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भारत विश्व का ऐसा देश है, जहां विभिन्न भाषाभाषी, जाति संप्रदाय के लोग एक साथ निवास करते हैं। भारत ही विश्व की सभी प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक जीवित सभ्यता है, जिसने इतने समय तक अपने आप को न केवल सुरक्षित एवं संरक्षित रख सका बल्कि अब विश्व सिरमौर बनने जा रहा है। जिसका प्रमुख कारण है, भारत की अनेकता में एकता की मिसाल, यहां के जनमानस के क्रियाकलाप, यहां की उदार संस्कृति में स्पष्ट परिलक्षित होती है। भारत की एकता के सूत्र सांस्कृतिक आस्था और संस्कार आज तक सभी देशवासियों के रग-रग में इस तरह समाहित हैं जिसके सुप्रभाव से भारत आज भी अपनी एकता को अक्षुण्ण रखकर विराट स्वरूप के साथ २१वीं सदी में विश्व का मार्गदर्शन करने को तैयार खड़ा है। यह तभी संभव हो पाया है, क्योंकि देश के विकास के लक्ष्य को पूरा करने हेतु सब से छोटी इकाई अर्थात गांव को ध्यान में रख कर सघन प्रयास किए जा रहे हैं।
विज्ञान कहता है कि, जिस प्रकार किसी भी कण का निर्माण उसमें निहित लघु एवं अदृश्य कणों से होता है, और जो किसी न किसी प्रकार से सशक्त तरीके से एक दूसरे को बांध कर एक विशाल अणु का निर्माण करते हैं, जिस प्रकार ग्रहों के बीच पाए जाने वाला अदृश्य गुरूत्वाकर्षण बल न केवल दो ग्रहों को बांधे रखता है, बल्कि समस्त सृष्टि की रचना करता है, ठीक उसी प्रकार किसी भी उन्नत एवं सशक्त देश के निर्माण में उसके आर्थिक एवं सामाजिक रूप से संपन्न गांवों का महत्वपूर्ण योगदान होता है।
कोई भी देश तब तक सशक्त एवं सम्पन्न नहीं कहा जा सकता, जब तक उस देश का प्रत्येक गांव व ग्रामीण लोग आर्थिक व नैतिक रूप से सम्पन्न नहीं हो जाते। इस विषय में स्वाामी विवेकानंद की उक्ति कि, यदि आपका पड़ोसी भूखा है तो मंदिर में प्रसाद चढ़ाना पाप है तथा पंडित जवाहरलाल नेहरू का कथन कि व्यक्ति को बेकार रखने से अच्छा है कि उसे गड्ढा खोद कर पुन: भरने के लिए नियुक्त करना चाहिए। इन दोनों कथनों से स्पष्ट होता है कि, यदि देश का आर्थिक विकास करना है तो छोटी से छोटी इकाई चाहे वह कड़ी, ग्राम पंचायत से शुरू होकर महानगरपालिका तक जाती हो सभी का विकास अनिवार्य है, तभी हम उन्नत राष्ट्र के स्वप्न को साकार कर सकते हैं।
स्वास्थं एवं सुरक्षित समाज के निर्माण के लिए गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा जैसी समस्याओं से हमें जल्द से जल्द निपटना होगा। आजादी के तुरंत बाद देश की बड़ी समस्या, रोटी, कपड़ा और मकान का हल जब तक देश के हर गांव, हर शहर के हर आम आदमी तक नहीं पहुंच जाता तब तक सशक्त, सुरक्षित गांव या शहर की कल्पमना बेमानी होगी।
वास्तव में देश को सांस्कृतिक, आर्थिक, नैतिक रूप से मजबूत बनाना है तो सभी देशवासियों को चाहे वे किसी भी वर्ण, जाति, धर्म के हों एकजुट होकर समन्वित प्रयास करने की आवश्यकता है, इसके साथ सरकारी प्रयासों एवं योजनाओं को शतप्रतिशत लागू करके भी सशक्त राष्ट्र की कल्पना को साकार किया जा सकता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से जितने भी प्रयास किए गए हैं और जो जारी हैं निश्चतय ही इनसे आमजनों की स्थिति में परिवर्तन हो रहे हैं परन्तु फिर भी सुरक्षित गांव या आदर्श गांव के सपने को साकार करना है तो निम्न बिन्दुओं पर सही समय में सटीक क्रियान्वयन करने की आवश्यकता है-
