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शहरी जनजीवन में नित-नए प्रयोग के चलते फैशन के जो अलग-अलग रंग दिखने लगे, उसमें इन वनवासियों के जीवन से जुड़े परिधान व गहने भी शरीक कर लिए गए हैं। वनवासी बालाएं भी संजने-संवरने में उतनी ही उत्सुक होती हैं, जितनी की शहरी बालाएं।

दूनिया के किसी भी कोने में चले जाएं, जहां मनुष्य सभ्यता का थोड़ा भी विकास हुआ है, वहां अपने-अपने ढंग का फैशन जरूर मिल जाएगा। ये केवल कपड़ों तक सीमित ना होकर शरीर पर धारण करने वाली प्रत्येक चीज के लिए नजर आएगा। चूंकि, तमाम वस्तुओं का प्रचलन समय के साथ तात्कालिक जरूरत और परिस्थितियों के मद्देनजर हुआ है तो उस काल-परिस्थिति का प्रभाव उस पर नजर भी आता है। इसीलिए बोलचाल में हम कहते हैं कि ये तो आदिम युग का है, पुरातन है, लोक संस्कृति का है या देहाती है। जिस बुटिक का आज बोलबाला है, वह लोक कला से ही निकला है।

यदि भारत के संदर्भ में बात करें तो अलग-अलग राज्यों में जो आदिम-वनवासी जातियां हैं, वे समय के साथ आधुनिक तो हुई हैं, फिर भी इन्होंने अपनी संस्कृति को, अपनी परंपराओं, रहन-सहन, खान-पान, वेशभूषा और आभूषण को ठेठ देसी परिवेश में काफी हद तक कायम भी रखा है। इसीलिए देश के वनवासी बहुल इलाकों मेें इनके तीज-त्योहारों पर अभी-भी मेले लगते हैं, जहां सहभागिता तो स्थानीय लोगों की रहती है, लेकिन ये नजारा देखने दूरदराज से लोग आते हैं। अब तो अनेक राज्यों के ऐसे इलाकों में पर्यटन गतिविधियां भी प्रारंभ हो चुकी हैं। जैसे मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाकों धार, झाबुआ, अलीराजपुर, खरगोन, खंडवा, बड़वानी जिलों में होने वाला भगोरिया। यह इलाका मालवा-निमाड़ अंचल कहलाता है। ये होलिका दहन के एक सप्ताह पहले शुरू होता है और इस दौरान जहां-जहां हाट-बाजार लगता है, वहां-वहां ये वनवासी खरीदारी और उत्सव मनाने बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। इनका ये पर्व भगोरिया कहलाता है, जिसकी ख्याति अब विश्व स्तरीय है।

यह त्योहार मौज-मस्ती और फसल के कट जाने का है। यह त्योहार, अपने चिरस्थायी गम, तकलीफ को भुला देने का है, यह त्योहार अपने जिंदा होने के अहसास का है और यह त्योहार अपना जीवन साथी चुनने का एक जरिया भी है। हालांकि इस आखिरी हिस्से को ही ज्यादा प्रचारित कर यह स्थापित करने की कोशिशें की जाती है कि आदिवासियों में भगोरिया अपने मनपसंद साथी को भगा ले जाने के लिए होता है, जिसका दूर-दूर तक वास्ता नहीं है।

यही वह त्योहार है, जिसमें इन वनवासियों के फैशन, रहन-सहन, आभूषण, कपड़ों की नुमाइश होती है। वैसे इसी तरह से श्रृंगारित होकर वे शादी-ब्याह में भी नजर आते हैं, लेकिन इसमें एक सीमित दायरा होता है और उसमें जन भागीदारी नहीं होती याने वे आम नागरी-शहरी लोगों के बीच उस तरह नहीं आते, जिस तरह से भगोरिया में आ जाते हैं।

चूंकि यह वह समय होता है जब ये खेत-खलिहान से मुक्त होकर फसल का पैसा गांठ में जमा कर लेते हैं या कहीं दूरदराज काम-धंधा-मजदूरी कर रहे होते हैं तो जमा पूंजी लेकर अपने गांव लौट आते हैं। तब साल भर से जमा मन के भार को एक तरफ पटक कर पूरे जोश और उमंग के साथ भगोरिया में शरीक होते हैं। उसी वक्त उनके गहने और पोषाख हमें देखने को मिलते हैं।

