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ज्ञवल्क स्मृति ५वीं शताब्दि के पूर्व का भारत का एक प्रसिध्द प्राचीन ग्रंथ है। उसमें वृक्ष को न काटने तथा काटने वाले को कड़ा दण्ड दिया जाने का नियम बनाया गया था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र, जो मौर्यकालीन ग्रंथ है, में भी वनों के रखरखाव की व्यवस्था की सलाह दी गई। महाराजा अशोक ने भी आगे बढ़कर पर्यावरण तथा जैवविविधताओं के संरक्षण की नीति अपनाई थी। लता-वृक्ष तथा अन्य वनस्पतियों से सारे चराचर के साथ आत्मीय सम्बंध थे। प्राचीन भारत में पर्यावरण बचाने के लिए अनवरत प्रयास होते रहे थे।
ब्रिटिश शासकों ने भी पर्यावरण की सुरक्षा के लिए अनेक कानून बनाए थे। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पर्यावरण की सुरक्षा के लिए ब्रिटिश कानूनों को संविधान में भी समाहित किया गया। कुछ अन्य कानून भी बनाए गए तथा १९७६ में पर्यावरण, वन तथा वन्य प्राणियों की सुरक्षा के लिए कानूनों में आवश्यक संशोधन भी किया गया। इसके बाद १९८० तथा १९८१ में जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण तथा वनों की सुरक्षा से सम्बंधित तथा भोपाल गैस त्रासदी, ध्वनि प्रदूषण के लिए कानून बना। १९८५ में वन तथा प्रर्यावरण के लिए अलग विभाग बनाकर उसके लिए अलग मंत्रालय भी बना।
जापान, इंग्लैण्ड व सिंगापुर की जनसंख्या का घनत्व अधिक होते हुए भी वहां पर्यावरण की मर्यादा को देखते हुए, इन राष्ट्रों से भारत की तुलना की जाए तो जनसंख्या की अधिकता के कारण पर्यावरण पर प्रभाव पड़ता है, यह समझ अब बदलती जा रही है। पर्यावरण को बनाए रखने के लिए लोगों में जागृति पैदा करने, पर्यावरण के प्रति आत्मीयता बनाने, आवश्यक कानूनों का निर्माण करने, पर्यावरण की सुरक्षा के लिए दुनिया में उपयोग में आने वाली अधुनिक तकनीक का उपयोग करने तथा पर्यावरण को नष्ट करने वालों पर नजर रख कर उन्हें दण्डित करने जैसी बातों का सहारा लेना पड़ेगा। यह बात अब सरकार के समझ में भी आ गई, तद्नुसार कदम उठाने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है।
वायु प्रदूषण का बड़ा कारण गांवों में बड़ी संख्या में तथा कुछ हद तक शहरों में भी १० करोड़ से अधिक घरों में है। गोबर के कण्डों, लकड़ी तथा अन्य अनुपयोगी वस्तुओं को रोज कम से कम दो तीन बार जलाया जाता है, जिससे उठने वाला धुंआ बहुत प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है। छोटे शहरों तथा गांवों तक विद्युत या तो पहुंची नहीं या पहुंची तो पर्याप्त मात्रा में नहीं है। पर्यावरण को कम हानि पहुंचाने वाले ऊर्जा स्रोत के लिए भी पर्याप्त अधो-संरचना नहीं है। डीजल तथा पेट्रोल पर चलने वाली गा़डियों पर भी कोई प्रतिबंध नहीं है। यही सब वायु प्रदूषण के कारण बने हैं।
