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भारत गांवों का देश है। यहां की लगभग ७० प्रतिशत जनसंख्या गांवों में निवास करती है, जिसकी अर्थव्यवस्था कृषि एवं कुटीर उद्योगों पर आधारित है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् नीति-निर्माताओं की यह प्रमुख चिंता थी कि किस प्रकार से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ किया जाए? जिससे कि संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक न्याय की प्राप्ति हो सकें।
आधुनिक समय में स्थलांतर एक सार्वभौम परिघटना है। संचार एवं यातायात के साधनों में तीव्र वृद्धि के कारण स्थलांतर आद्यौगीकरण एवं शहरीकरण का महत्वपूर्ण भाग बन रहा है। यह भी देखा जा रहा है कि भूमण्डलीकरण के दौर में उद्योगों के केन्द्र शहर बन गए हैं तथा ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों का आर्थिक वैषम्य ग्रामीण क्षेत्र के कामगारों को रोजगार सुलभता एवं उच्च आय रोजगार की तरफ आकर्षित कर रहे हैं। भारत में रोजगार के लिए स्थलांतर से तात्पर्य कम आय एवं कम रोजगार क्षेत्र से उच्च आय एवं उच्च रोजगार क्षेत्र की तरफ मजदृरों के पलायन से है।
जनगणना २०११ के अनुसार हमारे देश की कुल जनसंख्या १२१.०२ करोड़ है, जिसमें से ६८.८४ प्रतिशत जनसंख्या गांवों में निवास करती है तथा ३१.१६ प्रतिशत जनसंख्या शहरों में निवास करती है। १९५१ में सम्पन्न स्वतंत्र भारत की प्रथम जनगणना ग्रामीण एवं शहरी आबादी का अनुपात ८३ प्रतिशत एवं १७ प्रतिशत था। २००१ की जनगणना में यह अनुपात ७४ प्रतिशत एवं २६ प्रतिशत हो गया। ये आंकड़ें इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि ग्रामीण भारत के लोगों का शहरों की तरफ पलायन तेजी से बढ़ रहा है। गांवों में कृषि भूमि के लगातार कम होते जाने, आबादी बढ़ने और प्राकृतिक आपदाओं के चलते रोजी-रोटी की तलाश में ग्रामीणों को शहरों-कस्बों का रूख करना पड़ा। गांवों में बुनियादी सुविधाओं की कमी भी पलायन का एक प्रमुख कारण है। गांवों में रोजगार एवं शिक्षा के साथ-साथ बिजली, आवास, सड़क, संचार, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाएं शहरों की तुलना में बेहद निम्न स्तरीय हैं। साथ ही गांवों में भेदभावपूर्ण सामाजिक व्यवस्था के कारण शोषण और उत्पीड़न से तंग आकार भी बहुत से लोग शहरों का रूख कर लेते हैं। प्रसिद्ध कथाकार मुंशी प्रेमचन्द ने अपने उपन्यास ‘‘गोदान’’ में भी आज से ९० वर्ष पूर्व ‘गांव छोड़ कर शहर जाने की समस्या’ को उठाया था।
भारत एक कृषि प्रधान देश है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इसका योगदान १५ प्रतिशत के लगभग है। भारत में तीन मुख्य फसलें होती हैं-
१. रबी की फसलें- ये अक्टूबर-नवम्बर माह में बोई और मार्च-अप्रैल माह में काटी जाती हैं। रबी की मुख्य फसलों में-गेहूं, चना, मटर, मसूर, सरसों, आलू आदि हैं।
२. खरीफ की फसलें- ये फसलें जुलाई माह में बोई और अक्टूबर माह में काटी जाती हैंं। इनमें चावल, ज्वार, बाजरा, मक्का, मूंग, उरद, लोबिया, तिल, मूंगफली, सोयाबीन, कपास, जूट, पटसन व तम्बाकू हैं।
