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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विश्व की सब से बड़ी अशासकीय संस्था (एनजीओ) है। विश्व में जहां-जहां हिंदू हैं वहां-वहां संघकार्य है। अपने देश में संघ की पन्द्रह हजार से अधिक शाखाएं हैं। डेढ़ लाख से अधिक सेवा-कार्यों के माध्यम से संघ स्वयंसेवक सेवा-कार्य कर रहे हैं। देश में जब कभी नैसर्गिक विपत्ति आती है, तब सहायता हेतु दौड़ने वाला संघ स्वयंसेवक प्रथम होता है। किल्लारी में जब भूकंप आया तब भूकंपग्रस्त क्षेत्र में सर्वप्रथम लातूर के विवेकानंद चिकित्सालय की टीम पहुंची। यह चिकित्सालय संघ स्वयंसेवकों द्वारा संचालित है। इस प्रकार के विविध सेवा-कार्यों के कारण संघ याने आर एस एस को ‘रेडी फॉर सेल्फलेस सर्विस’ भी कहा जाता है।
संघ विश्व की सबसे बड़ी अशासकीय संस्था है यह जितना सच है उतना ही यह भी सच है कि विश्व के किसी भी संगठन के विषय में जितनी गलत धारणाएं या जितना अपप्रचार नहीं होगा उतना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विरुद्ध देश एवं विदेश में चलता है। इस झूठे प्रचार का संघ स्वयंसेवकों के मन, बुद्धि एवं भावविश्व पर कुछ भी परिणाम नहीं होता है। समाज को संघ की पहचान संघ स्वयंसेवक के माध्यम से होती है। इसके कारण संघ स्वयंसेवकों को देखने वाला समाज इस अपप्रचार से अप्रभावित रहता है। जिन्होंने कभी संघ देखा नहीं या अनुभव नहीं किया, केवल वे ही लोग इस जहरीले प्रचार के शिकार होते हैं। उनके मन में संघ के विषय में गलत सोच निर्माण होती है, डर की भावना पैदा होती है। संघ याने गुप्त संगठन है, उसका कार्य गुप्त रूप से चलता है, संघ को सवर्णों के वर्चस्व का राज्य निर्माण करना है, मुसलमानों का कत्लेआम करना है, ईसाइयों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाना है, महिलाओं को घरों में बंद कर रखना है, अस्पृश्यता फिर वापस लानी है, इस प्रकार के जबरदस्त आरोपों की सूची बहुत लंबी है।
मैं जब से स्कूल जाने लगा तब से संघ शाखा में जाने लगा। आज मेरी उम्र सत्तर वर्ष से अधिक है। और मेरा पूरा भावविश्व, विचारविश्व संघमय हो गया है। उपरोक्त सभी आरोप जब मैं पढ़ता हूं तब हंसी आती है। हंसी इसलिए कि जो लोग आरोप करते हैं उनका संघ-ज्ञान शून्य होता है। इसलिए उनकी अज्ञानता पर हंसी आती है और थोड़ा मनोरंजन भी होता है। मनोरंजन इसलिए भी कि वैसे संघ का काम कहां रुका है। वही-वही बातें सतत कहनी पड़ती हैं। वही विचार सुनने पड़ते हैं। ऐसे समय ऐसा कुछ पढ़ना-सुनना, मनोरंजन से कम नहीं है। आज देश में संघ के लाखों कार्यकर्ता हैं। तीन हजार से अधिक पूर्णकालिक प्रचारक हैं। प्रचारक याने, अपना शिक्षण पूर्ण कर अपने जीवन के कुछ वर्ष जो संघ कार्य हेतु समर्पित करता है, और संघ जहां कहेगा और जो कहेगा वह कार्य करता हैै, उसे प्रचारक कहते हैं। कुछ प्रचारक पांच दस वर्ष काम करते हैं फिर घर वापस आकर गृहस्थ जीवन प्रारंभ करते हैं। कुछ आजन्म प्रचारक रहते हैं। प्रचारकों के साथ ही गृहस्थ कार्यकर्ता भी अपने गृहस्थ जीवन की व्यवस्था कर संघ कार्य हेतु बहुत समय देते हैं। प्रवास करते हैं। ऊपर जो आरोप दिए गए हैं, उनसे प्रेरणा लेकर कार्य करने वाला एक भी कार्यकर्ता या प्रचारक मुझे मेरे आजतक के जीवन में नहीं मिला। मिलने की संभावना भी नहीं है। इसलिए ये आरोप सुनने के बाद मनोरंजन भी होता है और हंसी भी आती है।
मूलत: संघ विचार क्या है? यदि एक वाक्य में कहना हो तो ‘‘यह हिन्दू राष्ट्र है’’ यह संघ का मूल सिद्धांत है, और वह संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार द्वारा प्रतिपादित है। उनके जीवन का एक प्रसंग है कि प्रांरभ में हिन्दू राष्ट्र का विचार समझाने के लिए वे प्रवास करते थे, लोगों की बैठकें लेते थे। ऐसी ही एक बैठक में एक सम्माननीय व्यक्ति ने प्रश्न किया कि कौन कहता है यह हिन्दू राष्ट्र है? डॉ. हेडगेवार ने कहा, ‘‘मैं केशव बलिराम हेडगेवार कहता हूं यह हिन्दू राष्ट्र है। ’’ आज पूरे देश में डेढ़ से दो करोड़ संघ स्वयंसेवक गर्व से कहते हैं कि ‘हां, यह हिन्दू राष्ट्र है। ’ एक अकेले डॉ. हेडगेवार की शब्द-ध्वनि करोड़ों कंठों से फूट रही है। संघ शाखा में रोज