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भारत ग्राम-प्रधान देश है। यहां का ग्रामीण समाज कृषि पर निर्भर है और कृषि कई अन्य तरह की परम्परागत उद्यमों पर निर्भर है। यहां की कमजोर होती ग्रामीण अर्थव्यवस्था ने हमारे सामने कई तरह की समस्याएं उत्पन्न कर दी हैं। गांव के बरक्स शहर रोजगार का केन्द्र बनता जा रहा है। गांवों से पलायन होती आबादी एक तरफ कंक्रिट के जंगल और बड़े-बड़े उद्योग कल-कारखानों को लगाने में मददगार साबित हो रही है तो वही दूसरी ओर इससे नई तरह की समस्या भी उत्पन्न होती रही है। कमजोर होती ग्रामीण अर्थव्यवस्था से बेरोजगारी की दर बढ़ती जा रही है।
आज हमारे सामने विश्व की तमाम तरह की अर्थव्यवस्था का उदाहरण मौजूद है। इन अर्थव्यवस्थाओं के मद्देनजर यह आकलन करना आसान हो गया है कि किस तरह की व्यवस्था अपनाने से विकास को सही मायने में पाया जा सकता है। ये तमाम अर्थव्यवस्थाएं सम्पूर्ण विकास के लिए नाकाफी साबित हो रही हैं। तब हमारे सामने प्राचीन और परम्परागत व्यवस्था, जिसके हिमायती महात्मा गांधी भी थे, बच जाता है। गांधी के ग्राम मॉडल के जरिए भी बढ़ती हुई आबादी को रोजगार और सम्मान दिया जा सकता है। देश के विकास में कमजोर से कमजोर आदमी की भागीदारी गांधी के ग्राम मॉडल के साथ सुनिश्चित की जा सकती है। गांधी कहते हैं, ‘‘मैं ऐसे भारत के लिए कोशिश करूंगा, जिसमें गरीब-से-गरीब आदमी भी यह महसूस करें कि यह उसका देश है, जिसके निर्माण में उसकी आवाज का महत्व है।’’
आज़ादी के बाद हमने विकास का जो रास्ता अख्तियार किया, उस पर चल कर, आज सत्तर साल बाद भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को विकसित करने का विमर्श हम कर ही रहे हैं। इस व्यवस्था ने हमें आगे जरूर बढ़ाया, पर सही मायने में विकास से हम दूर खड़े हैं। हमारे पुरखों ने जो दिशा तय की थी उससे हम भटक गए। जिसका नतीजा यह हुआ कि सिर्फ शहर केन्द्रित विकास हम कर पाए हैं। जिसमें आधी से ज्यादा आबादी को हमने दरकिनार कर दिया है, जो परम्परागत रूप में हमारे विकास की धुरी रहे हैं। यह पूर्ण सत्य है कि गांव बदलेगा तभी ही देश बदलेगा। देश के हर हाथ को काम मिलेगा, तब सही मायने में हम खुशहाल बनेंगे। इसके लिए आवश्यक है कि गांवों को मजबूत किया जाए।
हम गांधी के रास्ते पर चल कर देश को सफल बना सकते हैं। गांधी ने ग्रामीण व्यवस्था को लेकर अपनी परिकल्पना प्रस्तुत की। इस परिकल्पना को अपना कर, समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर, आगे बढ़ा जा सकता है। आज दुनिया भर में विकास का जो रास्ता अपनाया गया वह एकांगी और विषमतापूर्ण है। इससे दुनिया के सामने नई तरह की चुनौती आई है। यह चुनौती है बेरोजगारी, गरीबी और असमानता। इस एकांगी व्यवस्था नें हिंसा की भावना को भी भड़काने का काम किया है। जबकि गांधी का ग्रामीण मॉडल विकास का रास्ता प्रकृति के साहचर्य में, मानवता के लिए हैै। गांधी के इन विचारों को अपनाकर समरस समाज का निर्माण किया जा सकता है।
