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गांधी जी कहा करते थे कि ‘‘भारत गांवों में बसता है। ’’ यह बिल्कुल सच है कि आज़ादी की सत्तरहवीं वर्षगांठ के बावजूद आज भी, हमारी दो-तिहाई आबादी गांवों में बसती है। गांधी जी का सपना ऐसे गांवों का था, जहां स्वराज (अपना राज), सुराज (अच्छे शासन) में परिवर्तित हो जाए।
१९३७ में ‘हरिजन‘ के अंक में लिखते हुए गांधी जी ने अपने आदर्श गांव का खाका खींचा था- ‘‘जहां स्वच्छता हो। गली-सड़कें धूल-धक्कड़ से मुक्त हों। ……चरागाह हों, सहकारी डेयरी हो और स्कूल हों जिनमें औद्योगिक शिक्षा पर बल दिया जाएं। ’’
महात्मा गांधी के इन्हीं विचारों से प्रेरित, भारत सरकार ने गांवों के विकास के लिए एक अनूठी योजना ११ अक्टूबर, २०१४ को आरंभ की। अनूठी इस मायने में कि यह केवल गांवों में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कई सामाजिक मूल्यों पर भी बल देती है, जैसे कि लोगों की भागीदारी, महिलाओं का सम्मान, आपसी सहयोग, आत्मनिर्भरता आदि। अनूठापन इसके नाम में भी है। भारत में शायद पहली बार सांसद के नाम पर किसी योजना का नामकरण किया गया है- ‘ सांसद आदर्श ग्राम योजना। ’
इस योजना को प्रारंभ करते समय प्रधान मंत्री ने कहा था कि, ‘‘हमारे विकास मॉडल की एक बड़ी समस्या है कि यह आपूर्ति आधारित है। योजनाएं दिल्ली, लखनऊ या गांधीनगर में बनती हैं। फिर उन्हें लोगों पर थोप दिया जाता है। हम इसे बदलना चाहते हैं- आदर्श ग्रामों के जरिए योजनाओं को आपूर्ति के बजाय मांग आधारित बनाना चाहते हैं। खुद गांव से ही विकास की मांग उठनी चाहिए। ’’
अन्य सरकारी योजनाओं की भांति एसएजीवाई लोगों को लाभार्थी व सरकार को दाता नहीं बनाती। बल्कि यह सरकार और लोगों को साथ लाती है मिलकर विकास करने को। यह लोगों को अवसर और दिशा प्रदान करती है जिसके बाद लोग खुद अपना मार्ग बनाते हैं।
इस आलेख में हम इस योजना के विविध पहलुओं और उपस्थित चुनौतियों पर विचार करेंगे।
सांसद आदर्श ग्राम योजना की रूपरेखा
सांसद इस योजना का मूल आधार हैं। विकास के लिए ग्राम पंचायत को एक इकाई माना जाएगा। मैदानी इलाकों में ३ से ५ हजार व पहाड़ी इलाकों में १ से ३ हजार की आबादी वाले गांवों (ग्राम पंचायतों) को शामिल किया जाएगा।
लोकसभा के सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्र में से किसी एक गांव (ग्राम पंचायत) को चुनेंगे। यदि किसी सांसद का निर्वाचन क्षेत्र शहरी है, तो वे किसी दूसरे निर्वाचन क्षेत्र का कोई गांव गोद लेंगे। राज्यसभा के सांसद उस प्रदेश का कोई गांव चुन सकते हैं जिस प्रदेश से वे निर्वाचित हैं। राज्यसभा के मनोनीत सांसद देश के किसी भी गांव को चुन सकते हैं।
लक्ष्य यह है कि २०१६ के आखिर तक हर सांसद एक गांव का विकास करें और उसके बाद मार्च २०१९ तक दो और गांवों का। २०१९ तक हर सांसद तीन गांवों को आदर्श गांव बनाएगा। उसके बाद अगले पांच वर्षों में हर साल एक गांव का विकास किया जाएगा।