३. जायद की फसलें- ये मार्च माह में बोई और जून में काट ली जाती हैं। इसमें मूंग, उरद, भिन्डी, खरबूज, तरबूज, खीरा, करेला, ककड़ी एवं अन्य तरकारियां हैं।
भारतीय कृषि प्रारम्भ से ही मानसूनी वर्षा पर आश्रित रही है। धीरे-धीरे बदलते मौसम की चाल व वर्षा की अनियमितता से कृषि अलाभकारी या घाटे का सौदा होती गई। कृषि को उन्नत्त बनाने के लिए सरकारी ॠण व्यवस्था तथा बीमा योजना प्रारम्भ की गई। किन्तु सूखे की मार, बेमौसम की बारिश, अनावृष्टि, अतिवृष्टि ओला आदि से नष्ट होती फसलों के कारण उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड, विदर्भ, कर्नाटक, मराठवाड़ा, तटीय आन्ध्र प्रदेश, और ओड़ीशा के किसान बड़ी संख्या में आत्महत्या करने लगे।
कृषि एवं कृषकों की समस्याआंें को विकरालता को देखते हुए ही वर्तमान सरकार ने १३ जनवरी, २०१६ को फसलों की सुरक्षा एवं कृषकों के भविष्य रक्षा, परिश्रम एवं धनरक्षार्थ नई फसल बीमा योजना की घोषणा की। इस योजना द्वारा किसानों के कल्याण, खेतिहर समुदाय के लिए जोखिम प्रबंधन और सूखे तथा बाढ़ के दौरान आने वाली चुनौतियोंे का सामना किया जा सकता है। सरकार द्वारा प्राकृतिक आपदा और सूखे के प्रबंधन सम्बन्धी विस्तृत नीति बनाई गई है जिसके अर्न्तगत आपदा सम्बद्ध योजनाएं, पीड़ित आबादी के लिए राहत उपाय इन सबको दूरगामी लक्ष्यों के तहत एकीकृत करने सम्बंधी कार्रवाई शामिल है।
फसल बीमा योजना इसी वर्ष खरीफ फसल के मौसम से शुरू हुई है। इसका लाभ देश के कुल साढ़े तेरह करोड़ किसानों को मिलेगा। बीमा प्रीमियम को घटाकर डेढ़ से दो फीसदी कर दिया गया जबकि पहले यह १५ फीसदी था। इसके अलावा कैपिंग का प्रावधान पूरी तरह हटा देने से इसका भी लाभ किसानों को मिलेगा। फसल बीमा को व्यापक बनाते हुए इसे खेत में फसलों की बुवाई से खलिहान तक समेटा गया है। प्राकृतिक आपदा के तुरन्त बाद २५ फीसदी क्लेम सम्बन्घित किसानों के बैंक खाते में सीधे पहुंच जाएगा। शेष ७५ फीसदी राशि नुकसान के आंकलन के बाद पहुंचेगी।
ओलावृष्टि, बेमौसम बारिश, आंधी, तूफान तथा जल भराव तक को स्थानीय जोखिम में शामिल किया गया है। यहां तक कि फसल कटाई के बाद चक्रवात एवं बेमौसम बारिश का जोखिम भी इसमें शामिल है। प्राकृतिक आपदा की स्थिति में किसानों को उनकी उपज के नुकसान की भरपाई करने वाली इस योजना का उल्लेखनीय पक्ष यह है कि इसमें रबी-खरीफ की फसलों के साथ ही बागवानी तक को शामिल किया गया है जिसके कारण सब्जी एवं फलों की खेती करने वाले किसान भी इस योजना का लाभ उठा सकेंगे।
पहले मात्र २० फीसदी किसान ही फसल बीमा योजना से जुड़े थे। किन्तु इस नई फसल बीमा योजना से शेष किसान भी बड़ी संख्या में इससे जुडेंग़े। निश्चित ही इस योजना के कारण बड़ी संख्या में किसानों के लिए खेती लाभकारी बनेगी। इस योजना द्वारा देश के ५० फीसदी से अधिक किसानों को कवर किया जाएगा जिससे बैंक एवं वित्तीय संस्थान लाभान्वित होंगे।
एक अप्रैल से लागू हुई नई फसल बीमा योजना के तहत किसानों द्वारा भरी जाने वाली प्रीमियम की राशि बढ़कर २००० करोड़ रूपये होने की संभावना है। इसके साथ ही केन्द्र ८८०० करोड़ रूपये मुहैया कराएगा।
