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ग्राम विकास का कागज पर लेखाजोखा करना सरल है, परन्तु वर्तमान गांवों में बदलाव लाना कठिन है। कुछ वर्ष पहले रालेगण सिद्धि तथा हिवरे बाजार जैसे देहातों में दो अलग-अलग विचारों से आया परिवर्तन हमें ज्ञात है। इस परिवर्तन का स्वरूप वहां के लिए ही ठीक था। इन दोनों स्थानों में जो परिवर्तन आया वह वहां की भौगोलिक रचना, पर्यावरण, परिस्थितियां तथा वहां के लोगों की सहभागिता का परिणाम था। अनेक वर्षों की मेहनत का शाश्वत लाभ वहां के निवासियों को मिलते रहेगा। यही नहीं तो अन्य राज्यों को भी इनसे लाभ हुआ। इन दोनों गांवों को आज भी आदर्श गांवों के नाम से जाना जाता है। श्री अन्ना हजारे तथा श्री पोपटराव पवार उस परिवर्तन के प्रवर्तक थे।
जिन्हें कोई प्रसिद्धि या नाम नहीं मिला, ऐसे अनेक व्यक्ति अनाम रह कर समाज के अनेक कठिन प्रश्नों को लेकर समाजहित में शिद्दत से लगे हुए हैं। जन सामान्य के जीवन में परिवर्तन आए, इसके लिए कोई अपेक्षा मन में रखे बिना स्वेच्छा से, पूरी निष्ठा से समाज हित में लगे व्यक्ति सही मायने में ‘स्मार्ट’ हैं। केन्द्रीय सरकार ने १०० शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने की घोषणा की तो इसी छोर को पकड़ कर शहरों को समार्ट बनाने की बजाय गांवों को स्मार्ट बनाना जरूरी है ऐसा कई लोगों ने कहना शुरू कर दिया। ऐसे स्मार्ट कमेन्ट का संतोषजनक उत्तर कर्जत तहसील के तामनाथ गांव को देख कर मिल सकता है। तामनाथ एशिया का शून्य कचरा व प्लास्टिक मुक्त गांव है। ९८प्रतिशत घर स्वच्छ घर हैं। यह है महाराष्ट्र के पिछले तीन दशकों का ग्राम विकास का लेखाजोखा।
स्वतंत्रता के पूर्व का शहर विकास
१८५१ में लन्दन में पहली वैश्विक औद्योगिक प्रदर्शनी आयोजित की गई थी। भारत ने भी इस प्रदर्शनी में ध्यान आकर्षित करने वाली रचनाओं के साथ भाग लिया। भारत के अनेक उद्योगपतियों ने भी इस प्रदर्शनी को देखा। दुनिया भर से आए प्रतिनिधियों ने विस्मयकारी नई खोजों को देखा, दुनिया में आ रहे परिवर्तनों को देखा। आने वाले समय में वैचारिक लेनदेन के साथ भारत में अनेक प्रकार के उद्योग शुरू हुए। लन्दन में १८३२ में पहली ट्रेन दौड़ी। भारत में भी आवागमन के लिए की रेल जरूरत सबसे पहले नाना जगन्नाथ शंकर शेठ ने महसूस की। आगे उन्हीं के प्रयासों से १६ अप्रैल १८५३ में मुंबई से ठाणे के बीच पहली ट्रेन ने दौड़ लगाईं। उद्योग क्रान्ति के कारण शहर बढ़ते गए। मुंबई के लोगों को साफ़ पानी मिलना चाहिए इस बात को ध्यान में रख कर १८५६ में विहार तालाब का उद्घाटन भी दूरद्रष्टा नाना शंकर सेठ के हाथों ही हुआ। टाटा उद्योग समूह के संस्थापक जमशेदजी टाटा और अन्य उद्योगपतियों ने भारत में उद्योग क्रांति की शुरूआत कर समृद्ध मुंबई की नींव डाली। ब्रिटिश कालीन महानगर जो भारत की अर्थव्यवस्था की नींव माने जाते हैं, उनमें मुंबई सब से आगे है, समाज उन्नति के लिए शिद्दत से काम करने वाले लोग चाहे वे उच्च सम्पन्न घरों के ही क्यों न हो अचर्चित रह कर काम करते रहे, उन्हीं की इच्छाशक्ति के बल पर समाज उन्नति कर सका यह उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट है।
