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भारत गांवों में बसता है। इसका अर्थ केवल इतना मात्र नहीं कि देश की ७२ प्रतिशत आबादी देहातों में रहती है। अपितु ग्रामों में भारतीय जीवन मूल्य आज भी विद्यमान हैं।
ग्राम विकास का काम नया नहीं है। आज़ादी पाने के पूर्व भी कई वर्षों से यह कार्य होता रहा है। अनेक निष्ठावान और विद्वान लोगों ने अपना पूरा जीवन इस कार्य में खपा दिया था। आज़ादी पाने के बाद भी सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर ग्राम विकास के कार्य हो रहे हैं। अतः हमें इस दिशा में आगे बढ़ते समय इस क्षेत्र के आज तक के अनुभवों का अध्ययन करना होगा और निम्नलिखित बातों को आधार बनाकर विकास की दिशा प्रस्तुत करनी होगीः-
१. अनन्त काल से अखण्ड रूप से चले आ रहे ग्रामीण जीवन में ऐसी मौलिकताएं अवश्य होंगी जो वर्तमान काल में भी सम्पूर्ण समाज के लिए (ग्रामीण और शहरी) उपयोगी हो सकती हैं। उनकी खोज करना तथा उनका राष्ट्र की नवरचना में समुचित उपयोग करना होगा।
२. ग्रामीण परिसर में रहने वाले लोग निरक्षर हो सकते हैं, किन्तु उन्हें सर्वथा अशिक्षित मानना गलत होगा। उनमें से अनेक में विचारशक्ति, योजकवृत्ति तथा प्रतिभा है। उनके उपयोग की समुचित विधि अपनाए बिना ग्रामीण जीवन आत्मनिर्भर नहीं बनेगा।
३. ग्राम विकास में स्थानीय महिलाओं व पुरुषों में नानाजी देशमुख के सक्रिय सहकार का रूप विकसित करना होगा।
४. ग्रामों के विकास का अर्थ ग्रामों का शहरीकरण करना नहीं हो सकता। वर्तमान शहर पाश्चात्य औद्योगिक सभ्यता के प्रतिबिंब मात्र हैं। उनमें भी भारतीय जीवन मूल्यों की पुनर्प्रतिष्ठा करने का काम ग्राम विकास के माध्यम से ही सम्भव होगा।
५. केवल आर्थिक विकास या भौतिक समृद्धि में ही ग्राम विकास की इतिश्री नहीं है। मानव एकात्म प्राणी है। उसमें भारत गांवों में बसता है। इसका अर्थ केवल इतना मात्र नहीं कि देश के एवं सामाजिक जीवन में परस्पर सहयोग निर्माण करना अनिवार्य है। सामाजिक अस्तित्व एवं स्वस्थ सामाजिक जीवन की यह प्राथमिकता है। इस संतुलित जीवन को विकसित करना ग्राम विकास की विशेषता होगी।
६. पुरातन एवं नूतन पीढ़ी में परस्पर सद्भावना व सामंजस्य बनाए रखना अति आवश्यक है। उसके बिना परम्परागत जीवन के स्थायी मूल्यों को कायम रखना संभव नहीं होगा।
स्वाधीनता आई, भारत गणतंत्र बना, किन्तु ग्रामों की स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया। गांवों में रहने वाले करोड़ों व्यक्तियों को आज भी पीने का पानी, स्वास्थ्य की सुविधाएं, प्राथमिक विद्यालय एवं दोनों समय भरपेट भोजन तक उपलब्ध नहीं है। आश्चर्य की बात तो यह है कि बड़े पैमाने पर किए गए सरकारी प्रयासों एवं स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रयत्नों के बाद भी स्थिति में बदलाव उस गति से नहीं आ रहा है जिसकी अपेक्षा की जाती है। मुझे बाबू जयप्रकाश नारायण के साथ गांवों में जाने एवं ग्रामीणों के सुख-दुःख को निकट से देखने का अवसर मिला। मेरे मस्तिष्क में यह प्रश्न बार-बार उठता था कि बड़े-बड़े समाजसेवियों के ग्रामीण पुनरुत्थान के प्रयासों का सकारात्मक परिणाम क्यों नहीं निकला? इस विषय में मैंने जब अध्ययन किया तो यह अनुभव हुआ कि सरकार एवं अन्य समाजसेवियों ने सिर्फ ग्रामीणों के आर्थिक विकास की दृष्टि से ही अधिक विचार किया था। मेरा व्यावहारिक अनुभव यह रहा है कि केवल आर्थिक विकास से समयानुकूल सामाजिक प्रवृत्ति विकसित नहीं होती। ऐसे में प्रत्येक व्यक्ति मात्र अपने आर्थिक विकास की होड़ में लग जाता है। जब ऐसा किया जाता है तो स्वावलम्बन और स्वाभिमान की भावना नहीं पनपती है। आज ग्रामीण विकास की उस परम्परागत अवधारणा को बदलने की नितांत आवश्यकता है, जिसमें सिर्फ आर्थिक विकास पर ही बल दिया जाता है। हमें ग्रामीण विकास
