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गणवेश व्यक्ति को रौबदार व्यक्तित्व देता है, उसमें देशभक्ति की भावना का संचार करता है, कठिनाइयों से जूझने की क्षमता का विकास करता है, समाज की रक्षा का दायित्वबोध देता है इसीलिए इसे पहनने वाला लोगों के सम्मान का पात्र होता है। आखिर रुबाब ही गणवेश की फैशन है।

आम तौर पर देखा जाता है कि व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुसार फैशन करना पसंद करता है। कोई भडकीले रंगों के कपड़े पहना पसंद करता है तो किसी को सफेद या हल्के रंगों कपड़े पसंद होते हैं। कोई कॉटन पहनता है तो कोई रेशमी या सिल्क। कोई पारम्परिक पहनावा पसंद करता है तो कोई रोज बदलने वाले ट्रेंड के हिसाब से चलता है। परंतु एक बात तो सच है कि चाहे कोई भी व्यक्ति हो स्वयं को दूसरों से अलग दिखाने के लिए ही फैशन करता है। और जब सभी लोग एक से कपड़े, गणवेश आदि प्रयोग करने लगे तो वह समूह का अर्थात गण का वेश बन जाता है और यही कहलाता है गणवेश। यह हमें समानता और समरसता की सीख देता है। एक सरीखा गणवेश पहने लोगों के मन में किसी भी प्रकार का भेदभाव न रहे यही गणवेश का मुख्य उद्देश्य है।

गणवेश की भी अपनी अलग पहचान है। विद्यालयीन जीवन शुरू होते ही गणवेश से हमारा नाता जुड़ जाता है। विद्यालय के पहले दिन गणवेश पहने अपने बच्चे को जब माता-पिता देखते हैं तो उनके मन में उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना हिलोरे लेने लगती हैं। अपने माता-पिता तथा परिवार से अलग होकर अपरिचित लोगों के बीच जाने का जो भय नन्हें-मुन्नों के मन में होता है वह तब दूर भाग जाता है जब वह अपने ही जैसे गणवेश पहने अन्य बच्चों को देखता है। फिर न जाने कब यही अपरिचित लोग उसे इतने प्रिय हो जाते हैं कि माता-पिता से दूर जाने का भय उनके मन से गायब हो जाता है।

गणवेश की डिजाइन, उसकी संकल्पना मूलत: उसे पहन कर किए जाने वाले क्रियाकलापों के आधार पर होती है। इसलिए विद्यालयों में भी जिस दिन शारीरिक व्यायाम या खेल आदि कराए जाते हैं तो अलग गणवेश होता है, बाकी दिन अलग गणवेश होता है।

यही संकल्पना समाज के विविध वर्गों पर लागू होती है। फैक्टरी में काम करने वाले मजदूरों का गणवेश उनके द्वारा किए जाने वाले कामों के मुताबिक होता है। उनके हाथ बार-बार मशीन पर चलते हैं। ग्रीस, तेल, स्याही आदि के कारण कई बार हाथ खराब हो जाते हैं। शरीर के विविश अंगों पर भी उसके कारण ये सब लगने की गुंजाइश होती है। अत: फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों को कंधे से पांव तक बंद गणवेश पहनाया जाता है। इसका कपड़ा अमूमन तो कॉटन ही होता है परंतु फैक्टरी के तापमान के हिसाब से उसके कपडे में कुछ बदलाव किए जाते हैं।

गणवेश और सेना तो जैसे एक सिक्के के दो पहलू हैं। भारतीय सेना के तीनों दलों के गणवेश ही उनके प्रति अभिमान और गर्व की पहली सीढ़ी होते हैं। सेना के गणवेश पहने ये लोग जब सामने से गुजरते हैं तो देखने वाले आम नागरिकों का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।

थल सेना में विभिन्न प्रकार के गणवेश हैं जो सैनिकों के पद, मौसम और समारोह के अनुसार होते हैं। ब्लैक कमांडो की गणवेश प्राप्त करने के लिए सैनिकों को अत्यधिक कड़ी मेहनत करनी होती है। कुछ विशिष्ट प्रकार की ट्रेनिंग के बाद ही इन लोगों को यह काला गणवेश दिया जाता है।

सामान्यत: हम सैनिकों को जिस गणवेश में पहचानते हैं वह हरे रंग का ‘जंगल गणवेश’ होता है। यह सैनिकों को जंगलों में पेड़ों की आड़ में रहने में मदद करता है। इसनके अलावा थल सेना में आठ अन्य प्रकार के गणवेश हैं जो उनके अलग-अलग रैंक के आधार पर होती हैं।

भारतीय नौसेना में भी इसी प्रकार के अलग-अलग लगभग दस गणवेश हैं। हालांकि पूर्ण सफेद गणवेश ही सबसे अधिक प्रसिद्ध है। परंतु, इसके अलावा गहरे नीले रंग का कोट पैंट और टाई भी नौसेना के वरिष्ठ अफसरों का गणवेश है।