कही जाने वाली प्रार्थना की पहली कड़ी में ये शब्द आते हैं, ‘‘वयं हिन्दूराष्ट्रांग भूता’’। यह हिन्दू राष्ट्र है यह कहने के लिए डॉ. हेडगेवार ने किसी पर जोर जबरदस्ती नहीं की। उन्होंने विचार स्वातंत्र्य का घात नहीं किया। हिन्दू राष्ट्र याने क्या यह उन्होंने अपने जीवन से सिद्ध किया। उनका जीवन याने हिन्दू राष्ट्र, ऐसे संस्कार उनके संपर्क में आने वाले सभी व्यक्तियों पर हुए और वे ही आगे चल कर डॉक्टरजी के प्रतिरूप हुए। उन लोगों ने ही पूरे देश में यह विचार फैलाने का काम किया। इनमें श्री गुरुजी, एकनाथजी रानडे, यादवराव जोशी, माधवराव मुळे, भाऊराव देवरस, बाबासाहब खटाटे, आप्पाजी जोशी, बाबाराव भिडे, ऐसे असंख्य नाम हैं।
हिन्दू राष्ट्र यह संघ का स्वप्न नहीं है, यह पहले समझना आवश्यक है। भारत को हिन्दू राष्ट्र बनना है, यह भी संघ का स्वप्न नहीं। भारत हिन्दू राष्ट्र है, यह संघ का मूलभूत सिद्धांत है। यह शाश्वत सनातन और शास्त्रीय सत्य है, ऐसा संघ का विश्वास है। इस पर संघ स्वयंसेवकों की असंदिग्ध निष्ठा है। इस पर किसी प्रकार का समझौता नहीं। भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना है ऐसा कहना याने सूरज को प्रकाश देना, पेड़ों को हरा रंग देना, दूध को शुभ्रता देना ऐसा कहने के समान हुआ। भारत का शाश्वत स्वरूप हिंदू राष्ट्र का ही है और वह निर्माण करने का स्वप्न देखने का प्रश्न ही निर्माण नहीं होता। स्वप्न न होने से उसे साकार करने का प्रश्न भी निर्माण नहीं होता।
डॉ.हेडगेवार कहते हैं कि यह हिन्दू राष्ट्र है, यह कोई मेरी खोज नहीं है। यह सनातन सत्य है। यह केवल मैं बताता हूं। डॉक्टर जो कहते थे वह सत्य था; क्योंकि हिंदू राष्ट्र का विषय उनके पूर्व भी लोकमान्य तिलक, योगी अरविंद, स्वामी विवेकानंद ने रखा था। डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने भी ‘बहिष्कृत भारत’ के एक संपादकीय में हिन्दू राष्ट्र का विषय रखा है। (संदर्भ बहिष्कृत भारत संपादकीय-२१ दिसंबर १९२८)। इन सब के कारण हिंदू राष्ट्र यह संघ की या डॉ. हेडगेवार की संकल्पना है ऐसा समझने का कोई कारण नहीं है।
डॉ.हेडगेवार का वैशिष्ट्य यह है कि वे केवल यह हिंदू राष्ट्र है, ऐसा कह कर रुके नहीं। इस विषय पर उन्होंने भाषण नही दिए या कोई बड़ी ग्रंथ संपदा भी निर्माण नहीं की। उनके सामने एक ही प्रश्न था कि यह जो सनातन सत्य है, लोगों को उसका विस्मरण क्यों हुआ? लोगों को अर्थात जो रुढार्थ से हिन्दू हैं, उन हिंदुओं को इसका विस्मरण क्यों हुआ? यह हिंदू भाव जागृति करने के लिए क्या करना होगा और वह कौन करेगा? ये उनके चिंतन के मुख्य बिंदु थे। और, उन्होंने निर्णय किया कि यह काम मुझे करना है, और इसलिए अपना संपूर्ण जीवन उन्होंने इस कार्य हेतु समर्पित कर दिया। यह विषय उन्होंने भाषण के माध्यम से, तर्कवाद के माध्यम से, बुद्धिवादी दृष्टिकोण से समाज के सामने रखा; परंतु डॉक्टरजी को अभिप्रेत हिन्दू राष्ट्र इन भाषणों से उनके साथ काम करने वालों को कितना समझ में आया यह कहना कठिन है। परंतु डॉक्टरजी का जीवन, चारित्र्य, समर्पण व मातृवत प्रेम करने की वृत्ति मात्र सभी ने उत्कटता से अनुभव की। सभी को समझ में आ गया कि हिन्दू राष्ट्र याने हृदय से, निस्वार्थ रूप से समाज पर उत्कट प्रेम करना, इसके अलावा कुछ नहीं।
हिन्दू राष्ट्र की अनुभूति जिन्हें देनी है वह हिन्दू समाज ही है। यह हिन्दू समाज संघ स्थापना के समय अत्यंत असंगठित था। असंगठित होने के कारण दुर्बल था। उसमें समाजशक्ति का अभाव था। असंख्य जातियों में वह विभाजित था। प्रत्येक जाति एक गुट के रूप में दूसरी जाति से अपने को अलग समझती थी। जातिधर्म आचरण का मुख्य विषय हो गया था। जातिधर्म मनुष्य को मनुष्य से तोड़ने वाला धर्म है। इस जातिप्रथा ने हिन्दू समाज के एक बड़े वर्ग को अछूत करार दे दिया और उन्हें समाज से अलग कर दिया। समाज में रह कर भी प्रत्येक हिन्दू ‘मैं अकेला हूं’ का अनुभव करता था। चार मुसलमान चार सौ हिंदुओं पर भारी पड़ते थे। क्योंकि चार सौ हिंदू याने झुंड था। उसमें सामाजिक एकता का अभाव था। ऐसे समय भागने वाला प्रत्येक हिन्दू ‘‘मैं अकेला हूं, मैं क्या कर सकता हूं’’ ऐसा सोचता था। इन हिंन्दुओं को ‘‘मैं हिन्दुस्थान का घटक हूं’’ यह अनुभूति दिलाने का अभिनव प्रयत्न डॉ.हेडगेवारजी ने प्रारंभ किया। इसके लिए उन्होंने संघ शाखाओं की शुरूआत की।
