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मिट्टी की महिमा मिटने में, मिट मिट हर बार संवारती है
मिट्टी मिट्टी को रचती है, मिट्टी हर बार संवरती है
मिट्टी में स्वर है संयम है, होनी अनहोनी कह जाए
हंसकर हलाहल पी जाए,छाती पर सब कुछ सहजाए।
-शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
यदि कविवर शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की इस कविता में हम मिट्टी के रूपक को गांव के प्रतीक में ले तो हमें गांवों विशेषतः भारतीय गांवों की विलक्षणता स्पष्ट ही प्रकट हो जाएगी।
इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत का उदय तब ही हो सकता है जब ग्रामों का उदय हो अर्थात ग्रामों का सर्वांगीण विकास हो। वर्तमान परिस्थितियों में भारत में ग्रामों का सर्वांगीण व चहुंमुखी विकास एक स्वप्न बन चुका है। यदि हमें भारत को सच्चे अर्थों में इक्कीसवीं में ले जाना है तो ग्रामोदय अर्थात ग्राम विकास के नए आयामों को खोजना व उन तक पहुंचना होगा। भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार कृषि और भारत के ग्राम है यह तथ्य एक सुस्थापित तथ्य है। गांव और कृषि पर हमारी निर्भरता इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि भारत की लगभग ७०% जनसंख्या ग्रामों में निवास करती है। यदि भारत का आकलन करना हो या मूल्यांकन करना हो तो यह कार्य गांवों से ही प्रारम्भ होगा। अत: भारतवर्ष के महत्व का वास्तविक मूल्यांकन यहां के गांवों से ही संभव है। संभवतः यही कारण था कि महात्मा गांधी ने लिखा – ‘‘सच्चा लोकतंत्र केन्द्र में बैठे हुए २० आदमी नहीं चला सकते। वह तो नीचे हर गांव के लोगों द्वारा चलाया जाना चाहिए ताकि सत्ता के केन्द्रबिन्दु जो इस समय दिल्ली, कोलकाता या बम्बई जैसे बड़े शहरों में हैं, मैं उसे भारत के ७ लाख गांवों में बांटना चाहूंगा। ’’ महात्मा गांधी का यह कथन भारतीय परिप्रेक्ष्य में ग्रामों के महत्व को भलीभांति प्रकट करता है। इस तथ्य को प्राचीन व मध्यकालीन भारत ने समझा भी था और यहां गांवों का महत्व सुस्थापित भी था किन्तु अंग्रेजों के शासन काल में भारतीय ग्रामों की ओर से शासन व्यवस्था का ध्यान हट गया था। अंग्रेज भारत को केवल व्यवसाय व शोषण की दृष्टि से देखते थे अतः उन्होंने केवल नगरों व समृद्ध क्षेत्रों पर ध्यान केन्द्रित किया व भारतीय ग्राम इकाई की घनघोर उपेक्षा की। अंग्रेजों के शोषण कारी रवैये के कारण से भारतीय ग्रामों के कुटीर, लघु, घरेलू उद्योग व कृषि व्यवस्था का ढांचा ढह कर ध्वस्त हो गया व ग्रामीण अर्थव्यवस्था पंगु होती चली गई। इसे विडंबना ही कहा जाना चाहिए कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी भारत की शासन व्यवस्था पूर्णतः अंग्रेजों के दृष्टिकोण से ही चलती रही फलस्वरूप भारतीय ग्राम स्वतंत्रता के पश्चात भी उपेक्षित के उपेक्षित ही रहे। अब जबकि भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र तो है ही वह गांवों के महत्व को भी भलीभांति समझ गया है एवं सैकड़ों ऐसी योजनाएं व कार्यक्रम चला रहा है जिससे ग्राम इकाई पुष्ट हो सके तब आवश्यक है कि हम स्थिति का सटीक आकलन करें। सैकड़ों योजनाओं व कार्यक्रमों के लागू होने के पश्चात भी गांवों का उपेक्षित रहना एक षड्यंत्र का ही संकेत करता है। अधिकांश ग्रामों व ग्रामीणों की स्थिति यह है कि उन्हें अपने लिए चलाई जा रही केंद्र व राज्य सरकारों की सैकड़ों हजारों करोड़ की योजनाओं की जानकारी ही नहीं है। ऐसी परिस्थिति में सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह है कि ग्रामीण जन सूचना संपन्न हो सके व तेज संचार माध्यमों का उपयोग कर सके व ऐसे साधनों की समझ विकसित कर सकें। कई सारी शासकीय योजनाओं के माध्यम से जहां ग्राम विकसित होने चाहिए थे वहीं भारतीय ग्राम