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संगठित हो नारी शक्ति देश अब आधार मांगे,
राष्ट्र की तन्द्रा मिटाने शक्ति का अवतार जागे।

राष्ट्र सेविका समिति- विश्व का यह सबसे बड़ा हिन्दू महिलाओं का संगठन आगामी विजयादशमी को अपनी स्थापना के ८० वर्ष पूर्ण करने जा रहा है। अपने क्रियाकलापों से राष्ट्रजीवन के विविध पहलुओं को प्रभावित करने वाले किसी भी सामाजिक- सांस्कृतिक संगठन के लिए यह एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। एक ऐसा पड़ाव जहां पहुंचने पर वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में अतीत का विश्लेषण और भविष्य की योजनाओं की समीक्षा करना उचित होता है।

स्थापना – परिचय – इतिहास
१९३६ में विजयादशमी के दिन महाराष्ट्र के वर्धा में वं. स्व. श्रीमती लक्ष्मीबाई केलकर (मौसीजी) ने राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना की। संगठन की स्थापना का ध्येय रखा गया तेजस्वी राष्ट्र का पुनर्निर्माण। इस ध्येय को परिपूर्ण करने का आधार है शीलवती, धैर्यशालिनी, सामर्थ्यवान, संगठित नारीशक्ति। और लक्ष्यपूर्ति का अमोघ साधन है शाखा। शाखा याने निश्चित स्थान पर नियमित रूप से एकत्र आना और विभिन्न कार्यक्रमों के द्वारा शरीर, मन, बुद्धि एवं आत्मा का विकास करना। यह समन्वित विकास राष्ट्र सेवा के लिए हो ऐसा सहज संकल्प करने का स्थान है, समिति शाखा का मैदान। ‘विकसित व्हावे, अर्पित होऊन जावे’ की अनुभूति का स्थान है, शाखा का मैदान।

वास्तव में यह कोई नया कार्य नहीं है। सदियों से चलता आया दायित्व है। राष्ट्र की रक्षा के लिए जीवन अर्पण करने वाली वीरांगनाओं, देशहित के लिए अपनी संतानों को सर्वस्व समर्पित करने के लिए बाध्य करने वाली माताओं और संपूर्ण समाज को अपने कर्तृत्व से दिशा दर्शन कराने वाली महिलाओं के चरित्रों से हमारे इतिहास के पन्ने गौरवान्वित हुए हैं। परापूर्व से अपने इस दायित्व का सुचारू रूप से निर्वहन करने वाली हिन्दू नारी बीच के संक्रमण काल में अपने उत्तरदायित्व के प्रति विस्मृत सी प्रतीत हो रही थी। उस प्रतिकूल समय में भी सुशीलादीदी, दुर्गाभाभी और अनसूयाबाई काले जैसी महिलाएं दीपस्तंभ की भांति कर्तृत्व बिखेर रही थी। परंतु अधिकांश भारतीय महिलाएं अभी तंद्रावस्था में थीं। घर की चार दीवारों में बंद थीं। ऐसे समय में जिस प्रकार जाम्बुवंत ने हनुमानजी को अपनी शक्ति का स्मरण कराया था उसी प्रकार भारतीय नारी को अपनी अन्तर्निहित शक्ति से परिचित कराने का काम लक्ष्मीबाई केलकर ने राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना के माध्यम से किया। महिलाओं का संगठन ही क्यों?