स्वतंत्रता के बाद का शहरों का विकास
स्वतंत्रता के बाद ग्रामीण आबादी का शहर की ओर अनियंत्रित स्थानांतरण हुआ और शहर महानगर बनते गए। समय के साथ महानगर की चकाचौंध बढ़ती गई और गांव कहीं अपनी पहचान खोते गए। मुंबई की बढ़ती भीड़ को रोकने के लिए प्रवीण मेहता और चार्ल्स कोरिया नामक दो आर्किटेक्ट ने विकल्प के रूप में सन १९७० में महाराष्ट्र सरकार के सामने नवी मुंबई का प्रस्ताव रखा, मुंबई में स्थानांतरण रोकने में इन दोनों की बड़ी भूमिका थी। परन्तु आने वाले समय में मुंबई की मिलों के विशाल मैदान, उपनगर, मुंबई के साथ-साथ अन्य शहरों के आसपास की छोटी-छोटी बस्तियां, मुख्य नगर व्यवस्था में समा गए, जिससे मुंबई सहित महाराष्ट्र को इन तीन दशकों में बहुत हानि हुई। आद्योगिक स्थानों का शहर में समा जाना स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक होता है। शहर का बड़ा हो जाना या शहर की व्यापकता बढ़ जाना मात्र विकास नहीं है। राजनीतिक अपरिपक्वता तथा प्रशासनिक गलतियों के कारण हजारों एकड़ कृषि जमीन शहरी व्यवस्था का अंग बन गई। अकेले महाराष्ट्र में ४.१३ लाख एकड़ कृषि जमीन अकृषि कार्य के लिए परिवर्तित हुई। सब से पहले खेती की जमीन के अन्य कार्यों के लिए रूपांतरण के नियमों की जांच कर उनमें बदलाव लाना जरूरी है, इसी में राज्य का हित है। सी आर जेड के कड़े नियमों और उस पर कार्रवाई के कारण समुद्री तट सुरक्षित हैं, अन्यथा इस आपाधापी में यह भी नहीं बचा होता। इस धरती पर कृषियोग्य जमीन नियमों पर गंभीरता से विचार किया गया होता तो आज का ग्रामीण भाग व मुंबई के साथ अन्य शहरों की रचना अधिक सुन्दर होती।
राजनीतिक अपरिपक्वता
शहरों का बेहिसाब फैलाव न होने देना यह प्रशासनिक जिम्मेदारी का हिस्सा है, लेकिन जो हुआ वह उलटा था। वास्तव में शहरी प्रशासन में सरकारी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। संपूर्ण राज्य की जिस पर जिम्मेदारी है उस मुख्यमंत्री को नगर विकास विभाग पर ध्यान देना चाहिए यह अभी भी अपेक्षित नहीं है। इस सन्दर्भ में विरोधी दलों के अनुभवी नेताओं ने, और वास्तु विशेषज्ञों को विरोध दर्ज करना चाहिए। स्वतंत्र भारत के ४० करोड़ लोगों में ८० प्रतिशत जनता गांवों में रहती थी, शहरी क्षेत्र अपनी सीमा में था। उस समय कृषि से मिलने वाला ८० प्रतिशत टैक्स अब २० प्रतिशत पर आ गया है। कृषि उत्पाद भी घटा है। भारत के छः लाख देहातों में लगभग ८०० मिलियन लोग रहते हैं, शहरी क्षेत्रों को मिलने वाली सुविधा से आज भी ये ग्रामीण बंधु बहुत दूर हैं।
आज की ग्रामीण परिस्थिति