इस योजना के अन्तर्गत किसान बीमा राशि का रबी फसलों के लिए १.५ फीसदी, खरीफ फसलों के लिए दो फीसदी और बागवानी फसलों के लिए ५ फीसदी रकम प्रीमियम के रूप में भुगतान करेंगे। पहले २३,०० रूपये के प्रीमियम के भुगतान पर सौ फीसदी फसल खराब होने का दावा करने पर १९,००० रूपये क्लेम मिलता था। जबकि अब मात्र १५,०० रूपये का प्रीमियम भुगतान करने पर ३०,०००/- रूपये तक का क्लेम मिलेगा।
वास्तव में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् पहली बार यह मौका है, जबकि किसानों के हित में इतना महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला किया गया है। निश्चित ही फसल बीमा में इस सुधार से किसानों के आर्थिक व सामाजिक जीवन मंें काफी हद तक बदलाव होगा। उनकी आजीविका का स्रोत कृषि अलाभकारी से लाभकारी दिशा में बढ़ेगा।
नई फसल बीमा योजना का लाभ पूर्वी उत्तर प्रदेश, बुन्देलखण्ड, विदर्भ, मराठवाड़ा, तटीय आन्ध्र प्रदेश और तटीय ओड़िशा के किसानों को विशेष रूप से मिलेगा। इन क्षेत्रों के किसानों की खेती सदा जोखिम भरी रहती थी। अब ये सुरक्षित हो जाएंगे।
किसानों द्वारा दावा भुगतान में होने वाली देरी को कम करने के लिए फसल काटने के आंकड़ों को एकत्रित करने एवं उसे अपलोड करने के लिए स्मार्ट फोन, रिमोट झेसिंग ड्रोन एवं जीपीएस तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। इस योजना के लिए सन् २०१६-१७ में ५,५५० करोड़ रूपये का आवंटन किया गया है। नई फसल बीमा योजना को मात्र एक ही बीमा कम्पनी, भारतीय कृषि बीमा कम्पनी (एआईसी) द्वारा नियंत्रित एवं संचालित किया जाएगा। इस योजना को सेवा कर से छूट भी दी गई है।
राष्ट्रीय कृृृषि बीमा योजना का उद्देश्य प्राकृतिक आपदाओं, कीट और रोगों के परिणामस्वरूप अधिसूचित फसल में से किसी की विफलता की स्थिति में किसानोंं को बीमा कवरेज और वित्तीय सहायता प्रदान करना है। नई फसल बीमा योजना नीति में फसल उगाने वाले पट्टेदार एवं जोतेदार किसान सहित सभी किसान बीमा राशि प्राप्त करने के पात्र हैं। इस योजना में अनुसूचित जाति, जनजाति एवं महिला किसानों को अधिकतम कवरेज सुनिश्चित कराने के लिए विशेष प्रयास किया जाएगा। नई फसल बीमा योजना में बीमा राशि सीधे ऑनलाइन वित्तीय संस्थाओं/बैंकों से लाभार्थियों के खाते में हस्तांतरित हो जाएगी। जिलास्तरीय निगरानी समिति (डीएलएमसी) फसल बीमा योजनाओं जैसे-‘राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना’ (एनएआईएस), मौसम ‘आधारित फसल बीमा योजना’ (डब्लूबीसीआईएस), ‘संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना’ (एमएनएआईएस), और ‘नारियल पाम बीमा योजना’ (सीपीआईएस) की निगरानी व देख-रेख कर रही है, यही किसानों को कृषि सम्बन्धित विभिन्न जानकारी का प्रबंध कराएगी।
खेती में नई तकनीक एवं प्रौद्योगिकी के प्रयोग के लिए कृतसंकल्पित सरकार ने बेहतर प्रशासन, समन्वय एवं जानकारी के समुचित प्रचार-प्रसार एवं पारदर्शिता के लिए एक बीमा पोर्टल तथा डीडी किसान चैनल भी शुरू किया है। इसके अलावा किसानों को फसल बीमा, कृषि सहयोग एवं कृषि से सम्बन्धित तमाम जानकारियों के लिए फसल बीमा एप्प भी शुरू किया गया है। सुरक्षित खेती एवं उन्नत आर्थिक दशा किसानों को जीवनदान देगी। निश्चित ही अब खेती घाटे का नहीं, बल्कि लाभ एवं सुरक्षा का सौदा बनेगी।