जल प्रदूषण (पृथ्वी के भूतल पर तथा भूजल) का बड़ा कारण यह है कि नदी या तालाब में पहुंचने वाले गंदे पानी पर पहले कोई प्रक्रिया नहीं की जाती। वर्षा के जल की ठीक से निकासी न होने के कारण, बस्ती का तथा उद्योगों का कचरा नदी में फेंकने के कारण, नदियों में अंत्य संस्कार सही तरीके न किए जाने के कारण भी जल प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। मलजल प्रक्रिया के सरकारी साधन कई बार बंद रहते हैं, या हमेशा के लिए बंद हो जते हैं, इसका कारण, मशीन की अयोग्य डिजाइन, रखरखाव न होना, पर्याप्त बिजली का अभाव, मानव संसाधन की कमी, पर्याप्त व्यवस्था का अभाव, गंदा पानी पाइप से रिसने तथा घन कचरे के कारण भूमि के अंदर प्रदूषण बढ़ता है जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
विश्व स्वास्थ संगठन की रिपोर्ट के अनुसार भारत के कुल ३११९ नगरों में से २०१ नगरों में मलजल प्रक्रिया का काम आंशिक रुप से हो रहा है, आठ स्थानों पर प्रक्रिया पूरी होती है, १०० से अधिक स्थानों से निकलने वाला मलजल सीधे गंगा में आता है। बाकि स्थानों पर प्रक्रिया शुरू करने के लिए बड़ी पूंजी की आवश्यकता है। जल प्रदूषण का दूसरा कारण खेतों में डाला जाने वाला खाद तथा कीटनाशक है, जो नदी नालों में बहकर, जमीन के अंदर तक प्रदूषण पैदा करते हैं। उसी प्रकार घनकचरा तथा दूषित भूजल नदी तथा तालाबों में जाकर प्रदूषण फैलाता है।
पश्चिम घाट का हराभरा प्रदेश संकट में है
सह्याद्री पर्वत महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक तथा केरल तक फैला हुआ है। वहां प्राकृतिक वनस्पतियों तथा जानवरों व पक्षियों की विभिन्न प्रजातियां पल रही हैं। कुछ तो विकास कार्य में नष्ट भी हो गई हैं। बची हुई पर्यावरणीय सम्पत्ति तथा प्राकृतिक सौंदर्य को अबाधित बनाए रखने के लिए माधव गाडगील तथा बाद में कस्तुरीरंगन समिति ने अध्ययन के बाद रिपोर्ट बनाई। दोनों रिपोर्ट की जांच करने के बाद सरकार ने कुछ हरित क्षेत्र को विकास कार्य के लिए उपयोग में न लेने के लिए सिफारिश की थी। परंतु ज्ञात होता है कि महाराष्ट्र, गोवा, तथा कर्नाटक में पश्चिम घाट का कुछ हिस्सा विकास कार्यों के लिए दिया रहा है। क्यों दिया जा रहा है यह समझ के बाहर है। परंतु पर्यावरण को बचाना है तो वहां काम करने वालों को विकास के काम तो करना चाहिए परंतु पर्यावरण की कीमत पर नहीं।
अक्षय ईंधन
अक्षय याने ईंधन की ऐसी आपूर्ति, जहां ईंधन समाप्त होते ही पुनः तुरंत बाद आपूर्ति शुरू हो जाती है। अक्षय ऊर्जा के कुछ प्रकार पर्यावरण को थोड़ी ही हानि पहुंचाने वाले होते हैं, खनिजीय ईंधन की अपेक्षा अक्षय स्रोत को पर्यावरण की दृष्टि से बेहतर माना जाता है। अक्षय ऊर्जा वातावरण में पैदा होने वाली ग्रीन हाउस से निकलने वाली विषैली गैसों पर नियंत्रण रखने की क्षमता रखती है। विविध प्रकार के ऊर्जा स्रोत, जिसमें अक्षय (ठशपशुरलश्रश) तकनीक का उपयोग होता है, उन्हें साफ तथा हरित माना जाता है। इनमें से किसी एक पध्दति का उपयोग किया जाए तो पर्यावरण की कम से कम हानि होती है। साथ ही नागरिकों की वर्तमान व भविष्य की आर्थिक तथा सामाजिक जरूरतें अच्छी तरह से पूरी होती हैं। ऊपर दी गई परिभाषा के अनुसार निम्नलिखित स्रोतों को अक्षय कह सकते हैं- सौर (फोटोव्हेल्वेड तथा सौर), पवन, भूतल का थर्मल, बायोमास, बायोगैस (घन कचरा साइकलिंग प्रक्रिया तथा जलशुध्दि प्रक्रिया से), कुछ हद तक जल विद्युत।
