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भिन्न कारणों से अपना घर, गांव, प्रदेश और यहां तक कि अपना देश छोड़ कर विदेश में बसने की प्रक्रिया मनुष्यों में इतिहास काल से चल रही है। शासकीय परिभाषा में इसे ‘स्थलांतर’ कहा जाता है। मानवीय स्थलांतर का अध्ययन करना अत्यंत उद्बोेधक है। इस तरह के स्थलांतर से सामाजिक, राजनैतिक, भौगोलिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में काफी हलचल होती है। स्थलांतर जैसे सामाजिक विषय पर आंखें मूंद लेना उचित नहीं होगा। वर्तमान इक्कीसवीं सदी में किसी भी तरह का शाश्वत रोजगार न होने के कारण केवल पेट भरने के लिए ग्रामीण लोग भारी मात्रा में शहरों का रुख कर रहे हैं। यह चिंता और चिंतन का विषय है।
मिट्टी के कच्चे-पक्के घर, जहां नजर पड़े वहां निस्तेज और थकेमांदे चेहरों के पुरुष, घर, आंगन, खेतों में दिनरात काम करने वाली महिलाएं, उनके आसपास बिखरे बालों वाले, मैले कुचैले कपड़े पहने बच्चे, थरथराते हाथों से खेतों में काम करने वाले वृद्धजन, यह परिदृश्य भारत के हर ग्रामीण क्षेत्र का है। कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक के सभी ग्रामीण भागों की यही उदास परिस्थिति है। यह परिस्थिति थोड़ी सी बदलती है जब बारिश के कारण खेतों में हरियाली छाती है। सूचना तंत्रज्ञान, विकास की हवा भी जिन गावों में नहीं पहुंची ऐसे गावों में युवा पीढ़ी कम ही दिखाई देती है। राजनेताओं के नाकारापन के कारण ही आज भी भारतीय गांव पिछड़े हुए दिखाई देते हैं। राजनेताओं का दृष्टिकोण सामाजिक संज्ञान या विकास का न होकर केवल अपनी कुर्सी बचाने तक ही सीमित रहा है। इस कारण जातीय राजनीति भी हावी रही। ग्रामीण भागों के सामाजिक-राजनैतिक आंदोलनों में भी इसी की प्रधानता रही। इसका परिणाम यह रहा कि गावों का विकास नहीं हुआ। विकास का मुद्दा कभी चर्चा का विषय भी नहीं रहा। इसके कारण ग्रामीण लोगों को कभी रोजगार, कभी अकाल, कभी सामाजिक अन्याय, कभी आत्मसम्मान की अपेक्षा, तो कभी प्रगति करने की इच्छा के कारण अपने पैतृक गांव को छोड़ने हेतु मजबूर होना पड़ता है। जीवन जीने की जद्दोजहद में कई गांव, कई बस्तियां वीरान हो रही हैं। जो लोग बस स्टैण्ड या रेल्वे स्टेशन पर अपने रिश्तेदारों को हाथ हिला कर अलविदा कहते हैं, धीरे-धीरे परिस्थितिवश उनकी स्मृतियों से गांव का घर, यादें सब धुंधला होते जाता है। शहर आने के बाद लोग कुछ दिन तो गांव की, अपनों की यादों में व्याकुल होते हैं; परंतु एक बार शहर आ जाने के बाद वापस गांव लौटना नामुमकिन हो जाता है। गांव के वृद्धजन इस आस में जीते हैं कि शहर गया उनका बेटा वापस लौट कर आएगा; परंतु कुछ समय बाद यह प्रश्न उनके मन में उठता है कि कहीं उसे सीमेंट के जंगल ने निगल तो नहीं लिया। कुछ दिनों पहले तक अपने खेत-खलिहानों में, जंगलों में, अपने वातावरण में सिर उठा कर काम करने वाले ये लोग शहर आकर, झोपड़ियों में, चौराहों पर, बसों-ट्रेनों में बुझी हुई आंखों से अपने जीवन की प्रगति की प्रतीक्षा करते रहते हैं। जिस गांव से प्रगति के स्वप्न लेकर वे लोग निकलते हैं उनके लिए फिर वे गांव ही स्वप्न बन जाते हैं। शहरों की लाख मुश्किलें सहते-सहते उनके मन में दो खाने बन जाते हैं। एक उनको रोजी-रोटी देने वाला शहर और दूसरा उनको स्नेह-ममता देनेवाला गांव। किसी अनजान शहर को अपना बना लेना आसान नहीं होता। शुरू में तो वहां का पानी भी अच्छा नहीं लगता। फिर धीरे-धीरे वह शहर पहचाना सा लगने लगता है …खुलने लगता है किसी किताब की तरह।
