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१५ अगस्त १९४७ को सत्ता हस्तांतरण के उपरांत सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक स्तर पर भारत में कई परिवर्तन आए हैं। इन ६८ वर्षों में भारत में अमीरों और गरीबों के बीच खाई बढ़ी है, वहीं प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हुई है। विभिन्न शासकीय योजनाओं के परिणामस्वरूप अब भारत में कोई भूखा नहीं सोता, लेकिन दहेज प्रथा, जाति प्रथा, लड़की के बजाए लड़का ही पैदा करने की रूढ़िगत मान्यताएं कहीं-कहीं भारतीय जनमानस में अपने विकराल रूप में मौजूद हैं, जबकि शिक्षा का स्तर बढ़ गया है। यू.डी.आई.एस.ई. डाटा २०१५ के अनुसार भारत में १४,४५,८०७ प्राथमिक शालाएं हैं, जिनमें से ८५.५१% गांवों में हैं किन्तु ४.४१% स्कूल एकल कक्ष वाले ही हैं और शिक्षकों की संख्या अपर्याप्त है।
भारत में गांवों की संख्या में पिछले दशक में २,२७९ की वृद्धि हुई है एवं जनगणना आयोग की रिपोर्ट के अनुसार २००१ में गांवों की संख्या ६,३८,५८८ से बढ़ कर २०११ में ६,४०,८६७ हो गई है, जबकि १९५१ की जनगणना के अनुसार भारत में केवल ५,६६,८७८ गांव थे, जिनमें से ४,७०,७३६ गांवों की आबादी १,००० से भी कम थी। २०११ में भारत की ३१.१६% जनसंख्या नगरों में तथा ६८.८४% गांवों में रहती है जबकि १९५१ में केवल १७.३% जनसंख्या नगरों में तथा ८२.७% गांवों में रहती थी। आज भी ग्रामीण जनसंख्या सर्वाधिक ८९.९६% हिमाचल प्रदेश में तथा सब से कम ५१.५५% तमिलनाडु में है। बिहार ८८.७%, असम ८५.९२%, ओड़ीशा ८३.३२%, उत्तर प्रदेश ७७.७२%, छत्तीसगढ़ ७६.७६%, झारखण्ड ७५.९५% और मध्यप्रदेश ७२.३७% जनसंख्या गांव में रहती है। उत्तर प्रदेश में वर्तमान में सर्वाधिक गांव १,०६,७०४ और सब से कम १११ गांव दिल्ली में हैं। मध्यप्रदेश में ५४,९०३, बिहार में ४४,८७४, राजस्थान में ४४,६७२, महाराष्ट्र ४३,६६३, कर्नाटक २९,३४०, आन्ध्रप्रदेश २७,८०० और गुजरात में १८,५३९ गांव हैं। १९५१ में भारत की जनसंख्या १.२५% वार्षिक वृद्धि दर के साथ ३६.१ करोड़ थी, जो कि २०११ में १.९५% वार्षिक वृद्धि दर के साथ १२१.०२ करोड़ हो गई, जिससे स्पष्ट होता है कि जनसंख्या वृद्धि दर में भी बढ़ोतरी हो रही है, जो कि जनसंख्या विस्फोट का एक प्रमुख कारण है।
पिछली जनगणनाओं के आंकड़ों के विश्लेशण से यह स्पष्ट होता है कि भारत में मनुष्य-भूमि अनुपात निरंतर बढ़ रहा है। इसी प्रकार देश में महिलाओं की संख्या में भी निरंतर गिरावट हो रही है। वास्तव में देश में स्त्री-पुरूष अनुपात में राज्यवार भिन्नता दिखाई देती है। जहां केरल में प्रति हजार पुरूषों पर १,०८४ महिलाएं हैं तो दिल्ली में मात्र ८६६। इन आंकड़ों के विश्लेषण से यह भी स्पष्ट होता है कि शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की संख्या ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा अत्यंत कम है। यदि हम वैश्विक आंकड़ों को देखें तो रूस में प्रति हजार पुरूषों पर १,१४४ महिलाएं, ब्रिटेन में १,१०४ तथा अमेरिका में १,०५० महिलाएं निवास करती हैं।
यदि हम बाल लिंगानुपात को देखें तो भारत के ८७ जिले ऐसे हैं जहां यह राष्ट्रीय औसत ९१८ से भी कम है। इसीलिए भारत के प्रधान मंत्री माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी ने ‘‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’’ का नारा दिया है, किन्तु स्वतंत्रता के ६८ साल बाद भी हमारी मानसिकता नारी विरोध की ओर जाती दिखाई दे रही है। भारत में महिलाओं को पुरूष के साथ बराबरी के अधिकार प्राप्त थे, किन्तु आज शिक्षा का स्तर बढ़ने के बावजूद आंकड़े प्रतिगामी हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के २०१४ के रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रतिदिन ९३ लड़कियां बलात्कार का शिकार हो रही हैं और उनके साथ छेड़छाड़ आदि के मामले बढ़ रहे हैं। क्या यही हमारा ‘‘यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते…’’ है?
