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भारत ने स्वतंत्रता की ७०वीं वर्षगांठ हाल में मनाई। आगे अमृत महोत्सवी वर्ष आना है, तब भारत कैसा होगा? स्वतंत्रता प्राप्ति के समय स्वतंत्र भारत के सम्बंध में हमारे सपने क्या थे? यह सच है कि अनेक बातें हमने हासिल कीं हैं। इसी कारण वैश्विक महासत्ता बनने का सपना भारतीयों ने संजोया है। एक नई उर्मि से भारतीय तरूणाई उत्सर्जित है। उज्ज्वल भविष्य के सपने अनेकों की आंखों में तैर रहे हैं। इस उमंग भरे वातावरण में एक बार फिर हमारे जीवन में प्रकाश, आशा, उत्साह एवं चेतना के प्रज्वलित दीपों के रूप में दीपावली आ गई है। जीवन में चाहे जितना अंधःकार हो, कठिन स्थितियां हो विचलित न होते हुए अपने अंतर-मन के दीप को प्रज्वलित करें। उन दीपों के आलोक में निरंतर आगे मार्गक्रमण करते रहें! दीपावली का वास्तविक संदेश यही है। इस वर्ष भी दीपावली धूमधाम से मनाई जाएगी, रोषनाई होगी, मनहर आतिषबाजी होगी, पटाखें चलेंगे। लेकिन केवल इतने से दीपावली के अवसर पर अंतर-मन में प्रज्वलित दीपों का प्रकाश खत्म नहीं होना चाहिए। यह दीप प्रज्वलन आत्मपरीक्षण का, सामाजिक मंथन का, राष्ट्र के सर्वांगीण मूल्यांकन का, सोशल ऑडिट का पैमाना बनें और यह दीपावली नए निश्चयों, नए संकल्पों एवं नए आत्मविश्वास का अवसर बनें।

राष्ट्र और समाज को निरंतर प्रकाशित रखने के लिए प्रवाही विचार देने, समाज में वैचारिक-दीप प्रज्वलित करने का कार्य ‘हिंदी विवेक’ पत्रिका लगातार कर रही है। पिछले छह वर्षों में दीपावली विशेषांकों के माध्यम से ‘हिंदी विवेक’ ने विचार-संवर्धन एवं जन-जागरण की परम्परा अविरत निभाई है। इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए इस वर्ष भी ‘ग्रामोदय’ विषय लेकर दीपावली विशेषांक प्रकाशित करने का प्रयास हिंदी विवेक ने किया है।

वैश्वीकरण, उदारीकरण एवं सूचना विस्फोट का भारतीय सामाजिक-आर्थिक विकास प्रक्रिया पर गहरा असर पड़ा है। बाजार आज देश के ग्रामीण स्तर तक पहुंच चुका है। बाजार ने अपने सभी उत्पाद सर्वदूर पहुंचाए हैं। उससे लोगों की रुचियां बदल गई हैं, उसका उपयोग करने की पद्धतियां बदल गई हैं और जीवन के प्रति दृष्टिकोण भी बदल गया है। इससे ग्रामीणों की आदतें भी शहरी लोगों की तरह बन गई हैं। फिर भी, गांव और शहर दोनों में एक बड़ी दरार बढ़ती जा रही है। सच कहें तो बाजार ने अपनी भूमिका यहां तक पहुंचाई है। यहां तक ही उन्हें लाभ की संभावना दिखाई दे रही है। देश के लाखों गांवों का विचार करें तो प्राथमिक सुविधाओं से गांव अब भी वंचित हैं। फलस्वरूप, गांवों का संतुलित विकास हो ही नहीं रहा है। आज दृश्य यह है कि गांवों में बड़े पैमाने पर लोगों के पास मोबाईल फोन हैं, परंतु गांव में शौचालय नहीं है। लोग टीवी पर विश्व देख रहे हैं, लेकिन उनके बच्चे अस्पतालों के अभाव से मामूली ज्वर के भी बलि चढ़ रहे हैं। बच्चों को ग्रामीण इलाकों में बेहतर शिक्षा उपलब्ध नहीं है। इसलिए ग्रामीणों को अच्छी नौकरियां नहीं मिल रही हैं। १९९१ के बाद हमारे यहां वैश्वीकरण की हवाएं तेजी से बहने लगीं। लेकिन वैश्वीकरण का निश्चित माने क्या है? अमेरिका की वस्तुएं हमारे यहां उपलब्ध होना क्या यह वैश्वीकरण है?

