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सा धुचरित सुभ चरित कपासू।
निरस बिसद गुनमय फल जासू।
जो सहि दुख परछिद्र दुरावा।
बंदनीय जेहि जग जस पावा॥
श्रीराम भक्त गोस्वामी तुलसीदास ने उपरोक्त चौपाई में संत जीवन का अचूक गुणवर्णन किया है। परोपकार के लिए, समाज के कल्याण के लिए समर्पित भाव से अपना जीवन अर्पण करने वाले संत, समाज के लिए दीपस्तंभ के समान मार्गदर्शक होते हैं। इसी प्रकार के शब्दों में संतों के जीवन कार्य का गौरव महाभारत-रामायण इन महाकाव्यों सहित संत कबीर, संत नानक देव, संत ज्ञानेश्वर जैसे सभी संतों ने किया है। श्रीमद् शंकराचार्य ने भी संत कार्यों का गौरव किया है।
संतों का सामाजिक महत्व महाभारत के ‘‘यक्ष प्रश्न‘‘ प्रसंग में अचूक रूप से स्पष्ट होता है। महाभारत के वनपर्व में यक्ष एवं युधिष्ठिर के बीच संवाद का उद्बोधक प्रसंग है। इस प्रसंग के संवादों में श्रेष्ठ नीतिमूल्यों का दीपस्तंभ के समान दर्शन होता है। यक्ष कथा से सभी परिचित हैं इसलिए उसे यहां न दोहराते हुए मुख्य संवाद की ओर मुड़ते हैं। यक्ष युधिष्ठिर से पूछता है कि ‘‘दिशा कौनसी?’’ इस प्रश्न के उत्तर में साधारणतया कोई भी पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, उत्तर आदि दस दिशाओं में से किसी एक का नाम लेगा। परंतु युधिष्ठिर का उत्तर इससे अलग है। युधिष्ठिर उत्तर देता है, ‘‘संत सत्पुरुष यही दिशा हैं। ’’
समाज को किसी भी अवस्था में योग-सम्यक दिशा निर्देशित करने का कार्य संत स्वत: के आचरण से करता है। इस उत्तर की पुष्टि में युधिष्ठिर यक्ष सें कहता है-
‘‘नर्को प्रतिष्ठ: श्रुतयो विभिन्ना नैको ऋषिर्यस्य मतं प्रमाणम।
धर्मस्थ तत्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गत: स पन्था॥
अर्थात नर्क की निश्चिती विभिन्न हैं, एक भी ऋषि-मत प्रमाण नहीं माना जा सकता, धर्म के तत्व गूढ़ हैं। इसलिए ऐसी स्थिति में जिस मार्ग से महापुरुष-महाजन (संत-सत्पुरुष) गमन करते हैं वही मार्ग दिशा होगा। यही दिशा समाज को श्रेष्ठ मार्ग दिखा कर समाज जीवन के कल्याण में बहुत बड़ा शाश्वत योगदान है। इसीलिए, ‘‘जगाच्या कल्याणा संताच्या विभूति। देह कष्टविनि उपकारे॥ ऐसी संतों की महिमा गाई जाती है। महाकवि भतृहरि ने ‘एके सत्पुरुषा: परार्य घटका: स्वार्थान परित्यज्य ये। ’, ऐसा सत्पुरुष का वर्णन किया है।
ग्रामोदय और संत
भारतवर्ष में संत-सत्पुरुषों की महान परंपरा है। इस परंपरा के अगणित संतों को १.मध्ययुगीन संत एवं २.अर्वाचीन संत इन दो भागों में विभाजित कर उस समय की पार्श्वभूमि में हमें उनके कार्यों का मूल्यांकन करना होगा। संतों के जीवन का मुख्य उद्देश्य आत्मोध्दार तथा उसका परिणाम समाजोद्धार है। नदी समुद्र में मिलने से पहले बहते-बहते दोनों किनारों के जनजीवन का पोषण करती है। नदी का उद्देश्य समुद्र में मिलना है एवं किनारे के जीवन का पोषण उसका परिणाम है।
का फेडित पाप ताप, पोखित तीरीचे पादप
समुद्रा जाय आप। गंगेचे जैसे॥
इन शब्दों में ज्ञानदेव ने संत जीवन के दोहरे स्वरूप का वर्णन किया है। इस प्रकार संत जीवन यह आत्मोद्धार एंव समाजोद्धार इस प्रकार के दोहरे स्वरूप का हैं। उसके आत्मोद्धार-मोक्ष प्राप्ति यह केन्द्र में होकर समाज कल्याण-समाजोद्धार यह उपकेन्द्र है। इस दृष्टि से हमें संतों के जीवन कार्य का विचार करना चाहिए।