यदि मालवा-निमाड़ अंचल के वनवासियों के पहनावेेे-ओढऩे की बात करें तो दूसरी जातियों की तरह यहां भी श्रृंगार महिला प्रधान ही है। यह शायद कुदरती तौर पर है कि महिला को सजना-संवरना ज्यादा भाता है और पुरुष उससे परहेज करता नजर आता है। ये वनवासी महिलाएं समूह में भगोरिया में सजना पसंद करती हैं। इतना ही नहीं तो शादी और दूसरे इनके तीज-त्योहार और पर्व-परंपरा मेें भी एकसाथ नजर आती हैं। ये ज्यादातर एक ही मोहल्ले की होती हैं, जिसे वनवासी फलिया कहते हैं। इनका बाकायदा काफी पहले से ड्रेस कोड तय हो जाता है और गहनों की भी सूची बन जाती है। ये उसी मुताबिक भगोरिया या शादी-समारोह में तैयार होकर आती हैं। आम भारतीय नारी से अलग ये नख-शिख श्रृंगार करती हैं। माथे पर बोर से लेकर तो पैर की अंगुलियों में पहनी जाने वाली बिछुड़ी तक पहनना ये नहीं भूलतीं। इनमें प्रमुख रूप से कमर का फैंसी कंदोरा, पैरों की बिछुड़ी, झूलदार कंदोरा, गले की तागली, हाथों की करमदी, हाथों की कांवली, हाथों की डाल, गले का हार , हाथ के वटमा कड़े और पैरों के रमझोल आते हैं।

इसी तरह से कपड़े भी होते हैं। इनका लुगड़ा, पोलका (ब्लाउज), पेटीकोट एक ही रंग का रहेगा। ये आम तौर पर अंत: वस्त्र नहीं पहनतीं। इनकी वर्तमान पीढ़ी जो पढ़-लिख गई है, शहरों में रहती हैं, वे भी इस समय पारंपरकि वेशभूषा में भगोरियां में झूमती नजर आ जाएंगी। इनकी कोशिश यह भी रहती है कि एक ही गांव की लड़कियों की वेशभूषा एक समान न हो, उसके लिए ये आपस में बात भी कर लेती हैं। जैसे एक ही गांव में चार फलिये हुए तो एक-दूसरे से साझा कर लेंगी कि वे किस रंग के कपड़े पहनने वाली हैं। अलबत्ता, गहने एक जैसे ही होते हैं, क्योंकि उनकी डिजाइन बहुत अलग नहीं हो सकती। आर्थिक स्थिति के मद्देनजर इनके वजन और आकार-प्रकार में जरूर अंतर रह सकता है। जितने भारी-भरकम गहने होंगे, वह उतने ही समृद्ध परिवार की होगी।

आप गौर करें कि इस समय जो फैशन है, वह कमोबेश लोक कला के नाम पर वनवासियों की परंपरा से ही निकला हुआ है। वनवासी अंग प्रदर्शन से परहेज नहीं करते, क्योंकि उनके लिए इसके कोई मायने ही नहीं हैं। एक वक्त था करीब 15-20 साल पहले तक का, जब इन इलाकों में सूर्यास्त के बाद आप निकल जाएं तो वनवासी गांवों की युवतियां-महिलाएं कमर से ऊपर निर्वस्त्र होकर अपने घर के आसपास व गांव में घूम लेती थीं। शहरी दखल और शिक्षा के प्रसार-प्रचार के बाद जरूर अब ऐसा अपवाद स्वरूप ही नजर आएगा। वैसे इन इलाकों की महिलाओं को सार्वजनिक रूप से अपने बच्चों को स्तनपान कराते आसानी से अभी-भी देखा जा सकता है।

बहरहाल, शहरी जनजीवन में नित-नए प्रयोग के चलते फैशन के जो अलग-अलग रंग दिखने लगे, उसमें इन वनवासियों के जीवन से जुड़े परिधान व गहने भी शरीक कर लिए गए हैं। इनके कपड़ों की हाथ से होने वाली छपाई को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल चुकी है और जो बाग प्रिंट पूरी दुनिया में मशहूर हो चुका है, वह इसी धार जिले का छोटा-सा गांव बाग है। शहरीकरण ने जिस तेेजी के साथ अपने दायरे बढ़ाए हैं, उसमें वनवासी फैशन के तमाम प्रतिमान भी समाहित कर लिए गए हैं।

 

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