गांव के लोगों का शहर की ओर आना; इसे ‘पुश-पुल थ्योरी’ कहते हैं। स्थलांतर के लिए धकेलना ‘पुश’ तथा स्थलांतर के लिए खींचना ‘पुल’ कहलाता है। बेरोजगारी, आर्थिक दुरावस्था, पारिवारिक परिस्थिति इत्यादि विविध कारणों से छोटे-बड़े गांवों से मुंबई, बेंगलुरू, चेन्नई, त्रिवेंद्रम, दिल्ली, हैदराबाद आदि महानगरों में लोग रोजगार तथा अच्छी चिकित्सा सुविधाओं के लिए धकेले जाते हैं तथा शहरीकरण आधुनिकीकरण के कारण युवा श्रमिक, विद्यार्थी, अच्छे रहन-सहन की उम्मीद रखने वाले, कुशल कर्तृत्व वाले लोग शहरों की ओर आकर्षित होते हैं। इसे जनसंख्या शास्त्र की भाषा में ‘पुश-पुल थ्योरी’ कहा जाता है। जनगणना के निरीक्षण में स्थलांतर के अनेक कारण दिए गए हैं परंतु रोजगार और नौकरी ही स्थलांतर के प्रमुख कारण रहे हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड आदि राज्यों से अनेक दशकों से बड़े पैमाने पर स्थलांतर हो रहा है। पिछले कुछ सालों से पूर्वोत्तर भारत से भी स्थलांतर में बढ़ोत्तरी हुई है। ओडीशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड आदि राज्यों से बड़े पैमाने पर मजदूर देश के कंस्ट्रक्शन व्यवसाय में आ रहे हैं। पंजाब में खेतों में काम करने वाले मजदूरों की कमी को बिहार के मजदूरों ने पूरा किया है। उत्तर प्रदेश के मजदूरों का पसंदीदा प्रदेश महाराष्ट्र है। फिलहाल वैश्वीकरण के कारण हैदराबाद, पुणे, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरू आदि शहरों में युवकों को उत्तम नौकरियां मिल रहीं हैं। अत: बड़े पैमाने पर यहां युवा वर्ग स्थलांतरित हो रहा है। वास्तविकता तो यह है कि केवल मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, सूरत, पंजाब, गोवा ही नहीं बल्की सिंगापुर, बैंकाक तक जहां जैसी आवश्यकता होती है वहां लोग अपना गांव छोड़ कर स्थलांतर कर रहे हैं। स्थलांतर करने वाले ये लोग कभी भी अकेले स्थलांतर नहीं करते। गांव का कोई एक व्यक्ति शहर जाता है और उसी की पहचान के सहारे गांव के अन्य आठ दस लोग भी स्थलांतर करते हैं। परंतु स्थलांतर करने वाले इन लोगों को यह भी नहीं मालूम होता कि वे कहां जा रहे हैं, क्या काम करने वाले हैं, क्या प्राप्त करने वाले हैं, रहने-खाने की क्या व्यवस्था है इत्यादि। ये लड़के जब साल में एक बार गांव वापस आते हैं तो उनके हाथ में मोबाइल और जेब में पैसे होते हैं। उनका रहन-सहन बदल चुका होता है। शहर में वे क्या काम करते हैं, उन्हें किस प्रकार के संकटों का सामना करना पड़ता है, यह गांव में कोई नहीं जानता। उन्हें केवल उनकी बदली हुई लाइफ-स्टाइल ही दिखाई देती है। इसी वजह से अन्य युवक भी शहर जाने के मोह में फंस जाते हैं। अभिभावकों को भी यह लगने लगता है कि शहर जाने से उनके बेटों का भी भला होगा और इसी भ्रम में वे अपने लड़कों को भी शहर भेज देते हैं।
इन सभी परिस्थितियों का अगर सही-सही निरीक्षण किया गया तो यह समझ में आएगा कि मनुष्य रूपी प्राणी अगर किसी अन्य अनजान प्राणी की आहट भी सुनता है तो वह घबरा जाता है, उत्तेजित हो जाता है, आक्रामक हो जाता है। अतः स्थालांतर का परिणाम होना भी स्वाभाविक ही है।