यही नहीं कृषि से जुड़े १४ फीसदी परिवारों में से लगभग ८० फीसदी के पास दो एकड़ से भी कम जमीन होने से वे आधुनिक कृषि तकनीकों व तौर-तरीकों का भी उपयोग नहीं कर पा रहे थे न ही सरकारी नीति एवं कार्यक्रमों का ही फायदा ले पाते थे। इसका मुख्य कारण किसानों को उचित सलाह-मशविरा देने वाली एजेन्सियों या कुशल कृषि विशेषज्ञों का सर्वथा अभाव था।
इन सब समस्याओं को ध्यान में रखते हुए भारतीय अर्थ-व्यवस्था में कृषि के बेहतर योगदान के लिए ही वर्तमान सरकार ने ‘स्किल इंडिया’,‘डिजिटल इंडिया’, ‘मेक इन इंडिया’ जैसे कार्यक्रमों की शुरूआत की है। इसका मकसद छोटे व कमजोर किसान परिवार से आने वाले लोगों को कुशल बनाना और उनकी जीवन शैली बेहतर करना है।
प्राय: किसानों की फसल बर्बाद हो जाती है। ऐसे में ई-खेती या कांट्रेक्ट की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसमें कारपोरेट कम्पनियां किसानों से अपनी पसंद का कच्चा माल तय वक्त और कम कीमत में उपजवाती है। इसमेंे उत्पादक और खरीददार के बीच पहले ही कीमत तय हो जाती है। ई-खेती में कांट्रेक्टर किसान को खाद्य और कीटनाशक जैसी जरूरतों के साथ खेती की तकनीकी सलाह भी मुहैया कराता है। ई-खेती से किसानों को खुले बाजार के मुकाबले २० से २५ फीसदी ज्यादा मुनाफा होता है।
कृषि को तभी लाभकारी बनाया जा सकता है जब किसान को अपनी मिट्टी की भली प्रकार परख हो। सरकार की ओर से मिट्टी की जांच पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इस काम में किसान मित्र अपने-अपने गांवों के किसानों की मिट्टी प्रयोगशाला में पहुंचा रहे और जांच करवा रहे हैं। रिपोर्ट के आधार पर किसानों को रासायनिक खाद्य एवं अन्य पोषक तत्वों को प्रयोग करने की सलाह दी जा रही है। मृदा की उर्वरता बढ़ाने के लिए उपयुक्त उर्वरकों का प्रयोग एवं चयन किया जाता है। इसके लिए केरल, कर्नाटक, असम, तमिलनाडु, हरियाणा तथा उड़ीसा में केन्द्रीय प्रयोगशाला की स्थापना की गई। विभिन्न राज्यों में भी अलग से प्रयोगशालाएं हैं।
सरकारें कई योजनाएं लागू कर रही हैं। इसमें प्रमुखत: हैं-राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा लक्ष्य, स्वीकृत बागवानी विकास कार्यक्रम, राष्ट्रीय आयल सीड एवं ग्रामीण भंडारण योजना।
इसके साथ ही कृषि क्षेत्र में ॠण प्रदान करने के लिए बैंकों में १८ प्रतिशत तक हिस्सा तय किया गया है। अब किसानों को फसल ॠण सात प्रतिशत वार्षिक दर पर दिया जाएगा।
उच्च उत्पादकता, कम उत्पादन मूल्य, कृषि फसल का पूरा लाभ तभी मिल सकता है, जबकि उच्च गुणवत्ता वाले बीज हों। इसके लिए सब्जियों, मसालों के उत्तम बीज की उपलब्धता पर जोर दिया जा रहा है।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अभियान के तहत किसानों को विभिन्न किस्मों एवं संकर फसलों से सम्बन्धित ज्यादा उपज वाले प्रमाणित बीजों को सब्सिडी पर उपलब्ध कराया जाता है। इसके साथ ही धान, गेहूं, दाल, अनाज की उत्तम पैदावार के लिए मिट्टी को उपजाऊ बनाने वाले पोषक जैव भी उर्वरक सब्सिडी पर किसानों को उपलब्ध कराए जाते हैं।
