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भारत को आज़ाद हुए आज ६९ वर्ष हो चुके हैं, लेकिन आज भी जनता के पास सड़कें नहीं हैं, रोजगार नहीं है, बिजली नहीं है, शिक्षा की उचित व्यवस्था का अभाव है। स्वास्थ्य व्यवस्था के अभाव में लोगों को असमय काल के ग्रास में समाहित होना पड़ रहा है। गांवों में पंचायती राज व्यवस्था के बाद लोगों में उम्मीदें जागी थीं कि इस व्यवस्था से क्षेत्र के विकास में काफी प्रभाव पड़ेगा, लेकिन आज भी १० से १५ प्रतिशत ग्रामों की व्यवस्था में ही बदलाव आ सका है।
लोकतंत्र में भाग्य विधाता की भूमिका में सिर्फ और सिर्फ जनता होती है और जिस दिन वह पूर्ण रूप से जागरूक हो गई तो विकास को दुनिया की कोई ताकत भी नहीं रोक सकती। आज भी यह यक्ष प्रश्न है कि देश का भला चाहने वाले लोग क्या जनता को संगठित कर चुनावों के प्रति जागरूक कर पाएंगे? क्या भले लोग राजनीति में जाकर राजनीति की गंदगी से दूर रह पाएंगे? क्या अभी हमारे गांव भी बुनियादी सुविधाओं के साथ-साथ शहरों में मिलने वाली तमाम सुविधाओं का लाभ उठा पाएंगे? क्या पलायन करने वाले मजदूरों को अपने घरों में रोजगार उपलब्ध हो पाएगा। ? भारत की चुनाव व्यवस्था में सुधार से ही इन सारी समस्याओं का समाधान हो सकेगा? जब हमारे देश का मतदान प्रतिशत ९५ से १०० प्रतिशत होगा और शतप्रतिशत लोग सरकार के चयन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करेंगे तब हम गांवों को शहर का स्वरूप दे पाएंगे। ग्राम पंचायत चुनावों में भी दलीय व्यवस्था होनी चाहिए। राजनैतिक दलों का इन चुनावों में सीधा हस्तक्षेप नहीं होता। यही वजह है कि ग्राम के पंच, सरपंच और अन्य जनप्रतिनिधियों पर सीधा नियंत्रण ना होने से उन पर समय-समय में भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं। देश की ३० से ४० प्रतिशत पंचायतों में भ्रष्टाचार के आरोपों में जनप्रतिनिधियों को पद से हटाया जाता है।
भारत में आम चुनाव को महापर्व के रूप में देखा जाता है- चाहे चुनाव लोकसभा का हो, विधान सभा या नगर निकाय या फिर ग्राम पंचायतों के। आज़ादी के ७० वर्ष बाद भी हमारे यहां मतदान का प्रतिशत ५० प्रतिशत से अधिक नहीं रहा है। हम यह कह सकते हैं कि ४० से ५० प्रतिशत लोग आज भी अपने मताधिकारों का प्रयोग नहीं करते। लेकिन ४० से ५० प्रतिशत लोग शहरी इलाकों में रहने वाले और पढ़े-लिखे लोग हैं। हम देखते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर या यह कहें कि जब लोकसभा चुनाव होता है तो हमारे देश में मतदान का प्रतिशत काफी कम होता है, लेकिन विधान सभा चुनाव में लोकसभा की अपेक्षा अधिक होता है। जब पंचायत के चुनाव होते हैं तो मतदान का प्रतिशत शतप्रतिशत होता है। आपको मैं यह बताना चाह रहा हूं कि भारत के विकसित और समृद्ध देश होने के बावजूद पढ़े- लिखे लोगों का मतदान प्रतिशत काफी कम है। भारतीय चुनाव की रीढ़ ग्राम व्यवस्थाएं हैं।
दुनिया के अन्य देशों में आम तौर पर पढ़े-लिखे मतदाताओं का प्रतिशत अधिक होता है लेकिन हमारे देश में ठीक इसका उल्टा होता है। ग्रामीणों में मतदान को लेकर काफी उत्साह रहता है पर यह उत्साह जागरूकता की वजह से नहीं होता। आज भी ये लोग एक टाईम पेट भर भोजन, कंबल, चादर, साड़ी और शराब के लिए अपने वोट का उपयोग कहीं भी करने को तैयार रहते है। यह बात मैं नहीं कह रहा हूं, समय-समय पर देश के महत्वपूर्ण संस्थानों के सर्वे इस सत्य को उजागर कर चुके हैं। हमारे देश की ग्रामीण व्यवस्थाओं की आप इस बात से कल्पना कर सकते हैं कि जहां आज आदमी पेट भर भोजन, तन ढांकने को कपड़ा और जीवनयापन के लिए रोजगार से जद्दोजहद कर रहा है वहां क्या शराब, कंबल, साड़ी और पेट भर भोजन कराने के बाद वोट अर्जित करने वाला व्यक्ति विकास कार्यों के साथ-साथ क्षेत्र के सर्वांगीण विकास के लिए कार्य कर पाएगा?