में ग्रामों की समूची सामाजिक पुनर्रचना, जिसमें सांस्कृतिक और आर्थिक पुनर्रचना भी सम्मिलित हो, पर ध्यान देना चाहिए।
दूसरे शब्दों में अपने आधारभूत परम्परागत जीवन मूल्यों को कायम रखते हुए सम्पूर्ण जीवन को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में परिवर्तित करने और उस दृष्टि से प्रयोग करने की आवश्यकता है।
ग्रामों के उत्थान के लिए हमारी दृष्टि नई पीढ़ी पर है। हम युवा शक्ति को इस कार्य की तरफ मोड़ कर ग्राम विकास के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। शिक्षित युवक-युवतियों को हमने कार्यकर्ता के रूप में लगाया। हम यह मानते हैं कि सामाजिक पुनर्रचना में जितना योगदान पुरुष दे सकते हैं, ठीक उतना ही योगदान महिलाएं भी दे सकती हैं। हमने इस दिशा में प्रयोग प्रारम्भ किया और नवविवाहित दम्पतियों को सामाजिक कार्य के लिए प्रेरित किया। जब पति-पत्नी दोनों समर्पित भाव के होते हैं तो समाज सेवा का कार्य सरलता से किया जा सकता है। ऐसे परिवार के बच्चे भी प्रारम्भ से ही सामाजिक कार्यों में रुचि लेने लगते हैं। आज गांवों में विकास के जो साधन उपलब्ध भी हैं, गांव वाले उनका उपयोग नहीं कर पाते हैं। हमने सर्वप्रथम प्रयास किया कि लोगों में जागरूकता उत्पन्न करके उन्हें विचारशील बनाया जाए। सरकार छोटी-छोटी विभिन्न परियोजनाओं के लिए ॠण देती है। लेकिन ग्रामीणों को इस बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं होती है। ॠण का फार्म कहां से मिलता है? कहां जमा होता है? इस सम्बंध में अन्य क्या औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं, यह सारी जानकारी उन्हें हम उपलब्ध कराते हैं। ॠण एवं अन्य सुविधाओं को पाने में कहीं पर भी ग्रामीणों का शोषण न हो, यह भी हम देखते हैं। सरकार कर्ज एवं सुविधाएं देती हैं, ग्रामीण उन सुविधाओं का सही प्रकार से उपयोग करते हैं। हम तो सिर्फ प्रेरणा देते हैं। हम अपने पास से धन नहीं देते हैं।
आज की मुख्य समस्या देश में उत्तम जीवन दर्शन का अभाव नहीं है। हमारे पास विश्व का सर्वोत्तम दर्शन है। स्थान-स्थान पर रामायण, महाभारत और गीता आदि धर्मग्रंथों का पठन-पाठन चलता रहता है। ये सिर्फ धर्मग्रंथ ही नहीं हैं, बल्कि इनमें भारत का वास्तविक दर्शन है। किन्तु आज दैनिक जीवन के कार्यों से इस दर्शन का कोई सम्बंध नहीं है। लोग उपदेश देते हैं, साधारण व्यक्ति सुन लेते हैं। न उपदेशक और न श्रोता ही इस दर्शन को जीवन में उतारने का प्रयास करता है।
आज़ादी के बाद आम जनता में एक अजीब प्रवृत्ति ने जन्म लिया। प्रत्येक व्यक्ति यह सोचने लगा कि समाज के लिए उपयोगी काम करने का दायित्व सरकार का है। सिर्फ सत्ता में रह कर ही समाज के लिए कुछ किया जा सकता है। जबकि आज़ादी से पहले पूरी लड़ाई सर्वसाधारण जनता ने अपने बल पर लड़ी थी। आत्मनिर्भरता या स्वावलम्बन की भावना बहुत कम हो गई है। जिस समाज में दूसरों पर निर्भर रहने की प्रवृत्ति होती है, वह कभी विकसित नहीं हो सकता है।

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