भारतीय चिंतन के अनुसार समाज जीवन की सबसे छोटी इकाई व्यक्ति नहीं अपितु परिवार है। जैसा परिवार वैसा समाज। और परिवार का केंद्रबिंदु है स्त्री। जिस प्रकार एक कोशिका की शक्ति उसकी नाभि में रहती है उसी प्रकार परिवार की समर्थता और सम्पन्नता का आधार है स्त्री। तेजस्वी राष्ट्र के पुनर्निर्माण का आधार है सक्षम समाज, समाज की सक्षमता का आधार है सुदृढ़ परिवार और परिवार की सुदृढ़ता का आधार है शारीरिक, बौद्धिक, नैतिक और आत्मिक रूप से सामर्थ्यशाली नारी। नारी की गरिमा को उजागर कराते हुए दुर्गा सप्तशती में कहा है कि, विद्या: समस्तास्तव देवि भेदा:, स्त्रिया: समस्ता: सकला जगत्सु। अर्थात् हे देवी! समस्त संसार की सब विद्याएं तुम्हीं से निकली हैं तथा सब स्त्रियां तुम्हारा ही स्वरूप है। नारी शक्ति है, सृजेता है, निर्मात्री है। इस ब्रहमयी चैतन्य की अंश स्वरूप नारी का स्वयं का परिष्कार व निर्माण हो, उसका लाभ उसे तो मिले ही इसके उपरांत उसकी क्षमताओं से, पावन संवेदना से परिवार, समाज और राष्ट्र भी लाभान्वित हो। इस प्रकार की सोच से प्रेरित होकर राष्ट्र सेविका समिति का कार्य आरम्भ हुआ।

वं. मौसीजी के ध्यान में और एक बात आई। उस समय भारत परतंत्र था। एक लंबे अरसे तक हम आक्रांताओं के प्रभुत्व में रहे। सदियों की इस दासता का कारण यह नहीं था कि हम में शक्ति की कमी थी अथवा हमारे शत्रु अत्यंत पराक्रमी थे। हमारे पराभव का सबसे बड़ा कारण था संगठन का अभाव। कतरने चाहे रेशम की हों या मलमल की उसकी कोई कीमत नहीं होती है। लेकिन उसी कतरनों का अगर पूरा थान हो तो वह बहुमूल्यवान होता है। उसी प्रकार संगठित समाज ही राष्ट्र को परमोच्च स्थान दिला सकता है और उस स्थान पर उसे कायम रख सकता है।

शाखा: अमोघ साधन
तेजस्वी राष्ट्र निर्माण के ध्येय को साकार करने के लिए साधन है शाखा। समिति की शाखा में आकर हर आयु-समूह की महिलाएं/बालिकाएं कुछ सामूहिक गुणों की उपासना कराती हैं जैसे कि समता, सांघिक गीत इत्यादि। शाखा में प्रवेश पाना अत्यंत सरल है। इसमें हर किसी महिला के लिए खुला प्रवेश है। यहां आकर कुछ व्यक्तिगत गुणों की सामूहिक उपासना की जाती है जैसे कि, समय पालन, अनुशासन, शौर्य, समर्पण, साहस इत्यादि। छोटे-छोटे खेलों के माध्यम से नेतृत्व, निर्णय क्षमता, जरूरत पड़ने पर दूसरों की सहायता की तत्परता जैसे गुणों का विकास सहजता से होता है। कहा जाता है कि विचार से कृति, कृति से स्वभाव, स्वभाव से चरित्र और चरित्र से नियति का निर्माण होता है। स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि अपने मस्तिष्क को उच्च विचारों और उच्चतम आदर्शों से भर लो। उन्हें रात-दिन अपने सामने रखो। उसीसे महान कार्य का जन्म होगा। शाखा के माध्यम से ऐसे उच्च विचारों और आदर्शों का नियमित संस्कार और बारंबार अभ्यास सहजता से होता है। इस प्रकार शाखा राष्ट्रीय आकांक्षाओं को पूर्ण करने वाला कल्पवृक्ष है। राष्ट्र की क्षीण प्राणशक्ति को पुनर्जीवित करने वाली संजीवनी है। राष्ट्र शरीर की हर व्याधि की अमोघ औषधि है।

