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इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के उत्तरार्ध का प्रारंभ हो गया है। जैसा कि अपेक्षित ही था कि विज्ञान और टेक्नालॉजी के विस्तार ने मानव सेवा की सभी सुख सुविधाओं का अंबार लगा रखा है। शहरी और महानगरीय सभ्यता और संस्कृति अपने चरम पर है। तथापि, साधनों से भरपूर, सुख और सुविधा के मद में चूर मानवीय जिंदगी शांति और संतोष से तो अभी भी बहुत दूर दिख रही है। यही कारण है कि शहरों और महानगरों की अत्यंत व्यस्त, नहीं बल्कि अस्त-व्यस्त, संतप्त जिंदगी से जैसे ही व्यक्ति को थोड़ा अवकाश मिलता है तो फिर वह शहरों में नहीं, बल्कि गांवों की ओर, प्रकृति और प्राकृतिक-नैसर्गिक वातावरण की ओर भागता है और वहां जाकर एक या दो रात बिता कर थोड़ा चैन या सुकून पाकर, तरोताजा होकर लौटता है। क्या कारण है कि शहर और महानगर, सुख-सुविधा देने वाले समस्त साधन-संसाधन, गगनचुम्बी अट्टालिकाएं, पंच सितारा सुविधाओं से युक्त मकान हमें वह शांति नहीं दे पाते, जो निसर्ग के वातावरण में, प्रकृति की हरीतिमा में, गांवों में, झोपड़ों में, नदी के किनारे जाकर मिलती है। उत्तर एक ही है कि मानव मन मूल रूप से, स्वभाव के कारण निसर्ग से संबद्ध है। बड़ी प्रसिद्ध पंक्ति है, जैसेे उड़ि जहाज को पंछी पुनि जहाज पे आवे, मेरो मन अनत कहां सुख पावे। मानव मन का जहाज गांव है, वन-वाटिका, ताल-सरोवर, पशु- पक्षी, पहाड़, पेड़-पौधे ये सब मिल कर जिस वातावरण की रचना करते हैं, वह मानव को चैन देता है तथा सुख और संतोष को प्रदान करता है। इसका कारण है कि मानव का मन और तन दोनों प्रकृति से अभिन्न हैं, जो तत्व मानव के तन या शरीर की रचना करते हैं, वही तत्व विराट रूप में प्रकृति में भी दृष्टिगोचर होते हैं। मानव शरीर की रचना पांच तत्वों-यथा पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल, आकाश से हुई है। प्रकृति भी इन्हीं पांचों तत्वों की ही देन है। अत: मानव प्रकृति के साथ रह कर ही शांति और संतोष की अनुभूति कर पाता है।
भारत के ऋषियों और महर्षियों ने इस सत्य का साक्षात्कार सृष्टि के विकास के प्रारंभ में ही कर लिया था और इसीलिए उन्होंनेे प्रकृति के आंगन में, निसर्ग की छांव में, ग्राम्य व्यवस्था का आविष्कार करके समाज के आर्थिक, सामाजिक जीवन का प्रारंभ किया। अत: इस प्रकार भारत की जीवन व्यवस्था के आधार गांव बने। आज भी भारत के ५ लाख ५० हजार गांव जिसमें भारत की ६० प्रतिशत से अधिक जनता निवास करती है, भारत की पहचान है और उसकी शान भी है।
भारत में ग्रामों की रचना का कोई निश्चित काल तो नहीं बताया जा सकता, कितु यह अवश्य है कि वेदों में ग्राम का उल्लेख मिलता है। अथर्व वेद के बारहवें कांड का प्रथम सूक्त पृथ्वी सूक्त के नाम से जाना जाता है, जिसमें पृथ्वी का स्तवन एवं उसकी प्रार्थना है। इस पृथ्वी सूक्त के छप्पनवें श्लोक में ग्राम का वर्णन है। ऋषि प्रार्थना करता है-
ये ग्रामा यदरण्यं या: सभा अधिभूम्याम।
ये संग्रामा: समित यस्तेषु चारुवदेम ते॥
(अथर्व १९.२.५६)
भूतल पर जो ग्राम, गहावन, जनपद सभा, समाज स्थान।
मेले या संग्राम वहां हम करते सब तेरे गुणगान॥
अर्थात- जहां गांव हैं, सभाएं होती हैं, लोग मिलते हैं और आपस में चर्चा करते हैं, जहां मेला लगता है अर्थात आमोद-प्रमोद के ये स्थान हैं।
हे भूमि हम आपको प्रणाम करते हैं। यहां पर संग्राम शब्द का अर्थ युद्ध नहीं, बल्कि ग्राम मिलन से है। सं का अर्थ जुडना या इकट्ठा होना और चर्चा करना है।