उचित आवास की व्यवस्था
हमारे संविधान की धारा २१ के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को जीवन या वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी दी गई है। संविधान द्वारा जीवन गारंटी के अधिकार का प्रयोग करने के लिए आश्रय का अधिकार अनिवार्य है। १९६१ में विश्व स्वास्थ संगठन द्वारा ठीक ही परिभाषा दी गई थी कि, आवास वह होता है जिसके लिए रिहायशी वातावरण आसपड़ोस की जरूरत होती है और मनुष्य उस आश्रय का इस्तेमाल करता है तथा उसके आसपास अन्य सभी आवश्यक सेवाएं, सुविधाएं शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अपेक्षित साज-सज्जा एवं परिवार के लिए सामाजिक परिवेश उपलब्ध हो। आवास केवल आश्रय या घरेलू सुविधाएं मात्र नहीं होता बल्कि उसमें अनेक सुविधाएं व साधन भी उपलब्ध होने चाहिए जिनसे व्यक्ति तथा परिवार समाज से जुड़ता है, जहां वह पलता- बढ़ता है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से २००१ तक शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में आवास की कमी को निम्न तालिका द्वारा समझा जा सकता है-
वर्ष आवास की कमी मिलियन में
ग्रामीण शहरी कुल
१९५१ ६.५ २.५ ९.०
१९६१ ११.६ ३.६ १५.२
१९७१ ११.६ ३.० १४.६
१९८१ १६.७ ७.० २३.३
१९९१ १४.७ ८.२ २२.९
२००१ २४.० ७.१ ३१.१
(स्रोतः आवास और बुनियादी सुविधाओं की प्रवृत्ति एवं अंतर भारत २००१- हडको द्वारा प्रकाशित)

इस समस्या के समाधान हेतु मौजूदा केन्द्र सरकार ने आदर्श ग्राम योजना, स्मार्ट सिटी योजना जैसी कई योजनाओं की शुरूआत की है ताकि सभी लोगों को आवास की सुविधा मिल सके। वर्तमान सरकार की सबके लिए घर योजना के तहत २०२२ तक शहरों में २ करोड़ घर बनाने का लक्ष्य है। केपीएमजी के अनुमान के मुताबिक, २०२२ तक ११ करोड़ घरों की मांग होगी। ऐसे में सरकार के इस अभियान से आर्थिक तौर पर कमजोर तबके के लोग लाभान्वित होंगे।
सांसद आदर्श ग्राम योजना का पूर्ण क्रियान्वयन
प्रधान मंत्री के १०० स्मार्ट सिटी बनाने के घोषणा के बाद ११ अक्टूबर २०१४ को वर्ष २०१९ तक २५०० आदर्श ग्राम बनाए जाने की घोषणा ने निश्चय ही भविष्य के सम्पन्न भारत की छवि को रेखांकित किया है। सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत, प्रधानम ंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रथम चरण में अंगीकृत वाराणसी के जयापुर ग्राम तथा द्वितीय चरण के तहत अंगीकृत किए गए नगेपुर ग्राम की तस्वीर ही बदल गई है। इसी चरण में राज्यसभा सांसद एवं महान क्रिकेटर सचिन तेंडुलकर ने हाल में ही आंध्र प्रदेश के गुंटुर मंडल में अवस्थित पुत्तमराजू केन्द्रिका ग्राम को सांसद निधि से ४ करोड़ की राशि उपलब्ध करा कर गांव की दशा ही परिवर्तित कर दी है। सड़क, स्कू्ल, शौचालय, बिजली, बैंक आदि मूलभूत सुविधाओं से ये ग्राम अब विश्व स्तरीय प्रतीत होने लगे हैं। इसके अलावा इन ग्रामों एवं शहरों का विकास भविष्य की योजनाओं एवं आदर्शतम आपदा प्रबंधन को ध्यान में रख कर किया जा रहा है।
