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जब बुद्धिजीवी यह कहते हैं कि भारत ग्रामों में बसा है तो उनके कहने का अर्थ यह होता है कि भारत का तीन चौथाई भाग ग्रामों मे बसा है। बल्कि इसके साथ-साथ वे ये भी मानते हैं कि भारतीय समाज और सभ्यता के मौलिक मूल्य ग्रामों मे संरक्षित हैं जहां से इन्हें शहरों और कस्बों की ओर संचारित किया जाता है। ग्रामीण समाज को पारंपरिक रीति-रिवाजों और लोक शैलियों का खजाना माना जाता है। इससे पारंपरिक संस्कृति का संरक्षण होता है। जब तक भारतीय ग्रामों को न समझ लिया जाए तब तक भारत की आत्मा को नहीं समझा जा सकता।
भारतीय ग्रामों के विषय में आम राय है कि मिट्टी और छप्पर से बने हुए घरों में रहने वाले विविध जतियों के लोग जिन्हें रोटी कमाने के लिए बहुत अधिक जद्दोजहद करनी पड़ती है। यद्यपि ग्रामों में गरीबी, भुखमरी, कुपोषण इत्यादि समग्र रूप से फैली हुई है। इन सबके पीछे एक ही कारण है वह है अशिक्षा। प्रायः समाज को अग्रसर बनाने में शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों के विषय में यह कथन पूर्णरुपेण लागू नहीं है।
ज्यादातर देखा जाता है कि ग्रामीण समाज परंपराबद्ध होता है। वहां तमाम लोकलाज संबंधी परम्पराएं प्रचलन मे होती हैं, जिन्हें निभाना हर ग्रामवासी के लिए आवशयक है। वरन उसे समाज से बहिष्कृत मान लिया जाता है या कर दिया जाता है।
आज जब हमारा देश विकास की ओर बढ़ रहा है तब ऐसे में हमारा आधा भारत जो गांवों में बसा है अछूता नहीं रहना चाहिए और विकास की रौशनी वहां भी पहुंचनी चाहिए। कुछ हद तक वह पहुंची भी है, क्योंकि आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए साक्षरता एक महत्वपूर्ण प्रेरक बल है। यह एक ऐसा शक्तिशाली साधन है जो जन्म दर को नियंत्रित करता है, जिससे उत्पन्न होने वाला दबाव कम होता है।
हमारे संविधान में प्राथमिक शिक्षा के सर्वव्यापीकरण से संबन्धित निम्नलिखित राज्यनीति के सिद्धान्त का उल्लेख किया गया है- राज्य इस संविधान के लागू होने के दस वर्ष कालावधि के भीतर चौदह वर्ष तक के आयु वाले सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रयास करेगा। सामाजिक, आर्थिक और जाति जनगणना (एस.ई.सी.सी.) द्वारा जारी ताजा रिपोर्ट में कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत के ग्रामीण इलाकों की ८६ मिलियन से भी अधिक जनता निरक्षर है।
साल २०११ में एस.ई.सी.सी. ने देश के ग्रामीण क्षेत्रों में ३१५.७ मिलियन लोगों को निरक्षर पाया है। ये आकंड़ें साल २०११ के जनगणना आकंड़ों से एवं दुनिया के किसी भी देश में निरक्षरों की संख्या से सबसे अधिक है।
देखा जाए तो एक तरह से ग्रामीण भारत में निरक्षरों की संख्या इंडोनेशिया की पूरी आबादी से भी ज़्यादा है जोकि दुनिया का चौथा सबसे अधिक आबादी वाला देश है। वहीं पाकिस्तान की जनसंख्या की तुलना में निरक्षर ग्रामीण भारतीयों की संख्या दोगुनी पायी गई है।
सामाजिक, आर्थिक और जाति जनगणना द्वारा रिपोर्ट जारी की गई है। एस.ई.सी.सी. के सर्वेक्षण में आम जनगणना से भी अधिक लोगों को लिया गया। एस.ई.सी.सी. के मुताबिक देश के ग्रामीण क्षेत्रों की लगभग ३५.७३ फीसदी जनता निरक्षर है जबकि २०११ जनगणना में ये आकंड़ें ३२.२३ फीसदी दर्ज किए गए थे।
नए आकंड़ों से ग्रामीण भारत में सक्षरता के निम्न स्तर का भी पता चलता है।
