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बदलाव मानव का स्थायी भाव है। ग्रामीण कहा जाने वाला भारत धीरे-धीरे बदल रहा है। कोंकण सरीखे भाग में भी पिछले कुछ वर्षों में यह बदलाव महसूस किया जा रहा है। गांव के लिए पानी की व्यवस्था, अवागमन की सुविधा, शैक्षणिक सुविधा, सामूहिक खेती, कचरामुक्ति, स्वास्थ्य मंं सुधार, शालाओं में सुधार, कंप्यूटर का उपयोग, करिअर संबंधित मार्गदर्शन, जल संधारण, गांव के कच्चे माल को बाजार उपलब्ध कराना, स्त्री सशक्तिकरण, सामाजिक सुधार आदि अथवा इनमें से किसी एक मुद्दे को लक्षित कर सुधार करने वाले लोग प्रत्येक गांव में होते हैं। उनके छोटे प्रयत्नों से भी परिवर्तन होता है। गांव का विकास और बदलाव याने इनमें अलग कुछ नहीं है। ऐसा ही एक हरफनमौला और सामाजिक सुधार का व्रत लिया हुआ व्यक्तित्व याने देवरुख के वसंत मनोहर उर्फ बालासाहेब पित्रे। आज सुश्रुत एवं ऍडलर इन दो आर्थोपेडिक कंपनियों के माध्यम से देवरुख का नाम विश्व पटल पर लाने वाले बालासाहेब ने केवल यही न रुकते हुए गांव के विकास को केंद्रबिंदु मान कर रोजगार निर्मिति, शैक्षणिक संस्थाओं की मजबूती, नए शैक्षणिक अध्ययन केंद्रों की निर्मिति करते हुए देवरुख के विकास में अपना नाम शामिल कराया है। उनके इस प्रयास का यह छोटासा अवलोकन……
ऍडलर/सुश्रुत की निर्मिति
वैश्वीकरण की हवा के बाद याने सामान्यत: १९९० के दशक के बाद कोंकण में उद्योग संबधी क्रांतिकारी बदलाव दिखने लगे। परंतु उसके पहले ही देवरुख ग्राम के एक युवक ने अपनी शिक्षा एवं बुद्धि के बल पर देवरुख सरीखे अत्यंत छोटे गांव में ‘‘सुश्रुत’’ की स्थापना की। वे थे वसंत मनोहर उर्फ बालासाहेब पित्रे। १९७३ में विजयादशमी के मुहूर्त पर देवरुख जैसे ग्रामीण इलाके में केवल ५०० वर्ग फीट की जगह एवं सात मजदूरों के साथ उन्होंने ‘‘सुश्रुत’’ का प्रारंभ किया। आज इस उद्योग की साडवली के लघुउद्योग परिसर में ७० हजार वर्गफुट जगह में विशाल इमारत खड़ी है। सुश्रुत की सहायक कंपनी ऍडलर की स्थापना १९९३ में की गई। देवरुख के पास मुरादपुर में ऍडलर की इमारत है। शरीर की हड्डियों के ऑपरेशन में प्रयुक्त होने वाले प्रत्येक उपकरण की निर्मिति इन दोनों कंपनीयों में होती है। अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता को देखते हुए दोनों जगह उच्च दर्जे का सामान तैयार किया जाता है। अतंरराष्ट्रीय बाजार से कच्चा माल आयात कर ये उपकरण बनाए जाते हैं। दोनों कंपनियों के उत्पादनों को आईएसओ प्रमाणपत्र प्राप्त है। इसके अतिरिक्त इन उत्पादों को यूरोपियन मार्केट में प्रवेश करने के लिए सीई प्रमाणपत्र भी एडलर को प्राप्त है। हाथ-पैरों की हड्डियों में फिक्स करने हेतु आवश्यक सूक्ष्म उपकरण तैयार करने के लिए कंपनी ने यूनिवर्सल मिनी एक्सटर्नल और थिका फिक्टेटर नामक उपकरण पद्धति विकसित की है। इस पद्धति का उपयोग चेहरे पर की जाने वाली प्लास्टिक सर्जरी में किया जाता है। सुश्रुत एवं ऍडलर कंपनी से उपकरण प्राप्त करने हेतु पहले ऑर्डर बुक करनी होती है। उसके बाद ३ हफ्ते में ये उपकरण बना कर दिए जाते हैं। हाथ पैरों की हड्डियों के खोखले भाग में भरने वाली एवं न हिलने वाली सलाखें बनाने हेतु कंपनी ने इंटरलॉकिंज नेल्स सिस्टम तैयार की है और इस पद्धति से विकसित उपकरणों की अच्छी मांग है।