गांव की सातवें दशक की तीसरी पीढ़ी भी थोड़े बहुत अंतर के साथ पुराने ढर्रे पर ही चल रही है। देहात यानी संकरे उबड़-खाबड रास्ते, अध्-कच्चे मकान, गन्दगी से भरी खुली नालियां, कचरे का अम्बार, गलिच्छ पालतू जानवरों की आवाजाही, कान पर मोबाइल लगाकर दो चक्के पर घूमने वाला २० से २५ आयु वर्ग का उत्साही किन्तु बेकार ग्रामीण युवक, समय की चिंता न कर गप्पे मारते मध्यम वर्गीय निवासी- सामान्य देहात का यही चित्र है। सरकारी नीति के विरोध में निकलता सुर, आपसी बैर, स्थानीय राजनीति, ये इस चौपाल की बैठक के प्रिय विषय होते हैं। सरपंच या गांव के महत्वपूर्ण व्यक्ति की सूचना पर १५ मिनट में १०० व्यक्ति जमा हो सकते हैं, इस बात का अनुभव स्वयं लेखक ने किया है। इस या उस कारण से ग्रामीण बंधुओं की शक्ति बड़ी मात्रा में बेकार जा रही है। पूरी सुविधाएं न मिलने के कारण निराशा ने उन्हें घेर रखा है, इसीलिए उनकी शक्ति का उपयोग रचनात्मक कार्यों के लिए होना चाहिए। यदि इन परिस्थितियों पर ध्यान नहीं दिया गया तो कहीं ग्राम विकास अलग ही राह पकड़ लें तो बुमरेंग वाली स्थिति बनने में देर नहीं लगेगी।
आज की तारीख में कृषि उत्पाद तथा जीवनावश्यक वस्तुओं की आपूर्ति १२५ करोड़ जनता को कम पड रही है, हर साल मौसम के बदलने से इस खाई को बढ़ते ही जाना है। अब तो छोटी काश्त वाले किसानों को मजदूर भी मिलना कठिन होते जा रहा है। औसत खेतिहर मजदूरों के जीवन स्तर में हुई वृद्धि के कारण वे अधिक मजदूरी मिलने वाले काम की ओर अधिक ध्यान देते हैं। सरकारी ग्राम योजना या सरकारी स्कूलों के द्वारा दी जाने वाली अन्न योजना में होने वाले भ्रष्टाचार के बजाय ग्रामीण अभिभावकों को अधिक सक्षम बनाना जरूरी है। संसद या विधान सभा में प्रतिनिधित्व करने वाले अधिकांश नेता ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले ही हैं। परन्तु न तो वे पूर्णतः ग्रामीण परिवेश के रह गए हैं न शहरी, एक तो शहर समस्या को वे समझ नहीं पाते और ग्रामीण समस्या के निदान में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं, ऐसी स्थिति में दोनों व्यवस्थाएं ढहने की ओर हैं। इस सन्दर्भ की गंभीरता को और विस्तार से रखने की जरूरत है ऐसा मुझे नहीं लगता।
अल्प खेती वाला किसान दिनोेदिन परावलम्बी होता जा रहा है, ऐसे जमीन धारक को कोई विकल्प उपलब्ध नहीं होने के कारण वह आत्महत्या की ओर बढ़ रहा है, यह भी एक कारण हो सकता है। आश्चर्यजनक बात यह है कि आज तक एक भी खेतिहर मजदूर ने आत्महत्या की है ऐसा सुनाई नहीं दिया। उसने शहर में काम करने का विकल्प ढूंढ़ लिया है। प्रत्येक सरकार ने कभी बिजली बिल तो कभी कर्ज माफ़ी कर के अपनी धन्यता मान ली।
पिछले अनेक वर्षों के पंचवार्षिक चुनावों में कभी गरीबी हटाओ तो कभी किसान भलाई के मुद्दे के आसपास हम घूमते रहे। परमाणु बम से ध्वस्त हुआ जापान, इजरायल जैसे देश बीस साल में स्वयंपूर्ण बन गए। भारत में आज सत्तर साल बाद कहीं बुनियादी विकास की बात शुरू हुई। महासत्ता के सपने देखने वाले भारत का तुलनात्मक गुणा-भाग सामने है। खैर! भारत के बड़े राज्य भारी पड़ने के कारण उनके विभाजन की बात देर से क्यों न हो ध्यान में तो आई। शहर के मामलों मे भी यही नीति क्यों नहीं लागू की जा सकती है। इस देश के सामने कई समस्याएं हैं, समय पर गलती सुधारने का मतलब ही स्मार्टनेस है।