मध्ययुगीन संतों के कार्य का विचार करते समय सर्वप्रथम हमें उस काल में भारत में स्थित धर्मांध आक्रमणकारियों की लंबी अवधि के क्रूर शासन का विचार करना होगा। ये धर्मांध आक्रमणकारी स्वधर्म के प्रचार-प्रसार हेतु तलवार एवं यातनाएं देने का उपयोग करते थे। गुरुनानक देव, गोस्वामी तुलसीदास, महात्मा कबीर, इनके काल में परधर्मीय आक्रमणकारियों से अपने धर्म को बचाने की अपेक्षा अपने प्राणों का रक्षण करना महत्वपूर्ण था। इस काल में बादशाह-सुलतान का राज्य था। उनकी मर्जी के अनुसार राज्य का कारोबार चलता था। बादशाह की मर्जी के अनुसार समाज की सुख-सुविधाओं के कार्य सम्पन्न होते थे। उस काल में ग्रामविकास- ग्रामोदय का विचार बादशाह की गिनती में नहीं था।
विदेशी धर्मांध आक्रमणकारियों के शासनकाल के पूर्व प्राचीन भारत में ग्राम्य जीवन सुख-सम्पन्न था। उस समय प्रचलित व्यवस्था के अनुसार प्रत्येक खंड स्वयंपूर्ण था। भौतिक खुशहाली कम थी, परंतु उस अभाव की कमी या दु:ख ग्रामीण महसूस नहीं करते थे। इसका कारण उनका भावविश्व संतों के नीतिमूल्यों पर आधारित, संस्कारित था। अपने स्वतः के सुख की अपेक्षा समाज बंधुओं के सुख का विचार करते हुए परस्पर सहयोग से गांव का, विभिन्न जातियों में बंटा समाज सुख से जीवन व्यतीत करता था। मुगल सम्राट व सुलतानों ने इस ग्राम जीवन में हस्तक्षेप कर पुरानी ग्राम व्यवस्था नष्ट कर दी। धर्मांध बादशाहों के कर-अत्याचारों के कारण ग्रामीण जनता परेशान हो गई थी एवं जितना मांगे उतना कर देकर चुपचाप जीवन व्यतीत कर रही थी। मुगलों के इस अत्याचार के काल में धर्म व संस्कृति की रक्षा के मुकाबले स्वत: की जीवन रक्षा महत्वपूर्ण थी। अत्याचारों के कारण असंख्य गरीब लोगों ने इस्लाम कबूल कर लिया, परंतु अनेकों ने स्वधर्म-स्वसंस्कृति की रक्षा हेतु बलिदान दिया। इस काल में अनेक संत-महात्मा हुए पर उन्होंने भी तत्कालीन परिस्थितिनुरूप धर्म-संस्कृति की रक्षा का कार्य किया। इस काल में स्वतत्रं रूप से अपने गांव का स्वयंनिर्णय के अनुसार विकास यह विचार भी नहीं आता था।
महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्वराज स्थापना के बाद ग्रामीण जीवन में एक नवीन चेतना निर्माण हुई। संत तुकाराम एवं संत रामदास जैसे संतों का मार्गदर्शन समाज को प्राप्त होने लगा। ग्रामीण प्रजा के सुख-दु:ख की चिंता स्वयं शिवाजी महाराज एवं संत करने लगे। संतों ने धर्माचरण, सत्यनिष्ठा, परोपकार इ.बातों का अमृतबोध कराते हुए समाज में पुरुषार्थ जागृत किया। ‘‘सभी सुखी हों, ‘‘दृढनिश्चयी हों ‘‘, ‘‘अपना जीवन यापन सुख-समाधान से करें‘‘ समाज की सेवा करें‘‘ ! राष्ट्रसंत रामदास स्वामी के ये वचन उनके जनता से, ग्रामवासियों से अंतरंग भाव-संबंधों का बोध कराते हैं। संत तुकाराम ने भी कहा है, जो कोई भी दु:खी है, जिन पर अत्याचार हुआ है या होता रहता है, उनको जो अपना कहता है, उनको अपनाता है, उनकी सेवा करता है उसी को साधु कहते हैं। भगवान का वास भी उसी के पास होता है। इन वचनों में दु:खी जनता की सेवा यही साधुत्व एवं संत का लक्षण है, यह कहा गया है। अर्थात ऐसे अनेक समाजोभिमुख वचन संत रामदास, संत तुकाराम जैसे १७हवीं सदी के संतों के अभंगों (छंद) में मिलते हैं, फिर भी उनकी प्राथमिकता ईश्वर भक्ति ही थी। ‘‘पहने भगवद् भक्ति का बखान’’ ऐसा समर्थ रामदास ने साफ-साफ कहा है।
