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राष्ट्र या देश की अवधारणा में जन एक महत्वपूर्ण तत्त्व है। भारत के बारे में सामान्यत: यह कहा जाता है कि भारत गांवों का देश है। लेकिन हकीकत में अब यह बीते जमाने की बात लगती है। फिर भी भारत की आबादी, संस्कृति और परंपरा को तीन वर्गों- ग्रामीण, वनवासी और शहरी में रखा जाता है। शासन या नीति निर्माता क्षेत्रीय विविधता और विशेषताओं के आधार पर ही विकास के विभिन्न पहलुओं का विचार करते हैं।
भारत अभी तक गांवों में ही परिलक्षित होता आया है। भारत में गांवों का भविष्य क्या होगा यह तो समय बतायेगा, लेकिन भारत का अतीत और वर्तमान गांव ही है। आज भले ही भारत का विकास शहरोन्मुख हो गया है, गांव का भी शहरीकरण किया जा रहा है, लेकिन जब कभी सम्यक विकास की बात होगी तो उस विकास की दिशा गांव की ओर होगी, क्योंकि भारत का परम वैभव गांव की पगडंडियों से होकर ही जाता है।
हांलाकि शहरों की संख्या में लगातार वृद्धि होती जा रही है। ज्यों-ज्यों भारत का शहरीकरण होता जा रहा है, त्यों-त्यों ग्रामीण और शहरी जनसंख्या का अनुपात भी बढ़ता जा रहा है। शहरों की ओर ग्रामीण आबादी का पलायन भारत में आधुनिक प्रवृत्ति है। औद्योगिकीकरण सहित अर्थव्यवस्था के तमाम अन्य प्रयासों के बावजूद भारत की आर्थिक प्रगति ग्राम्य आधारित ही है। आज भी भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि और सहायक उद्यम ही है। लेकिन इन सब स्थितियों के बावजूद भारत की विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के साथ ही मीडिया की दृष्टि गांव केन्द्रित नहीं है। राजनीतिक नेतृत्व, नीतिज्ञों, योजनाकारों, शासकों और प्रशासकों आदि की दृष्टि शहर केन्द्रित है। इसीलिए आजीविका, स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिकी सहित विकास के सभी प्रतिरूप शहर केन्द्रित ही है। गांव का विकास भी शहरों की तर्ज पर ही करने की चेष्टा हो रही है।
भारत में मीडिया या पत्रकारिता की स्थिति को इसी पृष्ठभूमि में देखना प्रासंगिक होगा। चूंकि आज भी भारत की आबादी का अधिकांश हिस्सा ग्रामीण ही है, अत: मीडिया प्रतिष्ठान और समाचार पत्रों के द्वारा ग्रामीण आबादी, अर्थव्यवस्था और आदतों के अनुसार योजनाएं बनाई जा रही हैं। ग्रामीण भारत में साक्षरता और शिक्षा की वृद्धि के साथ-साथ समाचार पत्रों की पहुंच में भी काफी वृद्धि हुई है। ग्रामीणों की क्रय शक्ति में वृद्धि के कारण बाजार की पहुंच भी तेजी से हुई है। यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि बाजार ने ग्रामीण पहुंच के लिए मीडिया और समाचार-पत्रों को माध्यम बनाया है। यद्यपि गांव तक विकास की पहुंच के लिए भी पत्रकारिता वाहक बनी है। पत्र-पत्रिकाएं शहर केन्द्रित तो हैं, लेकिन ग्रामोन्मुख भी हैं। मुख्य रूप से ग्रामीण आर्थिकी ने पत्रकारिता को अपनी ओर प्रेरित और लालायित किया है। क्षेत्रीय, संभागीय और जिला स्तर पर समाचार-पत्रों के ब्यूरो और संस्करण इसी कारण बढ़ रहे हैं। प्रसार संख्या के लिहाज से भारतीय भाषाओं के समाचार पत्र अंग्रेजी के अखबारों से बहुत आगे जा चुके हैं।