वायु सेना का भी सबसे प्रसिद्ध गणवेश है आसमानी रंग की शर्ट और गहरे नीले रंग की पैंट। परंतु इन सैनिकों के लिए भी मौसम और प्रसंगों के अनुरूप गणवेश निर्धारित किए गए हैं। जमीन पर काम करते समय ये सैनिक अलग तरह का गणवेश पहनते हैं और फाइटर या अन्य प्लेन उड़ाते समय अलग। पिछले वर्ष पहली बार जब तीन लड़कियां फाइटर पायलट बनी थीं तब से फायटर पायलट का गणवेश लोगों के आकर्षण केन्द्र रहा है।

इसी तरह सेना के इन तीनों दलों को अन्य सुविधाएं जैसे, मेस, चिकित्सा आदि देने वाले स्टाफ का भी गणवेश उतना ही विशेष होता है।

गणवेश की बात हो और पुलिस की वर्दी की बात न की जाए ऐसा तो हो ही नहीं सकता। पुलिस की खाकी वर्दी की शान ही निराली है। किरण बेदी, रविंद्र आंग्रे, विश्वास पाटिल आदि जैसे कई पुलिस अफसरों ने इस वर्दी को एक विशिष्ट मुकाम पर पहुंचाया है या यह भी कहा जा सकता है कि इस वर्दी ने उन्हें एक विशेष मुकाम तक पहुंचाया है। भारतीय फिल्मों में पुलिस की इस वर्दी पर कई फिल्में भी बनी हैं। यहां तक कि पुलिस इंसपेक्टर का किरदार निभाने वाले कई अभिनेताओं को इस वर्दी ने लोगों के दिलों तक पहुंचा दिया।

गणवेश के कारण उत्पन्न होने वाले अनुशासन का कोई सानी नहीं है और सामूहिक रूप से काम करने के लिए अनुशासन अत्यधिक आवश्यक है। यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ.केशव बलिराम हेडगेवार अच्छी तरह से जानते थे। इसीलिए उन्होंने संघ में गणवेश लागू किया। जिस सन 1925 से लेकर अभी तक संघ के गणवेश में कई परिवर्तन हुए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश का सबसे बड़ा गैर सरकारी संगठन है। इसके गणवेश में हुआ परिवर्तन कई दिनों तक चर्चा का विषय रहा है। संघ में सम्पूर्ण खाकी पहनावे के बाद सर्वप्रथम टोपी का रंग बदला गया। दंड को गणवेश में शामिल किया गया। खाकी फुल पैंट हाफ पैंट में परिवर्तित हुई और खाकी शर्ट सफेद शर्ट में। पहले संघ के गणवेश में भूरे रंग का चमड़े का बेल्ट था परंतु हाल ही में दिवंगत हुए जैन मुनि तरुण सागर जी महाराज से हुई चर्चा के बाद इसे बदल कर चमड़े की जगह सिंथेटिक का कर दिया गया। दो वर्ष पूर्व पुन: संघ ने खाकी हाफ पैंट, जो उसकी पहचान बन चुकी थी, को हटाकर पुन: ब्राउन फुल पैंट को गणवेश में शामिल कर दिया। संघ सदैव ही कालानुरूप और आवश्यकता के अनुसार परिवर्तन करने में विश्वास करता है। संघ के गणवेशों में हुए परिवर्तन भी यही इंगित करते हैं।

हमारे देश में ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करना बहुत आम बात है। कई बार तो लोग यह समझ ही नहीं पाते कि उल्लंघन हुआ है; क्योंकि ट्रैफिक के कई नियम उन्हें कभी बताए या सिखाए ही नहीं जाते। परंतु रास्तों पर गाड़ी चलाने वाला हर व्यक्ति यह बखूबी जानता है कि ट्रैफिक पुलिस की वर्दी पहने हुए आगे अगर कोई हवलदार खड़ा है तो उससे बचकर कैसे निकलना है। यह उस वर्दी या गणवेश का ही कमाल है जो लोगों के मन में यह डर पैदा करता है कि अगर नियमों का उल्लंघन किया गया तो दंड जरूर मिलेगा।

उपरोक्त सभी गणवेशों के अलावा ऐसे कई गणवेश हैं जो हमारे समाज के विविध वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जो लोग आधिकारिक रूप से इन्हें नहीं पहन सकते वे भी कुछ परिवर्तन करके अपनी इच्छा को पूर्ण कर लेते हैं।

जंगल गणवेश के नाम से प्रसिद्ध थल सेना की पोषाक जैसे पाजामे, टोपियां, छतरी इत्यादि कई चीजें बाजार में उपलब्ध हैं। गर्मियों में आर्मी कट हेयर स्टाइल रखने का पुरुषों में खासा क्रेज होता है। कई साल पहले तक तो हर बच्चे के पास एक जोड़ी पुलिस या सेना की वर्दी होती ही थी। नकली पिस्तौल को हाथ में लिए मुंह से धांय-धांय की आवाज निकालते हुए बच्चे स्वयं को असली इंस्पेक्टर ही समझते थे।

गणवेश व्यक्ति को रौबदार व्यक्तित्व देता है, उसमें देशभक्ति की भावना का संचार करता है, कठिनाइयों से जूझने की क्षमता का विकास करता है, समाज की रक्षा का दायित्वबोध देता है इसीलिए इसे पहनने वाला लोगों के सम्मान का पात्र होता है। आखिर रुबाब ही गणवेश की फैशन है।

 

 

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