इस प्रकार वैदिक काल से हमें ग्राम्य परंपरा का उल्लेख मिलता है। कुछ विद्वानों का मत है कि वैदिक काल से पहले गांव की रचना हुई और जब -ज्ञान का प्रसार हुआ और मानव मन तथा बुद्धि का उपयोग करने लगा, तब वेदों का उद्गम हुआ।
ऐसा कहा जाता है कि ग्रामों का उदय गोत्र या प्रवर से हुआ है। हिंदुओं में आज भी किसी भी धार्मिक अनुष्ठान में गोत्रोच्चार कराया जाता है। यह हमारी हिन्दू जीवन पद्धति की पुरातन परंपरा है जो सौभाग्य से अब तक चली आ रही है, यह हमारी सामाजिक व्यवस्था की वैज्ञानिकता को दर्शाता है। गोत्र का शाब्दिक अर्थ है, वह स्थान जहां पशुओं को रखा जाता है (गांव- त्रयन्तेे तत्र)। वैदिक काल तथा उससे भी पहले मानव पशुपालक था तथा वह अपनेे पशुओं को साथ में रखता था और जहां भी आजीविका के लिए विचरण करता तो अपने पशुओं के साथ जाता था। इन पशुओं में मुख्य रूप से गाय, बैल, घोड़े और बकरी, कुत्ते आदि होते थे। इनमें से सर्वाधिक प्रधानता गायों को दी गई थी। अत: प्रारम्भ से ही हिन्दू जीवन परंपरा में गो-दान का बड़ा ही महत्व है। चूंकि आर्य लोगों ने प्रारम्भ से ही गो-पालन और पशुपालन को महत्व दिया। अत: वे बाद में समान स्तर के लोग समूहों में विभाजित होकर अलग–अलग क्षेत्रों/स्थानों पर बस गए। मुख्यत: ऐसे स्थान नदी के किनारे, पहाड़ों के पास समतल भूमि पर- वनों और हिंसक पशुओं से दूर होते थे। कालान्तर में इन समूहों का नेेतृत्व बौद्धिक दृष्टि से किसी बहुत ही अनुभवी व्यक्ति के पास आया होगा, जिसे ऋषि की उपाधि दी गई और उस ऋषि के नाम पर गोत्र परंपरा की शुरूआत हुई, जो आज तक बड़ी ही सुचारू रूप से चली आ रही है। गोत्र परंपरा के कारण संगठित व्यक्तियों के समूह जब एक स्थान पर जाकर बसे तो वह स्थान गोष्ठ कहलाया। गोष्ठ वह स्थान थे जहां पशुओं को चरनेे की सुविधा थी। एक ही स्थान पर विभिन्न गोत्रों के लोग एकत्र हुए तो एक गोत्र से दूसरे गोत्र में वैवाहिक संबंधों की स्थापना हुई और सभ्यता के साथ ये परिवार में परिवर्तित हो गए।
इस प्रकार गांव के गठन में परिवार नामक संस्था का बड़ा योगदान रहा। कई परिवार जब एक स्थान पर मिलजुल कर अपना जीवन-यापन करने लगे तो सामूहिक व्यवस्था का निर्माण हुआ और वह जब एक स्थान पर स्थायी हो गए तो वही गांव कहलाए। इस प्रकार प्रत्येक गांव अपने एक अलग व्यक्तित्व के साथ अस्तित्व में आया। उसी व्यवस्था में परस्पर स्नेेह, सहयोग और सहिष्णुता के साथ रहना और विशेष अवसरों पर सभी ने साथ मिल कर आनंद बांटने की परंपरा शुरू की होगी और उत्सवों, त्यौहारों की शृंखला का प्रारंभ हुआ होगा। ऐसी व्यवस्था के लिए अथर्व ऋषि प्रार्थना करता है।
शान्तिवा सुरभि: स्थोना कीलालोद्नी पयस्वती
भूमिरधि ब्रीतु मे पृ-थिवी पयसा एह
सीधी, शान्त सुरभि सी जो है जग को सुख देती दान
भरे अन्न से धन जिसके, जो दुग्धदायिनी धेनु समान
वह वसुधा ले साथ अनान के पुष्टिप्रद रस अन्न अशेष
सुख पहुंचाए हमें और दे सदा मानसिक शुभ उपदेश
प्राचीन ग्राम व्यवस्था किसी प्रशासन या शासन से नहीं, केवल अनुशासन से परिचालित होती थी। पुरातन समाज और गांव देवताओं के अधीन थे। इसलिए प्रत्येक गांव में एक ग्राम देवता तथा गांव देवी की व्यवस्था बनी। उन्हीं अदृश्य किन्तुु अत्यंत ऊर्जावान देवता तथा देवी के नाम से पूरे गांव का जीवन चलता था और परस्पर सहयोग और प्रेम की भावना से गांव के लोग एक दूसरे की आवश्यकता पूरी करते थे। वहीं से वस्तु विनिमय, सेवा के आदान-प्रदान की परंपरा प्रारंभ हुई और आर्थिक व्यवहार