भारत सरकार द्वारा महिलाओं के विकास के लिए सुकन्या समृद्धि, हिम्मत और उज्ज्वला आदि योजनाएं अच्छी पहल हैं। पंचायतों में तो महिलाओं को ३३% आरक्षण दिया गया है, किन्तु भारतीय संसद में १२.़२% सीटों पर ही महिलाएं काबिज हैं। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की वर्ष २०१५ की मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार बांग्लादेश में २०% एवं पाकिस्तान में १९.७% महिलाएं संसद में हैं और अपने पड़ोसी पिछड़े देशों से भी हम पीछे हैं।
विभिन्न शोधों से यह स्थापित तथ्य है कि जिस देश में साक्षरता अनुपात जितना अधिक होगा, उस देश का विकास उतना ही अधिक होता है। १९५१ की जनगणना के अनुसार भारत में साक्षरता का प्रतिशत १८.३३ था जिसमें निरंतर वृद्धि हो रही है और २०११ में यह ७४.०४% हो गया है। इस प्रकार साक्षरता में लगभग चार गुना वृद्धि हुई है। यहां यह तथ्य चिंताजनक है कि आज भी ३५.५५% महिलाएं निरक्षर हैं, जबकि १७.८६% पुरूष ही निरक्षर हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में साक्षरता दर शहरी क्षेत्रों से भी कम है। केरल राज्य में साक्षरता दर जहां ९३.९१% है वहीं बिहार में सबसे कम ६३.८२% है। इसी तरह भारतीय लोगों की प्रत्याशित आयु १९५१ में ३२.१ वर्ष थी। वह विभिन्न स्वास्थ्य संबंधी शासकीय योजनाओं तथा विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों के जागरूकता कार्यक्रमों के परिणाम स्वरूप २०११ में बढ़ कर ६६.१ वर्ष हो गई है। इसके बढ़ने का मुख्य कारण सामान्य मृत्यु दर एवं बाल मृत्यु दर में तेजी से कमी होना है तथा भारतीयों की शिक्षा, रहन-सहन के स्तर में वृद्धि एवं चिकित्सा सुविधाओं में वृद्धि का परिणाम है। इसके बावजूद भारत की प्रत्याशित आयु वर्ल्ड डेवलपमेंट इंडीकेटर्स २०१२ के अनुसार जापान के ८३ वर्ष, स्विट्जरलैण्ड ८२, कनाडा ८१, ब्रिटेन ८०, अमेरिका ७८ एवं चीन ७३ वर्ष से कम है।
आज भारत में ७८% गांवों का विद्युतीकरण किया जा चुका है, जबकि १९४७ में केवल ३.९% गांवों में बिजली उपलब्ध थी। यह भी विडम्बना है कि भारत में कुल विद्युत उत्पादन का लगभग ३३% चोरी चला जाता है, जो २४,००० करोड़ रूपये प्रति वर्ष बैठता है। आज आवश्यकता यह है कि हम जल एवं ताप विद्युत पर निर्भरता कम करें और सौर ऊर्जा युक्त घरों, कार्यालयों तथा उद्योगों का विकास कर स्वदेशी की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ा सकते हैं। भारतीय लोग प्राचीन काल से ही सड़कों का महत्व समझते थे, इसलिए ईसा से ३,५०० वर्ष पूर्व भी भारत में सड़कों के संदर्भ मिलते हैं।
