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विश्वास की शक्ति बहुत बड़ी होती है। कार्य पर, नेतृत्व पर विश्वास होना चाहिये। श्रध्दायुक्त भक्ति भक्तों में अपार सामर्थ्य का निर्माण करती है। श्रध्दा के कारण सामान्य मनुष्य भी बड़े-बड़े काम कर जाते हैं। श्रध्दा के कारण उनमें अपार शक्ति निर्माण होती है। तमिलनाडु के यंगालुर एवं संत अप्पार की यह कहानी है।

यंगालुर की संत अप्पार पर बहुत श्रध्दा थी। यंगालुर अमीर थे। उन्होने अपने पैसों से जगह-जगह श्रध्दालुओं के लिये धर्मशालाओं का निर्माण किया। उन सब को अपने गुरू अप्पार का नाम दिया। अपने एक पुत्र का नाम भी उन्होंने “अप्पार” रखा।

इन सब में मजेदार बात याने उसने संत अप्पार को कभी देखा भी नही था। परंतु उनके उपदेशों को उसने आत्मसात कर लिया था। गुरू से उसने कोई गुरूमंत्र भी नही लिया था। एकलव्य एवं द्रोणाचार्य की जोड़ी का यह तमिल अवतार कह सकते हैं।

एक बार एक आश्चर्यजनक बात हुई। यात्रा के दौरान रास्ता भटकने से संत अप्पार यंगालुर के गांव पहुंच गये। वहां वे क्या देखते हैं कि उनके नाम धर्मशालायें हैं, उनके नाम से अन्नछत्र चल रहे हैं, उनके भजन मंडल हैं इ.। संत अप्पार के गांव में पहुंचने के पूर्व ही उनकी वार्ता गांव में पहुंच चुकी थी।

अप्पार अपने गांव आये हैं, यह समझते ही यंगलुर दौड़कर अपने गुरू के दर्शन को जाता है एवं उन्हे साष्टांग प्रणाम करता है। भक्तिभाव से उन्हे अपने घर ले जाता है। आज उसके घर दिवाली ही थी। गुरू के भोजन के लिये उत्तम रसोई बन रही थी।

खाना खाने हेतु केले के पत्तों की आवश्यकता थी, इसलिये यंगलुर ने अपने बड़े पुत्र को बगीचे से केले के पत्ते लाने के लिये भेजा। वहां एक बड़े नाग के काटने से यंगलुर के पुत्र की मृत्यु हो जाती है। लड़का अभी तक वापस क्यों नहीं आया? यह जानने के लिये यंगालुर स्वत: बगीचे में जाता है जहां वह देखता है कि उसका बेटा मरा पड़ा है। गुरूजी के भोजन में देरी न हो इसलिये वहां बेटे के शव को केले के पत्तों से ढंक कर दूसरे पत्ते लेकर घर आता है।

गुरू एवं अन्य लोग पंगत में भोजन करने बैठते हैं। तभी गुरू अप्पार पूछते हैं, “बच्चे कहां हैं? उन्हे भी भोजन के लिये बुलाइयें।”

यंगालुर ने कहा कि बच्चे आजुबाजु कही खेल रहे होंगे। वे बाद में आ जायेंगे, आप तो भोजन कर लीजिए। परंतु संत अप्पार यंगालुर की बातों को नकार देते हैं एवं उन्हे आवाज देकर बुलाने को कहते है।

यंगलुर बाहर आकर बच्चों को आवाज देता है। उसमें उस बच्चे का नाम भी शामिल होता है जो खेत में मरा पड़ा है। और क्या आश्चर्य अन्य बच्चों के साथ वह पुत्र भी बाग से उठकर आता है।

यंगालुर को लगता है, यह गुरूदेव का चमत्कार है। वह गुरूदेव को सत्य घटना बताता है। संत अप्पार गंभीर होकर एक ही वाक्य बोलते हैं, “यंगालुर मेरी साधना की अपेक्षा तुम्हारी श्रध्दा (विश्वास) अत्यंत बलवान है।, उसी का यह परिणाम है।”

 

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