हम किसी भी व्यक्ति से यह पूछे कि क्या उसका देश पर प्रेम है, तो वह कभी ‘नहीं’ नहीं कहेगा। फिर जब आप जिस गांव में रहते हैं या जिस इलाके से शहर में पलायन कर आए हैं वह गांव, क्या देश का हिस्सा नहीं है? फिर आप उस गांव पर प्रेम क्यों नहीं करते? यह पूछने पर सभी चुप्पी साध लेते हैं। आप अपने गांव पर, ग्रामीण सम्पदा पर प्रेम करना जब सीखेंगे, तभी देश में सही अर्थ में सुधार आएगा।

हम भारतीय मानते हैं कि विश्व की आत्मा भारत है। किंतु, यह भी उतना ही सच है कि गांव भारत की आत्मा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अपनाई गई गलत नीतियों के दुष्परिणाम भारत के ग्रामीण इलाकों को आज भुगतने पड़ रहे हैं। भारत को यूंही पुण्यभूमि नहीं कहा जाता। यहां की संस्कृति, सभ्यता, नदियां और यहां की सुजलाम्-सुफलाम् भूमि के कारण ही यह पुण्यभूमि थी। भारत के गांवों में या देहातों में विभिन्न तरह के प्रबंध की सुनियोजित व्यवस्था थी। जिसमें शिक्षा, चिकित्सा, सिंचाई व्यवस्था, ज्योतिष, संगीत, लुहार, कुम्हार, धोबी, नाई, मंदिर एवं विभिन्न धार्मिक स्थानों की व्यवस्था, गांव से गुजरने वाले यात्रियों के पेयजल प्रबंध, उनके निवास के लिए सराय आदि बातें सुव्यवस्थित थीं। जब तक यह ग्राम व्यवस्था हमारे जीवन का अंग थी तब तक हम हर दृष्टि से सम्पन्न थे। उस समय हम दुनिया में सर्वाधिक अनाज पैदा करने वाला देश थे। भारत का मूल चिंतन मानव एवं प्रकृति के बीच परस्पर सम्बंध संवर्धित करता था। भारत पर जो आक्रमण हुए वे भारत की किसी केंद्रीय सत्ता पर अथवा चक्रवर्ती राज्य पर नहीं हुए। वे मुख्यतः ग्राम समूह, नगरों एवं ग्रामों की सम्पन्नता की लूट करने के लिए ही हुए। इससे सम्पन्न एवं सुव्यवस्था के प्रतीक ग्राम-समूह, अनेक देहात आक्रमणकारियों के कब्जे में चले गए। ब्रिटिश सत्ता ने भारतीय ग्राम व्यवस्था को नष्ट एवं भ्रष्ट किया। आज विकास की दृष्टि से गांव में जो कुछ होना चाहिए वह नहीं है। वहां आज कच्चे मकान हैं, अशिक्षितता है, बिजली और पानी नहीं है। महात्मा गांधी तो अंत तक कहते रहे कि ‘‘भारत की स्वतंत्रता का आधार भारत के गांव होंगे। और यही ग्रामीण व्यवस्था ही भारत को एक श्रेष्ठ देश की तरह विश्व में स्थापित करने में सहायक होगी।’’ गांधी का निरंतर उपयोग करने वाले सत्ताधारियों ने गांधीजी के इन विचारों की देशव्यापी चर्चा कभी की ही नहीं।

आज विकास के नाम पर शहरीकरण का ही उदात्तीकरण करने वाली जीवन-शैली बढ़ रही है। गांव वीरान होते जा रहे हैं। भारतीय मूल चिंतन पर आधारित जीवन से हम धीरे-धीरे बहुत दूर निकल चुके हैं। दुर्भाग्य से, ग्राम्य जीवन से लोग बड़े पैमाने पर शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। शहर जितना बड़ा हो रहा है उतना वह एक-दूसरे को अपरिचित होता जा रहा है। स्वतंत्रता के बाद दूरदर्शी दृष्टिकोण के अभाव एवं गांवों के असंतुलित ढंग से विकास के कारण ग्रामीण लोगों का शहरों के प्रति आकर्षण बढ़ गया। रोजगार या अन्य प्राथमिक सुविधाओं के लिए ग्रामीण जनता का एक बड़ा हिस्सा शहरों की ओर पलायन कर गया। फलस्वरूप, शहर फूल गए, लेकिन शहरों की व्यवस्था चरमरा हो गई। वहां पर्यावरण असंतुलन से प्रदूषण तक, बिजली, पानी, परिवहन से स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र की व्यवस्था तक भिन्न-भिन्न तरह की विसंगतियां पैदा हो गईं। इस तरह शहर की एक अलग पहचान बन गई। कहीं गगनचुंबी इमारतें, तो कहीं झुग्गी-झोपड़ियां, कहीं चालें तो कहीं आलीशान कालोनियां, कहीं शानदार इलाका तो कहीं गुंड़ागर्दी की स्थिति बन गई। फलस्वरूप, शहरी जीवन सब को समान सुविधाएं एवं उत्तम व्यवस्था दिलाने में विफल हो गया है। हां, वोटों की राजनीति लेकिन फलती-फूलती रही। नदियां नालों में तब्दील हो गईं। यह समस्या देश के सभी शहरों की है।
फिर गांव एवं शहर के बारे में अलग-अलग बहसें छड़ती रहती हैं। राय बनती हैं, और फिर उसके आधार पर हम ‘हमारी ग्राम व्यवस्था’ अथवा ‘शहरों की समस्याओं’ पर भावुक चर्चाएं करते हैं। लेकिन, इन समस्याओं के हल खोजने के ईमानदार प्रयास नहीं किए जाते।