उपरोक्त के आधार पर हिसाब लगाएं तो बर्तमान में कुल ७९३ सांसद हैं। (५४३ लोकसभा के, २५० राज्यसभा के जिनमें १२ नाम निर्देशित हैं)। यदि हर सांसद तीन गांवों का विकास करें तो २०१९ तक २३७९ आदर्श गांव बन जाएंगे जोकि बाकी गांवों के लिए प्रेरणा का काम करेंगे।
आदर्श ग्रामों के लिए फंडिंग
एसएजीवाई के लिए अलग से फंडिंग का कोई प्रावधान नहीं है। इसमें विकास कार्यों के लिए धन निम्न प्रकार से जुटाया जाएगा-
१) ग्राम पंचायत का अपना राजस्व।
२) केन्द्र व राज्य वित्त आयोग से पंचायत को मिला अनुदान।
३) केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं का धन,जैसे-इंदिरा आवास योजना,मनरेगा, प्रधान मंत्री सड़क योजना।
४)‘सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास निधि’ (एमपीलैंड) का धन।
५)‘कॉरपोरेट सोशल जिम्मेदारी’ से मिला धन।
कैसा होगा ये आदर्श ग्राम?
इसमें ‘स्मार्ट स्कूल’ होगें, सब को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध होगी, पक्के घर होंगे, सभी के लिए आधार कार्ड व ई-गवर्नेस होगा। कुल मिला कर इस आदर्श गांव में समग्र विकास होगा। वैयक्तिक, सामाजिक, आर्थिक सभी।
इस मॉडल गांव में हर परिवार को गरीबी से बाहर निकालने पर मुख्य जोर होगा। हर घर में शौचालय होगा, स्वच्छता होगी। बिजली, पानी, सड़क और ब्राडबैंड होगा। नशाखोरी और महिलाओं के साथ भेदभाव जैसी सामाजिक कुतरीतियों के उन्मूलन का प्रयास किया जाएगा।
एक गांव को आदर्श कैसे बनाया जाएगा?
एसएजीवाई के अंतर्गत हर गांव के लिए एक ग्राम विकास प्लान बनाया जाएगा जिसमें हर परिवार को गरीबी से बाहर निकालने पर मुख्य जोर होगा। सांसद गांव के लोगों के साथ मिल कर इस प्लान को तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभाएंगे। जिले का कलेक्टर भी इन प्लानों को तैयार करने में सहयोग देगा। वही इस योजना के लिए एक वरिष्ठ अधिकारी को प्रभारी अधिकारी नियुक्त करेगा। यह प्रभारी अधिकारी जिले में एसएजीवाई का समन्वय करेगा।
इसके अलावा सांसद गांव में ही बहुत सी गतिविधियों को प्रेरित करेंगे जैसे हेल्थ कैम्प लगाना, लोगों की शिकायतों का निस्तारण, समुदाय को भागीदारी के लिए प्रेरित करना आदि। इसमें शराबखोरी, तम्बाकू, गुटखा के सेवन के विरुद्ध अभियान भी चलाया जाएगा। ग्राम पंचायतों के जरिए जमीनी लोकतंत्र को मजबूत किया जाएगा व निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के प्रयास होंगे। इसके लिए महिला सभा व बालसभा गठित की जाएंगी। प्रौढ़ साक्षरता, ई-साक्षरता को बढ़ावा मिलेगा व नई पीढ़ी को पर्यावरण, शहीदों व बुजुर्गों के प्रति सम्मान दिखाने की सीख दी जाएगी।
सांस्कृतिक रूप से भी गांव में लोक उत्सवों, लोककलाओं, गीतों को बढ़ावा दिया जाएगा व नौजवानों को साफसफाई का ध्यान रखने व रोज आधा घंटा कसरत करने के लिए प्रेरित किया जाएगा। गांव में स्मार्ट स्कूल होगें जिनमें इंटरनेट व कंप्यूटर की मदद से पढ़ाई की जाएगी, ई-लाइब्रेरी खोली जाएंगी।