इस पृष्ठभूमि में केवल और समग्र रूप से ग्राम सुधार, ग्राम विकास, ग्रामोद्योग एंव ग्रामोध्दार का सविस्तर विचार किया राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज ने। २०वीं सदी में महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के इस संत ने ग्राम परिवार जैसा प्रस्तुत विविधांगी विचार अच्छे-अच्छे समाज सुधारकों को भी चकित करने वाला है। उनके द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘ग्रामगीता’ व उनके कार्य की सराहना डॉ.राजेन्द्र प्रसाद (तत्कालीन राष्ट्रपति), आचार्य विनोबा भावे, डॉ.राधाकृष्णन, लाल बहादुर शास्त्री, महात्मा गांधी, पं.नेहरू इ. अनेक नेताओं ने की है। भारत की वैभवशाली, संत परंपरा में ग्रामीण विकास को लक्ष्य कर केवल ग्रामोदय विषय पर इकतालिस अध्यायों का काव्य ग्रंथ लिखने वाले एवं उसे ‘ग्रामगीता’ नाम देने वाले संत याने राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज! ग्रामीण विकास की समस्त योजना (ब्लू प्रिंट) आपको ‘ग्रामगीता’ में देखने को मिलेगी।
तुकडोजी महाराज का जीवन परिचय
संत तुकडोजी महाराज का पूरा नाम ‘माणिकदेव नामदेव इंगळे ठाकुर था। उनका जन्म ३० अप्रैल १९०९ को महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के अमरावती जिले के यावली ग्राम में हुआ। पिता नामदेवजी दर्जी का काम करते थे। मां मंजुला देवी अनाज पीसने इ. काम करती थी। मांधान (विदर्भ) के प्रज्ञाचक्षु गुलाबराव महाराज ने तुकडोजी महाराज का नामकरण विधि किया था व उनका नाम माणिकदेव रखा था। बचपन से ही उन्हें भजन गाने का शौक था, परंतु झांझ बजाने का आलस था। वे स्कूल से भाग कर नदी के किनारे प्रकृति के सानिध्य में अकेले बैठते थे। तैरना, घुड़सवारी, कुश्ती, गायन, योगासन, कीर्तन और काव्य रचना उन्हें बचपन से ही पसंद थी। आकोट के विदेही नाथपंथी संत श्री आडकोजी का अनुग्रह श्री तुकडोजी महाराज को मिला। तुकडोजी महाराज भी ‘‘पंढरी की वारी’’ अर्थात पढंरपुर यात्रा करने लगे। भक्त पुंडलिक की मातृ-पितृ सेवा से तुकडोजी महाराज अत्यंत प्रभावित थे।
१९२५ में उन्होंने अपना दर्जी का व्यवसाय बंद कर दिया एवं विरक्त वृत्ति से गृहत्याग कर दिया। ईश्वर दर्शन की लालसा से वे जंगल में जाकर तपश्चर्या करने लगे। वहां उन्हें एक योगी पुरुष ने हठयोग की शिक्षा दी। महाराज को कवित्व कला जन्मजात प्राप्त थी। सन १९२५ में उनकी पहली हिंदी भजनावली प्रकाशित हुई। गांव-गांव के मंदिरों में भजन मंडलियां तुकडोजी महाराज के हिन्दी भजन गाने लगीं।
मनी नाही भाव,
अन देवा मला पाव।
देव कसा पावेल हो,
देव बाजारचा भाजीपाला नाही हो॥
अर्थात मन में भक्तिभाव नहीं है और इच्छा है कि भगवान मिल जाए, तो ऐसे भगवान नहीं मिलेगा। क्या वह बाजार में बिकने वाली सबजी-भाजी है?