संघ शाखा याने क्या? संघ में एक कहानी बताई जाती है। यह कहानी स्वामी विवेकानंद जी ने भी बताई है। संक्षेप में कहानी इस प्रकार है- एक सिंह का बच्चा बकरियों के झुंड़ में पलता -बढ़ता है और बकरियों के स्वभाव का हो जाता है। वह अपना वास्तविक स्वरूप भूल जाता है। थोड़ीसी आवाज से घबरा जाता है। एक बार एक सिंह उस झुंड़ पर आक्रमण करता है। बकरी के झुंड में एक सिंह का बच्चा देख कर उसे आश्चर्य होता है, और उसे कहता है- ‘‘तू मेरे जैसा ही सिंह है। बकरियां हमारा भोजन हैं। घास खाना हमारा काम नहीं है। ’’ और एक तालाब के पास जाकर उसे उसका प्रतिबिंब दिखा कर उसे उसके स्वरूप की पहचान करा देता है। डॉ. हेडगेवार ने जो शाखातंत्र निर्माण किया वह प्रत्येक हिन्दू को उसके स्वरूप की पहचान कराने वाला जलाशय है। अपनी पहचान करें एवं अपनी भव्यता का साक्षात्कार करें। मैं हिन्दू हूं एवं हिन्दू राष्ट्र का अंग हूं यह पहचान कर लें। इसी को डॉक्टर साहब ने हिंदू संगठन कहा। यह संगठन किसी के विरोध में नहीं। किसी को मारने के लिए नहीं। सत्ता प्राप्त करने के लिए तो बिलकुल भी नहीं। यह संगठन है, खुद की पहचान करने के लिए, आत्माभिमान जगाने के लिए, आत्मविस्तार करने के लिए, स्वत: के मूल स्वरूप करने की पहचान के लिए।
डॉ.हेडगेवार ने हिन्दू राष्ट्र यह शाश्वत एवं सनातन सत्य माना। इसके हिन्दू व राष्ट्र ये दो शब्द महत्वपूर्ण हैं। हिन्दू किसे कहें? हिन्दू की क्या व्याख्या है? डॉ.हेडगेवार ने हिन्दू शब्द की व्याख्या नहीं की। स्वातंत्र्यवीर सावरकर के विषय में उन्हें परम आदर था। उनका हिन्दुत्व नामक ग्रंथ उन्होंने पढ़ा था। इस ग्रंथ में सावरकरजी ने हिन्दू की व्याख्या की है। वह इस प्रकार है, ‘‘आ सिन्धु-सिन्धु पर्यन्ता, यस्य भारत भूमिका पितृभू-पुण्यभू चैव सा वै हिन्दूरिती स्मृता:। ’’ परंतु यह व्याख्या डॉक्टरजी ने कभी संघ में नहीं बताई। स्वातंत्र्यवीर सावरकर के समान ही डॉक्टरजी का दूसरा श्रद्धास्थान था लोकमान्य तिलक। लोकमान्य तिलक ने भी हिन्दू की व्याख्या की है, जो इस प्रकार -‘‘प्रमाण्य बुद्धि र्वेरेषु। साधनानां अनेकता। उपास्यानां अनियम:। एतत धर्मस्य लक्षणम। ’’ डॉ. हेडगेवार ने यह व्याख्या भी कभी संघ में नहीं बताई। रुढ़ार्थ से जो हिन्दू हैं उन्हें साथ लेकर संगठन का कार्य किया। उनकी व्यावहारिक व्याख्या थी, ‘‘हम जिन्हें हिन्दू समझते हैं वे हिन्दू और जो स्वत: को हिन्दू समझते हैं वे हिन्दू। ’’
संघ कार्य जैसे-जैसे बढ़ता गया वैसे-वैसे हिन्दू इस शब्द पर चर्चा प्रारंभ हुई। संघ कार्य प्रारंभ होने के पूर्व स्वामी विवेकानंद, योगी अरविंद ने अपने-अपने दृष्टिकोण से हिन्दू कौन है, यह बताने का प्रयत्न किया था। डॉ. हेडगेवार के बाद श्री गुरुजी सरसंघचालक बने। उन्होंने हिन्दू शब्द पर विस्तृत भाष्य किया। वे कहते हैं- ‘‘अनादिकाल से हिन्दू समाज नाम से पहचाना जाने वाला एक महान व सुसंस्कृत समाज इस मातृभूमि का पुत्र इस नाते से यहां रह रहा है….. हिन्दू यह नाम अभी का है या दूसरों ने हमें दिया है, यह कहना इतिहास की कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा। …सप्तसिंधु नाम पर से हस्तबिंदु या बाद में हिन्दू नाम प्रचलित हुआ। ’’ (विचारधन -प्रश्न क्र.९२)। यही विषय सावकारजी ने और स्वामी विवेकानंद ने भी रखा है।
हिन्दू किसे कहें? इस प्रश्न का उत्तर श्री गुरुजी ने इस प्रकार दिया है-‘‘हिन्दू समाज के भिन्न-भिन्न पंथ व मत का समावेश व समन्वय निम्न श्लोक में कितने सुंदर प्रकार से किया गया है ये देखें-
या शैव: समुपासरो शिव इति ब्रम्हति वेरानीनों बौद्ध बुद्ध इति प्रमाणपंख: कर्तेति नैय्यायिका:।
अर्हकित्युत जैन शासनरता: कर्मेति मीमांसका:
सो यं वो विदधातु वांछित फलं त्रेल्योक्यनाथो हरि:॥
अर्थ- जिनकी शैव शिव रूप में, वेदांति ब्रह्म रूप में, बौद्ध बुध रूप में, नैय्यायिक कर्ता रूप में, जैन अर्हत रूप में और भीमांसक कर्म रूप में उपासना करते हैं वे त्रैल्योक्यनाथ ईश्वर हमें इष्ट फल दें।
व्यक्ति-व्यक्ति को प्राप्त यह पूजा स्वांतत्र्य है।