उपरोक्त सभी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही सभी मौजूदा योजनाओं में प्रभावी तालमेल बैठाया जाएगा। आवश्यकता पड़ने पर इन योजनाओं में एसएजीवाई के अनुरूप फेरबदल भी किया जाएगा। आधुनिक तकनीक का भरपूर प्रयोग किया जाएगा, जैसे गांव में खेती के विकास के लिए रिमोट सेंसिंग तकनीक का प्रयोग।
राष्ट्रीय स्तर पर ग्रामीण विकास मंत्रालय इस योजना के लिए नोडल मंत्रालय होगा और सभी कामों का समन्वय व निगरानी करेगा। मंत्रालय इस योजना को प्रभावी बनाने के लिए क्षमता निर्माण पर जोर देगा। इस योजना को लागू करने के लिए एक हैंडबैंक बनाई जाएगी सांसदों को भी वर्कशापों द्वारा प्रशिक्षण दिया जाएगा। ग्राम पंचायत स्तर तक के कार्यकर्ताओं को भी प्रशिक्षण मिलेगा ताकि वे अपने दायित्वों को ठीक से निभा सकें।
राज्य स्तर पर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक कमेटी बनेगी जिसमें सभी संबधित विभाग शामिल होंगे। प्रोत्साहन के लिए चार पुरस्कार भी देने का प्रावधान किया गया है-
१) सर्वश्रेष्ठ प्रौक्टिसिस २)सर्वश्रेष्ठ प्रभारी अधिकारी
३)सर्वश्रेष्ठ जिला कलेक्टर ४)सर्वश्रेष्ठ आदर्श ग्राम
एक सफल कहानी
झारखण्ड में पूर्वी सिंहभूम के सांसद श्री विद्युत बरन महतो ने वांगुरदा ग्राम पंचायत को गोद लिया। उन्होंने देखा कि वहां किशोरियों द्वारा स्वास्थ्य और स्वच्छता की ओर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा था। वहां महिलाएं एनीमिया (खून की कमी) से ग्रसित थीं तथा और भी कई बीमारियां फैली हुई थीं।
अत: सांसद महोदय ने किशोरियों के लिए विशेष स्वास्थ्य कैंप लगवाए। करीब १८८ लड़कियों की स्क्रीनिंग की गई। उनमें अनेक को स्त्री रोग संबंधी शिकायतें पाई गईं जिनको वे अब तक अज्ञानतावश और रुढ़ीवादी समाज के सामने छिपा रही थीं। यह भी पाया गया कि ज्यादातर बीमारियां अस्वच्छ जीवनशैली और गंदे परिवेश के कारण थीं। अत: वहां महिलाओं और किशोरियों में इस बारे में जागरूकता फैलाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
एसएजीवाई की समीक्षा
इस योजना का फेज-१, २०१४ में शुरु हुआ। प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी के जयापुर गांव को गोद लिया। श्रीमती सोनिया गांधी ने रायबरेली के उड़वा गांव को गोद लिया। अन्य सांसदों के अलावा लगभग सभी ने गांव गोद लिए।
प्रधान मंत्री जी ने अपने गोद लिए गांव में अधारभूत ढांचा बढ़ाने और बेटी का जन्म होने पर खुशियां मनाने पर जोर दिया। साथ ही उन्होंने गांव का जन्मदिन मनाने की बात भी कही। फेज १ में इन गांवों की संख्या ७०२ थीं।
फेज-२ में हुए इस निराशाजनक प्रदर्शन के निम्न कारण हैं-
१. सासंदों की शिकायत है कि इस योजना को लागू करने के लिए सरकार ने उचित फंडिंग की व्यवस्था नहीं की है। एसएजीवाई के लिए अलग से फंड नहीं मिलता, नतीजन आदर्श गांव बनाने के लिए उन्हें अपने एमपीलैंड (सांसद क्षेत्रीय विकास निधि) में से खर्च करना पड़ता है। एक आदर्श गांव के लिए करीब २ करोड़ खर्च आता है। वहीं वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि वर्तमान में २३३ सरकारी योजनांए हैं जिनका प्रयोग गांवों के विकास के लिए किया जा सकता है। लेकिन बहुत से सांसदों को उनकी जानकारी नहीं है। अत: आवश्यकता है कि सांसदों को सही सूचना उपलब्ध कराई जाए।