आज़ादी के समय तक भारत में गांवों में परिवहन का प्रमुख साधन बैलगाड़ी या घोड़ागाड़ी ही थी। देश में उस समय १.५ करोड़ बैलगाड़ियां थीं जिनमें ३ करोड़ बैल जोते जाते थे और इनके रखरखाव पर भी कोई अतिरिक्त खर्च नहीं होता था। बैल, खेतों की जुताई के भी काम आते थे और उनका खानादाना खेतों से आसानी से प्राप्त हो जाया करता था। अब भारतीय खेतों से बैलों को हटा कर ट्रेक्टर को स्थापित करने से हमें डीजल का और अधिक आयात करना पड़ रहा है जिससे विदेशी मुद्रा खर्च होती है। भारत में १९५०-५१ में १.५७ लाख कि.मी. पक्की एवं २.४३ लाख कि.मी. कच्ची इस प्रकार कुल ४ लाख कि.मी. की सड़कें थीं, जो अब बढ़ कर ४२.३६ लाख कि.मी. हो गई हैं। भारत के पूर्व प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार ने २५ सितम्बर २००० को प्रधान मंत्री सड़क योजना शुरू की, जिसके द्वारा अब तक ५०० आबादी वाले सभी गांवों को पक्की सड़क से जोड़ा जा चुका है। सड़कों के आने से जहां मानव पर्यटन बढ़ा है वहीं किसानों का माल भी तेजी से बाजारों में पहुंचने लगा है।
भारत में जल परिवहन का उल्लेख प्राचीन शास्त्रों में मिलता है। यूनानी यात्री मेगस्थनीज ने लिखा था कि भारत में ५८ नदियों के द्वारा जल परिवहन होता है, किन्तु अंग्रेजों ने आंतरिक जल परिवहन व्यवस्था को ठप किया तथा रेल्वे का विकास किया। इसलिए हमें जल परिवहन को पुन: प्रोत्साहित करना चाहिए। पहले भारत के गांवों में संचार का प्रमुख साधन डाक विभाग की सेवाएं हुआ करती थीं, वहीं आज ९५% ग्रामीण परिवार मोबाईल फोन का उपयोग कर रहे हैं तथा ९६% गांवों में टी.वी. तथा रेडियो की पहुंच हो गई है। इस प्रकार हम देखते हैं कि गांवों में आर्थिक विकास की दृष्टि से विभिन्न धनात्मक परिवर्तन हो गए हैं।
श्री दीनदयाल उपाध्याय जी अप्रैल १९५४ में पूर्णिमा के दिन उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थ नगर जिले के बांसी नामक ग्राम की पदयात्रा के समय प्यास लगने पर एक गरीब किसान दम्पति से पानी पिलाने को कहा तो उनकी पत्नी पानी के साथ सभी को गुड़ भी खिलाईं और बदले में किसी भी प्रकार का धन लेने से इंकार कर दिया और कहा कि यह अतिथि देवो भव रूपी हमारे संस्कार हैं। इसे देखकर उपाध्याय जी के कहे शब्द ‘‘ग्रामवासी अनपढ़ और निर्धन होते हुए भी कितने संवेदनशील, सभ्य और उदार हैं। भारत के वैशिष्ट्य एवं जीवन मूल्यों को अपनी खस्ता हालत में भी बड़ी निष्ठा के साथ टिकाये हुए हैं। शहरों से शिक्षित एवं धनी लोगों में जीवन मूल्य का र्हास हो रहा है और सामाजिक जीवन से चेतना गायब हो रही है। ग्रामों में विद्यमान इस उदात्त आचरण का प्रवाह हमें गांवों से शहरों की ओर बढ़ाना होगा।’’ अतएव आज सभी शिक्षा संस्थाओं में भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक मूल्यों की शिक्षा अनिवार्य किया जाना चाहिए। इसी प्रकार आदरणीय नाना जी देशमुख के मार्गदर्शन में दीनदयाल शोध संस्थान द्वारा चित्रकूट के आसपास ५०० गांव में किया गया ग्रामीण विकास का कार्य तथा श्री अन्ना हजारे द्वारा रालेगण सिद्धी में किया गया कार्य अनुकरणीय है तथा भारत के गांवों को विकसित करने के लिए इन्हीं मॉडलों पर कार्य करना उचित होगा।
इला भट्ट ‘‘सेवा’’ नामक संस्था की संस्थापक हैं और गुजरात के आणंद तथा सुरेन्द्र नगर जिलों के गांवों में ‘‘स्मार्ट गांव’’ कार्यक्रम सफलतापूर्वक चला रही हैं। उन्होंेने स्थानीय पैदावार से भोजन की आवश्यकता, प्राथमिक शिक्षा में ग्रामीणों का सहयोग लेकर स्थानीय वस्तुओं से मकान व स्वरोजगार के विविध प्रकल्प चलाए जिससे गांव पुन: स्वावलम्बी बन गया। उनका कहना है कि आखिर खाद्यान्न बाहर से आएगा, ग्रामों में उपयोग होने वाली प्रौद्योगिकी बाहर से खरीदी जाएगी और आवास के लिए किसी दूर शहर की हाऊसिंग योजना का यदि हम उपयोग करेंगे तो हम अपने गांव एवं समुदाय की आज़ादी गंवा बैठेंगे। अतएव भारत का विकास गांवों को आत्मनिर्भर एवं स्वावलम्बी बनाकर ही किया जा सकता है।
आज भारत के गांवों का अस्तित्व इतने सामाजिक, आर्थिक विकास के बाद भी खतरे में है; क्योंकि समस्त अन्न, जल और वायु गंभीर रूप से प्रदूषित एवं विषयुक्त हो गई है। इस दीपावली पर हम सब मिट्टी के दीये जलाएंगे और अपने बच्चों को न तो भैंस का दूध पिलाएंगे और न ही ’’रासायनिक परिष्कृत दूध’’ पिलाएंगे वरन् केवल ‘‘गो-रस’’ ही पिलाएंगे और वास्तविक ‘‘गोवर्धन पर्व’’ मनाएंगे। यदि यह संकल्प पूरा हो गया तो भारत का सच्चा राष्ट्रवाद उदय होगा और स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग बढ़ेगा और हमारा राष्ट्र फिर से सोने की चिड़िया में परिवर्तित हो जाएगा।
इन सभी चर्चाओं से यह भी स्पष्ट है कि भारत में गरीबों एवं बेरोजगारों की संख्या नित्य बढ़ रही है। उसका मुख्य कारण अधिकांश कार्यों का मशीनीकरण किया जाना है, जबकि भारत की स्थिति अन्य देशों से भिन्न है। यहां मानव संसाधन भरपूर है, किन्तु उसका सुनियोजन नहीं किया गया है। देश की गरीबी मिटाने के लिए हमें गांवों को स्वावलम्बी बनाने के लिए कुटीर उद्योग, विषरहित जैविक खेती एवं गौ पालन तथा औषधीय पौधों से जड़ी-बूटी निर्माण तथा प्रत्येक घर में खादी एवं सूती वस्त्रों का निर्माण तथा उपयोग को बढ़ावा देकर आनंद के दीप जलाएंगे तो भारत का हर गांव, हर घर इस दीप पर्व पर प्रकाशित व आलोकित हो जाएगा।

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