ऑपरेशन हेतु आवश्यक उपकरणों का स्वतंत्र सेट भी कंपनी द्वारा तैयार किया जाता है। सुश्रुत का मुख्य कार्यालय पुणे में है। इसके अतिरिक्त संपूर्ण देश में उपकरण भेजने हेतु दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता, मुंबई में विभागीय कार्यालयों की स्थापना की गई है। कंपनी के उत्पाद देश के अतिरिक्त स्विट्जरलैण्ड, जर्मनी, अमेरिका, वेस्ट इंडिज, श्रीलंका, नेपाल आदि देशों में भी निर्यात किए जाते हैं। परिणाम एवं अचूकता के स्तर पर पूर्ण रूप से खरे उतरने वाले उपकरण आज अंतरराष्ट्रीय बाजार में नाम कमा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर के सर्जरी के लिए आवश्यक उपकरण बनाने हेतु कंपनी द्वारा बयूरो चीफ ऑफ इंडियन स्टैण्डर्ड
से प्रमाणित करवा कर ये उपकरण विकसित किए जाते हैं। सन १९९४ में कंपनी ने टाईम (ट्रेनिंग इनिशियेटिव इन मेडिकल एज्युकेशन) इस सहसंस्था की स्थापना कर उसके माध्यम से प्रसिद्ध शल्य चिकित्सकों द्वारा नए शल्य चिकित्सकों का मार्गदर्शन करवाने की नीति प्रारंभ की है। इसमें ३८ प्रकार के पाठ्यक्रमों के माध्यम से आज तक तीन हजार से अधिक नए सर्जनों को ट्रेनिंग देने में कंपनी को सफलता प्राप्त हुई है। इंडियन आर्थोपेडिक एसोसिएशन की ओर से दिए जाने वाला प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘राष्ट्रीय प्रवीणता पुरस्कार’ पहली बार सुश्रुत के संचालक अजय पित्रे को प्राप्त हुआ है। बालासाहेब पित्रे, उनकी पत्नी श्रीमती विमलाताई पित्रे, पुत्र अजय पित्रे एवं बहू श्रीमती भारती पित्रे आदि परिवार के सहयोगी ही इन देनों कंपनियों का भार संभालते हैं। अभी-अभी ही ये कंपनियां एक बहुराष्ट्रीय कंपनी को हस्तांतरित की गई हैं। इससे देवरुख ग्राम की प्रतिष्ठा में चार चांद लग गए हैं।
क्रेडार की स्थापना
प्राकृतिक कलागुणों का वरदान प्राप्त कोंकण के कलाकारों को इन दृश्य कलाओं का शास्त्रयुक्त शिक्षण उपलब्ध हो, इस कला के आधार पर वे स्वावलंबी बने, स्वयं उद्योजक बनें, इस संकल्पना से बालासाहेब ने क्रेडार नामक संस्था की स्थापना की। इसी में से डी कॅड(देवरुख कॉलेज ऑफ आर्ट एन्ड डिजाइन) की स्थापना हुई। पित्रे फांउडेशन के माध्यम से निर्मित क्रेडार इस पब्लिक ट्रस्ट के माध्यम से डी कॅड का व्यवस्थापन होता है। सन २००२ में यह संस्था मुंबई में पंजीकृत की गई। ग्रामों से नौकरी एवं कामधंधे के निमित्त शहर की ओर होने वाले स्थलांतर रोकने हेतु ग्रामीण क्षेत्र में उद्यमी विकास होना आवश्यक है। इसी दिशा में बढ़ने का प्रयत्न इस संस्था के माध्यम से किया जा रहा है। डी कॅड में बी. एफ.ए. पेंटिग एवं २डी एनिमेशन इन डिग्रियों के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। गत १० वर्षों में यहां से असंख्य विद्यार्थी ये डिग्रियां लेकर निकले हैं। क्रेडार की ओर से सुसज्जित होस्टल, अतिथि कक्ष, कांफ्रेंस रूम, भोजन व्यवस्था, हस्तकला का प्रशिक्षण देने वाले पॉटरी, बांस का काम, पेपर क्राफ्ट, पेपर मॅशे, स्क्रिन प्रिंटिंग इ. विभाग चलाए जाते हैं। प्रिंट मीड़िया के लिए आवश्यक डिजाइन संबंधी प्रशिक्षण देने हेतु क्रेडार डिजाइन स्टूडियों की स्थापना की गई है। इसके साथ ही हस्तकला की वस्तुओं की बिक्री हेतु प्रथम व्यवस्था की गई है।