प्रारंभ हुआ। वर्तमान आधुनिक गांव उसी प्राचीन परंपरा के प्रतिनिधि हैं, जहां आप अभी भी प्रेम के अटूट बंधन देख सकते हैं। आज भी वहां उत्सव हैं, नृत्य हैं, गीत हैं। जल रस भरे सावन के झूले हैं और पीली सरसों के बसंत के झर-झर फूले हैं। आज भी यदि गांव में विवाह हो तो कन्या की विदाई पर सारा गांव रोता है और अगर किसी का बेटा ब्याहा गया और बहू लाता है तो सारा गांव लक्ष्मी की आगवानी के लिए पलक पावड़े बिछा देता है। क्या किसी शहर या महानगर की संस्कृति में ऐसा भाव मिलेगा। वहां तो पांच तारांकित होटल में जाकर वर-वधु के निमित्त उपहार स्वरूप लिफाफा पकड़ा कर और स्वरुचि भोजन का आनंद लेकर वापस घर आ जाते हैं। स्थिति यह है कि लोग वर-वधु के नजदीक जाकर उनको आशीर्वाद/शुभकामना देना भी तथाकथित सभ्य सुसंस्कृत लोग गंवारा नहीं करते। प्रेम, स्नेह और आत्मीयता की परंपरा का निर्वाह सीखना हो तो हमें गांवों की ओर ही लौटना होगा।
इस प्रकार भारत में गांवों की रचना वैदिक काल से भी पहले की है। गांव के निर्माण के बाद कृषि परंपरा का श्री गणेश हुआ, जिसका उल्लेख हमें वेदों में मिलता है। भारत की कृषि प्रणाली विश्व में प्राचीनतम है। ऋग्वेद में हमें कृषि से संबंधित अर्थात अन्नोत्पादन से संबंधित कई सूत्र मिलते हैं और यह भी उल्लेख मिलता है कि यदि कभी भूमि की उर्वरा शक्ति में कोई कमी आ जाए तो आदि प्रजापति अर्थात प्रकृति की आदि शक्तियां से पूर्ण करें, ऐसा ऋषि प्रार्थना करता है। अथर्व वेद के पृथ्वी सूक्त के इस श्लोक को देखिए-
त्वमस्यापनी जनानामजिति
कामदुधा प प्रधाना
यत त ऊनं तत् त आ
पूरयाति प्रजापति: प्रथमजा ऋतस्य
अन्नोषधि की क्षेत्रभूमि, तू जगजीवोंं की योनि महान।
तू अखंड विस्तृत तू करती सबको अभिमत काम प्रदान॥
जो तुझमें न्यूनता कहीं हो जो कुछ तेरा रहा अपूर्ण।
सत्य विष्णु के ज्येष्ठ तनय वे आदि प्रजापति करते पूर्ण॥
इस प्रकार प्राचीन ग्राम्य परंपरा से मानव सभ्यता का विकास हुआ। तथापि इस विकास की प्रक्रिया में हमारी ऋषि परंपरा ने उसमें श्रम एवं परिश्रम को सबसे अधिक महत्व दिया। ऋग्वेद की ऋचाएं कहती हैं कि मानव को कर्म करना चाहिए और कर्म का सबसे बड़ा उपकरण है – हाथ। ग्रामीण के हाथ हसिया – बाली के काम आते हैं। देवता सिर्फ प्रार्थना से या पूजा से प्रसन्न नहीं होते बल्कि कठिन परिश्रम से प्रसन्न होते हैं और यदि व्यक्ति परिश्रम नहीं करता तो देवता भी प्रसन्न नहीं होते, क्योंकि देवता भी परिश्रम करते हैं। अ यं मे हस्तो भगवान, अ यं मे भगवत्तर: पद, अ यं मे शिवामिमदर्शन: ऋषि कहता है कि मेरे हाथ में ही भगवान है और जिसमें सबका कल्याण करने की शक्ति है।
ऋषि और कृषि, भारतीय ग्राम्य संकल्पना और व्यवस्था के आधार रहे हैं। इस परंपरा ने केवल मानव को जीवन जीना सिखाया, बल्कि जीवन को सुख शांति, सफलता और आनंद के साथ जीने के विचार और संस्कार भी दिए। इस परंपरा में गाय माता बनी, पृथ्वी मां थी ही, सूर्य और इंद्र को पिता का स्थान दिया, चंद्रमा मामा और बिल्ली मौसी बनी। ऐसे भाव का निर्माण- जिसने समस्त प्राणियों और सृष्टि के तत्वों को संबंधों के सूत्र में बांध कर ऐसी व्यवस्था को नाम दिया, जिसमें जीवन का आनंद और निरंतर आगे बढ़ने और उत्तरोतर प्रगति करने का आह्वान दोनों मिलता है। इसी कारण से महात्मा गांधी, पंडित दीन दयाल उपाध्याय, विनोबा भावे तथा अन्य चिंतकों ने ग्राम स्वराज्य के माध्यम से भारत के नवनिर्माण का चिंतन दिया है।

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