श्री गुरुजी ने जो श्लोक दिया है उस श्लोक में कालोचित परिवर्तन कर संघ के एकात्मता मंत्र में वह श्लोक समाहित किया गया है। संघ स्वयंसेवक प्रभात शाखा में प्रतिदिन यह मंत्र कहते हैं। यह मंत्र इस प्रकार है-
यं वैदिका मंत्रदृश: पुराणा इंन्द्र यमं मातरिश्वान माहूं:
वेदान्तिनोऽनर्वचनीयमेकं यं ब्रम्ह शब्देन विनिर्दिशन्ति॥
अर्थ-प्राचीन काल में मंत्रदृष्टा ऋषियों ने जिसे इन्द्र, यम, मातारिखान कह कर पुकारा और जिस एक अनिर्वचनीय को वेदान्त ब्रह्म शब्द से निर्देश करते हैं-
शैवा यमीशं शिव इत्यवोचन् यं वैष्णवा विष्णु रितिस्तुवन्ति
बुद्धस्तथाऽर्हन्निति बौद्ध जैना: सत श्री अकालेतिच सिक्ख संत:॥
अर्थ-शैव जिसको शिव और वैष्णव जिसको विष्णु कह कर स्तुति करते हैं और जिसे बौद्ध और जैन बुद्ध और अरिहन्त कहते हैैं तथा सिक्ख संत जिसे सतश्री अकाल कह कर पुकारते हैं।
शास्तेतिकेचित कतिचित कुमार: स्वामीति मातेति पितेति भक्तया।
यं प्रार्थयन्ते जगदी शितारं स एकं एवं प्रभुरद्वितीय:॥
अर्थ- जो सब जग का स्वामी है, उसे कोई शास्ता तो कोई कुमार स्वामी कहते हैं, तो कोई उसे स्वामी माता, पिता ऐसा संबोधित कर उसकी भक्तिपूर्वक प्रार्थना करते हैं। वह प्रभु एक ही है और उसके सरीखा अन्य कोई दूसरा नहीं है।
श्री बालासाहब देवरस ने यही आशय इस प्रकार प्रगट किया है, ‘‘हिन्दू समाज इस नाम के अंतर्गत कौन आते हैं, इस संबंध में सभी बंधुओं की एक निश्चित व समान धारणा है। कुछ वर्षों पूर्व हमारे देश में एक कोड बनाया गया, हिंदू कोड। संसद ने वह पास किया। वह पास हो इस विषय में जिन्होंने अगुवाई की, उनमें पं.नेहरू थे, डॉ. आंबेडकर थे। कोड बनाने के बाद यहां की जिस बहुसंख्य जमात पर वह लागू करना था, उसे क्या नाम दिया जाए यह प्रश्न जब उनके सामने आया, तब उन्हें उस कोड को ‘‘हिंदू कोड’’ ही कहना पड़ा। यह कोड किस पर लागू होगा यह बताते समय प्रारंभ में ही उन्हें ऐसा कहना पड़ा, ‘‘मुसलमान, ईसाई, यहूदी एवं पारसी इन चार जमातों को छोड़ कर, भारत में बाकी जितने लोग हैं, उनमें सनातनी, लिंगायत, जैन, बौद्ध, सिक्ख, आर्य समाजी इत्यादि शामिल हैं, इन सभी पर यह कोड लागू होगा। ’’ इसके आगे जाकर यह भी कहा है- ‘‘उपरोक्त सूची के अलावा यदि कोई शेष हों तो वे भी इसमें शामिल होंगे। जिन्हें यह लगता है कि उन पर यह कोड लागू नहीं होता, तो इसे सिद्ध करने की जवाबदारी उन पर होगी। इस प्रकार हिन्दू शब्द की व्याख्या नहीं हो सकती । इसीलिए ‘‘ हिंदू समाज ही नहीं’’ जैसा विवाद कभी- कभी मचाया जाता है, जो ठीक नहीं। यहां हिन्दू कोड के अंतर्गत आने वाले सभी ‘‘हिन्दू समाज’’ के अंतर्गत आते हैं ऐसा पं. नेहरू ने कहा है, डॉ आंबेडकर ने कहा है। ’’ (सामाजिक समता व हिन्दू संगठन, पृष्ठ ३-४, बालासाहब देवरस)
राष्ट्र यह शब्द पुरातन है। इस संसार में अनेक राष्ट्रों का उदय हुआ और कालांतर में वे अस्त हो गए। मिस्र, बेबिलोनिया, रोम, यूनानी इ. प्राचीन राष्ट्र आज विश्व के नक्शे में नाम से हैं; परंतु उनकी संस्कृति का जब विकास हुआ था तब की वह संस्कृति आज आस्तित्व में नहीं है। वे लोग और उनकी संस्कृति समाप्त हो गई। ढाई-तीन हजार वर्ष पूर्व भारत में जो संस्कृति थी, वह आज वैसी की वैसी है। कालानुरूप लोगों की वेशभूषा एवं रहन-सहन में परिवर्तन हुआ है। परंतु जीवन मूल्य वैसे के वैसे ही हैं। इसे संस्कृति की निरंतरता कहते हैं। डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के शब्दों में- ‘‘भारत में अनेक जातियां होने के बावजूद और वे एक दूसरे से अलग होने के बावजूद यहां उनमें गहरी सांस्कृतिक एकता है। ‘‘उत्तर में हिमालय, वायव्य दिशा में हिंदूकुश पर्वत माला और पूर्व-पश्चिम-दक्षिण में समुद्र। इस प्रकार भारतीय राष्ट्र की रचना है। प्रकृति ने इस देश को, एक विशिष्ट रूप दिया है। राष्ट्र की इस प्राचीनता का गौरव सभी महापुरुषों ने किया है।