संपूर्ण भारत में व्याप्त २,७०० से अधिक शाखाओं से संस्कारित लगभग ५५,००० से अधिक समिति कार्यकर्ती समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में अपना सहयोग दे रही हैं। समिति की सेविकाएं शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक आत्म-निर्भरता जैसे विषयों को लेकर देशभर में ४७५ से अधिक सेवा प्रकल्पों को चला रही हैं। इसके अतिरिक्त प्रति वर्ष प्रत्येक प्रान्त में दीपावली और गर्मियों के अवकाश में ५ से लेकर १५ दिन के लिए विशेष शिक्षा शिविरों का आयोजन होता है। इस वर्ष लगभग ९,००० बालिकाएं/युवतियां और ३,००० व्यवसायी महिलाएं इन शिक्षा वर्गों में सम्मिलित हुईं। राष्ट्र सेविका समिति द्वारा शाखा और शिक्षा वर्गों के उपरांत जागरण और प्रबोधन द्वारा भी लक्ष्य प्राप्ति के लिए बहुविध उपक्रम लिए जाते हैं। इस वर्ष ८० वर्ष की पूर्णाहुति की उपलक्ष्य में लगभग २०० स्थानों पर आयोजित किए गए युवती सम्मेलनों में ६५,००० से ज्यादा १६-४५ आयु-समूह की युवतियां सम्मिलित हुईं।

सामाजिक समरसता और शाखा
शाखा द्वारा एक और बात सिद्ध होती है। सेविकाओं में समरसता का भाव जागृत होता है और यह भाव अपने तक सीमित न रह कर पूरे समाज में प्रसारित होता है। जिस भारतीय समाज की महिलाओं को संगठित करने का व्रत समिति ने लिया है वह समाज अनेक जातियों, भाषाओं, पंथों और सम्प्रदायों में बंटा है। शाखा के छोटे-छोटे कार्यक्रमों के माध्यम से यह भेद, ये दूरियां, यह अंतर मिटता है। समिति के उद्देश्य को प्रकट करने वाली एक आज्ञा शाखा में दी जाती है। ‘एकश: सम्पत्’- यानी एक पंक्ति में खड़े रहो। पढ़े लिखे हो या अनपढ़, इस जाति के हो, या उस जाति के, धनी हो या गरीब, यह भाषा बोलने वाले हो, या वह भाषा बोलने वाले हो, यह सब इस ‘एकश: सम्पत्’ की आज्ञा मिलने पर एक पंक्ति में खड़े हो जाते हैं।

शाखा में शायद समाज सुधारकों के समान जातिभेद को मिटाने के लिए कड़े भाषण नहीं दिए गए होंगे। जातिप्रथा मानने वालों को उग्र शब्दों में कभी प्रताड़ित भी नहीं किया गया होगा। फिर भी सभी को जाति के अभिमान से ऊपर उठाया है। यह एक अलग तरीका है। किसी फलक पर खींची गई रेखा को छोटी करना है, तो उसके दो तरीके होते हैं। एक तरीका यह है कि डस्टर से उस रेखा को मिटाते जाना। और दूसरा तरीका है, उससे और बड़ी रेखा खींचना, ताकि, पहली रेखा अपने-आप छोटी हो जाए। समिति ने यह दूसरा तरीका अपनाया।