उषाताई नातू गणेश संग्रहालय
डी कॅड के संस्थापक बालासाहेब पित्रे की रिश्तेदार गणेशभक्त श्रीमती उषाताई नातू ने विविध देशों में प्रवास करते हुए वहां की गणेश प्रतिमाएं एकत्रित की हैं। विश्वकोश के आधार पर उन्होंने इन सब मूर्तियों की जानकारी भी एकत्रित की। अब तक उन्होंने उनके अनेक हितचितंकों को ये मूर्तियां भेंट स्वरूप दी हैं। विश्वकोश के आधार पर उन्होंने असंख्य गणेश मूर्तियां खास कलाकारों से निर्माण भी करवाई हैं। अपने बाद इन मूर्तियों को कौन संभालेगा यह प्रश्न उनके सामने था। उन मूर्तियों में से करीब १५० से २०० मूर्तियों का संग्रह उन्होंने डी कॅड की मातृसंस्था क्रेडार को भेंट स्वरूप दी है। इसीसे डी कॅड ने उषाताई नातू के नाम से दो वर्ष पूर्व मूर्ति संग्राहलय प्रारंभ किया है। जापान, मलेशिया, कंबोडिया, अफ्रीका, श्रीलंका, भूटान, सूडान और अन्य कई देशों से संग्रहित सुंदर गणेश मूर्तियों का संग्रह यहां है। इन मूर्तियों में डेढ़ इंच से चार फुट तक की मूर्तियों का समावेश किया गया है। चौदह कला एवं चौसठ विद्याओं का अधिपति विघ्नहर्ता गणेश की महिमा केवल भारत में ही नहीं वरन संपूर्ण विश्व भर में है एवं सब जगह गणेश भक्त मौजूद हैं। विघ्नहर्ता गणेश की कीर्ति की महिमा अगाध है। देशभर में केवल भादों के महीने में ही नहीं वरन् माघ में भी गणेशोत्सव मनाने की परंपरा है। संकटों से रक्षण करने वाले इस विघ्नहर्ता का नाम लिए बिना एवं उसका पूजन किए बिना कोई भी शुभ काम प्रारंभ नहीं किया जाता।
ललित कला अकादमी
स्थानीय कलाकारों को तबला, हार्मोनियम, गायन, नृत्य इ.का शास्त्रीय प्रशिक्षण देने हेतु क्रेडार ने देवरुख ललित कला अकादमी के नाम से सन २००८ में नई संस्था प्रारंभ की। निष्णात शिक्षकों के माध्यम से यहां विद्यार्थियों, बालकों एवं प्रौढ़ों को भी शास्त्रशुद्ध प्रशिक्षण की व्यवस्था है।
प्रायोगिक कलामंच का निर्माण
शहर में स्थित नाट्यगृह बंद होने पर नाटक प्रेमियों की दिक्क्तों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों हेतु भी कलामंच न होने से होने वाले संत्रास को दूर करने हेतु बालासाहेब पित्रे ने देवरुख में सन २००२ में बालासाहेब पित्रे प्रायोगिक कलामंच का निर्माण किया। इसके बाद देवरुख की सांस्कृतिक कलाओं एवं कलाकारों को एक अपने हक का मंच प्राप्त हुआ है। आधुनिक रंगमंच, आधुनिक व्यवस्था, प्रेक्षकों के बैठने हेतु उपयुक्त व्यवस्था तथा अन्य सुविधाओं के कारण यहां संगीत महोत्सव, सांस्कृतिक महोत्सव, व्यावसायिक नाटकों का मंचन तो होती ही है इसके अतिरिक्त स्थानीय स्तर पर भी कलाकारों को अपनी कला प्रदर्शित करने हेतु एक अपना स्थान प्राप्त हुआ है। पित्रे प्रायोगिक कलामंच के कारण देवरुख के खाते में एक और अपलब्धि जुड़ गई है।