विकास हर किसी का स्वप्न है। बिना सड़क वाले किसी अंधेरे गांव को भी विकास की आस है। वे भी दुनिया को अपनी मुट्ठी में करना चाहते हैं। परंतु उन सपनों में नियोजन न होने के कारण शहरों में उनकी भीड़ बड़ रही है। शहरों की भीड़ और झोपड़पट्टियों में इन सपनों के स्मारक दिखाई देते हैं। इस स्थलांतर की प्रक्रिया के सामाजिक और राजनैतिक परिणाम भी हैं। वास्तविक रूप से देखा जाए तो मानवी संस्कृति का इतिहास ही स्थलांतर का इतिहास है। रोजी-रोटी के साधन अत्यल्प होने के बावजूद भी मनुष्य स्थलांतर करते थे। स्थलांतर से ही मानव संस्कृति विकसित हुई है। स्थलांतर से ही अनेक संस्कृतियों का उदय हुआ है। अमेरिकी संस्कृति इसका स्पष्ट उदाहरण है। अब वैश्वीकरण के कारण दुनिया सिमट गई है। इसके कारण स्थलांतर भी बहुत आसान हो गया है। परंतु इससे एक संकुचित प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। इस स्थिति से आतंकित स्थलांतरित, अलग-अलग समस्याओं को झेलने वाले स्थानीय नागरिकों एवं उनकी परिस्थितियों का फायदा उठाने वाले राजनेता उत्पन्न हुए हैं। रेल के डिब्बों में जगह न मिलने, शहर की गलियों में गटर भरने, गंदगी बढ़ने, महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों के बढ़ने, सामाजिक स्तर पर होने वाले सांस्कृतिक अपमान आदि समस्याओं से स्थानीय लोग आहत होते हैं।
सामाजिक ध्रुवीकरण आज के राजनेताओं की आवश्यकता है। जब तक बाहरी शत्रु निर्माण नहीं होता तब तक स्थानीय लोग आंदोलित नहीं होते। विकास की कोई योजना अगर दिमाग में न हो तो मनभेद करने का खेल बहुत आसान होता है। शहर के स्थानीय लोगों का विकास करने की तुलना में बाहर से आए स्थलांतरितों को लक्ष्य बनाना आसान होता है। मूलत: भारतीय राजनीति का कद ही कम होने के कारण यह बड़े ही स्वाभाविक तरीके से हो जाता है। फिर हर शहर को बाहर से आए लोगों का डर दिखाया जाता है। कल-परसों तक रांची को अपना मानने वाला बिहारी बाबू झारखंड राज्य का निर्माण होते ही अलग प्रांत का हो जाता है। हालांकि देश भर के सभी शहरों में विस्थापितों के, स्थलांतरितों के समान सूत्र दिखाई देते हैं। राज ठाकरे ऐसे इकलौते राजनेता नहीं हैं जिन्होंने प्रांतवाद के मुद्दे को उपस्थित करके चुनावों में मतदाताओं को रिझाने का प्रयास किया। राहुल गांधी ने भी उत्तर प्रदेश चुनाव प्रचार के दौरान वहां के युवाओं से कहा था कि ‘कब तक आप लोग महाराष्ट्र जाकर भीख मांगेंगे? कब तक दिल्ली-पंजाब में मजदूरी करेंगे?’ दिल्ली की पूर्व मुख्य मंत्री शीला दीक्षित ने भी दिल्ली की स्थानीय समस्याओं के लिए बाहर से आए हुए लोगों को ही दोषी ठहराया था। असम, पंजाब में भी बाहर से आए हुए लोगों पर हमेशा ही हमले होते रहते हैं। भारत के हर राज्य ने इस आग की तपिश को कभी न कभी सहा है। कर्नाटक में भी साठ क े दशक में आंदोलन हुआ था। तमिलनाडु और केरल से स्थलांतरित हुए लोग इस आंदोलन के केंद्र थे। उत्तर भारतीय लोगों के विरुद्ध भी इसी तरह का आंदोलन छेड़ा गया था। पश्चिम बंगाल में बिहारियों के लिए आज भी स्थिति तनावपूर्ण ही है। दो-चार वर्षों पूर्व पंजाब में भी इसी तरह की लड़ाई हुई थी। पूर्वोत्तर भी इससे अछूता नहीं है। असम की हिंसक घटनाओं के कारण स्थलांतरितों की समस्याएं शीर्ष पर पहुंच गई हैं। यह समस्या केवल जनसंख्या शास्त्र की नहीं वरन् सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, बहुभाषिक, बहुवर्गीय आदि सभी तरह से मायने रखती है।