आज गांवों की परिस्थिति भी बदली-बदली नज़र आती है। गांव भी बाज़ार के जद में है। इस बाज़ारवादी व्यवस्था ने लोगों के शोषण का काम किया है। इसने ऐसा तंत्र विकसित किया है कि लोगों को गैरजरूरी वस्तु भी जरूरी-साी जान पड़ती है। बाज़ार के भ्रम का जाल गांव-गांव तक फैल चुका है। आज हम मशीन उत्पादित वस्तुओं के उपभोक्ता बन चुके हैं। इस उपभोक्तावादी संस्कृति ने हमारी भूख बढ़ा दी है। हम अपनी आवश्यकता पूर्ति व धन-उपार्जन के लिए शहरों में पलायन करते जा रहे हैं, जिससे एक तरह की अव्यवस्था बनती जा रही है। इस बाज़ार भ्रमजाल को गांधी के रास्ते पर चल कर ही तोड़ा जा सकता है। कृषि आधारित ग्रामीण व्यवस्था को बचाया जा सकता है।
आज भी तकरीबन ६० फीसदी से ज्यादा जनसंख्या रोजगार के लिए कृषि पर आश्रित है। देश के लगभग एक अरब बीस करोड़ की जनसंख्या को पेटभर भोजन किसानी से प्राप्त होती है। किसान हमारे अन्नदाता हैं। गांधी कहते हैं, ‘‘किसान को दुनिया का पिता कहा गया है। अगर परमात्मा देने वाला है, तो किसान उनका हाथ है।’’ किसानी के इस पवित्र काम को आगे बढ़ाने की जरूरत है। इसके लिए ग्रामीण समाज और उसकी तंत्र व्यवस्था को मजबूत करके समाज को सही दिशा में ले जाया जा सकता है।
हमारे देश में ग्रामीण समाज की समृद्ध परंपरा रही है, जो हर लिहाज से आत्मनिर्भर समाज था। अंग्रेजी शासन व्यवस्था के दौरान भी ग्रामीण समाज सशक्त था। अंग्रेजों द्वारा आत्मनिर्भर ग्रामीण व्यवस्था को साजिशन नष्ट करने का काम किया गया। भारत के ब्रिटिश गवर्नर सर चार्ल्स मेटकाफ ने, भारत के ग्रामीण समाज के लिए कहा, ‘‘ये ग्राम समाज छोटे-छोटे प्रजातंत्र हैं, जिन्हें अपनी आवश्यकता की लगभग हर वस्तु अपने भीतर ही मिल जाती है। जो विदेशी संबंधों से लगभग स्वतंत्र होते हैं। वे ऐसी परिस्थिति में भी टिके रहते हैं, जिनमें दूसरी हर वस्तु का अस्तित्व मिट जाता है।’’
चार्ल्स मेटकाफ ने जिस भारतीय समाज को देखा था वह समाज हर लिहाज से आत्मनिर्भर समाज था। यह समाज उपभोक्ता नहीं बना था। हम उत्पादक थे। भारतीय ग्रामीण समाज का अपना अर्थतंत्र व समाजतंत्र था, जिसकी बुनियाद पर ग्रामीण व्यवस्था टिकी हुई थी। गांधी ने इस व्यवस्था का सूक्ष्मावलोकन किया था। गांधी एक तरफ स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय थे तो दूसरी तरफ भारत के ग्रामीण समाज के ताने-बाने को समझने और इसका निदान करने के प्रयास में थे। उन्होंने यह समझ लिया था कि भारत को जितनी राजनीतिक आज़ादी की आवश्यकता है उतनी ही इसके सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने की। सामाजिक सूत्र को मजबूत करने से ही गांव मजबूत बनेगा। तभी गांवों का स्थायी विकास संभव हो सकेगा और गांव विकास का केन्द्र बनेगा। आज दुनिया की तमाम अर्थव्यवस्था केन्द्र में विकास का सिद्धांत है, ऊपर से रिस कर नीचे तक आना। आज इस अर्थव्यवस्था का दुष्परिणाम हमारे सामने है। जिसमें बहुसंख्यक आबादी विकास में भागीदार नहीं बन पाती है। विकास कुछ लोगों द्वारा और कुछ लोगों तक सीमित रहता है। जबकि विकास का गांधीवादी मॉडल नीचे से ऊपर तक बढ़ने का सशक्त मार्ग दिखाता है।
