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पूर्वोत्तर में टैटू फैशन नहीं, परम्परा का अंग है। आधुनिकता के बावजूद कबीलाई युवक गोदवाना पसंद करते हैं। हालांकि, कबीलाई प्रतीकों की जगह आधुनिक प्रतीकों ने उसका स्थान ले लिया है। इससे  पूर्वोत्तर में मरती जा रही इस प्रथा में नई जान आ गई है।

क बार अरुणाचल प्रदेश के खूबसूरत इलाके जीरो जाना हुआ। वह इलाका अपातानी जनजाति बहुल है। वहां की वादियां तो मदमस्त करती ही हैं, लोगों का स्वभाव भी अतिथियों के प्रति अच्छा है। वहां पर घूमते हुए मैंने कई महिलाओं के गाल पर टैटू देखा। इस वजह से उनका सुंदर चेहरा थोड़ा विकृत भी लग रहा था। इसके पहले मैंने नागालैंड के मर्दों के हाथों में भी अलग-अलग तरह के टैटू देखे थे। जिज्ञासा हुई, आखिर इसका कारण क्या है? कई लोगों से बात की, कुछ पुस्तकों का अध्ययन किया। उसके बाद मैं एक निष्कर्ष पर पहुंचा। उसका निचोड़ इस प्रकार है।

पूर्वोत्तर में सदियों से महिलाओं में टैटू (गोदना) की परंपरा रही है, भले ही इन दिनों देश-विदेश में टैटू फैशन का एक नया प्रतिमान बन गया है। लेकिन पूर्वोत्तर के जनजातीय समाज में टैटू परंपरा सदियों पुरानी है। उनका मकसद भी बिल्कुल भिन्न हुआ करता था। कहने का तात्पर्य यह है कि इसके पीछे एक ठोस वजह और मान्यताएं रही हैं। यही वजह है कि शिक्षा के प्रसार और जनचेतना के विकास के दौर में शामिल होने के बावजूद पूर्वोत्तर के जनजातीय समाज में टैटू की परंपरा आज भी जीवित है। शिक्षित लड़कियां भी फैशन के चलन-प्रचलन की वजह से नहीं, अपनी परंपरा को जीवित और जारी रखने की परिपक्व मानसिकता के साथ टैटू करवाना पसंद करती हैं। वैसे उन वजहों का कोई अस्तित्व उनके समाज में अब नहीं है, जिनकी वजह से टैटू एक परंपरा बनी, लेकिन परंपरा के संस्कृति बन जाने की प्रकिया में यह उनकी जीवनशैली का एक अंग बन गया है।

इसके पीछे कोई अंधविश्वास नहीं, संस्कृति के प्रति आस्था की भावना है। आज के दौर में जनजातीय समाज में सुंदर लड़कियों के चेहरे को परंपरा के नाम पर विकृत करने की प्रथा पर बहस भी होने लगी है, बावजूद इसके स्कूल-कालेज में पढ़ती लड़कियों के चेहरे पर टैटू देखा जा सकता है। अन्य जगहों पर भले ही लोग इसे सौंदर्य से जोड़कर देखते हैं, लेकिन पूर्वोत्तर के कई जनजातीय समाज में सुंदर औरतों को कुरूप बनाने के लिए उनके चेहरे पर टैटू बनाए जाते हैं, ताकि दूसरे कबीले उनका अपहरण नहीं कर सकें। उनमें अरुणाचल प्रदेश का अपातानी जनजातीय समाज भी शामिल है। अपातानी जनजाति में सुंदर लड़कियों को कुरूप बनाने के लिए टैटू का इस्तेमाल होता था, ताकि दूसरे जनजातीय समाज के लोग उसके प्रति आकर्षित न हों। पहले तो उनकी जीवन शैली कबीलाई थी, समाज का रूप तो बाद में आया। कबीलाई जीवन में ताकत ही सबकुछ होता है। जिसके पास ताकत हो, वह कुछ भी छीन लेता था।

अरुणाचल प्रदेश अपातानी जनजाति की लड़कियां बेहद सुंदर होती हैं। वहां का प्राकृतिक नजारा भी काफी सौंदर्यमय है। पास के निशी जनजाति के लोग अक्सर अपातानी लड़कियों का अपहरण करके अपने घर पर रख लेते थे। उन्हें दासी बनाकर रखते थे। क्योंकि निशी समुदाय की तुलना में अपातानी लड़कियां ज्यादा सुंदर होती हैं। इससे बचने के लिए अपातानी समुदाय के बुजुर्गों ने लड़कियों के चेहरे को कुरूप बनाने की चलन आरंभ कराई।  इसके साथ ही नाक में गोलाकार आकृति वाली बड़ी नथुनी पहनना आरंभ हुआ। इससे सुंदरता कम हो जाती है। टैटू लड़कियों के ओंठ की नीचे कराई जाती थी। जिसमें छह लंबी लाइन रहती है। जिसका रंग नीला रहता है। टैटू करवाना तब बेहद कष्टकारक था। तब टैटू के लिए किसी बंदूक और विशेष प्रकार की स्याही का इस्तेमाल नहीं होता था। इसके लिए चाकू से गाल के नीचे हिस्से पर चीरे लगाए जाते थे, फिर उन चीरों का रंग गहरा नीला करने के लिए उन पर जानवरों की चर्बी की लेप लगाई जाती थी।  टैटू की लाइन मोटी और गहरी हो, इसके लिए जख्मों में संक्रमण होने दिया जाता था। इस क्रम में टिटनेस आदि से कई बार लड़कियों की मौत हो जाती थी, क्योंकि तब इलाज के आधुनिक साधन उपलब्ध नहीं थी। जिस लड़की का टैटू कराया जाता था, वह काफी दिनों तक कष्ट में रहती थी।