‘साक्षर’लोगों के भी लिए पढ़ना लिखना मुश्किल है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों की ‘साक्षर’ जनता में से कम से कम १४ फीसदी ( १२३ मिलियन ) लोग पांचवीं कक्षा तक भी नहीं पढ़े हैं जबकि लगभग १८ फीसदी ( १५७ मिलियन ) लोगों ने या तो प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की है या केवल कक्षा पांच तक पढ़े हैं।
भारत में शिक्षा का स्तर असली ज्ञान को नहीं दर्शाता है। ग्रामीण भारत की २८० मिलियन आबादी केवल नाममात्र की ही साक्षर हैं। पिछले चार सालों में इन आकंड़ों में ५ फीसदी की और कमी देखी गई है। अगर बात गणित की करें तो कक्षा तीसरी के एक चौथाई छात्र १० से ९९ संख्या की पहचान ठीक से नहीं कर पाते। पिछले तीन सालों में इन आकंड़ों में १३ फीसदी की कमी हुई है। ये आंकड़ें ग्रामीण भारत की स्कूली शिक्षा पर काम करने वाली गैर सरकारी संस्था प्रथम एजुकेशन फाउंंडेशन ए.एस.ए.आर(एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट) ने जारी किए हैं। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में केवल ३ फीसदी (तीन मिलियन) लोगों ने स्नातक या उच्च स्तर शिक्षा प्राप्त की है।
रिपोर्ट के मुताबिक मध्य भारत में निरक्षरता दर सबसे अधिक, ३९.२० फीसदी पाई गई है। देश के पूर्वी इलाकों में ये आकंड़ें ३८.७९ फीसदी दर्ज किए गए जबकि पश्चिमी क्षेत्रों में ये आकंड़ें ३५.१५ फीसदी रहे। उत्तर भारत में ३२.८७ फीसदी, उत्तर पूर्वी इलाकों में ३०.२ फीसदी एवं दक्षिण भारत में २९.६४ फीसदी दर्ज किए गए हैं।
केंद्र शासित प्रदेशों में शिक्षा दर सबसे बेहतर पाई गई है। इन इलाकों में कुल आबादी की केवल १५ फीसदी जनता निरक्षर पाई गई है। राजस्थान में साक्षरता दर का सबसे बुरा प्रदर्शन देखा गया है। राजस्थान में ये आकंड़ें ४७.५८ फीसदी (२५.८८ मिलियन लोग) दर्ज की गई है। मध्य प्रदेश की हालत कुछ ठीक नहीं है। यहां ये आकंड़ें ४४.१९ फीसदी (२२..८० मिलियन लोग) दर्ज किए गए हैं। इन दो राज्यों के बाद सक्षरता दर की खराब स्थिति बिहार की है। बिहार में ये आकंड़ें ४३.८५ फीसदी (४२.८९ मिलियन लोग) हैं जबकि तेलंगना में ये आकंड़ें ४०.४२ फीसदी (९.५ मिलियन लोग) हैं। दक्षिण भारत के तेलंगना एवं आंध्र प्रदेश का देश के टॉप दस निरक्षर राज्यों में नाम होना एक चौंकाने वाली बात है। केंद्र शासित प्रदेशों में दादरा एवं नगर हवेली में निरक्षरता दर सबसे अधिक ३६.२९ फीसदी दर्ज की गई है ।
जमीनी स्तर पर विद्यालयी सुविधाओं के सही योजना बनाने तथा देश के सभी क्षेत्रों में समान विकास सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार समय-समय पर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अखिल भारतीय शिक्षा सर्वेक्षण कराती रहती है। किन्तु क्या पूरी सच्चाई सामने आ पाती है।
शिक्षा का यह अर्थ कदापि नहीं कि जन मानस को अक्षर ज्ञान करा दिया जाए और सरकारी कागजों में खानापूर्ति करा दी जाए। शिक्षा का अर्थ यह भी होना चाहिए कि जनता कम से कम अपने देश के विषय में पूरी तरह परिचित हो, देश के क़ानूनों, और बनाई जा रही योजनाओ से परिचित हो। कौन सी सुविधाएं उनके लिए सरकार प्रदान करा रही है यह भी उन्हें समय-समय पर बताया जाना चाहिए, जो आम जनता का हक़ है ।
कुछ मुद्दें जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए-
१) कृषि के समुचित और नवीन तकनीकों की जानकारी नहीं होने के करण फसलों पर असर देखा जा सकता है, जिसकी जानकारी होना अति आवश्यक है।

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