हिन्दू शब्द के साथ धर्म यह शब्द भी आता है इसलिए हिन्दू राष्ट्र याने हिन्दू धर्म मानने वालों का राष्ट्र ऐसा अर्थ भी किया जाता है। इसी में से दूसरा अर्थ यह भी निकाला जाता है कि हिन्दू राष्ट्र यह धार्मिक संकल्पना है और हिन्दू राष्ट्र और कुछ न होकर धर्माधारित राज्य होगा। यह संकल्पना भारत के अनेक लोगों को मान्य नहीं है। पं. नेहरू ने इस संकल्पना का प्रखर विरोध किया है। प्रश्न यह उठता है कि हिन्दू राष्ट्र इन शब्दों में संघ को क्या अभिप्रेत है? जिस प्रकार इस्लामिक राज्य या यहूदियों का राज्य है क्या उस प्रकार हिन्दू धर्म को मानने वालों का राज्य संघ को अभिप्रेत है? संघ का हिन्दू राष्ट्र का स्वप्न साकार होगा क्या? इस प्रश्न में निहित अर्थ क्या भारत हिन्दू धर्म पर आधारित राज्य होगा? ऐसा भी होता है। इसलिए हिन्दू धर्म याने क्या? इसकी चर्चा करना भी आवश्यक है।
जिस अर्थ में इस्लाम, ईसाई, ज्यूडाइज्म ये धर्म के नाम से संबोधित किए जाते हैं, उस अर्थ में हिन्दू नामक धर्म का अस्तित्व देश में नहीं है। इस्लाम, ईसाई, ज्यूडाइज्म ये धर्म एक ग्रंथ, एक देवदूत, एक ईश्वर, एक प्रकार की उपासना पर आधारित हैं। जो खुद को हिन्दू कहते हैं वे इन प्रकारों में फिट नहीं बैठते। हिन्दू यह अलग-अलग पंथों की संसद है। भगवान मानने वाले न मानने वाले, वेद मानने वाले न मानने वाले, धार्मिक कर्मकांड करने वाले नकरने वाले सभी हिन्दू हैं। सभी हिन्दुओं को मान्य ऐसा एक मानक ग्रंथ हिन्दुओं में नहीं। कुछ लोग वेदों को प्रमाण मानते हैं, कुछ नहीं मानते। कुछ मूर्तिपूजक हैं-कुछ नहीं। वे निर्गुण निराकार के उपासक होते हैं। हिन्दू धर्म यह लोगों को एक सांचे में रखने वाली संकल्पना नहीं है। हिन्दू धर्म का राज्य यह वाक्य अंतर्विरोधों से भरा है। जिस समाज में सर्वमान्य ग्रंथ नहीं, देवदूत नहीं, एक ईश्वर नहीं, उस समाज में धर्मराज्य किस आधार पर होगा? ऐसा प्रश्न निर्माण होता है। पाकिस्तान या अरब देशों में कुरान पर आधारित राज्य चलता है, वैसे भारत में वेद, गीता या गुरुग्रंथसाहिब या धम्मपद इन्हें प्रमाण मान कर धार्मिक राज्य नहीं चलाया जा सकता। यह अशक्यप्राय है। संघ कितना भी सामर्थ्यशाली हो जाए यह नहीं कर सकता; क्योंकि भारतीय जनता का वैसा स्वभाव नहीं है।
धर्म याने पंथ नहीं, धर्म याने उपासना पद्धति नहीं और धर्म याने ग्रंथ प्रामाण्यवाद नहीं। ये बातें संघ में असंख्य बार बताई जाती हैं और ये बातें संघ स्वयंसेवकों के मन में घर कर गई हैं। संघ में धर्म का अर्थ ‘‘धारणात धर्म इत्यादु। धर्म धारयते प्रजा। ’’ इस प्रकार किया जाता है। यह महाभारत का श्लोक है और धर्म की व्याख्या करते समय इसे प्रमाण माना जाता है। इस विषय में विनोबा भावे कहते हैं, ‘‘अपनी भारतभूमि में अत्यंत प्राचीन वेदकाल से आजतक ‘‘धर्म’’ यह शब्द सतत प्रचलित है। इस शब्द का निश्चित समानार्थी शब्द दूसरी भाषाओं में नहीं मिलता। धर्म यह एक व्यापक शब्द है। हमारा जीवन जिन नीति-विचारों पर आधारित होता है उसे हम धर्म कहते हैं। धर्म अविचल है। धर्म के सिद्धांत निश्चित हैं। जिस प्रकार गणित के सिद्धांत किसी भी देश एवं किसी भी काल में निश्चित हैं उसी प्रकार धर्म के सिद्धांतों में भी कभी बदलाव नहीं होता। धर्म वह जो धारण करता है- धारणात धर्म:। जिन सिद्धांतों के अभाव से जीवन छिन्नभिन्न हो जाता है ऐसे मूल सिद्धांत याने धर्म। (भारताचा धर्म विचार, पृष्ठ क्र ७, विनोबा)। इस प्रकार के विचार महात्मा गांधी, योगी अरविंद, स्वामी विवेकानंद, डॉ.बाबासाहब आंबेडकर के भी हैं। उन्हें भी यहां दे सकते हैं; परंतु वह अनावश्यक विस्तार होगा।
संघ का कार्य धारणा करने वाले धर्म की पहचान हिन्दू समाज को कराना है। इस अर्थ में संघ का कार्य धार्मिक कार्य हुआ। वह जैसे धर्म संवर्धन का है वैसे धर्म रक्षण का भी है। संघ कार्य का संपूर्ण ध्येय संघ की प्रार्थना में निहित है। इस प्रार्थना में संघ स्वयंसेवक रोज कहता है-
‘‘समुत्कर्षानिस्प्रेयसस्वक मुग्रम
परम साधनन नाम वीरप्रतम
तदन्तस स्फुरत्वस्था ध्येयनिष्ठा
ह्ृदन्त: प्रजागत तीव्र निशम
विजेत्री च नस संहता कार्यशक्तिर
विधायास्य धर्मस्त्र संरक्षण
परम वैभवन नेतुमेतत स्वराष्ट्रम
समर्थ भवत्वाशिषा ते भृशम
॥माता की जय॥
अर्थ- अभ्युदय सहित नि:श्रेयस की प्राप्ति का वीरव्रत नामक जो एकमात्र श्रेष्ठ उग्र साधन है, उसका हम लोगों के अंत:करण में स्फूरण हो। हमारे हृदय में धर्म तथा तीव्र ध्येयनिष्ठा सदैव जागृत रहे। तेरे आशीर्वाद से हमारी विजयशालिनी संगठित कार्यशक्ति स्वधर्म का रक्षण कर अपने इस राष्ट्र को परम वैभव की स्थिति पर ले जाने में अतीव समर्थ हो। ॥माता की जय॥