स्थानांतरण के कारण
स्थानांतरण अटल है। जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए या आर्थिक कारणों से बाहर जाने के लिए अपनी कूवत के अनुसार गांव की सीमा के बाहर जाना ही है, ऐसे ही लोगों में कोई शहर में तो कोई विदेश में जाकर स्थाई हो जाता है। यह स्वाभाविक भी है। मानव विकास तथा स्थानांतरण यह कभी नहीं रुकेगा। मानव का लगातार प्रगति के रास्ते पर चलना यह प्रकृति का नियम है।
वैश्विक तापमान में बदलाव, भविष्य कथन, और ग्रामीण खेतिहर मजदूरों का पलायन हो रहा है। अभी भी भारत के महानगरों के ७० प्रतिशत लोग गन्दी बस्तियों में क्यों रहते हैं, इसके उत्तर के पीछे ही हमारी अवनति का मूल छिपा है। शहरों की गन्दी बस्तियों में रहने वालों के जीवन को नागरिक जीवन कैसे कह सकते हैं? सच तो यह है कि शहरों की गन्दी बस्तियों में रहने वालों की अपेक्षा ग्रामीण जीवन स्वास्थ्य के लिए कम हानिकारक है। विदेशी विशेषज्ञों की मानें तो २०५० तक दुनिया की जनसंख्या का ५० प्रतिशत भाग शहरों में रहेगा। यह कथन भारत पर कितना लागू होता है इसका विचार कर लोगों के सामने रखना ठीक होगा। उसका बार-बार प्रचार करना गलत है। उसके कारण खेतिहर मजदूरों का शहर की ओर जाने की मात्रा बढ़ते जा रही है।
स्थानांतरण के विषय में विदेशी विशेषज्ञों द्वारा की गई भविष्यवाणी सच होने के लिए चिंतित होने की बजाय ‘२०१६ में खेतिहर मजदूरों का शहर की ओर पलायन रोकने में सरकार सफल रही’ यह होना भारत के लिए जादा जरूरी है, यह भविष्य के भारत के लिए इतिहास बनेगा। परन्तु इसे वास्तविकता के धरातल पर लाने की जिद मुख्यमंत्री और उनके सहयोगियों में होनी चाहिए। और ऐसा होने में ही ‘किसानों के भारत’ के रूप में परिचित देश का हित छिपा है। पलायन रोकने का मतलब मजदूरों का गांव से शहर में आने पर प्रतिबंध लगाना नहीं है, वरन उन्हें गांव में ही रोजगार उपलब्ध कराना है; ताकि उनका जीवन स्तर ऊपर उठ सके। इसके आगे खेतिहर कामगारों का शहर की ओर जाना हमारी अर्थव्यवस्था के बिलकुल अनुकूल नहीं है, इस सत्य को सामने रख कर ही सरकार को आगे के कार्यक्रम की दिशा तय करनी चाहिए।
राजनीतिक अपरिपक्वता का समाज पर परिणाम
स्मार्ट सिटी यानी क्या? यह बात आज तक शहर के लोगों को भी समझ में नहीं आई। ग्राम विकास भी सरकार ने हाथ में लिया है। पर न तो गांव समृद्ध हुए न ही शहरों को पूर्णता प्राप्त हुई। भारत की स्थिति आज त्रिशंकु जैसी हो गई। आज शहर भी गांव जैसे बड़ी बस्ती रह गए हैं। मूलभूत सुविधाओं के अभाव में शहर के लोग नाराज हैं, पैसा आता है पर वह अनेक मार्गों से खर्च हो जाता है। इसके विपरीत छोटी जोत वाले किसानों के पास पैसा ही नहीं है। आर्थिक अस्थिरता उसकी नियति है। सबसे पहले किसान को आर्थिक अस्थिरता से बाहर निकालना होगा। एक बार उनको आर्थिक क्षमता प्राप्त हो गई तो फिर उनके लिए और क्या अच्छा किया जा सकता है इस पर विचार हो। एक ही बार में कई फ़ाइल खोल देने से कम्प्यूटर भी हैंग हो जाता है। सरकार के भी एकसाथ कई घोषणाएं कर देने से संभ्रम पैदा होता है। वर्तमान सरकार पुरानी आदतों को बगल में रख कर ग्राम विकास की स्थायी अवधारणा पर काम करें तो ठीक होगा।