हमारे गांव की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है। किसानी हमारे ग्रामीण समाज का मुख्य पेशा रहा है। किसान अन्न उपजा कर अपना पेट तो भरता ही है साथ ही वह सबको अन्न द्वारा जीवन देता है। आज यह पवित्र किसानी मजबूरी में किया जाने वाला काम बन गया है। इसमें से जीवन देने की पवित्र भावना निकल गई है। बुद्धि और श्रम के बीच के विभेद ने इस भावना की महत्ता को कम किया है। आज श्रमशील व्यक्ति की प्रतिष्ठा समाज नहीं करता। सिर्फ बुद्धि को वरीयता दी जाने लगी है। खैर, आज किसानी घाटे का सौदा बनता जा रहा है। आर्थिक और सामाजिक दोनों लिहाज से। हमने जब से नई-नई तकनीकों का ईजाद किया और खेती का काम भी हम इन तकनीकों के सहारे करने लगे हैं, इन तकनीक के प्रयोग से उत्पादन तो बढ़ा है इसके साथ ही लागत भी कई गुणा बढ़ गई है। दूसरी तरफ रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग से कई तरह की बीमारियां भी लोगों में बढ़ने लगी। यानी तकनीक और रासायनिक उर्वरक खेती-किसानी के लिए लम्बे समय तक फायदेमंद साबित होने वाला नहीं है। आज अत्यधिक उर्वरकों के प्रयोग से खेत ऊसर बनते जा रहे हैं। ये बातें किसानी के लिए मौजूदा गंभीर संकट है।
कीटनाशक और उर्वरक के प्रयोग से एक तरफ खेती की लागत बढ़ रही है तो दूसरी तरफ लागत के अनुपात में बाजार मूल्य का संकट बढ़ता जा रहा है। यह घाटे का सौदा लम्बा चलने वाला नहीं है। अब हमारे सामने एक ही विकल्प बचता है परम्परागत ढंग से खेती। परम्परागत तरीके से खेती करने पर लागत को कम से कम किया जा सकता है। खेती को फायदेमंद बनाने के लिए परम्परागत अन्य विकल्पों पर भी विचार करना होगा। खेती के पूरक के रूप में पशुपालन की परम्परा हमारे यहां पुरानी परम्परा है। यह परम्परा खेती के पूरक का काम करती है। पशु उत्पाद से न सिर्फ आमदनी बढ़ाई जा सकती है बल्कि कृषि कार्य में भी यह मददगार साबित होता है। पशु गोबर खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के काम आती है। गाय का मूत्र नीम के साथ मिला कर पौधों को कीट से बचाने के काम आता है। कीटनाशक के अत्यधिक उपयोग से उत्पन्न होने वाली बीमारियों से भी बचा जा सकता है। परम्परागत खेती के तरीकों से हम अपनी जरूरत भी पूरी कर सकते हैं और साथ ही अपनी जरूरत के अनुसार धन अर्जन भी कर सकते हैं।
आज हमारे समाने एक और बड़ी समस्या खड़ी हो रही है वह है, जोत की जमीन की समस्या। आबादी बढ़ती जा रही है। उसी अनुपात में जोत की जमीन का बंटवारा भी होता जा रहा है। जिससे दिन-प्रतिदिन जोत की जमीन कम होती जा रही है। जोत के जमीन का संकट आने वाले समय में सबसे गंभीर संकट बनने वाला है। गांधी ने इसका समाधान निकाला-सामुदायिक खेती और सामुदायिक रूप से पशुपालन। इस समस्या से गांवों के लोग सामूहिक रूप से खेती और पशुपालन करें तो जोत के जमीन की समस्या से निपटा जा सकता है।