आदर्श सड़कें एवं उत्कृष्ट परिवहन सुविधाएं
किसी भी गांव की आर्थिक या भौगोलिक सुरक्षा में वहां के परिवहन के साधनों का अहम योगदान होता है। जब तक गांवों के बीच श्रेष्ठ परिवहन एवं सड़क की सुविधाएं नहीं रहेंगी वह स्थान विकास नहीं कर सकता। इसी बात को ध्यान में रख कर प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना की शुरूआत तत्काथलीन प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा की गई जिसके तहत भारत निर्माण के अंतर्गत २००९ से समयबद्ध तरीके से, मैदानी क्षेत्रों में १००० से ज्यादा जनसंख्याा वाले आबाद क्षेत्र और पहाड़ी व जनजातीय इलाकों में ५०० या ज्यादा की जनसंख्या वाले आबाद क्षेत्रों को जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। विद्यमान ग्रामीण सड़क नेटवर्क का क्रमबद्ध उन्नयन भी इस योजना का घटक है। तदनुसार १,४६,१८५ किलोमीटर, बारह मासी सड़कों द्वारा ६६,८०२ आबाद क्षेत्रों को जोड़ने की एक कार्य-योजना तैयार की गई है। वर्तमान की मोदी सरकार ने इस योजना के तहत अब तक प्रतिदिन ३० किमी औसतन सड़क निर्माण के आधार पर इस वर्ष के सितम्बर तक ४२७२ वर्ग किमी तक सर्वसुविधायुक्त रोड का निर्माण कर लिया है तथा आशा है कि इस वर्ष के अंत तक १०००० किमी के लक्ष्य को आसानी से प्राप्त कर लिया जाएगा, जो कि गांव की सुरक्षा एवं आर्थिक समृद्धि के लिहाज़ से सर्वश्रेष्ठ है।
सुशासन व ई-गर्वनेंस
सुशासन का शाब्दिक अर्थ जहां अच्छा शासन से है, वहीं इसका व्यापक अर्थ राम राज्य के समान शासन से है जहां सर्वे भवन्तु सुखिन: की आदर्श भावना निहित है और यह तभी संभव है जब शासन से भ्रष्टाचार, जमाखोरी जैसी भयंकर बीमारियां पूर्णतया समाप्त होंगी। इस ओर पहल करते हुए केन्द्र सरकार एवं कई राज्य सरकारों ने ई-गर्वनेंस की शुरूआत की है, जिससे नागरिकों को अधिकतम सुविधाएं ऑनलाइन उपलब्ध कराई जा रही हैं।
केन्द्र सरकार की राष्ट्रीय ई-शासन योजना (एनईजीपी) के तहत भूमि अभिलेख सुविधा में संवर्धन, अपराध और आपराधिक ट्रैकिंग नेटवर्क और प्रणाली (सीसीटीएनएस) के तहत पुलिस स्टेशन स्तर पर दक्षता और प्रभावी पुलिस कार्रवाई की सुविधा, रोजगार कार्यालय मिशन मोड परियोजना (ईईएमएमपी) के तहत रोजगार कार्यालयों (ईई) के नेटवर्क के माध्यम से प्रदान की जाने वाली आधुनिक रोजगार संबंधी सेवाओं को उन्नत बनाने की सुविधा, औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग (डीआईपीपी) वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय भारत सरकार द्वारा उद्योग में उन्नयन पर आधारित ई-बिज़ मिशन मोड परियोजना के तहत संकल्पित किया जा रहा है। भारत सरकार की राष्ट्रीय ई-शासन योजना में इनके लिए एक स्पष्ट संकल्पना है: कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, मनोरंजन, एफएमसीजी उत्पादों, बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं, यूटिलिटी भुगतान आदि के क्षेत्रों में नागरिकों को एक वहनीय लागत पर सभी सरकारी, सामाजिक और निजी क्षेत्र की सेवाएं प्रदान करना और पहुंच योग्य बनाना।