नियोजित ग्राम विकास
ग्राम विकास में चलने लायक रास्ते, भूमिगत नाली, बेकार पानी का निस्तार तथा उसका उपयोग, ग्राम स्वच्छता, स्वच्छ मकान आदि का समावेश होना चाहिए। खेती के साथ संलग्न व्यवसायों से किसान को जोड़ना चाहिए। इन धंधों में आसपास के शहरों के लिए उपयोगी उत्पाद का चुनाव हो, जिससे उत्पादन, बिक्री, और ग्राम विकास के उद्देश्य को पूरा किया जा सके। इससे किसान को खेती में मजा भी आएगा, और वह अतिरिक्त आमदनी से उन्नत खेती करने के लिए आर्थिक रूप से सक्षम भी होगा। सरकार को अपने विकल्प को ठोक-बजाकर सामने लाना होगा। ७० प्रतिशत लोगों को ३० प्रतिशत लोगों पर निर्भर बनाने के बजाय ७० प्रतिशत लोग टैक्स जमा करने के योग्य बने, इस दिशा में विकास की नीति तय करनी होगी।
कंप्यूटर का ग्राम विकास परक उपयोग
मोबाइल क्रांति से आया बदलाव सभी के लिए अनिवार्य है। परन्तु कौन से अनुप्रयोग उपयोगी हों तथा हानि-लाभ को ध्यान में रख कर बच्चों के पहुंच में होने चाहिए और जिन्हें बच्चों से दूर रहना चाहिए उस पर प्रतिबंध लग सके, इसकी नीति सरकार को बनानी चाहिए। द. कोरिया ने भविष्य का विचार कर अपना सर्च एंजिन बना कर शिक्षा के लिए अलग कंप्यूटर विकसित किया है। हमारे यहां हर साईट तक पहुंच होने के कारण छोटे बच्चे इसके बलि बन रहे हैं। सभी आयु वर्ग की कितनी संख्या इसका कैसे उपयोग करती है, इसका भी सर्वेक्षण होना जरूरी है। आज भी हम कहीं न कहीं इसके दुष्परिणामों को देख रहे हैं, अब यह महंगी तकनीक गांवों तक पहुंच चुकी है, तो अब गांव स्मार्ट हो गए यह मान लेना चाहिए? ग्रामीण क्षेत्रों तक सूचना क्रांति के लिए वायफाय मुफ्त करने वाली योजनाओं को गंभीर विचार मंथन के बाद ही लागू करना चाहिए। अत्यधिक स्वतंत्रता भी हानिकारक होती है।
भाषा-बोली में स्थायी सूचना तथा परिसवांद केंद्र
सन १९६८ में ‘सेंटर फॉर इनिशिएटिव फॉर चेंज’ या ‘मोरल रिआर्ममेन्ट’ नामक संस्था ने पंचगनी, सातारा में ६८ एकड़ जमीन पर १५,००० वृक्ष लगाए। संस्था के द्वारा चलाए गए शिविरों के माध्यम से पानी जमा करना, जमा किए गए पानी का नियोजन, उसी प्रकार ग्रामीण भागों के लिए उपयुक्त विविध कार्यक्रम साल भर चलाए गए। इस स्थान पर मकानों के छत से बेकार बहने वाले २२ लाख लीटर बरसाती पानी को सन १९७३ से जमा किया जाता रहा है। उसका उपयोग भी किया जाता है।