२. कॉरपोरेट सोशल दायित्व से भी धन की प्राप्ति उत्साहजनक नहीं रही है। ग्रामीण विकास मंत्रालय औद्योगिक निकायों की एक बैठक बुला रहा है जिससे उन्हें अपने कॉरपोरेट सोशल दायित्व का पैसा इस योजना में लगाने के लिए प्रेरित किया जा सके।
३. दूसरा मुद्दा गांव के चयन का है। नियमों के अनुसार सांसद अपने क्षेत्र का कोई भी गांव चुन सकते हैं (केवल अपने गांव और अपनी ससुराल के गांव को छोड़ कर)। इससे दुविधा पैदा होती है। यदि सांसद एक गांव को गोद लेकर विकास कार्य कराए तो दूसरे गांव वाले नाराज हो सकते हैं और इस नाराजगी का खामियाजा सांसद को अगले चुनाओं में भुगतना पड़ सकता है। इस समस्या का हल लोगों से बेहतर संवाद स्थापित करके किया जा सकता है। यदि सांसद उन्हें इस योजना का महत्व और आवश्यकता समझाने में सफल हो जाते हैं तो उनका चुनावी जोखिम कम हो जाएगा।
४. जिन सांसदों के निर्वाचन क्षेत्र शहरी हैं, उन्हें किसी दूसरे क्षेत्र के गांव को गोद लेना पड़ता है। वे ऐसा नहीं करना चाहते उन्हें अपने एमपीलैंड का पैसा दूसरे के निर्वाचन क्षेत्र में खर्च करना पड़ेगा।
५. चूंकि इस योजना का अलग बजट नहीं है, अत: इस योजना की सफलता के लिए जरूरी है कि सांसद केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा चलाई जा रही विकास योजनाओं में तालमेल बैठाएं जैसे आवास योजना, प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसी अनेक राज्यों की योजनाएं यह एक कठिन काम है। तब और भी कठिन हो जाता है जब केन्द्र व राज्य में अलग सरकारें हो तथा मुख्यमंत्री और सांसद अलग-अलग पार्टी के हों।
६. एसएजीवाई के जरिए कुछ हजार गांव आदर्श बना दिए जाएंगे लेकिन भारत में ६ लाख से ज्यादा गांव हैं। क्या इन गांवों का इतना व्यापक प्रभाव हो पाएगा कि इन सभी बचे गांवों को स्वयं ‘स्मार्ट गांव’ बनने के लिए प्ररित कर सकें?
७. इस योजना की सफलता न केवल सांसद के नेतृत्व और मार्गदर्शन पर निर्भर करेगी, बल्कि ग्राम स्तर पर स्थानीय नेताओं, समुदाय के सम्मानित सदस्यों, पंचायतों और सिविल समाज की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। अत: इन सभी को उचित प्रशिक्षण व प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
इस योजना के पीछे का मूल विचार सराहनीय है। यह विचार कहता है कि ग्रामीण समुदाय स्वयं आगे आकर अपना विकास करें। हर काम के लिए सरकार का मुंह न ताके।
पहले भारतीय गांवों में लोग बहुत सा काम खुद मिल-जुल कर किया करते थे जैसे तालाब की खुदाई। आज आवश्यकता है कि उस सहकारिता और आपसी भागीदारी की पुरानी भावना को फिर से जीवित किया जाए और भारतीय गांवों को तरक्की की राह पर आगे बढ़ने को प्रेरित किया जाए। एसएजीवाई इस दिशा में एक सही प्रयास है।

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