सभी स्रोतों के लिए भगवान सूर्य ही जिम्मेदार है। सौर ऊर्जा मुख्यतः सूर्य की गरमी व प्रकाश से प्राप्त होती है। यह वातावरण में फैल कर हमें अनेक प्रकार के लाभ देती है।
२००४ के एक सैटलाइट चित्र से ज्ञात होता है कि गंगा के उत्तर भाग में पानी में प्रदूषण उत्तर क्षेत्र में बायोमास जमाने की प्रथा के कारण उत्पन्न धुंए से होता है। उसी प्रकार पाकिस्तान तथा मध्यपूर्व के रेतीले प्रदेश के धुल कण भी गंगा के पानी को प्रदूषित करते हैं। वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, घन कचरा, प्राकृतिक रूप से होने वाले प्रदूषण के कारण भारत के लिए हरित प्रदेश हमेशा चिंता का विषय रहा। पर्यावरण के नष्ट होने का अर्थ है अनेक रोगों को निमंत्रण। और भारतीयों के प्रभावित करने में जीवन में स्वास्थ्य को प्रभावित करने में इनके दुष्परिणाम बड़ा कारण बनते हैं।
स्वच्छ भारत अभियान
एक चुनावी संदर्भ में अक्टूबर २०१४ में एक सभा में नरेन्द्र मोदी ने कहा कि ‘‘पहले शौचालय फिर देवालय’’। इस वाक्य का निहितार्थ समझने की जरूरत है। अब प्रधान मंत्री बनने के बाद मोदी ने ‘‘स्वच्छ भारत अभियान’’ की घोषणा कर दी है।
भारत के विषय में सभी कहते हैं कि, यह देश गलिच्छ तथा प्रदूषित है। एशिया में सबसे अधिक गंदी बस्तियों वाला देश भारत को माना जाता है। यद्यपि इन बस्तियों के बाहर भी पर्यावरण की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। यूनाइटेड नेशन की जानकारी के अनुसार खुले में शौच करने वालों की संख्या भारत में सबसे अधिक है, लगभग ४० करोड़। बड़ी मात्रा में जल प्रदूषण तथा वायु प्रदूषण यहां है। नदी, तालाब, कुओं का भूतल के ऊपर का तथा नीचे का भी जल ६०% प्रदूषित है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वायु प्रदूषण के मामले में भारत विश्व में ९वें स्थान पर है। दिल्ली शहर सबसे अधिक प्रदूषित है। सब से अधिक प्रदूषित शहरों की सूची में भारत के १३ शहर हैं। इन्हीं सब कारणों से भारत को गंदा कहकर अपमानित होना पड़ता है।
अस्वास्थ्यकर परिस्थिति तथा प्रदूषण के कारण बस्तियों के तथा अन्य लोगों के भी स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। असम के लगभग ५०% लोगों को खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय की सुविधा प्राप्त नहीं है। इसके कारण डायरिया, कालरा, टाइफाइड, हेपेटाइटीस तथा कृमिरोग तेजी से फैलता है। यूनिसेफ की जानकारी के अनुसार २०१० में १३% बाल मृत्यु अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों से उत्पन्न डायरिया रोग से हुई है।
भारत में ‘स्वच्छ भारत अभियान’ पब्लिक-प्राइवेट पार्टिसिपेशन (झझझ) के अंतर्गत चलाना चाहिए। उदाहरण के लिए न्यूयार्क शहर में बिजनेस इम्प्रूवमेंट डिस्ट्रिक्ट के द्वारा बगीचों का रखरखाव किया जाता है। यह भी पी.पी.पी. का एक प्रकार है।
घन कचरे से उर्जा का निर्माण
घनकचरे से ऊर्जा बनाने का विकल्प नार्वे तथा जापान में उपयोग में लाया जाता है। भारत में अक्षय ऊर्जा पर काम करने वालों का कहना है कि भारत में नगरीय तथा औद्योगिक घन कचरे से १००० मेगावाट ऊर्जा उत्पन्न हो सकती है।
इसे करने के लिए घन कचरे को चार भागों में बांटा जाना चाहिए-