लोकसभा, विधान सभा चुनावों में विजयी प्रत्याशी कितने बार ग्राम की यथार्थ स्थिति को जानने गांवों में जाते हैं? हमेशा सुनने में यह अच्छा लगता है कि भारत गांवों में बसता है। भारत के अधिकांश लोग आज भी कृषि पर निर्भर है। पर वातानुकुलित कक्षों में ग्रामीण भारत की योजना बनाने वाले जमीनी हकीकत जानने क्या ग्रामीणों के पास चुनाव के बाद जाते हैं? ग्रामीणों का जीवन स्तर लगातार घट रहा है और यही वजह है कि आज गांव के गांव खाली होते जा रहे हैं। शहर के आसपास के क्षेत्रों में ग्रामीण परिवेश खत्म होता जा रहा है। ग्रामों की व्यवस्था बेहतर बनाने के उद्देश्य से पंचायती राज व्यवस्था की कल्पना की गई थी। ऐसा नहीं है कि ऐसी कल्पना पहले नहीं की गई हो। अंग्रजों ने भी गांवों को बेहतर बनाने के लिए व्यवस्था अपने शासनकाल में लागू की थी।
ब्रिटिश काल के प्रारम्भ से ही पंचायतें स्थानीय प्रशासन की इकाई थीं किन्तु उन्हें सरकार के नियंत्रण में कार्य करना पड़ता था। जब भारतीय नेताओं ने राष्ट्रीय स्तर पर स्थानीय स्वशासन की मांग की तो ब्रिटिश सरकार ने सबसे निचले स्तर पर, अर्थात प्रारम्भिक स्तर पर स्वशासन की शक्तियां देना शुरू किया। ये स्तर थे, ग्रामीण क्षेत्र में पंचायत और नगर क्षेत्र में नगरपालिका। इनके लिए विभिन्न राज्यों में विभिन्न अधिनियम पारित किए गए, जैसे बंगाल स्थानीय स्वशासन अधिनियम,१८८५; बंगाल ग्रामीण स्वशासन अधिनियम, १९१९, बंगाल नगर पालिका अधिनियम १८८४। भारत में यदि विकेन्द्रीकरण के प्रयासों पर प्रकाश डाला जाए तो ब्रिटिश शासन काल में भी कुछ ऐसे पहलू उजागर होते हैं जो स्थानीय, ग्रामीण शासन को सुदृढ़ करते प्रतीत होते हैं जैसे लॉर्ड रिपिन द्वारा स्थानीय स्वयं सरकार के सुधार से सम्बन्धित प्रयास किए गए। उन्होंने मुख्य तीन पहलुओं पर बल दिया-(१) प्रशासनिक क्षमता का विकास्। (२) राजनीतिक शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार। (३) मानव विकास में वृद्धि करना। इसके साथ ही कई और कमेटियां बनीं जो विकेन्द्रीकरण के सुदृढ़ करने से सम्बंधित थीं जैसे रॉयल कमीशन ऑफ द डिसेंट्रलाइजेशन। परन्तु ब्रिटिश शासन द्वारा ये सभी प्रयास असफल रहे, क्योंकि उसने सभी पदसोपानीय प्रशासनिक संरचना पर बल दिया।
देश में स्वतंत्रता के बाद ग्रामीण विकास की दिशा में सर्वप्रथम २ अक्टूबर १९५२ को भारतीय शासन ने सामुदायिक विकास कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इसके पश्चात् ग्रामीण भारत में निवास कर रहे गरीबों की समस्याओं का अध्ययन करने व पंचायती राज पर विचार के लिए १९५७ में बलवंत राय मेहता समिति का गठन किया गया। नवम्बर १९५७ में इस समिति की सिफारिशों को स्वीकृती प्रदान करते हुए पंचायती राज रखा गया। स्वतंत्रता के पश्चात् पंचायती राज की स्थापना को लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण की अवधारणा को साकार करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। सर्वप्रथम राजस्थान को पंचायती राज स्थापना करने वाले प्रथम राज्य का गौरव प्राप्त हुआ। परन्तु पंचायती राज शासन का सम्पूर्ण व सुचारू क्रियान्वयन न होने के कारण समस्याएं उभरने लगीं। इस तरह जितनी तेजी और उत्साह के साथ राज्यों में पंचायतों की स्थापना हुई थी उसी तेजी से कुछ ही दिनों बाद इनका पतन प्रारम्भ हो गया। स्थानीय एम.