक पार्टी का चेहरा प्राप्त होते ही अण्णा हजारे अरविंद केजरीवाल से अलग हो गए परंतु अरविंद को कुछ अन्य लोगों का साथ मिल गया और उन्होंने आधिकारिक रूप से नई राजनैतिक पार्टी का ऐलान कर दिया। पार्टी के साथ समाज के विभिन्न तबके के लोग जुड़े। यूपीए शासन के भ्रष्टाचारों से पीड़ित जनता को अरविंद केजरीवाल की बातों में सच्चाई और उनके वादों में अपने लिए कुछ खास नजर आने लगा था। खासकर उन लोगों के मन में आशा की उम्मीद जगी थी जो कांग्रेस और भाजपा दोनों से ही परेशान हो चुके थे, जिनकी निष्ठा दोनों ही से उठ चुकी थी। ऐसे में आम आदमी पार्टी का उदय उनके लिए बेहतरीन विकल्प था।

लोकसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी कुछ खास नहीं कर पाई परंतु दिल्ली के चुनावों में उसने अपना परचम लहरा दिया। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी और अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री। अब होना तो यह चाहिए था कि चुनावों से पूर्व उन्होंने दिल्ली की जनता से जो वादे किए थे उन्हें पूरा करने की कोशिश करते। शीला दीक्षित की सरकार को जिन कारणों के लिए वे कोसते थे उन कारणों का निर्मूलन करते। दिल्ली की भ्रष्टाचार से पीड़ित जनता को सुशासन देने की व्यवस्था करते। बिजली, पानी, वाईफाई इत्यादि सुविधाएं अपने वादे के अनुसार लोगों को मुहैया करवाते, महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करते……परंतु ऐसा कुछ हुआ नहीं। सड़कों का ट्रैफिक कम करने और जाम जैसी समस्या से निपटने के लिए ऑड ईवन सिस्टम शुरू करने के अलावा दिल्ली की जनता उनके किसी अच्छे काम को याद नहीं करती। करे भी तो कैसे अगर कोई अच्छा काम किया ही नहीं तो।

अपनी हर नाकामयाबी का ठीकरा केंद्र सरकार और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी पर फोड़ने वाले अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी ने अब पंजाब की तरफ अपना रुख किया है। गौरतलब है कि पंजाब में फिलहाल अकाली दल और भाजपा की मिलीजुली सरकार है जो कि नशाखोरी को न रोक पाने, पाकिस्तानी सीमा से लगे क्षेत्रों से होने वाली घुसपैठ आदि कारणों से पंजाब की जनता की नजरों से गिर चुकी है तथा लोकसभा चुनावों में देश भर में कांग्रेस की जो किरकिरी हुई उसके बाद पंजाब की जनता कांग्रेस को चुनने का ‘रिस्क’ नहीं ले सकती। ऐसे में अरविंद केजरीवाल को पंजाब में अपना सिक्का चलने की उम्मीद दिखना गलत नहीं है। परंतु अरविंद शायद यह भूल गए कि किसी भी स्थापित व्यवस्था को बदलने के लिए उतनी ही या उससे अधिक मजबूत आधार वाली नई व्यवस्था की आवश्यकता होती है। पंजाब की जनता अब किस आधार पर उन पर विश्वास करें? उनको दिल्ली की जनता के जो अवसर दिया था उसे भी वे गंवाते नजर आ रहे हैं। मुख्य मंत्री होने के नाते विकास की नई योजनाएं बनाकर उन्हें अमलीजामा पहनाने की जगह वे केंद्र सरकार के खिलाफ ही धरना देते बैठ जाते हैं। ऐसे में क्या कोई राज्य केवल धरना देने वाला मुख्य मंत्री चाहेगा?

जैसे कि लेख की शुरुआत में ही कहा गया कि किसी भी पार्टी या संगठन की उम्र उतनी ही लंबी होती है जितनी उसके कार्यकर्ताओं की निष्ठा का आधार प्रबल होता है। अरविंद केजरीवाल की पार्टी की निष्ठा का आधार क्या है? अगर हम कहें कि ‘विचार’ तो वह विचार तो तभी खत्म हो गया मालूम होता है जब आंदोलन ने पार्टी का स्वरूप लिया था। भ्रष्टाचार मुक्त भारत का स्वप्न देखने और दिखाने वाले अरविंद केजरीवाल के कई साथियों पर ही आए दिन भ्रष्टाचार और अन्य आरोप लगते रहते हैं जिनका ताजा उदाहरण ही मंत्री संदीप कुमार है जिन्हें पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया। ऐसे में कोई कार्यकर्ता पार्टी की विचारधारा के कारण उससे जुड़ा है ऐसा कहीं भी नजर नहीं आता।

दूसरा अगर कहें कि उनकी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल के प्रति उनकी निष्ठा है तो पार्टी में उन पर उंगली उठाने वालों की भी कमी नहीं है। अपनी मर्जी से पार्टी छोड़ कर जाने वाले अधिकतम लोगों का यही कहना है कि पार्टी में लोकतंत्र नहीं है। अरविंद केजरीवाल पार्टी कार्यकताओं पर अपने निर्णय थोपते हैं। जो कार्यकर्ता गलत आचरण में लिप्त पाए जाते हैं उन्हें अरविंद निकाल देते हैं और जिन्हें अरविंद के निर्णय पसंद नहीं आते वे खुद पार्टी छोड़ देते हैं। ऐसे में अगर पार्टी में ही एक साथ मिलजुलकर संगठनात्मक तरीके से काम करने की क्षमता नहीं है तो वे कैसे किसी राज्य का शासन चलाएंगे? और अगर अरविंद अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को ही नहीं संभाल पा रहे हैं तो वे किसी राज्य को कैसे संभालेंगे?

अरविंद केजरीवाल के पास राजनीति, नेतृत्व और संगठन तीनों का अत्यंत अल्प अनुभव है। कार्यकर्ताओं की रुचि, उनके पार्टी के साथ जुड़ने का प्रयोजन, उनकी महत्वाकांक्षा, पार्टी के लिए उनकी उपयोगिता तथा पार्टी के लिए उनसे करावाया जाने वाला कार्य इन सभी का गणित समझने में जितना समय लगता है उतना तो अरविंद ने खुद कार्यकर्ता के रूप में भी नहीं गुजारा तो वे नेता के रूप में लोगों में इनकी पहचान कैसे करेंगे? आंदोलन को जनाधार मिलना और उसका पार्टी के रूप में कार्य करना इसके बीच का अंतर अरविंद केजरीवाल को समझना होगा। हर चुनाव से पहले की जाने वाली जोड़तोड़ (ताजा उदाहरण नवजोत सिंह सिद्धू) से चुनाव तो जीता जा सकता है परंतु चुनाव के बाद जब सरकार चलाने की बारी आती है तो आईना साफ दिखाई देने लगता है।

देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करके साफसुथरा बनाने के लिए अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी की स्थापना की और बड़ी शान से उसका चुनाव चिह्न झाडू रखा था परंतु अब उसी झाडू के तिनके बिखरते नजर आ रहे हैं। कहीं ऐसा न हो कि आगामी चुनावों से पहले और कुछ तिनके बिखर जाएं और अरविंद कहें- बिखर गए झाडू के तिनके अब सफाई कैसे हो?

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