कृषि को लाभकारी बनाने के लिए बदलते समय के साथ फसल पैदावार की गुणवत्ता में भी परिवर्तन लाना अनिवार्य है। कन्नौज के एक किसान ने बाजार के अनुसार पैदावार में परिवर्तन कर मुनाफा कमाया है। आजकल विश्वभर में मधुमेह की बीमारी से लगभग ३५ प्रतिशत लोग पीड़ित हैं। ऐसे में किसानों ने मधुमेह पीड़ितों को ध्यान में रखकर शुगर फ्री आलू का उत्पादन प्रारम्भ किया। इससे उत्साहित एक व्यवसायी ने खाड़ी देशों से सम्पर्क किया और इसी वर्ष मई-जून महीने में आलू की पहली खेप निर्यात करने में सफलता भी हासिल की।
इसी प्रकार बाराबंकी जिले के एक प्रगतिशील किसान ने एक छोटे रकबे से केले का अच्छा उत्पादन प्रारम्भ किया। आज उनकी प्रेरणा से आसपास के जिलों में केले का अच्छा उत्पादन हो रहा है, जिससे किसान लाभान्वित हो रहे हैं।
इसके अतिरिक्त वर्तमान सरकार ने कृषि को लाभकारी बनाने की दिशा में गत वर्षों की तुलना में फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रति कुन्तल बढ़ाया है। सामान्य धान का वर्ष २०१४-१५ में न्यूनतम समर्थन मूल्य १३६० रुपये प्रति क्विंटल, ग्रेड ए धान का १४०० प्रति क्विंटल, संकर ज्वार का १५३० रु प्रति क्विंटल, अरहर का ४३५० रु प्रति क्विंटल, मूंग ४६०० रु प्रति क्विंटल, उड़द ४३५० रु प्रति क्विंटल, सोयाबीन (पीला) २५६० रु तथा (काला) २५००/प्रति क्विंटल तथा तिल ४६०० रु प्रति क्विंटल है।
इस तरह सरकार किसानों को उनकी उपज के लिए ज्यादा लाभकारी राशि दिलाने के लिए कृतसंकल्पित है। खरीफ और रबी की फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि निश्चित ही किसानों की बेहतरी की दिशा में एक अच्छा कदम है।
भारत विकास के युवातम राष्ट्रों में से एक है, जो पूरे आत्मविश्वास एवं उम्मीद के साथ विकसित हो रहा है। भारत की दो-तिहाई आबादी ३५ वर्ष आयु से कम लोगों की है, जो इसे समृद्धि हासिल करने के व्यापक अवसर उपलब्ध कराती है। देश में प्रतिवर्ष १ करोड़ २५ लाख नए युवा रोजगार की तलाश में घर से निकलते हैं। यह संख्या प्रतिवर्ष बढ़ रही है। आज प्रश्न युवाओं का मात्र कार्यदक्ष होना ही नहीं है, बल्कि उन्हें ऐसा रोजगार दिलाने की जरूरत है जो वास्तव में आय का सृजन करता हो। आज सरकार स्वावलंबन और कौशल विकास पर विशेष ध्यान दे रही है। उसका लक्ष्य सन् २०२२ तक १५ करोड़ युवाओं को काम का हुनर, दक्षता, सिखाना है ताकि वे अपने उद्योग-धंधे स्वयं स्थापित कर देश के आर्थिक विकास में सहयोग कर सकें। क्योंकि वर्तमान समय में विकसित देशों के पास धन तो है, लेकिन काम करने वाले कुशल जन नहीं हैं। भारत उन्हें प्रशिक्षित और कुशल करोड़ों युवा दे सकता है। इस समय देश में कुशल कारीगर मात्र ३.५ प्रतिशत हैं। जबकि विश्व में कुशल प्रशिक्षित लोगों के लिए नौकरियों का बहुत बड़ा बाजार तैयार है। माना कि ऊंची मेरिट से ही नौकरी मिलना सम्भव नहीं है। इसके लिए छात्र को बाजार ज्ञान, सम्बन्धित क्षेत्र की पूरी जानकारी, टीम भावना और मैनेजमेन्ट कौशल होना चाहिए। विशेषज्ञों का भी मानना है कि अच्छी डिग्री के साथ ही विषय की जानकारी, संवाद कौशल, बाजार की समझ, सामान्य व्यावहारिक ज्ञान और प्रस्तुतिकरण कौशल भी होना चाहिए।