इस पंक्ति में धर्म याने सभी के उत्कर्ष की इच्छा और पारलौकिक कल्याण की कामना ऐसे दो विषय आए हैं और वे साध्य करने के लिए साधन के रूप में वीरव्रत का उल्लेख है। संगठित कार्यशक्ति क्यों चाहिए तो वह धर्मरक्षण के लिए चाहिए। (राज्यप्राप्ति हेतु नहीं)।
संघ के सब प्रयत्न भारत में सनातन धर्म की पहचान और उसकी अनुभूति सभी को हो इस हेतु से हैं। महात्मा गांधी स्वत: को सनातनी हिन्दू कहते थे। २० जून १९२१ के ‘यंग इंडिया’ में वे लिखते हैं, ‘‘मैं स्वतः को सनातनी हिन्दू मानता हूं। मेरा वेद, उपनिषद एवं पुराणों पर विश्वास है। उसी प्रकार हिंदू धर्मशास्त्र के अवतार और पुनर्जन्म पर भी मेरा विश्वास है। ’’ यह सनातन धर्म याने क्या? महात्मा गांधी कहते हैं, ‘‘सच्चा धर्म संकुचित विचार का हो ही नहीं सकता। सच्चा धर्म केवल बाह्य निरीक्षण नहीं है। सच्चा धर्म परमेश्वर और उसके अस्तित्व पर विश्वास रखना सिखाता है। अंहिसा, पुनर्जन्म और सत्य इन पर दृढ़ विश्वास सिखाता है। धर्म अत:करण का विषय है। ’’ सनातन धर्म के विषय में योगी अरविंद के विचार अत्यंत मननीय हैं। उत्तरपारा में जो उनका भाषण हुआ वह बहुत महत्वपूर्ण है। उसमें वे कहते हैं, ‘‘हिन्दू धर्म याने क्या? इसका आकलन मुझे हो गया है। हम हिन्दू धर्म एवं सनातन धर्म के विषय में बार-बार बात करते हैं पर उसका अचूक अर्थ क्या है यह जानते नहीं हैं। अन्य सभी धर्म प्रमुखत: विश्वास और व्यवहार के धर्म हैं। परंतु सनातन धर्म प्रत्यक्ष जीवन ही है। विश्वास की अपेक्षा जीना यह महत्व का है। सनातन धर्म मानव जाति की मुक्ति के लिए पुरातन काल से इस देश में अवतरित है। यह सनातन धर्म विश्व को देने के लिए भारत का उदय हो रहा है। भारत स्वत: के लिए जीवित नहीं हो रहा है, वरन् वह विश्व कल्याण हेतु जीवंत हो रहा है। भारत मानवता के लिए जीवंत है। भारत स्वत: के लिए कभी नहीं जिया, वरन् वह मानवता के लिए जिया। स्वत: के लिए नहीं तो संपूर्ण मानव जाति के लिए भारत को महान होना पड़ेगा। ’’
इस सनातन धर्म का पालन कैसे किया जाए? हमारे रोज के जीवन में वह कैसे आए? इसका उत्तर डॉ. हेडगेवार ने खोजा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ याने सनातन धर्म रोज के जीवन में लाने की प्रयोगशाला है। मानवधर्म याने सभी मानव मनुष्य इस नाते से एक हैं एवं सबसे बंधुवत व्यवहार करना चाहिए। स्वामी विवेकानंद ने यह आशय शिकागो की सर्वधर्म परिषद में रखा। हमें राष्ट्र के रूप को साकार करना है तो बधुंता की भावना सर्वत्र होनी चाहिए, ऐसा डॉ. बाबासाहब कह गए हैं। बंधुता यह सबको बांधने वाला सूत्र है। सबको बांधने वाला सिमेंट है। इस बंधुभावना को ही धर्म कहना चाहिए और यही युगधर्म है। यह संघ का मूल विचार है। संघ के सब स्वयंसेवक इसके लिए काम करते हैं। हम सब एक हैं, भारत हमारी माता है, इस माता की हम संतान हैं, इसलिए हम परस्पर बंधुभाव से एक रहेंगे। यह शिक्षा संघ में सतत भिन्न-भिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से स्वयंसेवकों के मन पर अंकित की जाती है। इसका स्वाभाविक परिणाम याने जब कभी समाज के सामने संकट पैदा होता है तब स्वयंसेवक किसी भी आदेश की प्रतीक्षा न करते हुए संकट में मदद हेतु दौड़ कर जाता है। फिर वह चक्रवात हो, भूकंप हो या बाढ़ हो।
संघशक्ति जैसी-जैसी बढ़ती जा रही है वैसे-वैसे उसके स्वाभाविक परिणाम समाज में दृष्टिगोचर होते हैं। राजनैतिक क्षेत्र में एक परिणाम दिखाई पड़ता है, अलग-अलग राज्यों में भाजपा की सत्ता है। केंद्र में भी भाजपा की सत्ता है। प्रधान मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक सभी संघ स्वयंसेवक हैं। विविध राज्यों के राज्यपाल भी संघ स्वयंसेवक हैं। वे देश के विकास के संदर्भ में विचार करते हैं। देश के अलग-अलग प्रश्नों के संबंध में विचार रखते हैं, उनका निदान करते हैं एवं उस पर कार्यवाही प्रारंभ करते हैं। सत्ता में बैठे हुए लोगों को रोज निर्णय लेने पड़ते हैं, बोलना पड़ता है, भूमिका रखनी पड़ती है। इन सब का अर्थ कुछ लोग ऐसा लगाते हैं कि संघ ने अब हिन्दू राष्ट्र का एजेंडा कार्यरूप में परिणित करने का कार्य प्रारंभ कर दिया है। भाजपा के माध्यम से संघ को भारत हिन्दू राष्ट्र में परिवर्तित करना है। उसके लिए अलग-अलग विषयों का भगवाकरण प्रारंभ कर दिया है। संघ-विचारों के व्यक्ति अलग-अलग शासकीय क्षेत्रों में प्रस्थापित किए जा रहे हैं।