पत्रकारिता को ग्रामीण या शहरी पत्रकारिता के रूप में विश्लेषित करना अत्यन्त कठिन है। ग्रामीण पत्रकारिता की कोई स्पष्ट परिभाषा भी नहीं है। गांव से प्रकाशित पत्रों को ग्रामीण कहें या ग्रामीण विषय-वस्तु वाले पत्रों को ग्रामीण? क्या जिन पत्रों का ग्रामीण क्षेत्रों में उपयोग होता है उसे ग्रामीण पत्रकारिता कहें? किसे कहें ग्रामीण पत्रकारिता यह असुविधा है। अत: सुविधा के लिए हम पत्रकारों द्वारा ग्रामीण समाज और समसामयिक परिस्थितियों की अखबारों या रेडियो-टेलीविजन या डिजिटल माध्यमों में योगदान को ग्रामीण पत्रकारिता की संज्ञा दे सकते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार जिन पत्रों में ४० प्रतिशत से अधिक सामग्री ग्रामीण विषयों से सम्बन्धित हो उसे ग्रामीण पत्र माना जा सकता है। अत: ग्रामीण पत्रकारिता के तहत वे तमाम विषय और उन्हें तवज्जो देने वाले पत्र और पत्रकार होंगे जिनका सरोकार ग्रामीण जीवन से होगा। इस प्रकार भारत में पत्रकारिता का प्रारंभिक चरण ग्रामीण पत्रकारिता को ही माना जा सकता है। तब वह लक्ष्य, उद्देश्य और मिशन की पत्रकारिता थी। आज की पत्रकारिता व्यावसायिक है, शहरी हो गई है। ग्रामीण पत्रकारिता अपने अस्तित्व की चुनौती से जूझ रही है। पत्रकारिता में गांव की भाषा, बोली, परंपरा, संस्कृति आदि नगण्य है। हिन्दी पत्रकारिता में भी अंग्रेजी का बोल-बाला है।
ग्रामीण पत्रकारिता का उल्लेख करते हुए यहां एक दृष्टांत उल्लेखनीय है। सरस्वती के संपादक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के पास एक व्यापारी शक्कर की कुछ बोरियां इस आग्रह के साथ छोड़ गया कि वे अपनी पत्रिका में शक्कर का विज्ञापन प्रकाशित कर दें। उन दिनों ‘सरस्वती’ पत्रिका की समाज में काफी प्रतिष्ठा थी। कुछ समय बाद जब वह व्यापारी आचार्य द्विवेदी के पास पहुंचा और पूछा कि अभी तक विज्ञापन प्रकाशित नहीं हुआ? तो आचार्य द्विवेदी ने उस व्यापारी को शक्कर की बोरियां वापस ले जाने को कहा। उन्होंने व्यापारी को स्पष्ट कहा कि वे शक्कर का विज्ञापन छाप कर गांव की अर्थव्यवस्था को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते, क्योंकि इससे गुड़ तैयार करने वाले किसानों का नुकसान होगा। गांव का कुटीर उद्योग नष्ट होगा। विज्ञापन से प्रभावित लोगों में गुड़ की बजाए शक्कर का चलन बढ़ेगा। तब यह पत्रकारिता का धर्म था। आज ऐसे कितने संपादक या पत्रकार हैं जो इस तरह की चिंता करते हैं या इस तरह का मूल्यनिष्ठ निर्णय लेते हैं?
विकास और ग्रामीण पत्रकारिता को विशेष महत्व देने वाले समाचार पत्रों का अपना अलग इतिहास रहा है। भारत में पहला कृषि पत्र ‘कृषि सुधार’ सन १९१४ में और ‘कृषि’ सन १९१८ में प्रकाशित हुआ। भारत सरकार द्वारा ग्रामीण पत्रकारिता को महत्व देते हुए १९४६ में ‘खेती’ और १९५० में ‘कुरुक्षेत्र’ का प्रकाशन शुरु हुआ। सन १९७३ में ‘भारतीय ग्रामीण समाचार पत्र संघ’ की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य ग्रामीण पत्रों के स्तर को ऊंचा करना, विज्ञापन के लिए सामूहिक प्रयत्न करना तथा ग्रामीण पत्रकारिता की समस्याओं पर सामूहिक तौर पर विचार करना था।
वरिष्ठ पत्रकार श्री वेद प्रताप वैदिक ने ९ मई, १९८९ को नई दुनिया में प्रकाशित आलेख मं५ लिखा- ‘‘गांवों के विकास पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए और यह कार्य संवाददाता ही कर सकता है, क्योंकि वही ग्रामीण पत्रकारिता की धुरी है।’’ लेकिन आज अखबारों के इतने विकास और समृद्धि के बावजूद ग्रामीण संवाददाताओं की दयनीय स्थिति ही दिखाई देती है। ग्रामीण क्षेत्र के पत्रकारों का वेतन और उपलब्ध सुविधाएं निराशाजनक हैं। अनियमित या मामूली तनख्वाह के साथ काम करना उनकी विवशता है। वे पहचान के लिए भी मोहताज हैं। सिर्फ पत्रकारों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी ग्रामीण पत्रकारिता के लिए चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। रूरल जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आरजेएआई) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अरुण सिंह चंदेल के अनुसार, ‘ग्रामीण पत्रकारों में से अधिकांश १०० से २०० रुपये रोजाना पर गुजर-बसर करते हैं। इसलिए वे खेती जैसे आजीविका के दूसरे साधनों पर भी निर्भर रहते हैं।’ मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त और भारत में ग्रामीण पत्रकारिता के जाने-पहचाने नाम पी. साईनाथ भी इस बात से सहमति रखते हैं। साईनाथ के अनुसार, ‘ग्रामीण पत्रकारों को बहुत ही कम वेतन पर गुजारा करना पड़ता है, जिसकी वजह से उन पर दबाव ज्यादा होता हैं। पत्रकार संगठनों की कमी और कॉन्ट्रैक्ट (ठेका) आधारित नौकरी के चलते पत्रकारों की स्वतंत्रता खत्म हो रही है।’ बाजार, व्यापार और व्यावसायिकता के साथ ही विदेशी पूंजी निवेश के कारण पत्रकारिता का चाल, चरित्र और चेहरा बदल गया है। इससे सबसे अधिक ग्रामीण पत्रकारिता ही प्रभावित हुई है।
जैसी कि संभावना व्यक्त की जाती रही है, उपभोक्ता बाजार तेजी से ग्रामीण क्षेत्रों में प्रवेश करता जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में धीमी गति से ही सही लेकिन आर्थिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। आर्थिक स्थिति में बढ़ोतरी के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में सूचनाओं की भूख बढ़ रही है। विचारों का स्थान बढ़ रहा है। इसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों में भी पत्रकारिता के लिए स्थान और गुंजाइश बढ़ रही है।
हाल ही में ‘भोपाल जिले के ग्रामीण क्षेत्रों के विशेष संदर्भ में मीडिया की पहुंच, उदभासन और प्रभाव’ विषय पर किए गए एक अध्ययन में ग्रामीण क्षेत्रों में संचार और संचार माध्यमों की स्थिति, ग्रामीणों की संचार प्रवृत्तियों आदि के बारे कई महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट हुए हैं। इस अध्ययन के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में भी संचार के बुनियादी ढांचे और सेवाओं का तीव्र विकास हो रहा है। किन्तु फिर भी जनसंचार का कोई भी माध्यम शत-प्रतिशत ग्रामीण परिवारों में नहीं पहुंच सका है। हालांकि टेलीविजन, मोबाईल फोन और पत्र-पत्रिकाओं की पहुंच में निरन्तर वृद्धि हो रही है, लेकिन रेडियो (सेट) और टेलीफोन की पहुंच में निरन्तर कमी दर्ज की जा रही है। कम्प्युटर और इंटरनेट की पहुंच ग्रामीण क्षेत्रों में अभी बहुत कम है। अध्ययन में यह स्पष्ट हुआ है कि ग्रामीण क्षेत्रों में टेलीविजन और मोबाईल फोन की पहुंच अन्य माध्यमों की तुलना में ज्यादा तेज गति से हो रही है। इंटरनेट पहुंच की गति सबसे कम है। किंतु ग्रामीण क्षेत्रों में मोबाइल फोन के बाद समाचार पत्र सर्वाधिक भरोसेमंद संचार माध्यम है। ग्रामीण क्षेत्र के शिक्षित और अशिक्षित व्यक्तियों में टेलीविजन सबसे लोकप्रिय माध्यम है। लेकिन बिजली की कमी टेलीविजन के उपयोग में सबसे बड़ी बाधा है।
इस अध्ययन में यह तथ्य भी उजागर हुआ है कि ग्रामीण क्षेत्र में अधिकांश संचार माध्यमों का उपयोग सूचना और शिक्षा की बजाए मनोरंजन प्राप्त करने के लिए हो रहा है। समाचार पत्र ग्रामीण भारत की गुणात्मक निरंतरता के वाहक हैं। जबकि टेलीविजन, मोबाईल फोन और इंटरनेट के कारण पारिवारिकता, सामूहिकता, पारदर्शिता सहित अन्य पारंपरिक मूल्यों में क्षरण हो रहा है।