आज का युग ‘तकनीकी युग’ है और इसमें आबादी और रोजगार के बीच काफी अंतर आ चुका है। ऐसे में कौशल विकास महत्वपूर्ण है। भारत की अप्रत्यक्ष/प्रच्छन्न/प्रत्यक्ष बेरोजगारी का समाधान इसी से सम्भव है। क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था विशेषज्ञता व दक्षता पर आधारित होती जा रही है। एक आंकड़े के मुताबिक सम्पूर्ण विश्व में ५.५ करोड़ दक्ष लोगों की कमी है। इनमें नर्स, टेक्निशियन, फिटर, इलेक्ट्रिशियन, प्लम्बर जैसे कार्य करने वाले लोग शामिल हैं। हालांकि भारत में इनके कार्यों में दक्ष लगभग ४.७ करोड़ लोग ऐसे हैं, जिनके पास रोजगार नहीं है।
वैश्विक स्तर पर भारत की कार्यशील आबादी का अनुपात सर्वाधिक है पर उनमें कौशल दक्षता का सर्वथा अभाव है। १५ से ६९ वर्ष के ६० प्रतिशत लोग अकुशल हैं जिससे उनके श्रमबल का लाभ, बेहतर तरीके से उपयोग नहीं हो रहा है। यहां तक कि ५३ प्रतिशत लोग अकुशल कृषि कार्य में लगे हैं, क्योंकि माना जाता है कि यहां कौशल दक्षता की आवश्यकता नहीं है जबकि वास्तविकता यह है कि आधुनिक कृषि में सबसे अधिक दक्षता की आवश्यकता है। इसी प्रकार ९३ प्रतिशत लोग अनौपचारिक क्षेत्रों में कार्यरत हैं लेकिन ये सभी यदि प्रशिक्षण द्वारा कार्य में दक्षता प्राप्त कर लें तो उत्पादकता में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की जा सकती है। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम श्रेणी की उद्यम ईकाइयां यानि एमएसएमई क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। देश के औद्योगिक उत्पादन में इसका बड़ा योगदान है।
विनिर्माण क्षेत्र में ४५ फीसदी और निर्यात में ४० प्रतिशत इसका योगदान है। देश की जी.डी.पी. में भी इसका योगदान ३७ प्रतिशत है, जिनमे करीबन ४० प्रतिशत रोजगार का सृजन होता है। इन इकाइयों से रोजगार पाने वाले श्रमिक कम कुशल, अनपढ़ और वंचित समूह से सम्बन्धित होते हैं। देश में लगभग २.६ करोड़ एमएसएमई ईकाइयां हैं। विनिर्माण क्षेत्रों में उद्यमियों के लिए कुशल मानवशक्ति उपलब्ध कराने के लिए १ लाख ६५ हजार, ३४० युवाओं को प्रशिक्षित किया गया तथा १८ प्रौंद्योगिकी विकास केन्द्रों के जरिये ३६ हजार २१६ युवाओं को प्रशिक्षित किया गया है। गांवों में लघु उद्योगों को पुनर्जीवित करने के लिए और व्यावसायिक कुशलता के लिए स्कीम को नए बदलाव के साथ लागू किया गया है। ग्रामीण आजीविका व्यवसाय योजना ग्रामीण युवाओं को रोजगार के अवसर देने के लिए कारगर है। १३ राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में उद्यम लगाने के लिए आवेदन फाइल करने हेतु एक पोर्टल शुरू किया गया है। विश्व बैंक की सहायता से १५ नए टेक्नोलॉजी डेवलपमेन्ट सेन्टर खोले जाएंगे जिसके द्वारा युवाओं को बेहतर प्रशिक्षण मिलेगा। मुद्रा बैंक की स्थापना से सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्योगों को विकास की नई राह मिलेगी।