समिति और अन्य महिला संगठन में अंतर
अन्य नारीवादी संगठनों की तरह राष्ट्र सेविका समिति महिला द्वारा स्थापित एवं संचालित संगठन है। लेकिन समिति और अन्य महिला संगठन के बीच मूलभूत अंतर यह है कि प्रायः नारीवादी संगठनों का विचार केवल महिलाओं के हितों की रक्षा के आस-पास केंद्रित रहता है; जबकि समिति अपने ‘मैं’ को बड़ा करके समाज केंद्रित विचार करती है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो राष्ट्र सेविका समिति महिलाओं का, महिलाओं द्वारा समाज के लिए काम करने वाला संगठन है अधिकांश मामलों में नारीवादी संगठनों की विचारधारा पुरुष-द्वेष में परिणित होती दिखाई पड़ती है। समिति की विचारधारा किसी के विरोध में नहीं है। किसी का द्वेष और विरोध नारीत्व नहीं है, बल्कि सबके प्रति प्रेम, सबके प्रति विश्वास और आत्मीयता यही नारीत्व का परिचायक है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि अन्याय और अत्याचारों को भी चुपचाप सहा जाए। लेकिन अनावश्यक स्पर्धा को टाला जा सकता है। भारतीय चिंतन के अनुसार स्त्री और पुरुष एक दूसरे के स्पर्धक नहीं अपितु एक दूसरे के पूरक हैं। और दोनों मिल कर उभय के उत्थान में एवं समाज और राष्ट्र के उत्कर्ष में एक दूसरे के सहायक हैं। रघुवंश के प्रारंभ में शिव-पार्वती को वंदन करते हुए उनका, ‘शब्द और अर्थ के अनुसार परस्पर मंण संपृक्त’ (एक जान ) ऐसा वर्णन किया है (वागर्थाविव संपृक्तौ)। शब्दों के बिना अर्थ हो नहीं सकता; और अर्थ के बिना शब्द केवल आवाज है। स्त्री और पुरुष का ऐसा निरंतर परस्परावलंबी साहचार्य हिंदू संस्कृति को अभिप्रेत है। इसी चिंतन का अनुसरण कराते हुए रा.से.स. विभिन्न विषयों/मुद्दों में एक संतुलित, सर्वांगीण मत रखती है।

तेजस्वी राष्ट्र के मानक
रा.से.स. का लक्ष्य अपनी इस गौरवमयी मातृभूमि को विश्व में सर्वाधिक तेजस्वी राष्ट्र के रूप में प्रस्थापित करना है। ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में हमारा देश सर्वश्रेष्ठ हो। आर्थिक दृष्टि से वह स्वावलंबी और संपन्न हो। भारत ने कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया है, लेकिन अगर भारत पर युध्द थोपा जाए तो युद्ध में भारत हमेशा अजेय हो। इसके साथ भारत केवल एक देश ही नहीं है, जीवन का एक प्राचीन विचार है। भारत एक गुणवाचक शब्द है। एक चिंतन है। एक जीवन दृष्टि है। और यह जीवन दृष्टि एकात्म और सर्वांगीण है। यह जीवन दृष्टि भारत के राष्ट्र जीवन के हर पहलू में प्रकट होनी चाहिए।

आध्यात्मिकता का अर्थ सबकुछ त्याग देना नहीं है। भारतीय विचारधारा के अनुसार भौतिक प्रगति और आध्यात्मिक उन्नति दोनों का सामान महत्व है। लेकिन भौतिक प्रगति धर्माधारित हो। इस प्रकार एक सर्वांगीण उन्नत, अजेय, सर्वश्रेष्ठ समाज और राष्ट्र हम निर्माण करना चाहते हैं। और परम वैभव की हमारी इस आकांक्षा में विश्वहित की कल्पना समाहित है।

तेजस्वी राष्ट्र के निर्माण का दिव्य लक्ष्य लिए आज समिति की सेविकाएं समाज के विभिन्न क्षेत्रों में फैली हुई हैं। समाज एक व्यामिश्र अस्तित्व होता है। यानी उसके जीवन के अनेक क्षेत्र होते हैं। जैसे राजनीति, धर्मकारण, शिक्षा, उद्योग, व्यापार, कृषि आदि। समाज जीवन के अनेक घटक भी होते हैं, जैसे महिला, छात्र, शिक्षक, वनवासी, नगरवासी,ग्रामवासी, कामगार, डॉक्टर, अधिवक्ता आदि। इन सभी क्षेत्रों में तथा घटकों में सेविकाएं अपने राष्ट्रभाव और चरित्र सम्पन्न आचरण शैली लिए गुनगुना रही हैं-
सेविके बढ़े चलो लक्ष्य तक चढ़े चलो,
विजन मशाल हाथ ले तमस को मिटा चलो।

 

 

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