मेरे विचार से भारत के प्रत्येक राज्य में भौगोलिक परिस्थिति के अनुसार ग्राम विकास के अंतर्गत एक-दो गांवों का विकास नमूने के तौर पर करना चाहिए। इन गांवों में घरेलू और छोटे उद्योग हेतु लगने वाली ऊर्जा का उत्पादन, सोलर प्लांट, बरसाती पानी जमा करने के उपाय, कंप्यूटर का उपयोग, पशुधन की उत्पादकता बढ़ाने वाले कार्यक्रम, पर्यावरण में परिवर्तन और इससे परिणाम की सूचना देने वाले स्थायी केन्द्रों का निर्माण होना चाहिए। खेती के उत्पादनों की पास के शहर में उचित मूल्य में बिक्री की व्यवस्था होनी चाहिए। किसान के छोटे-मोटे व्यवसाय को बड़े व्यवसाय के साथ जोड़ने से किसान की क्षमता बढ़ेगी। इसमें मत्स्य व्यवसाय, फलों के उत्पाद, पशु संवर्धन और कृषि निर्यात की जानकारी भी मिलनी चाहिए। उसके बाद शिक्षा, स्वास्थ्य, और स्वच्छता की ओर रूचि पैदा करनी होगी। आर्थिक दुर्बलता के कारण बैंक आदि की ओर उसे हाथ पसारना न पड़े, इतना उसे सक्षम बनाना पड़ेगा। इस दौरान गांव की मौलिकता भी बनी रहे, इसका भी ध्यान रखना होगा।

‘जल समृद्धि’- तार्किक उपाय
जल ही जीवन है। कृषि कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले जल व्यवस्थापन की सर्वांगीण जानकारी किसान को होनी चाहिए। किसान का जीवन जल पर ही निर्भर होता है। प्रत्येक किसान को बरसाती जल को जमीन में सोखने की और उसको संग्रहीत करने की व्यवस्था करना चाहिए। हर प्रकार से उपयोगी यह जल प्रतिवर्ष बड़ी मात्रा में बेकार जाता है, खेती जैसे बड़े क्षेत्र में बरसने वाली और बह कर बेकार जाने वाली विशाल जलराशि का कोई परिमापन नहीं होता है। अनेक वर्षों से पूरी जमीन का खेती के लिए उपयोग में आने वाला रकबा प्रतिशत में, सिंचित क्षेत्र, क्षेत्रफल, फसल का तरीका, मिट्टी का प्रकार, इत्यादि बातों का रिकार्ड रखा जाता है उसी प्रकार बरसात के जल का भी लेखा जोखा रहना चाहिए। ऐसा हुआ तो कितना पानी बेकार जाता है यह ध्यान में आएगा। और पानी बचाने के लिए कुछ कार्रवाई हो सकेगी। जल यह पर्यावरण का महत्वपूर्ण तत्त्व है। जल संवर्धन प्रतिष्ठान के श्री उल्हास परांजपे के अनुसार भविष्य में यह जल सुरक्षा का बड़ा तर्कयुक्त उपाय हो सकता है। भारत के गरीब किसान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी के कर्ज से मुक्ति दिलानी हो तो उनके मिलकियत के खेत पर बरसाती जल के संग्रहण के लिए लगने वाली अधोरचना के लिए लिए एकबारगी राशि देना पड़ेगा। हर साल जमा पानी से चार से छः महीने नकद फसल किसान ले सकेगा। टैक्स के रूप में सरकार के खजाने में धन भी आएगा। इस तरीके से किसान साल भर व्यस्त भी रहेगा। आज जरूरत है किसान को शिक्षित कर समृद्ध बनाने की।
हर साल केंद्र सरकार, राज्य सरकार, और किसान चिंतित दिखाई देते हैं। इस समीकरण को हम बदल सकते हैं। भारत के प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री देवेन्द्र फडणविस, सम्बंधित विभाग के मंत्री, शासकीय अधिकारी, इस विषय के विशेषज्ञ और चिंतकों को इस प्रस्ताव पर गहराई से विचार करना चाहिए। इस तर्कयुक्त विकल्प को प्रयोग में लाया गया तो केवल महाराष्ट्र के नहीं तो पूरे भारत के किसान जल समृद्धि से स्वावलंबी हो सकेंगे। समाज के सामान्य लोग यदि शहर या गांव में परिवर्तन ला सकते हैं तो वर्त्तमान सरकार के लिए जल समृद्धि से किसान के जीवन में स्थायी रूप से सही में अच्छे दिन लाना संभव है। 

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