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गाने में मोहम्मद रफी कुछ संस्कृत शब्दों का उच्चारण ठीक से नहीं कर पा रहे थे, तो नौशाद ने तुरंत ही बनारस से संस्कृत पंडितों को बुलावा भेज दिया था. उन्होंने रफी को सही  उच्चारण में मदद की, तब कहीं जाकर कई बार रिहर्सल के बाद नौशाद ने फाइनल रिकॉर्डिंग की मंजूरी दी. इसी का नतीजा था कि ये गाना आज भी दुनिया भर के मंदिरों में गाया और सुना जाता है.

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