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भारतीय संस्कृति विश्व के इतिहास में कई दृष्टियों से विशेष महत्व रखती है। यह इस संसार की एक प्राचीनतम संस्कृतियों में से है। सर्वांगीणता, विशालता, उदारता और सहिष्णुता की दृष्टि से अन्य संस्कृतियों की अपेक्षा अग्रणी स्थान रखती है। इसकी मुख्यत: तीन विशेषताएं हैं:-
-भारतीय संस्कृति कर्म प्रधान संस्कृति है।
-भारतीय संस्कृति अमर है।
-भारतीय संस्कृति विश्वगुरू बनने में समर्थ है।
देश चाहे भारत हो या कोई भी, उसके गांंव का जब तक विकास न हो तब तक उस देश का संपूर्ण विकास नहीं हो सकता। जहां तक भारत के गांंव के विकास की बात आती है तो उसकी आर्थिक विकास के साथ-साथ संस्कृति का विकास भी अधिक महत्वपूर्ण है। हमारे देश का हर गांव आज भी संस्कृति से जुड़ा है। शहर की तुलना में बड़ी मात्रा में गांवों में लोगों ने संस्कृति को पकड़े रखा है। अधिकतर संत और ऋषि की गांवों से ही आए हैं, जिन्होंने हमें जीवन जीने के मूलभूत तत्व सिखाए हैं। जीवन की धारा अपने संशोधनात्मक विचारों से हमें ही नहीं परंतु पूरे विश्व को दी। आज हमारी संस्कृति का अध्ययन करने का अन्य देश प्रयास कर रहे हैं। इसमें हमारे वर्तमान प्रधान मंत्री का भी भारी मात्रा में योगदान है। संपूर्ण विश्व में अपनी प्राचीन परंपरा रहे योग को ‘योग दिवस’ के रूप में शुरू करवाया, जो कि सारे विश्व में बड़े उत्साह के साथ मनाया गया। उनके हर विदेशी दौरे में हमारे देश की अस्मिता को बढ़ावा दिया जा रहा है। हमें किसी का अनुकरण करने के बजाय हमारी अच्छाई विश्व के सामने कैसे प्रस्तुत की जाए इसका प्रयास सतत हो रहा है। संस्कृति इस शब्द का आशय बहुत व्यापक है। आइये, संस्कृति की रक्षा में अपने गांवों के माध्यम से किस तरह योगदान होता आया है और हो रहा है इसके अनेक पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं।
संयुक्त परिवार
आधुनिकता व प्रगति की स्पर्धा में परिवार बड़े पैमाने पर बिखरते हुए आज हम देख रहे हैं। परंतु गांवां ेमें आज भी संयुक्त परिवार बसते हैं। हर सुख-दु:ख में सब मिल कर साथ में खड़े होते हैं। इसमें एकता का प्रतीक नजर आता है। स्वतंत्र जीवन जीने की लालसा में घर से दूर होकर संकट की घड़ी में पश्चाताप करने वाले कई परिवारों के हमें अक्सर दर्शन होते ही हैं। कुछ हद तक ‘लव मैरेज’ भी इस समस्या का एक कारण है। लेकिन आज भी कई जगह, अधिकतर माता-पिता तथा अन्य सम्माननीय पारिवारिक सदस्यों द्वारा शादी के रिश्तें तय किए जाते हैं। इसमें सामाजिक और पारिवारिक दायित्व का तथा व्यक्तिगत मूल्यों का आधार होता है। अपने परंपरागत शास्त्रों का आधार होने से पवित्रता, चारित्र और स्वाभिमान का अनुभव और अंश भी प्रमाणित होता है।
भाषा का स्वाभिमान
शहरीकरण की इस भागदौड़ में लोग शहर में आकर अपनी भाषा का प्रयोग करना भी बंद कर देते हैं। परंतु आज भी गांवों में सभी लोग अपनी भाषा का स्वाभिमान बचाए हुए हैं। अपने देश में मोटी तौर पर कोई ४१५ भाषाएं बोली जाती हैं। गांव की भाषा में अपने मिट्टी की एक अलग ही महक होती है। भाषा यह संवाद और संभाषण के लिए अत्यंत उपयुक्त साधन है। स्थानीय भाषा में विचारों की अभिव्यक्ति सहज होती है। आज भी जब हम छुट्टियों में अपने गांव जाते हैं, पुराने सभी मित्रों के साथ जब गांव की देशी भाषा में बात करते हैं तो हम एक अद्भुत आनंद की अनुभुति महसूस करते हैं, और उसकी पुनरावृत्ति की हर वक्त अपेक्षा करते हैं। यही तो है अपनी भाषा की सुंदरता और विविधता में एकता!
सहयोग और सहज भाव
स्वभाव में अगर सहज भाव होगा तो ही सहयोग के भाव प्रकट हो सकते हैं। शहर की तुलना में यह चीज गांवों में अधिक मात्रा मे दिखाई देती है। मिलजुल कर रहने से लोगों में यह भाव पनपता है और वास्तविकता में उसका प्रकटीकरण भी होता है। सहयोग मानवता की एक अच्छी मिसाल बनते आई है। इससे अहंकार लुप्त होने में भी काफी मदद होती है। मैत्रीपूर्ण व्यवहार निर्माण कर मानव कल्याण के कार्य में अग्रसर साबित हो सकते हैं। सब का साथ, सब का विकास यह नारा भी इसी भाव की उपज है। सहयोग से एकता बढ़ती है और विकास की प्रगति अधिक प्रभावी होती है।

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