ई-न्यायालय मिशन मोड परियोजना (एमएमपी) के माध्यम से भारतीय न्याय पालिका की सुविधाओं को आसानी से जनसामान्य तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इसी अनुक्रम में कई राज्य सरकारों ने अपने राज्योंे में सूचना तकनीकी के माध्यम से सुशासन के सही रूप को परिभाषित किया है यथा- छत्तीासगढ़ सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली को ऑनलाइन कर दिया है जिसके तहत राशन के आबंटन की जानकारी कभी भी कहीं भी प्राप्त की जा सकती है। इसके तहत राशन सामग्री के ट्रक निकलने से लेकर राशन दुकानों में ग्राहकों को अनाज वितरित होने तक का रिकार्ड रखा जा रहा है। जिसकी प्रशंसा प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक कार्यक्रम के दौरान की थी तथा अन्य राज्यों के लिए इसे अनुकरणीय बताया था। इस आधार पर स्पष्ट कहा जा सकता है कि, आर्थिक रूप से सुरक्षित एवं संपन्न देश की संकल्पना तब तक साकार नही हो सकती जब तक वहां के गांव, शहर या प्रदेश में सुशासन न हो।
महिलाओं की स्थिति में सुधार एवं महिला जनभागीदारी में वृद्धि
भारतीय दर्शन कहता है यत्र नार्यस्तू पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता, जो समाज में नारी सम्मान को स्पष्टत: परिभाषित करता है। यदि वर्तमान परिवेश की चर्चा करें तो भारत की स्थिति अन्य देशों की तुलना में सराहनीय है। केन्द्र सरकार की बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना, महिला हेल्पलाइन योजना, नारी शक्ति पुरस्कार, इंदिरा गांधी मातृत्व सहयोग योजना, उज्ज्वला योजना आदि ने देश की महिलाओं को नया गौरव प्रदान किया है। पंचायतों, निगमों, नगर पालिकाओं आदि में ५० फीसदी सीटें आरक्षित करना साहसिक एवं उन्नायक कदम है। आज भी उत्तर-पूर्व में कई जनजातियों में मातृसत्तात्मक पद्धति का प्रचलन है जहां संपत्ति-जमीन, जायदाद व मकानादि पर केवल स्त्रियों का अधिकार होता है। वहां की स्त्रियां अपने को सशक्त एवं आत्मनिर्भर मानती हैं और गांव में सारे निर्णय उनके सहमति से ही लिए जाते हैं, जो कि स्पष्टत: सशक्त समाज का परिचायक है। इस लिहाज से सशक्त एवं सुरक्षित गांव वही होगा जहां की स्त्रियां सुरक्षित होंगी तथा हर स्तर पर बढ़-चढ़कर हिस्सा लेंगी।
उत्कृष्ट शिक्षा व्यवस्था
शास्त्र कहता है कि, विद्या ददाति विनयम् अर्थात शिक्षा से ही ज्ञान एवं चरित्र का विकास होता है। कोई भी समाज तब तक विकास नहीं कर सकता, जब तक वहां सुशिक्षा एवं साक्षरता न हो। पुरातन काल से ही भारत वैश्विक स्तर पर शिक्षा का सबसे बड़ा केन्द्र था, नालंदा, तक्षशिला विश्वविद्यालय सहित चरक, सुश्रुत, भास्कराचार्य, चाणक्य, पतंजलि, वात्सायन, जैसे भारतीय विद्वानों ने पूरे विश्व को ज्ञान से आलोकित किया। इस परम्परा को जीवित रखने तथा देश के छोटे से छोटे ग्राम स्तार से शिक्षा में गुणवत्ता लाने के लिए सरकार द्वारा चलाए जा रही कई योजनाओं जैसे सर्वशिक्षा अभियान, साक्षर भारत, मध्याह्न भोजन योजना आदि से शत-प्रतिशत लोगों को शिक्षा प्रदान कर उनके स्तर को बदलने की कोशिश की जा रही है। वर्तमान राष्ट्रीय शिक्षा नीति २०१६ से देश में शिक्षा में नए मानदंड स्थापित होंगे। इस हेतु आमजनों की राय ली जा रही है, जो कि केन्द्र सरकार का सार्थक एवं सराहनीय प्रयास है।