एल.ए. तथा राज्य स्तर के नेताओं ने पंचायती संस्थाओं के प्रतिनिधियों को भविष्य के लिए अपना राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी महसूस किया। दूसरी ओर प्रशासकीय कर्मचारियों को भी जन-प्रतिनिधियों की अधीनता में कार्य करना अच्छा नहीं लगा। पंचायतों पर जातिवाद, भ्रष्टाचार, पक्षपात, अकुशलता आदि के आरोप लगाए जाने लगे। पंचायतों के आर्थिक संसाधनों के अभाव, ग्रामीण जनता की उदासीनता, सरकारी पदाधिकारियों का असहयोग, राज्य सरकारों की निष्क्रियता आदि कारणों ने पंचायती व्यवस्था को निष्प्रभावी बना दिया। बहुत से राज्यों में वर्षों तक पंचायतों के चुनाव नहीं कराए गए। दलीय कारणों से पंचायतों का अतिक्रमण किया गया। १९६५ से लगभग दो दशकों तक पंचायती संस्थाएं अव्यवस्था का शिकार रहीं। इस सब का परिणाम यह हुआ कि पंचायती राज संस्थाएं जैसे आस्तित्वहीन हो गईं।
१९९१ में हुए चुनाव के बाद सत्ता में आई कांग्रेस की राव सरकार ने १६ सितंबर १९९१ में संविधान का ७२वां संशोधन विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया। उक्त विधेयक को संसद के दोनों सदनों की एक ३० सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति को निर्दिष्ट कर दिया गया। इस समिति ने जुलाई १९९२ में अपना प्रतिवेदन संसद को प्रस्तुत किया। २२ दिसम्बर १९९२ को लोकसभा ने उसे पास कर दिया। लगभग चार महीनों में १७ राज्यों द्वारा इस विधेयक को अनुमोदित किया गया। अंततोगत्वा २० अप्रैल १९९३ को इसे राष्ट्रपति ने स्वीकृती प्रदान की और २४ अप्रैल १९९३ को संविधान के ७३वें संशोधन अधिनियम के रूप में इसे लागू किया गया।
राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात और छत्तीसगढ़ में पंचायती राज की त्रिस्तरीय व्यवस्था है। सब से ऊपरी स्तर पर जिला परिषद (जिला स्तर पर), पंचायत समिति (ब्लॉक स्तर पर), पंचायत (ग्राम स्तर पर)। यह पंचायती राज्य व्यवस्था भारतीय संविधान के द्वारा सभी राज्यों में लागू की गई है। राजस्थान में प्रथम पंचायत चुनाव १९६० में हुए थे। उसी के अंतर्गत राजस्थान में १९९५ से नियमित ५ साल के अंतराल पर पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव करवाए जाते हैं। इस प्रकार यह पंचायती राज संस्थाओं का १०वां चुनाव था। परंतु इस बार प्रदेश की भाजपा सरकार ने चुने जाने वाले जनप्रतिनिधियों के लिए जिला परिषद व पंचायत समिति के सदस्यों के लिए १०वीं पास व पंचायतों के सदस्य (वार्ड पंच) व सरपंच के लिए ८वीं पास होना जरूरी कर दिया है। राजस्थान जैसे पिछड़े प्रदेशों में जहां साक्षरता राष्ट्रीय औसत से भी कम है, जहां राष्ट्रीय औसत साक्षरता का ७४.०४ प्रतिशत है वहीं राजस्थान में यह ६७.०१ प्रतिशत है और १०वीं व ८वीं पास तो और भी कम ग्रामीण आबादी है। इस तरह एक बहुत बड़ी आबादी को इन शैक्षणिक योग्यता के नियमों की आड़ में सीधे-सीधे चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया गया।