वर्तमान सरकार ने गंगा निर्मलीकरण हेतु सन् २०१४ में नमामि गंगे कार्यक्रम शुरू किया। गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए सरकार की नमामि गंगे योजना के अंतर्गत गंगा को निर्मल एवं अविरल बानाने के लिए लगभग ४० से ५० हजार करोड़ तक के खर्च का संभावित अनुमान है। इसमें सेे २० हजार करोड़ रूपये में गंगा निर्मलीकरण हेतु आवंटित किए जा चुके हैं। गंगा निर्मलीकरण एक राष्ट्रीय कार्यक्रम है। इसमें प्रत्येक देशवासी को सकारात्मक योगदान देना चाहिए। स्वस्थ सिद्धांतों पर आधारित नदी प्रबंधन नदियों को भी अच्छा स्वास्थ देगा। लगभग २५०० किलो मीटर तक बहने वाली गंगा को नवजागरण और कड़े कानूनों को लागू करके ही प्रदूषण से मुक्त किया जा सकता है।
वर्तमान सरकार के कड़े नियमों, सख्ती एवं प्रयासों के फलस्वरूप ७६४ प्रदूषणकारी ऐाद्योगिक ईकाइयों में से ५१४ ने ऑनलाइन प्रदूषण मॉनिटरिंग सिस्टम लगा दिण् हैं। इसके साथ ही २८ डिस्टलरीज की जांच की गई। इनमें प्रदूषण के संकेतक बी ओ डी (बायोकेमिकल आक्सीजन डिमांड) की मात्रा २२ टन प्रतिदिन से घटकर २ टन प्रतिदिन पर आ गई। इसी तरह पल्प एंड पेपर उद्योग की ४८ ईकाइयों मेें भी बी ओ डी का स्तर ७६ टन प्रतिदिन से घटकर २५ टन प्रतिदिन रह गया है। वहीं चीनी उद्योग की ५४ ईकाइयों में भी अपशिष्ट जल निकासी का स्तर प्रति टन गन्ना पेराई पर ४०० लीटर से कम हो कर २०० लीटर पर आ गया है।
बी ओ डी स्तर में कमी आना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका स्तर अधिक होता है तो जल में आक्सीजन का स्तर कम हो जाता है। इससे जलीय जीव-जन्तु खत्म हो जाते हैं। गंगा में सभी ७६४ प्रदूषणकारी औद्योगिक ईकाइयां से हर दिन १३१ टन बी ओ डी जाता है। जो गंगा में शहरी सीवेज तथा अन्य स्रोतों से जाने वाले कुल बीओडी का ३० प्रतिशत है। इसके अलावा १५० प्रदूषणकारी औद्योगिक ईकाइयों जिनमें ९ पेपर मिलों, २८ टेक्सटाइल ईकाइयों, ६ बूचड़खानों, ९ चीनी मिलों, ४ डिस्टीलरी, १० रासयनिक उद्योग की ईकाइयों, ६८ टेनरीज, १६ अन्य औद्योगिक ईकाइयों को बंद करने का आदेश दिया गया है। वर्तमान सरकार इस बात के लिए भी दृढ़ संकल्पित है कि सिर्फ गंगा ही नहीं अन्य नदियों को भी सरकार मानकों के अनुसार ही जल प्रवाहित करने की अनुमति देगी। पर्यावरण मंत्रालय द्वारा सख्ती के बाद निश्चय ही गंगा में प्रदूषण कम होगा। और निरतंर अबाधित जल प्रवाह से वह निर्मल भी होगी।
गंगा संरक्षण मंत्रालय के अनुसार ४६४ करोड़ रुपये की लागत से ‘नमामि गंगे परियोेजना’ के अन्तर्गत सीवेज ट्रीटमेंट के २९ प्रोजेक्ट पूरे कर लिए गए हैं। इसके साथ ही गंगा किनारे बसे गांवों में १५ लाख शौचालयों के निर्माण का लक्ष्य है जिसमें से करीब सवा तीन लाख शौचालय तैयार हो गए हैं।
मोदी सरकार अलग मंत्रालय बनाने के बाद गंगा के लिए एक विशेष विश्वविद्यालय स्थापित करने जा रही है। इस अनूठे विश्वविद्यालय का नाम गंगा यूनिवर्सिटी ऑफ रिवर साइंसेज होगा। पूरी दुनिया में यह अपने तरह का पहला विश्वविद्यालय होगा। इसमें नदी प्रदूषण और जल की गुणवत्ता से लेकर नदियों की विभिन्न अवस्थाओं पर अध्ययन किया जाएगा।

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