हमें आज गांवों को और खेती को बचाने के लिए परम्परागत उद्योगों को बढ़ावा देना होगा। मोटे तौर पर हम अपने परम्परागत उद्योगों को दो वर्गों में बांट सकते हैं। पहला- कृषि और उससे जुड़ा हुआ उद्यम और दूसरा- ग्रामीण समाज का पंरपरागत दस्तकारी और कारीगरी। परम्परागत उद्यम प्राचीन समय से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संचालित करने का काम कर रही है। हमारे यहां खेतिहर-ग्रामीण समाज का हुनर विश्व प्रसिद्ध था। भारत का बना कालीन, दरी, ऊनी शॉल, रेशम के वस्त्र आदि की मांग दुनिया भर में थी। तांबे के बर्तन, मिट्टी के खिलौने और उस पर की गई चित्रकारी मनमोहक होती थी। इसकी बाजार में अच्छी कीमत थी।
खेती के साथ कारीगरी और दस्तकारी दोनों पूरक अर्थव्यवस्था का काम करती हैं। आज इस तरह के हुनर विकसित कर ग्रामीण समाज आत्म-निर्भर बनने के साथ-साथ उत्पादित वस्तु को बेच कर अपनी जरूरत पूरी कर सकती है। अंग्रेजों के आने के बाद हमारी ग्रामीण व्यवस्था ध्वस्त हुई। आज़ादी के बाद हम ग्रामीण परम्परागत व्यवस्था को नहीं बचा पाए। महात्मा गांधी कृषि के साथ उद्यम की इस व्यवस्था की उपादेयता का महत्व समझते थे। इस वजह से परम्परागत व्यवस्था को बचाने और उसको आगे लाने का प्रयास करते रहे। दरअसल गांधी जिस स्वराज्य का ताना-बाना बुनना चाहते थे उसके केन्द्र में कृषि व्यवस्था थी। कृषि व्यवस्था को समर्थन देकर और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन के लिए वे परम्परागत कला-कौशल को बचाना चाहते थे। गांधी मॉडल में अत्यधिक उत्पादन के बजाय लोगों द्वारा उत्पादन पर विशेष बल था।
नए समाज निर्माण में शिक्षा के महत्व को गांधी समझते थे। उन्होंने तत्कालीन शिक्षा पद्धति को अपनाने के बजाए परम्परागत पद्धति के जरिए विद्यार्थियों का विकास करने की नीति बनाई थी, जो आने वाले समय में बेहतर समाज का निर्माण कर सकें। गांधी कहते हैं, ‘‘शिक्षा से मेरा अभिप्राय यह है कि बालक या प्रौढ़ के शरीर, मन तथा आत्मा की उत्तम क्षमताओं का सर्वांगीण विकास किया जाए और उन्हें प्रकाश में लाया जाए। अक्षर-ज्ञान न तो शिक्षा का अंतिम लक्ष्य है और न उसका आरंभ है। वह तो मनुष्य की शिक्षा के कई साधनों में केवल एक साधन है। अक्षर-ज्ञान अपने-आप में शिक्षा नहीं है। इसलिए मैं बच्चे की शिक्षा का श्रीगणेश उसे कोई दस्तकारी सिखाकर और जिस क्षण से वह अपनी शिक्षा का आरम्भ करें उसी क्षण से उसे उत्पादन के योग्य बनाकर करूंगा। इस प्रकार प्रत्येक स्कूल आत्म-निर्भर हो सकता है।’’
गांधी की शिक्षा दृष्टि में स्वावलम्बन और उससे आगे बढ़ने की बात है। गांधी जानते थे कि सभ्य और स्वस्थ समाज निर्माण के लिए रोजगार का सृजन आवश्यक है। रोजगार योग्य बनाने के लिए शिक्षा का रोजगारपरक होना जरूरी है। गांधी इन अर्थों में रोजगारपरक शिक्षा के हिमायती थे। यह शिक्षा व्यवस्था गांवों से पलायन रोक सकती है। हर हाथ को काम दिला सकती है। यह व्यवस्था काम के साथ सम्मान दिला सकती है।