इस भजन एवं इस प्रकार के अन्य भजनों से उन्होंने भक्ति जागरण का कार्य हाथ मंी लिया। हाथ में खंजरी (छोटी ढपली जैसा एक प्रकार का वाद्य) लेकर अपने पहाड़ी आवाज में तुकडोजी स्थान-स्थान पर भजन के कार्यक्रम करने लगे। उनके इस जनजागरण के हिन्दी-मराठी भजनों को सुनने के लिए हजारों की संख्या में लोग जमा होते थे।
१९३३ में उन्होंने राष्ट्रीय सत्याग्रही शिविर में भाग लिया व अपने राष्ट्रीय भक्ति गीतों से सत्याग्रहियों में जोश भरने का काम किया। चाय छोड़ो, धूम्रपान छोड़ो, खादी का उपयोग करो यह उनका आवाहन होता था। प्रथम वे स्वतः खादीधारी बने। स्वदेशी का नारा बुलंद किया। सन १९३६ में महात्मा गांधी ने उन्हें बुला लिया एवं अपने साथ सेवाग्राम आश्रम में रखा। उनके देशभक्ति गीतों से महात्मा गांधी भी प्रभावित हुए। इसी समय में तुकडोजी ने मोझरी नामक ग्राम में श्री गुरुदेव सेवाश्रम की स्थापन की। राष्ट्रभक्ति जागृत करने हेतु युवकों के शिविर लगाए। रा.स्व.संघ, भारत सेवादल, कुश्ती के अखाड़े आदि स्थानों पर जाकर उन्होंने राष्ट्रीय जनजागरण के कार्य में भाग लिया।
१९४२ के आंदोलन में तुकडोजी महाराज युवकों के मुख्य प्रेरणा स्रोत बने। उनके भाषण व राष्ट्रभक्ति गीत तो चेतना पैदा करने वाली आंधी ही थे। अंग्रेजों ने उन्हें बंदी बना कर रायपुर (छत्तीसगढ़) की जेल में रखा। जेल से रिहा होने के बाद भी उन्हें चन्द्रपुर -वर्धा जिले में प्रवेश की मनाही थी। सन १९४३ में तुकडोजी महाराज ने जनजागरण के एक प्रभावी साधन के रूप में ‘श्री गुरुदेव’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। गुरुदेव सेवा मंडल के माध्यम से गांव-गांव, घर-घर ग्रामोन्नति का प्रचार किया। ग्रामीण क्षेत्र में सैकड़ों कार्यकर्ता तैयार किए एवं ‘ग्राम निर्माण पर्व’ सप्ताह का आयोजन किया। इस सप्ताह में एक दिन ग्राम उद्योग, दूसरे दिन महिला उन्नति पर्व, तीसरे दिन नशामुक्ति, चौथे दिन गोरक्षा, पांचवें दिन सहभोजन- कुश्ती प्रतियोगिता, छठवें दिन भजन प्रतियोगिता एवं सातवें दिन ग्राम आरोग्य- स्वच्छता, श्रमदान, राष्ट्रधर्म इ. विषयों पर वर्ग एवं व्यारव्यान होते थे। गांव की सामाजिक आवश्यकताओं, भौगोलिक स्थिति के अनुसार अनेक नए सुधारों के विषय समाविष्ट किए जाते थे। सामाजिक एकता व सामंजस्यता निर्माण करने पर उनका जोर था एवं सहभोजन व सामूहिक भजन ये उसके लिए प्रभावी साधन थे। इन सब में राष्ट्रधर्म सर्वोपरि था।
चेत रहा भारत दु:ख से, आग बुझना मुश्किल है।
उठा तिरंगा बढावे छाती, अब बहिलाना मुश्किल है॥
झाडझडूले शस्त्र बनेंगे, भक्त बनेगी सेना।
पत्थर सारे बम बनेंगे, नाव लगेगी किनारा॥