उत्तम स्वास्थ्य एवं स्वच्छता की व्यवस्था
महात्मा गांधी ने कहा था, कि जहां स्वच्छता होती है, वहीं ईश्वर का वास होता है। देश में बदलते परिवेश के आधार पर स्वास्थ्य एवं स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। ग्राम व शहरों का विकास तब तक संभव नहीं है, जब तक कि वहां स्वच्छता न हो। देश में सरकार द्वारा चलाए जा रहे स्वच्छता अभियान, हर सार्वजनिक स्थानों पर शौचालयों का निर्माण, हर सरकारी विद्यालयों में पृथक महिला शौचालय का निर्माण, नगरपालिका, नगर निगम द्वारा अधिकतम सफाई कर्मचारियों की भर्ती, भारत सरकार द्वारा सफाई टैक्स की शुरूआत, केन्द्र सरकार के कार्यालयों द्वारा सफाई पर विभिन्न पुरस्कारों की घोषणा आदि से स्पष्ट परिलक्षित होता है कि गांव, शहर, समाज की सफाई से ही देश का विकास संभव है, निश्चय ही उत्तम स्वास्थ्य तभी संभव है जब स्वच्छता होगी।
स्वास्थ्य एवं स्व्च्छता को सचमुच बेहतर बनाना है तो सभी स्रोतों पर विशेष ध्याान दिए जाने की आवश्यकता है चाहे जल संसाधनों की सफाई हो, चाहे मृदा असंवर्धन एवं क्षरण को रोके जाने वाले उपाय हों या कारखानों, मोटर गाड़ियों से निकलने वाले धुएं से प्रदूषणमुक्त वातावरण बनाने के उपाय हों या मौजूदा मोबाइल टावरों से निकलने वाले विकिरणों से रक्षा की बात हो, सरकार सहित ग्राम अथवा शहर स्तर पर भी प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि इनसे रक्षा हेतु अधिकाधिक प्रयास करें, ताकि स्वस्थ, सुरक्षित, संपन्न समाज एवं गांव की स्थापना संभव हो सके। इनसे होने वाली हानियों को निम्न चार्ट के माध्यम से समझा जा सकता है।
संसाधनों का उचित प्रबंधन एवं आपदा प्रबंधन
हमारे देश में प्राकृतिक एवं मानवजनित दोनों प्रकार की समस्याएं आती रहती हैं। वर्तमान में मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, असम में आई बाढ़ ने लाखों लोगों के जीवन को अस्तव्यस्त कर दिया है। महामारी, अग्निकांड, दंगा, रेल दुर्घटना आए दिन होते रहते हैं। इसके अलावा नक्सलवादी, उग्रवादी, आतंकवादी हमलों से देश दहलते रहता है। सुरक्षित समाज की कल्पना तब तक नहीं की जा सकती जब तक इन समस्याओं से डट कर सामना न किया जाए। वर्तमान में, दमनकारी शक्तियों के विरूद्ध सरकारी तंत्र द्वारा किए जा रहे प्रयास सराहनीय हैं।
वहीं प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए भी सरकारी योजनाओं में भी वृद्धि करने की आवश्यकता है। परन्तु उससे भी ज्यादा ज़रूरी है समय रहते आपदा प्रबंधन करने की यथा- हाल ही में, पुलगांव के हथियार गोदाम में भीषण आग लगी थी, जिसमें आसपास के करीब ५० लोग जल कर मर गए थे, मध्य प्रदेश के पेटलावाद नामक स्थान पर अचानक हुए विस्फोट में कई लोग जल कर खाक हो गए थे, दोनों ही स्थोनों पर सरकारी तंत्र द्वारा उस स्थान के बेजा कब्जा वासियों को स्थाान खाली करने के आदेश दिए जा चुके थे; ताकि किसी प्रकार की अवांछनीय घटना न घटित हो परन्तु ज़मीन के लालच में कई लोगों की जाने गईं।