पित्रे फाउंडेशन
गत २० से अधिक वर्षों से पित्रे फाउंडेशन के माध्यम से बालासाहेब एवं विमलताई पित्रे सामाजिक कार्य कर रहे हैं। पित्रे फांउडेशन ने आज तक असंख्य जरूरतमंदों की सहायता की है, इसके अतिरिक्त सामाजिक आवश्यकताओं को पूर्ण करने पर इस फांउडेशन का जोर रहा है। प्रसिद्धि से दूर रहते हुए फांउडेशन का कार्य अन्य अनेक संस्थाओं के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो रहा है। इसी फांउडेशन की ओर से गत १० वर्षों में जिले की ४०० से अधिक शालाओं को सदाहरित (वृक्षारोपण) किया गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा संचालित राष्ट्र सेवा समिति के माध्यम से रत्नागिरी शहर में योग प्रशिक्षण केंद्र प्रारंभ हो रहा है। यह योग केन्द्र बेंगलूर के सुप्रसिद्ध एस. व्यास योग केन्द्र के संयुक्त तत्वावधान में प्रारंभ हो रहा है। इस योग केन्द्र के उपक्रम को पित्रे फाउंडेशन का अर्थपूर्ण सहयोग प्राप्त है।
देवरूख याने भगवान के रुकने का स्थान, देवरुख याने पीपल के वृक्ष अधिक होने के कारण इस गांव का नाम देवरुख पड़ा ऐसा जानकर बताते हैं। इस देवभूमि में भगवान के समान मदद हेतु दौड़ कर आने वाले एवं अपने कार्यों से गांव का उत्कर्ष करने वाले लोग बहुतायत से हैं। इन्ही में से एक यानि बालासाहेब पित्रे। गांव की आवश्यकताएं पहचान कर उन्होंने प्रत्येक क्षेत्र में अपने कार्य का विस्तार किया। ४० वर्ष पूर्व स्थापित ‘‘सुश्रुत’’ ने गांव से बेरोजगारी हटाने में मूल्यवान सहयोग दिया है। जो आज तक राजनीतिज्ञों को साध्य नहीं हुआ वह बालासाहेब ने एक कंपनी स्थापित कर साध्य किया है। आज देवरुख परिसर के ३०० से अधिक स्थानीय जन यहां काम कर रहे हैं। अर्थात ३०० परिवारों के पालनपोषण में बालासाहेब ने योगदान दिया यह कहना गलत नहीं होगा।
क्रेडार के माध्यम से निर्मित कला अकादमी एवं डी केड में भी सौ से ज्यादा लोग कार्य कर रहे हैं। गांव की दृष्टि से आवश्यक रोजगार निर्माण करने में उनके द्वारा स्थापित डी कॅड के माध्यम से स्थानीय विद्यार्थियों को चित्रकला का प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जिसके लिए स्थानीय विद्यार्थियों को मुंबई या कोल्हापुर जाना पड़ता था।
ललित कला अकादमी के माध्यम से स्थानीय कलाकारों को उनका अपना रंगमंच मिला। इसके लिए भी पहले उन्हें मुंबई या कोल्हापुर जाना होता था।
गांव की सांस्कृतिक परम्परा अधिक व्यापक करने हेतु पित्रे प्रायोगिक कलामंच सफल हो रहा है तो उधर गांव की धार्मिक एकता बनाए रखने हेतु ग्राम देवता ‘‘सोलजाई’’(सोळजाई) के मंदिर जीर्णोद्वार में बालासाहेब ने अमूल्य योगदान दिया है। पर्यावरण संतुलन हेतु उन्होंने घर में नारियल के पेड़ मुफ्त में बांटे हैं। देवरुख शिक्षण प्रसारक मंडल के अध्यक्ष के नाते शैक्षणिक क्रांति में उन्होंने योगदान दिया है।
कुल मिलाकर अपने बहुआयामी कार्यों से बालासाहेब द्वारा किया गया ग्राम विकास का कार्य मील का पत्थर साबित होगा इसमें संदेह नहीं है।

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