यह संपूर्ण विषय याने एक भ्रमजाल है। संघ में एक गीत कहा जाता है। उसकी पंक्तियां हैं-‘‘पथ का अंतिम लक्ष्य नहीं है, सिंहासन चढ़ते जाना। सब समाज को लिए साथ में आगे बढ़ते जाना॥अटल बिहारी वाजपेयी प्रधान मंत्री बने या नरेंद्र मोदी प्रधान मंत्री बने इसलिए केवल हिन्दू राष्ट्र हो गया यह केवल बचकाना विचार न होकर मूर्खतापूर्ण विचार है। हिन्दू राष्ट्र यह सनातन सत्य है। यह बात वाजपेयी प्रधान मंत्री बनने से सिद्ध नहीं होती या डॉ. मनमोहन सिंह प्रधान मंत्री बनने से असत्य नहीं है। किसी के भी प्रधान मंत्री होने या न होने पर हिन्दू राष्ट्र का अस्तित्व निर्भर नहीं है। हम लोकतंत्रीय शासन पद्धति का अवलंबन करते हैं।
प्रत्येक पांच वर्ष के बाद चुनाव होंगे और जो बहुतम में होगा वह शासन करेगा। शासन किस प्रकार करना इसका निर्धारण संविधान द्वारा किया गया है। उससे बाहर जाकर शासन करना किसी के बस में नहीं। संविधान में कहा गया है कि राज्य किसी भी पंथ या उपासना पद्धति पर निर्भर नहीं होगा। नरेंद्र मोदी स्वयंसेवक होने के बावजूद संविधान से बंधे हैं। संविधान से बंधे रह कर ही उन्हें अपना काम करना चाहिए यह संघ की भी अपेक्षा है।
संघ के ध्येय या स्वप्न में राज्यसत्ता प्राप्त करना यह विषय है ही नहीं। राज्यसत्ता प्राप्त करना यह बहुत सामान्य कार्य है एवं काफी कम दर्जे का लक्ष्य है। यह संस्कार संघ स्वयंसेवक पर सतत किया जाता है। संघ का कार्य समाज को सामर्थ्य संपन्न बनाना है। संघ को सामर्थ्य संपन्न करना या सत्ता सपंन्न करना नहीं। सामाजिक सामर्थ्य की संघ की विचारधारा है। विश्व में अनेक राष्ट्र बने-बिगड़े, अनेक संस्कृतियों का विकास हुआ एवं उनका लय हुआ परंतु भारत, भारत ही रहा। इसका क्या कारण? इसका कारण याने भारत की समाज रचना कभी भी शासन पर निर्भर नहीं रही। हमारी समाज रचना शासन केंद्रित कभी नहीं रही। राज्यसत्ता पर उसका अस्तित्व कभी भी निर्भर नहीं रहा। समाजरचना स्वतंत्र रही। उसका मूलाधार बहुत अलग है। हमारी समाज रचना स्वयंशासित, स्वावलंबी एवं धर्माधिष्ठित रही।
पश्चिमी देश एवं भारत में यही महत्वपूर्ण अंतर है। वहां राज्यसत्ता को बहुत महत्व दिया जाता है। उनके राजनीतिक विचारों का हम पर बड़ा परिणाम होता है। इस कारण कोई भी आंदोलन प्रारंभ हो जाता है। संघ को सत्ता की राजनीति से कुछ भी लेना-देना नहीं है। राजसत्ता अनुकूल होने पर भी संघ को उसका मर्यादित उपयोग ही होता है। मर्यादित इस अर्थ में कि राज्यसत्ता किसी भी प्रकार की बाधाएं उत्पन्न नही करतीं। परंतु अनुकूलता, जैसी आज है, संघ का स्वप्न साकार करने में समर्थ नहीं है। संघ को समाज बलशाली बनाना है अर्थात समाज को आत्मनिर्भर एवं शासन पर किसी प्रकार निर्भर न रहने वाला बनाना है। आधुनिक शासन की बड़ी विशेषता याने सत्ता सब क्षेत्रों में दखल देती है। शिक्षा का क्षेत्र स्वतंत्र होना चाहिए, परंतु शिक्षा नीति शासन तय करता है। मजदूर संघ स्वतंत्र होना चाहिए, परंतु वे किसी न किसी राजनीतिक दल के दास होते हैं। सहकारिता का क्षेत्र स्वतंत्र होना चाहिए, परंतु सत्ताधारी उसमें भी हस्तक्षेप करते हैं।
स्वतंत्र समाज की कल्पना महात्मा गांधीजी ने रखी। गांव स्वयंपूर्ण हो एवं उनकी रचना पंचायती राज के आधार पर हो। गांवों के लोगों को एकसाथ बैठ कर अपने प्रश्न एवं झगड़ों का निराकरण करना चाहिए। महात्माजी की ग्राम स्वराज्य की यही संकल्पना थी। संघ की कल्पना का हिन्दू राष्ट्र इसी प्रकार स्वयंशासित होना चाहिए। समाज केा संचालन करने वाले सभी महत्वपूर्ण क्षेत्र स्वतंत्र एवं स्वायत्त होने चाहिए। यह संघ केवल कहता नहीं है तो करके दिखाता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यह संस्था संघ स्वयंसेवक चलाते हैं। संघ को सरसंघचालक नहीं चलाते हैं। सरसंघचालक केवल जिम्मेदारी का पालन करते हैं। संघ को धन स्वयंसेवक देते हैं। संघ कार्यालय स्वयंसेवक खड़े करते हैं। संघकार्य हेतु वाहन स्वयंसेवक उपलब्ध कराते हैं। संघ स्वायत्त, स्वयंपूर्ण और अपने क्षेत्र में सार्वभौम संस्था है। संघ पर किसी भी शक्ति का बाह्य नियंत्रण नहीं है। भारत में कार्य करने के कारण वह संविधान के अंतर्गत कार्य करता है, और उसके नियमों से बंधा है। परंतु संघ कैसा चलाना, अर्थसहायता कहां से लेना इ. सभी प्रश्न संघ स्वयंसेवक निश्चित करते हैं। व्यापक अर्थों में समाज यह तय करता है कि संघ कैसा हो।