पुनः उपयोग में आनेवाले, बड़े आकार के तथा न जलने वाले कचरे को अलग कर भट्टी में डालना पड़ेगा। नार्वे पड़ोसी देशों से घन कचरा आयात करता है। तकनीकी जानने के लिए बहुत से विकासशील देश इसे जापान से आयात करते हैं। ऐसा प्रकल्प मुंबई में क्यों नहीं बनाया जाता है? ऐसे प्रकल्प के लिए कार्यक्षम घन कचरे के व्यवस्थापन की भी जरूरत है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि मुंबई के घन कचरे से १२० मेगावाट बिजली उत्पन्न हो सकती है। जिससे वर्ष में १००० करोड़ रुपये प्राप्त होंगे। पीपीपी मॉडल भी इसके लिए काम कर सकता है।
भारत में ३१-१२-२०१४ तक कितनी अक्षय ऊर्जा का उत्पादन हुआ? भारत सरकार ने २०१६ तक १८५०० मेगावाट और ऊर्जा बनाने का लक्ष्य रखा है, उसमें से पवन की ११००० मेगावाट की हिस्सेदारी है।
३१ दिसम्बर २०१४ तक अक्षय ऊर्जा का उत्पादन निम्नानुसार हैः
प्रकार मेगावाट
१. पवन २२४६५
२. सौर ( फोटोऐकल) ३०६३
३. छोटी जलविद्युत ३९९१
४. बायोमास १३६५
५. गन्ने के छिलके से २८००
६. घन कचरे से १०८
कुल ३३६१२
पवन ऊर्जा का काम भारत में १९९० से प्रारंभ हुआ। अब इस क्षेत्र में भारत दुनिया में ५वें नम्बर पर है। डेन्मार्क तथा यू.एस. आगे है। भारत में किस राज्य में कितनी मेगावाट पवन ऊर्जा बनती है। तमिलनाडु ७१६२, गुजरात ३१७५, महाराष्ट्र ३०२२, राजस्थान २६८५, कर्नाटक २१३५, आंध्र प्रदेश ४४८, मध्यप्रदेश ३८७, केरल ३५, पश्चिम बंगाल १, अन्य राज्य ३
कुछ बड़े पवन केन्द्र (मेगावाट में) ः
१) थर मरुस्थल ३५००० वर्ग कि.मी. क्षेत्रफल ६०० से २१०० क्षमता मेगावाट।
२) भारतीय सौर ऊर्जा अभियान संस्था को यूनाइटेड नेशन की पर्यावरण संस्था ने सहयोग दिया। भारतीय सौर संस्था को ‘‘एनर्जी ग्लोब वर्ल्ड’’ का पारितोषिक भी प्राप्त हुआ। इन्होंने २००३ में दक्षिण भारत के ग्रामीण भागों में जहां बिजली की ग्रीड नहीं थी, १६००० घरों तक बिजली पहुंचाने का काम ३ साल तक किया। ॠण की व्यवस्था कनारा बैंक तथा सिंडिकेट बैंक की २००० शाखाओं ने की।
३) भारत सरकार ने देश भर में सौर ऊर्जा क्षेत्र में काम करने के लिए जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय सौर अभियान की ओर से २००९ में घोषणा की कि राष्ट्रीयकृत योजना के अंतर्गत क्लाइमेट चेंज योजना के द्वारा २०१३ तक १००० मेगावाट तथा २०२० तक २००० मेगावाट ग्रीड का लक्ष्य रखा है। इस योजना में ग्रिड़ की विद्युत तथा सौर विद्युत समान स्तर की तथा प्रति यूनिट खर्चा भी एक समान रखने की कोशिश रहेगी।
एल.ई.डी. बल्बः
पर्यावरण को बचाने वाले तथा कम विद्युत पर चलने वाले एल.ई.डी. बल्बों को रास्तों पर तथा घर-घर लगाने का सरकार ने निश्चय किया है।
भारत सरकार ने नान फासिल इंधन के लिए २०१५ में ३० प्रतिशत तथा २०३० के लिए ४० प्रतिशत उत्पादन का लक्ष्य रखा है। भारत ने पर्यावरण के रखरखाव के क्षेत्र में तथा अक्षय ऊर्जा के उत्पादन में अच्छी उन्नति की है।
ॠण २.४ प्रतिशत कम हुआ। उत्पादन २९१६८ मेगावाट, ट्रांस्मीशन सर्कुलेटरी लाइन ३६८२१ कि.मी. बन गई है। एल.ई.डी. बल्ब ३ करोड़ से अधिक लग गए हैं जबकि भारत का लक्ष्य ६२ करोड़ का है।

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