अंग्रेज अधिकारी तुकडोजी के इस गाने से परेशान थे। वन्दे मातरम के साथ इन गीतों के गाने पर की स्थानीय अधिकारियों ने प्रतिबंध लगा लिया था।
सन १९४७ में भारत स्वतंत्र हुआ। तुकडोजी महाराज ने इस स्वराज्य को सुराज्य में परिवर्तित करने हेतु ग्रामोदय का परिपूर्ण कार्यक्रम प्रारंभ किया। गांव-गांव में स्वावलंबन सप्ताह, नवनिर्माण सप्ताह, राष्ट्रीय एकात्मता सप्ताह, राष्ट्रधर्म जागृति सप्ताह, स्वच्छता आरोग्य सप्ताह ऐसे अनेक प्रकार के अभियान प्रारंभ किए। संत तुकडोजी के इस ग्रामोदय पर महात्मा गांधी अत्यंत संतुष्ट थे।
रियासतों को भारतीय गणराज्य में शामिल होना चाहिए इस हेतु उन्होंने सम्बंधित रियासतों की जनता के बीच जाकर उन्हें राष्ट्रीयता का महत्व समझाया तथा जनता का मत रियासतों की अपेक्षा भारतीय गणतंत्र में शामिल होने हेतु परिवर्तित किया। हैदराबाद के निजाम ने स्वतंत्र भारत में विलीन होने से इनकार कर दिया। रजाकारों के द्वारा प्रजा पर अत्याचार कर आतंक निर्माण किया। ऐसे समय रजाकारों के विरुध्द तुकडोजी महाराज ने महाराष्ट्र-हैदराबाद सीमा पर स्थित गांवों में घूम-घूम कर जनजागरण किया।
१९६२ तथा १९६५ के युद्धों के समय राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज सीमा पर गए एवं अपने हिन्दी राष्ट्रभक्ति गीतों से जवानों में जोश भर दिया। उनका यह राष्ट्रीय कार्य देख कर पं.नेहरू, गुलजारीलाल नंदा ने उन्हें राष्ट्रीय एकत्मता परिषद की मानद सदस्यता प्रदान की।
संत तुकडोजी के असीम कार्य के कारण १९५२ में अमेरिका में हुई सर्व धर्म परिषद में उन्हें विशेष रूप से निमंत्रित किया गया। इतना ही नहीं, १९५५ में जापान में हुई सर्व धर्म परिषद में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया। संत तुकडोजी के भजनों से सारा विश्व गुंजायमान हो गया। राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने उनके खंजरी भजन का आयोजन राष्ट्रपति भवन में किया। राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसान ने उन्हें राष्ट्रसंत की उपाधि से सम्मानित किया। संत तुकडोजी महाराज की ‘ग्रामगीता’ ग्रामीण कार्यकर्ताओं की ‘भगवद् गीता’ ही है। इस तरह ग्रामोदय के लिए अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत करने वाले राष्ट्रसंत का जीवन व कार्य याने सर्वांगीण ग्रामोध्दार का चिंतन पर्व ही है। सन १९६८ में पंढरपुर में आषाढ़ की वारी के समय भगवान श्री विट्ठल के दरबार में उन्होंने आखिरी भजन किया और ११ अक्टूबर १९६८ को कैंसर से उनकी जीवन ज्योति अनंत में विलीन हो गई। आत्मा परमात्मा में विलीन हो गया। हजारों ग्रामवासियों का तारणहार चला गया।

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