ग्रामीण विकास को मजबूत और स्थायी बनाने के लिए गांधीजी ने स्वच्छता के संस्कार का प्रतिपादन किया। स्वस्थ्य शरीर में ही स्वच्छ आत्मा का वास होता है। ग्रामीण समाज की सबसे बड़ी समस्या थी सफाई। गांधी कहते हैं, ‘श्रम और बुद्धि के बीच जो अलगाव हो गया है, उसके कारण हम अपने गांवों के प्रति इतने लापरवाह हो गए हैं कि वह एक गुनाह ही माना जा सकता है। नतीजा यह हुआ है कि देश में जगह-जगह यह सुहावने और मनभावने छोटे-छोटे गांवों के बदले हमें गंदे गांव देखने को मिलते हैं।’’ गांधी जिस शिद्दत से राजनीतिक लड़ाई लड़ते हैं वैसे ही स्वच्छता और गांवों में व्याप्त कुरीतियों जैसे नशाबंदी और अस्पृश्यता के खिलाफ भी सामाजिक आंदोलन करते हैं। गांधी के गांव की सम्पूर्ण सफाई का तात्पर्य है हिंसा मुक्त समाज, नशामुक्त समाज, स्वस्थ-स्वच्छ और अस्पृश्यता मुक्त समाज। यानी कोई भेद न हो मनुष्य-मनुष्य में। अस्पृश्यता जैसी कुरीति को मिटाने के लिए गांधी ने झाडू का शास्त्र गढ़ा।
न्यायमूर्ति चन्द्रशेखर धर्माधिकारी कहते हैं, ‘‘चरखा आर्थिक स्वावलम्बन और आर्थिक विषमता समाप्त करने का प्रतीक है। वह वर्ग निराकरण या वर्ग समन्वय का भी प्रतीक है। झाडू सामाजिक विषमता और जातिभेद समाप्ति का प्रतीक है।’’ गांधी के स्वच्छता के मायने कई हैं। दैहिक और पारिवारिकी स्वच्छता के साथ-साथ आत्मा की स्वच्छता भी आवश्यक है। गांधी द्वारा गढ़ा गया झाड़ू और स्वच्छता का शास्त्र समाज में व्यापक बदलाव का संकेत करते हैं। आज़ादी मिले एक लम्बा अरसा हो चुका है। हम अपने ग्रामीण समाज को आज भी पूर्ण रूप से स्वच्छ और स्वस्थ समाज नहीं बना पाए हैं। इस दिशा में और आगे बढ़ने की आवश्यकता है।
ग्रामीण विकास की अवधारणा की गांधी ने जो कल्पना की उसमें सम्पूर्ण विकास का लक्ष्य निहित है। गांधी का लक्ष्य सिर्फ भौतिक और लौकिकता तक सीमित नहीं है। वे कहीं इससे आगे बढ़ कर सोचते हैं। गांधी कहते हैं, ‘‘अगर हिन्दुस्तान को सच्ची आज़ादी पानी है और हिन्दुस्तान के मार्फत दुनिया को भी, तब आज नहीं तो कल देहातों में ही रहना होगा, झोंपड़ियों में, महलों में नहीं। कई अरब आदमी शहरों में और महलों में सुख और शांति से कभी नहीं रह सकते न एक दूसरे का खून करने यानी-हिंसा से, न झूठ से-यानी-असत्य से।’’ गांधी की ये बातें आज और प्रासंगिक होती जा रही हैं। आज आधुनिक सभ्यता का पर्याय शहर बन गया है और देहात पिछड़ेपन की निशानी है। जबकि आने वाले समय में नगर और शहर इंसानी हुजूम को आश्रय देने में सक्षम नहीं होगा। आने वाले समय में हमारे पास एक ही विकल्प होगा, गांवों की तरफ चलो। हमें अपने पुरूषार्थ और विकास के वर्तमान मापदंड को बदल कर गांधी को प्रासंगिक बनाना होगा। तभी हमारा गांव बचेगा और हमारी सभ्यता-संस्कृति बची रहेगी।

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