सुरक्षित नगर या ग्राम वही है जहां आपदाओं का पूर्व प्रबंधन, प्राकृतिक संसाधनों जैसे-जल, वायु, बिजली, सौर ऊर्जा का पूर्ण प्रबंधन हो ताकि इनके अधिकाधिक उपयोग से विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों से पर्यावरण को मुक्त रखा जा सके। इसके लिए भी हमें विशेष प्रयास करने की आवश्यकता है ।
आज गांव व शहरों में इन्फ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी हो रही है जिसमें पेय जल, जल-मल निकासी, यातायात के अल्प साधन तेजी से बढ़ते वाहन एवं बढ़ता प्रदूषण, आवास की भारी कमी जैसी अनेक समस्याएं हैं। यही कारण है कि, जहां एक ओर महानगरों के दड़बेनुमा कमरों में भीड़ बढ़ती जा रही है वहीं दूसरी ओर गांवों कस्बों के लाखों लोग शहर की ओर पलायन कर रहे हैं। ऐसे में यदि गांव व शहरों में परस्पर सामंजस्य के साथ विकास न किया जाए तो भयावह स्थिति हो सकती है। विश्व बैंक ने अपने आकलन में माना है कि ग्रामीण और शहरी इलाकों में यातायात की व्यवस्था जितनी सुगम होगी, लोगों का पलायन उतना ही कम होगा। इसे इस उदाहरण से समझा जा सकता है- जापान की राजधानी टोकियो में हर रोज ८० लाख लोग आकर काम करते हैं और चले जाते हैं तो यह कमाल वहां की फर्राटेदार एवं समय-पाबंद रेल का है। इसी तरह २००६ से स्पेन में शुरू हुई सीमेंस बोलरोई गाड़ी ४०४ प्रति घंटा रफ्तार से चल कर लाखों लोगों को गंतव्य तक पहुंचाती है। चीन ने उसको पछाड़ते हुए सीआरएच-३ बाडी चलाई जो ४१६ किमी प्रति घंटा की रफ्तार से चलती है। भारत में भी इस दिशा में सकारात्मक प्रयास किए जा रहे हैं। भारत में बुलेट ट्रेन चलाए जाने की योजना के प्रथम चरण में अहमदाबाद से मुंबई के बीच सर्वे का काम शुरू हो गया है।
समग्र तौर पर कहा जाए कि यदि सचमुच देश का विकास करना है तो इसकी शुरूआत ग्राम स्तर से की जानी चाहिए। इसके लिए सरकार के साथ-साथ प्रत्येक नागरिक को भी हर दिशा में गंभीरता से विचार करते हुए आगामी १०० वर्षों की स्थिति को सोच कर काम करना होगा। सभी को मजबूत संरचनायुक्त मकान, पक्की सड़कें, पेयजल, विद्युत, बेहतर शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य, संचार सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी। वर्तमान सरकार द्वारा इस दिशा में भरसक प्रयास किए जा रहे हैं, बस जरूरत है तो सभी दलों/पार्टियों व देश के नागरिकों को साथ मिलकर व्यापक एवं समग्र विकास के बारे में सोचने की और उसे क्रियान्विषत करने की, तभी सही अर्थों में रामराज्य की स्थाापना संभव हो सकेगी। सब कुछ संभव है, आइए हम सब मिल कर इस दिशा में प्रयास तो करें क्योंकि किसी ने ठीक ही कहा है-
कौन कहता है आसमां में सुराख हो नहीं सकता,
बस एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो।

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