स्थलांतर के मुद्दे को देखते समय हमें उसके पीछे की गुत्थी को भी सुलझाना होगा। अपने गांव को छोड़ने वालों की संख्या बहुत बड़ी है। उत्तर प्रदेश के विभिन्न गावों से लखनऊ शहर में जाने वालों की संख्या, महाराष्ट्र के विभिन्न गांवों से मुंबई, पुणे जैसे महानगरों में आने वालों की संख्या बहुत बड़ी है। गांवों से शहरों में और अन्य राज्यों में होने वाले स्थलांतर ने देश की सामाजिक प्रक्रिया को अच्छे और बुरे दोनों परिणाम दिए हैं। भारत की एकता और एकात्मता को निश्चित करने वाले ये स्थलांतर केवल अपनी रोजी-रोटी ही निश्चित नहीं करते, वरन् उन शहरों के सर्वांगीण विकास के वाहक के रूप में भी अत्यधिक योगदान देते हैं। विश्व के सभी प्रमुख शहरों का विकास स्थलांतरित नागरिकों ने अपने कठोर परिश्रम से किया है। उसमें भारत के भी सभी प्रमुख शहरों का समावेश है। अत: गांवों से शहरों की ओर मुड़ी इस श्रमशक्ति या श्रमशीलता का अभिनंदन करना ही चाहिए। परंतु यह विचार भी आवश्यक है कि यह निर्माण क्षमता भारत के गांवों का विकास करने में किस प्रकार योगदान दे सकती है।
जब तक स्थलांतरित वर्ग कम मूल्य पर काम करता रहता है तब तक स्थानीय लोगों को वह अपेक्षित होता है, परंतु भारतीय होने नाते जब वह स्थानीय शहर की सांस्कृतिक, राजनैतिक बातों की ओर ध्यान देने लगता है तो उसे बाहरी और तिरस्कृत नजरों से देखा जाने लगता है। यह चित्र समानता की भावना को स्पष्ट नहीं करता। कहा जाता है कि गांव से शहर आया व्यक्ति शहर को अपना समझने लगता है; परंतु शहर किसी को कभी अपना नहीं समझता। जब बेहतर जीवनशैली के लिए लोग गांव से शहर आते हैं तब उन गांवों का क्या होता है? बस ये मत पूछो!! बिहार, उत्तर प्रदेश, कोंकण के कुछ गांव तो ऐसे हैं जिनके घरों, मोहल्लों में सन्नाटा छाया हुआ है। परंतु ऐसा लगता है जैसे आज की युवा पीढ़ी ने यह निश्चय कर लिया है कि वे इसका परिणाम अपने मन पर होने ही नहीं देंगे। अपने हृदय के दरवाजे जैसेे उन्होंने बंद कर रखे हैं। उनका कहना है जो उनको महीने की पहली तारीख को वेतन देगा वही उनका शहर होगा। अपना घर, गांव आदि कोई भी भावना आज के युवा में दिखाई नहीं देती। एक सूटकेस, एक म्यूजिक सिस्टम और एक माइक्रोवेव ओवन के आधार पर वह अपने जीवन को आगे बढ़ा रहा है। आज का युवा आत्मसम्मान के मुद्दे पर दिल से बात करता है। कुछ पैसे कम मिले तो कोई बात नहीं पर उसके इंसान होने की कद्र होनी चाहिए। गांव में बेरोजगार, दलित, गरीब के रूप में होने वाला अत्याचार उसे सहन नहीं होता। यह हमारा दुर्भाग्य है कि युवा गांव में रह कर इस अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करने को तैयार नहीं होता। उसका आत्मसम्मान तो जागृत हो जाता है परंतु आर्थिक, सामाजिक, जातिगत स्तर पर वह उस व्यवस्था को काट नहीं दे पाता। ऐसा ही युवा वर्ग गांव से शहर की ओर स्थलांतर करता है। वह कहता है कि अगर मैं शहर में चाय की छोटी सी गाड़ी भी लगाता हूं तो लोग मेरे हाथ की चाय पीते हैं। वे चाय पीते समय मेरी जाति नहीं पूछते। गांव में काम तो करवा लिया जाता है पर पैसा तो छोड़ो सम्मान भी नहीं मिलता। हर ताकतवर कमजोर को दबाने का काम करता है। वास्तविकता का यह पहलू देखने के बाद प्रश्न उठता है कि क्या युवा वर्ग इसलिए स्थलांतर कर रहा है कि उसमें आत्मसम्मान जागृत हो गया है और अब पीढ़ियों से चले आ रहे अन्याय से वह अपने आप को मुक्त करना चाहता है?