बेरोजगारी, अज्ञानता, पिछड़ेपन व गरीबी का पर्याय बन कर रह गए हैं। भारतीय ग्राम संचार साधनों व शिक्षा के भाव में रूढ़िवादी व अंधविश्वासों से ग्रसित बने रहे। भारतीय ग्राम स्वतंत्रता के सत्तर वर्षों बाद आज भी विकास की मुख्य धारा से कटे हुए हैं। अशिक्षा, गरीबी, रूढ़िवादिता, अंधविश्वास के कारण आज भी भारतीय ग्रामीण महाजनों के कर्ज से दबा रहता है व बैंकिंग प्रणाली का लाभ नहीं उठा पाता है। अशिक्षा का कारण ही है कि जनसंख्या वृद्धि दर के क्षेत्र में भी ग्रामों की वृद्धि दर नगरों के अपेक्षा अधिक रहती है।
यह तथ्य सम्पूर्ण भारत को स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि यदि भारत का विकास करना है, भारत उदय करना है तो विकास का मार्ग भारतीय ग्रामों से गुजरता हुआ ही आएगा अर्थात ग्रामोदय के मार्ग से ही आएगा। वर्तमान दौर में भारतीय शासन व्यवस्था को यह बात ध्यान रखनी होगी कि ग्रामीण क्षेत्र के विकास के लिए जब भी कोई योजना तैयार की जाए या अमल में लाई जाए तो सबसे पहले योजना के महत्व के बारे में ग्राम पंचायतों को विस्तार से जानकारी दे कर जागरूक किया जाए और योजना को सफल बनाने के लिए पूरा दायित्व ग्राम पंचायतों को ही सौंपा जाए। शिक्षण केन्द्रों का ग्राम स्तर पर न खुलना भी भारतीय ग्रामों के पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण है। गांवों की एक बड़ी समस्या बिजली कमी है। पर्याप्त बिजली न मिल पाने से ग्रामीण कई तरह की समस्याओं का सामना करते हैं व सामाजिक, शैक्षणिक व आर्थिक दृष्टि से पिछड़ते जाते हैं। आवागमन के साधनों के संदर्भ में भी यही स्थिति है। आवागमन के साधन जहां अतीव कम हैं वहीं सड़के दुर्गति की भेंट चढ़ गई हैं। गावों को अगर सड़क, स्वास्थ्य, बिजली, शिक्षा और पानी की समस्याओं से आज मुक्ति दिला दी जाए तो भारतीय ग्राम आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व शैक्षणिक क्षेत्र में तेजी से बढ़त बना सकते हैं।
२०११ जनगणना के मुताबिक देश में कुल २४.३९ करोड़ परिवार हैं जिनमें से १७.९१ करोड़ परिवार गांवों में रहते हैं। इनमें से हर तीसरा परिवार भूमिहीन है और आजीविका के लिए शारीरिक श्रम पर निर्भर है। आय के स्रोत के लिहाज से ९.१६ करोड़ परिवार दिहाड़ी मजदूरी करते हैं और खेती करके ३०.१० प्रतिशत परिवार अपना गुजर- बसर करते हैं। इन सबके बाद भी भारत दुनिया में तेज आर्थिक विकास करने वाला देश है, किंतु इस विकास का लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल पा रहा है। इसका प्रभाव ग्राम विकास पर भी पड़ा है, जो कि पिछले वर्षों में सतत धीमा हुआ है। भारतीय ग्रामों में सामाजिक चुनौतियां लगातार बनी हुई हैं और गरीबी निरंतर बढ़ रही है। अभी तक जितनी भी ग्रामीण विकास आधारित योजनाएं आई हैं वे धरातल पर आशानुरूप सफल नहीं हो पाई हैं। कारण यह है कि भले ही योजना गांव और ग्रामीणों के लिए बनी हो पर उनकी परिस्थितियों को ध्यान में रख कर नहीं बनी हैं। योजनाकारों का ग्रामीण परिस्थितियों का पूर्णतः जानकार न होना व उनका जमीन से न जुड़ा होना इन योजनाओं के विफल होने का एक बड़ा कारण है। ग्रामीणों पर आधारित योजनाओं को दीर्घकालीन एवं ज़मीनी परिस्थितियों के अनुसार बनाना पड़ेगा ताकि आसानी से ग्रामीण इन योजनाओं का लाभ उठा सकें। ग्रामोदय से भारत उदय तभी हो पाएगा जब ग्रामीण जन नई तकनीक से परिचित हो पाएंगे व उसे उपयोग कर पाएंगे। ग्रामों के लिए बनाई नई लाभकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए, बाजार में अपने उत्पादनों को उचित दामों में बेचने के लिए और विकास के हर आयाम पर पहुंचने के लिए शिक्षा की सर्वाधिक आवश्यकता है। स्पष्ट है कि यदि हम भारत उदय चाहते हैं तो हमें ग्रामोदय के महत्वपूर्ण मार्ग पर चलना ही होगा।

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