यह सर्वमान्य तथ्य है कि जनसंचार माध्यम विकास और परिवर्तन को प्रभावित करते हैं। किन्तु जनसंचार माध्यमों की पहुंच, संदेश की पहुंच को सुनिश्चित नहीं करता। बल्कि कई बार संचार माध्यमों की उपलब्धता के बावजूद संदेश अनुपलब्ध रह जाते हैं। जिन ग्रामीण क्षेत्रों में, विशेषकर शहरों के निकट और मुख्य सड़कों से जुड़े ग्रामीण क्षेत्रों में संचार माध्यमों की पहुंच बढ़ी है। इन क्षेत्रों में संचार माध्यमों के प्रभाववश अनेक बदलावों को महसूस किया जा रहा है। संचार माध्यमों के कारण ग्रामीण जीवन के सामाजिक-सांस्कृतिक पहलू, सामाजिक संस्थाएं- परिवार, विवाह, सामाजिक संस्तरण, शिक्षा, जाति आदि के साथ ही ग्रामीण अभिवृत्तियों- सामूहिकता, पारस्परिक सहयोग, पारस्परिक अवलंबन, मितव्ययिता, संचय, धार्मिकता, सामाजिक नियंत्रण आदि में निरन्तरता की अपेक्षा परिवर्तन अधिक देखा जा रहा है।
वर्तमान समय में संचार माध्यमों का प्रभाव व्यापक और असीमित है। यह व्यक्ति की मनोदशा, विचार, आदतों, व्यवहार, जागरूकता, समझ, दिनचर्या और जीवन दशाओं को प्रभावित कर रहा है। संचार के कारण व्यक्ति की सामाजिक-सांस्कृतिक, आर्थिक-राजनीतिक और पारंपरिक अभिवृत्तियां प्रभावित हो रही हैं। जनसंचार माध्यम व्यक्ति के सामाजीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं। संचार माध्यमों ने भौगोलिक दायरे को काफी कम कर दिया है। एक तरफ जहां पूरी दुनिया एक गांव की तरह हो गई है, वहीं गांव अपने-आप में पूरी दुनिया की तरह बन रहा है।
अत: संचार माध्यमों, विशेषकर अखबारों को तथा ग्रामीण पत्रकारिता से जुड़े पत्रकारों को पहले से ज्यादा संजीदा होने की जरूरत है। ज्ञानयुक्त, शिक्षित, संस्कारवान, संवेदनशील और जागरुक ग्रामीण समाज के निर्माण में पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। लेकिन इसके लिए पत्रकारिता को भी भारतीय और ग्रामीण मूल्यों से युक्त होना होगा। पत्रकारों को अपनी प्रतिबद्धता पूंजी, तकनीक, व्यावसायिकता और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से अधिक गांव और ग्रामीणों के प्रति स्थापित करनी होगी। पत्रकारिता से जुड़े व्यक्तियों को गांव और ग्रामीण अपेक्षाओं को समझने का कौशल विकसित करना होगा। अब राजनीति, आर्थिकी से लेकर ग्रामीणों का व्यवहार भी पत्रकारिता द्वारा प्रभावित और निर्धारित होने लगा है। पत्रकारिता के कारण ग्रामीणों में सतर्कता, सावधानी और सुरक्षा की दृष्टि विकसित हो रही है। यह सकारात्मक और शुभ है। हो सकता है दूरस्थ अंचलों में पत्रकारिता का प्रभाव भले ही कम हो या नगण्य हो, लेकिन हजारों गावों में लोग जागरुक हुए हैं, हाशिए के लोग अब अपने हक की लड़ाई के लिए चैतन्य हुए हैं। पत्रकारिता के कारण लोगों को न सिर्फ सरकार की कल्याणकारी योजनाओं व कार्यक्रमों की जानकारी मिल रही है, अपितु वे कमियों और दोषों के प्रति छिद्रांवेषण भी करने लगे हैं्।
गत वर्षों में ग्रामीण क्षेत्र और ग्रामीण विषय, सरकार की प्राथमिकता सूची में काफी ऊपर आया है। पत्रकारिता के लिए भी ग्रामीण विषय प्राथमिकता का बने यह आवश्यक है। ग्रामीण क्षेत्र में पाठकों की तादाद लगातार बढ़ रही है। पत्रकारिता भी भारतीय मूल्यों को अंगीकार कर स्वयं को सशक्त करे और भारत में उपेक्षितों, हाशिए के लोगों, विशेषकर ग्रामीणों की आवाज बने, उन्हें शक्ति और उर्जा दे यही वर्तमान पत्रकारिता का धर्म है। पत्रकारिता चाहे तो गांव के प्रति दृषिकोण में बदलाव कर सकती है। विकास की शहरी विचारधारा के स्थान पर ग्रामीण विचारधारा की पुनर्स्थापना पत्रकारिता के द्वारा की जा सकती है, बशर्ते भारत की पत्रकारिता विदेशी पूंजी और तकनीक का पिछलग्गू न बने। भारत के गांवों का सम्यक विकास पत्रकारिता का एजेंडा बने यह समय की मांग है।

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