इन संस्थानों में अभी भी ग्रामीण जनता का विश्वास बना हुआ है। इसलिए इन चुनावों में मत प्रतिशत भी लोकसभा व विधान सभा चुनावों की तुलना में अधिक होता है। इसका प्रमुख कारण तृणमूल स्तर पर इन संस्थाओं के पास स्थानीय स्तर के बहुत से काम होते हैं जिनमें मनरेगा जैसी कल्याणकारी योजनाओं को लागू करना भी होता है। दूसरा जो आदमी सरपंच चुना जाता है वह उनके गांव का ही आदमी होता है। उस तक उनकी पहुंच आसान होती है। लेकिन इन पंचायती राज संस्थाओं से आम गरीब व मेहनतकश जनता को वस्तुत: कुछ भी हासिल नहीं हुआ है और ना ही उन्हें सत्ता में कोई भागीदारी मिली है। लेकिन इससे कुलकों व धनी किसानों की सत्ता में हिस्सेदारी बढ़ी है। इस पूंजीवादी व्यवस्था में उनकी छोटे हिस्सेदार के रूप में ही सही लेकिन भागीदारी सुनिश्चित हो गई। इस प्रकार इस व्यवस्था के सामाजिक आधारों का विस्तार ही हुआ है।
आरक्षण से जो दलित या महिला चुन कर आती है वह भी मुख्यत: भ्रष्ट तरीकों से पैसे कमाने पर ध्यान देते हैं। आम दलित आबादी व आम महिलाओं का उनसे कोई सरोकार नहीं होता है। महिलाएं भी अधिकतर प्रभावशाली परिवारों व धनी किसानों या कुलकों के परिवारों से आती हैं और महिला सरपंच भी नाममात्र की सरपंच होती हैं। सरपंच के सारे कार्य तो उनके पति ही करते हैं। इसलिए गांवों में एक नया नाम चलन में आया है सरपंच पति। जो दलित चुन कर आते हैं वे भी प्रभावशाली जातियों के ही लिए काम करते हैं। यहां तक कि किसी गांव में दलित सरपंच रहते हुए भी दलित उत्पीड़न की घटना हो जाती है तो कोई बड़ी बात नहीं है। अब दलित उत्पीड़न में मुख्य हाथ सवर्णों के स्थान पर मध्य किसानी जातियों का है जिनमें जाट, गुर्जर, यादव, माली आदि प्रमुख हैं। क्योंकि इन जातियों से नव धनिक वर्ग व धनी किसानों का वर्ग आता है। अब इनकी राजनैतिक आकांक्षाएं भी बढ़ी हैं। पंचायती राज ने इनकी राजनैतिक आकांक्षाओं को संतुष्ट करने का काम किया है।
अब सवाल यह है कि वर्तमान पंचायत राज व्यवस्था का विकल्प क्या हो? आज की जो सरकारी पंचायतें हैं वे तो जनता की पंचायतों का स्थान तो ले ही नहीं सकतीं। बल्कि ये तो वे ही पंचायतें हो सकती हैं जो क्रांतिकारी तरीके से गठित हों और उनमें शोषक वर्गों की कोई भागीदारी ना हो। जिनमें गऱीब किसानों व खेतिहर मज़दूरों व दूसरे मेहनतकशों का पूरा प्रतिनिधित्व हो। ये पंचायतें ही आगे चल कर सत्ता का वास्तविक केन्द्र बनेंगी। यह ऐसी व्यवस्था तभी सम्भव है जिसमें उत्पादन के साधनों पर सम्पूर्ण जनता का स्वामित्व हो व राजकाज की व्यवस्था सार्विक मताधिकार से चुने हुए जनप्रतिनिधियों के हाथ में हो जिन्हें कभी भी वापस बुलाने का अधिकार हो। ऐसा क्रांतिकारी लोक स्वराज्य पंचायतों में ही सम्भव है, जो आगे चल कर सत्ता का वास्तविक केन्द्र बनेंगी।

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