यह वजह है कि सन 1970 में इस प्रथा पर अरुणाचल सरकार ने प्रतिबंध लगवा दिया। बावजूद इसके काफी लड़कियां आज भी टैटू करवाना पसंद करती हैं, हालांकि अब तरीके बदल चुके हैं। अब यह प्रथा उतनी पीड़ादायक नहीं रही है। राज्य सरकार भी लोगों के नाराज होने के भय से इस प्रथा के खिलाफ सख्ती नहीं बरतना चाहती।

ऐसा नहीं है कि पूर्वोत्तर में टैटू का प्रयोग सिर्फ सुंदर स्त्रियों के बचाव के लिए उनके चेहरे को कुरूप बनाना होता है। कुछ जनजातियों में इसका इस्तेमाल अपनी अलग पहचान के लिए भी किया जाता है। अलग-अलग तरह के टैटू उनकी अलग पहचान को बताते हैं। असम और अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती इलाके में सिंग्फू जनजाति रहती हैं। टैटू को लेकर इनके अपने रिवाज और प्रचलन हैं। इस समुदाय में पुरुष और महिलाएं टैटू कराते हैं। लेकिन सिर्फ विवाहित सिंग्फू महिलाएं ही टैटू करवा सकती हैं। कुंआरी लड़कियों को इसकी इजाजत नहीं मिलती। विवाहित महिलाएं दोनों पैरों में एड़ी से घुटने तक टैटू करवाती हैं। जो उनके कपड़े की वजह से आमतौर पर नहीं दिखते हैं। शिंग्फू पुरुष अपने कूल्हे पर टैटू गोदवाते हैं।

टैटू रिवाज नगा जनजातियों में भी मिलता है। वहां पर इसका इस्तेमाल बहादूरी के लिए किया जाता है। नरमुंडों का शिकार करने वाले कोन्याक नगा अपने ललाट पर टैटू गोदवाते थे। जिनके ललाट पर टैटू रहता था, उन्हें मुख्य नरमुंड शिकारी माना जाता था। टैटू की डिजाइन से पता चल जाता था कि टैटू गोदवाने वाले कोन्याक नगा कितने नरमुंड का शिकार कर चुका है। उन प्रतीकों से यह भी पता चल जाता था कि युद्ध के दौरान उसकी भूमिका का औसत क्या था।

अरुणाचल प्रदेश के नोक्टे और वांचो जनजाति में भी चेहरे पर टैटू कराने का प्रचलन रहा है। दरअसल टैटू के आधार पर समुदाय की विशेष पहचान हो जाती थी। पहले फोटो परिचयपत्र का तो रिवाज था नहीं और न ही यह उपलब्ध था। जब युद्ध या दुर्घटना में किसी का निधन हो जाता था तो उसके चेहरे और शरीर पर गुदे टैटू के आधार पर मृतक के समुदाय की पहचान हो जाती थी। तब उस समुदाय के मुखिया को खबर भेज दी जाती थी। मुखिया आकर शव की पहचान करता था और उसके परिवार वालों को अंतिम श्राद्ध के लिए सौंप देता था। कबीलाई व्यवस्था में टैटू फोटो परिचय पत्र की तरह भी काम आता था, क्योंकि समुदाय विशेष के टैटू की डिजाइन और आकृति अलग-अलग होती थी। जिसके जानकार हर समुदाय के बूढ़े-बुजुर्गों को रहती थी।

समय के साथ-साथ पूर्वोत्तर में टैटू संस्कृति में कई बदलाव आए हैं। आधुनिकीकरण और शहरीकरण का प्रभाव टैटू पर भी देखा जा सकता है। अब यह पहचान की जगह प्रदर्शन और फैशन के रूप में परिणित हो गया है। लेकिन कुछ दर्शाने के लिए पीड़ा सहने का मकसद एक ही है। नागा युवा आज भी अपनी बहादुरी, धैर्य और मर्दानगी प्रदर्शित करने के लिए टैटू गोदवाते हैं। क्योंकि टैटू गोदवाने में दर्द का अहसास होता है। ऐसा भी नहीं है कि अब सभी नगा युवक टैटू गोदवाते हैं। लेकिन चलन तो है ही।

पूर्वोत्तर के युवकों में टैटू गोदवाने की प्रथा में एक परिवर्तन जरूर आया है। अब समुदाय विशेष से जुड़ी परंपरागत आकृतियों  की जगह मनपसंद आकृति को आकार दिलाया जाता है। पूर्वोत्तर के ज्यादातर युवक टैटू के रूप में ड्रैगन, बाघ और अन्य आकृतियां पसंद करते हैं। इसके लिए ज्यादातर काली स्याही का प्रयोग होता है। टैटू के फैशन बन जाने की वजह से पूर्वोत्तर में मरती जा रही इस प्रथा में नई जान आ गई है। उनके गेहुंए या गोरी चमड़ी पर काली स्याही के टैटू खिल उठते हैं और दूर से चमकते हैं।

 

 

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