भारत के अनेक गावों में खेती के अलावा भी रोजगार के अनेक मौके उपलब्ध हैं। साधन भले न हों पर मौके अवश्य हैं। प्रश्न है केवल बदलती हुई मानसिकता का। आज की युवा पीढ़ी केवल परिस्थिति के कारण स्थलांतरित नहीं हो रही है, उसके पीछे शहरी जीवनशैली का मोह भी एक कारण है। पिछले कुछ समय में रामलीला, शादी-ब्याह, या जनजागृति अभियान के अंतर्गत साल में एकाध बार होने वाले नुक्कड़ नाटक के अलावा अधिकतर गांवों में सांस्कृतिक दृष्टि से अधिक कुछ नहीं होता। संगीत, नृत्य, कला गांवों में निम्न स्तर तक पहुंची ही नहीं है। गांव को एक विचारधारा में बांधने वाले नीतिगत नेतृत्व के अभाव के कारण सामाजिक उपक्रम गांवों से गायब हो गए हैं। ऐसे में शैक्षणिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संस्कारहीन युवा वर्ग शहरों में आता है। गांवों के दबावग्रस्त वातावरण में पला-बढ़ा युवक जब शहरी जीवन शैली के मोह में बंधा शहर के मुक्त वातावरण में स्थलांतर करता है तो उसे शहरी सभ्यता के नियमों के पालन का ध्यान नहीं रहता। उसकी यही जाहिल और गैरजिम्मेदार प्रवृत्ति विरोध का मुख्य कारण बन जाती है।
स्थलांतरितों की समस्या उस कथा की तरह है जिसमें अंधों को हाथी को छूने के लिए कहा जाता है। पूरा हाथी किसी के भी हाथ में नहीं समाता। उसी तरह ही यह समस्या भी मुट्ठी से धीरे-धीरे रेत की तरह फिसलती चली जा रही है। जो इस समस्या की ओर देख रहे हैं वे इसे सामाजिक दृष्टिकोण से न देखते हुए राजनैतिक दृष्टिकोण से देख रहे हैं। किसी को भी इस समस्या को जड़ से सुलझाने का प्रयत्न नहीं करना है। युवा गांव में श्रम करने को तैयार नहीं हैं। अत: कहीं ऐसा न हो कि भविष्य में इस समस्या पर नियंत्रण रखने की बजाय यह और विकराल रूप ले लें। यह तो सत्य है कि स्थलांतर की इस समस्या ने आज समाज के सामने नई चुनौती उपस्थित कर दी है।
कभी पेट भरने के लिए, कभी रोजगार के लिए, कभी पानी के लिए अपनी पीठ पर अपनी दुनिया उठाए स्थलांतरित, विस्थापित घुमना मानव का इतिहास है। पर क्या यही उसका वर्तमान भी होना चाहिए? आज भी जीने के लिए क्यों किसी को अपने गांव, अपनी जड़ों से से उखड़ कर जाना पड़े? क्यों आज चार बाल्टी पानी के लिए लोगों को अपने खेत-गांव छोड़ कर शहरों का रुख करना पड़े? आज के आधुनिक युग में भी गांव और विस्थापन की समस्या का इतना विकराल रूप धारण करना हमारा दुर्भाग्य है। हो सकता है कि अगले कुछ वर्षों में स्थलांतर को नकार देकर अपने गांव, अपनी भूमि में ही आत्मसम्मान के साथ रोजगार की सत्ताधारियों से मांग करने वाली नई पीढ़ी भी ग्रामीण क्षेत्रों में जन्म ले!
माना, है घने अंधेरे हाथ फैलाए जकड़ने के लिए,
लाखों तारे, चॉंद-सूरज भी तो है रोशनी के लिए।

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