जो संघ में है वह समाज में प्रतिबिंबित हो यह संघ का आग्रह है। संघ स्वयंसेवक लाखों सेवाकार्य करते हैं। उसी प्रकार सैकड़ों संस्थाएं खड़ी करते हैं। अखिल भारतीय स्तर पर तीन दर्जन से अधिक संस्थाएं होंगी। इसका निश्चित आंकड़ा मेरे पास नहीं है, परंतु उनकी संख्या हजारों में होगी। ये सभी संस्थाएं स्वतंत्र और स्वायत्त हैं। वे अपने अस्तित्व के लिए केवल समाज पर निर्भर हैं, राजसत्ता पर निर्भर नहीं हैं। वे अपना काम सहमति एवं एकमत से करती हैं। वे व्यक्ति-केंद्रित नहीं हैं। कोई भी पदाधिकारी आजन्म नहीं रहता। योग्य समय पर वह निवृत्त होता है और उसका स्थान नई पीढ़ी लेती है। यह संस्था-जीवन का सातत्य है और जीवंतता है। दूसरे शब्दों में यह संस्था का जैविक विकास है।
संघ को अभिप्रेत हिन्दू राष्ट्र में लाखों की संख्या में इस प्रकार की स्वतंत्र, स्वायत्त और समाज पर अवलंबित संस्थाएं खडी हों। वे समाज का नियमन करें। समाज के प्रश्न वे समाज को साथ लेकर सुलझाएं। अपने समाज में कोई भूखा न रहे, चिकित्सा सुविधाओें से वंचित न रहे, शिक्षा से वंचित न रहे, कमजोर वर्ग पर अत्याचार न हो, छुआछूत का पालन न हो, सबको सामाजिक सम्मान मिले यह सब देखने की जबाबदारी समाज की है। यह जबाबदारी राजसत्ता पर न डाली जाए। समाज को यदि यह जबाबादारी निबाहनी है तो उसके लिए सक्षम जनशक्ति का निर्माण करना होगा। उसकी संस्थाएं खड़ी होनी चाहिए और उन्हें अपनी-अपनी रुचि के अनुसार अलग-अलग विषय लेकर नि:स्वारर्थ रूप से काम करना चाहिए। संघ का स्वप्न यदि कोई है तो यह है।
सैकड़ों साल की गुलामी और विपरीत विचारों के आक्रमण के कारण हमारा स्वत्व क्या? हमारा अस्तित्व किसमें हैं? इस समय हमें क्या करना चाहिए? यह हम भूल गए हैं। इसीलिए एकत्रित काम करने की आदत समाप्त हो गई है। झगड़े करने में ही हम समय गंवा रहे हैं। संस्था खड़ी करना एवं दो-चार वर्षों में उसमें फूट पैदा करना ऐसा हमारा स्वभाव हो गया है। इस फूट को वैचारिक मुलम्मा चढ़ाने की हमें आदत लग गई है। यह आदत संघ को समाप्त करनी है। हिन्दुओं को एकत्र आना चाहिए। समान उद्देश्यों के लिए काम करना चाहिए। काम में अनुशासन चाहिए, प्रामाणिकता चाहिए, और पारदर्शिता भी चाहिए। संघ ने संघ रूप में मॉडल सबके सामने रखा है। अलग-अलग संस्थाओं को परस्पर पूरक बन कर काम करना सीखना चाहिए। श्रेय लेने के लिए प्रयत्न करने की अपेक्षा उत्तम परिणामों के लिए प्रयत्न होने चाहिए। इस प्रकार का संस्था-जीवन समाज में बड़े पैमाने पर खड़ा करने का कार्य संघ स्वयंसेवक कर रहे हैं।
इस कार्य का एक वैश्विक दृष्टिकोण अत्यंत विस्तार से रखा है। संक्षेप में वह इस प्रकार है-‘‘अधिक से अधिक लोगों का अधिक से अधिक सुख यह हमारा विचार न होकर एक भी मनुष्य और कोई भी प्राणी दु:खी न रहे यह हमारी संकल्पना है। वह प्रत्यक्ष में उतारने हेतु मुझे दूसरों पर प्रेम क्यों करना चाहिए, उनके सुख-दुख में समरस क्यों होना चाहिए इसका उत्तर देना होगा। वह उत्तर हमारे पूर्वजों ने दिया है। संपूर्ण सृष्टि और प्रत्येक प्राणीमात्र में एक परमात्मा का वास है। उसमें उपस्थित आत्मा, ईश्वर, सत्य, वास्तविकता की अनुभूति यही व्यक्ति को अन्यों के सुख के लिए समर्पित करने की प्रेरणा है। ’’ संघ का संपूर्ण प्रयत्न इस प्रकार की अनुभूति हो, ऐसा समाज खड़ा करने की ओर है। संघ संकल्पना का हिन्दू राष्ट्र यह पंथिक उपासना पद्धति पर आधारित ग्रंथिक नहीं है। तू और मैं अलग नहीं। हम दोनों ही एक ही तत्व के आविष्कार हैं। ऐसी अनुभूति महसूस करने वाला समाज खड़ा करना यही संघ का लक्ष्य है। उसे आप स्वप्न कहें या और कुछ; परंतु वह तत्काल साकार नहीं होगा। उसके लिए अनेक पीढ़ियों ने अपने आप को न्योछावर कर दिया और आने वाली अनेक पीढ़ियों को इस कार्य हेतु न्योछावर होना होगा।

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