संयम, भाईचारा एवं प्रकृति के अंग एवं मित्र बन कर विकास करने की व्यवस्था का नाम है- हमारा ग्राम्य जीवन। उस जीवन का अत्यंत गंभीरता से अध्ययन होना जरूरी है। इससे पता चलेगा कि मनुष्य ग्रामीण जीवन में ही सब से सुखी होता है। जब कोई देश अव्यवस्था का शिकार बनता है तब लोग अपने देश के इतिहास में उन समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश करते हैं। ऐसी कोशिश से ही अपने शक्ति-केंद्र पुनः सक्रिय करने में मदद मिलती है। इसलिए हमें यह देखना होगा कि इतिहास में ग्रामीण व्यवस्था क्या थी जिससे ग्रामीण समाज सुख, शांति के साथ विकास करता था। उस दिशा में हमें कुछ कदम उठाने चाहिए। हमारे आसपास इतिहास, वर्तमान, भविष्य से सामंजस्य स्थापित करने वाला विकास का जो चिंतन हो रहा है उसमें अपनी सहभागिता निश्चित करने का हमें प्रयास करना चाहिए।
इसी सद्भावना के साथ ‘हिंदी विवेक’ का ग्रामोदय दीपावली विशेषांक प्रकाशित किया जा रहा है। गांव एवं विकास को ‘स्मार्ट विलेज’ की संकल्पना में प्रस्तुत करने का प्रयास मखमली जूते की तरह प्रतीत होता है। ‘स्मार्ट विलेज’ की झूठी किंतु आकर्षक लगने वाली संकल्पना का उल्लेख करते समय एक बात महसूस होती है कि गांवों में मामूली सी प्राथमिक सुविधाओं तक का अभाव है। उन प्राथमिक सुविधाओं को भी उपलब्ध कराएं तो ग्रामीण क्षेत्र विकास की सीढ़ियां चढ़ना प्रारंभ कर देगा। इसलिए ‘ग्रामोदय’ के चिंतन से पाठकों को जोड़ने, सकारात्मक दृष्टिकोण सभी के समक्ष प्रस्तुत करने, ग्राम विकास का कार्य करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं को ग्राम विकास विषय से जोड़ने के लिए ‘हिंदी विवेक’ ने यह ग्रामोदय दीपावली विशेषांक प्रस्तुत किया है।

भारत… भारत रहे इसलिए गांवों का विकास एवं समृद्धि आवश्यक है। गांवों से अपनी संस्कृति बचेगी, संवेदना बचेगी। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का अग्रदूत, स्वतंत्रता आंदोलन में सर्वस्व न्योछावर कर देने वाला, सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों में अगुवा रहा ग्रामीण निवासी आज स्वत्व को खोता नजर आ रहा है। आज देश में ग्राम स्तर की समस्याओं की बड़ी चुनौती हमारे समक्ष है। लेकिन इस तरह की चुनौतियों को स्वीकार करने की इतिहास-प्रदत्त क्षमता भारतीयों में है। यह अपनी धरोहर है। समाज के लिए पथ-प्रदर्शक बने, मार्गदर्शक बने इस तरह सभी समस्याओं को समेट कर विकास, प्रगति एवं सकारात्मक दृष्टिकोण देने की चुनौती ‘हिंदी विवेक’ ने स्वीकार की है। इसका ‘हिंदी विवेक’ भलीभांति निर्वाह कर रहा है।

‘ग्रामोदय’ जैसे अनोखे विषय के प्रति जनजागरण करने का दीपावली के अलावा और अन्य कौन-सा मंगल प्रसंग हो सकता है? इसीलिए दीपावली के अवसर पर ‘हिंदी विवेक’ गांव की प्राचीन, ऐतिहासिक संस्कृति एवं परम्पराओं का तथ्यात्मक विवेचन पाठकों तक पहुंचा रहा है। समस्याओं एवं विकास दोनों की चर्चा करने वाले मान्यवरों के सटीक लेख इस ग्रामोदय दीपावली विशेषांक में प्रकाशित किए गए हैं।

‘ग्रामोदय’ का संदेश लेकर ‘हिंदी विवेक’ का यह दीपावली विशेषांक देशभर के पाठकों तक पहुंच रहा है। इस ग्रामोदय दीपावली विशेषांक हेतु कर्मचारी वर्ग ने भी अत्यंत तन्मयता से काम किया है। इस दीपावली विशेषांक के बारे में आपकी प्रतिक्रिया हमारा ‘पाथेय’ है और हम आपकी राय की प्रतीक्षा में हैं। प्रकाशोत्सव दीपावली आप सभी के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि, ऐश्वर्य और आनंद का प्रकाश निर्माण करें और साथ ही गांव, ग्रामीण जीवन के बारे में आपके मन में आत्मीयता निर्माण हो यही मंगल कामना है। इस प्रकाश पर्व के पावन अवसर पर ‘हिंदी विवेक’ की ओर से पाठकों, विज्ञापनदाताओं, लेखकों, प्रतिनिधियों, हितचिंतकों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं!

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