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सरहेनरी मेनियो मैकॉफ ने ग्राम समुदाय को ‘लघु गणतंत्र’ के समान बताते हुए कहा है कि यह बाह्य संबंधों से बिल्कुल पृथक और विभिन्न राजनीतिक फेरबदल के बावजूद अपरिवर्तित रहा। उनका यह भी कहना है कि ग्रामीण समुदाय के लोगों का जीवन एक-दूसरे पर निर्भर था। वास्तव में भारतीय ग्राम समुदाय एक ‘लघु गणतंत्र’ (टाइनी रिपब्लिक) की भांति ही था; क्योंकि यह उन सभी शर्तों को पूरा कर रहा था जो एक गणतंत्र के लिए अनिवार्य मानी जाती हैं, जैसे-आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था, प्रशासन और न्याय। अगर उस समय के गांवों को वर्तमान गणतंत्रीय अवधारणा के सापेक्ष देखें तो यह निष्कर्ष निकालने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए कि उस समय के गांव उत्पादन, उद्यमिता और प्रशासन के मामले में आत्मनिर्भर थे। यही वजह रही होगी कि उस समय गांवों की आबादी नगरों की बजाए गांवों में ही रोजगार पैदा करने में सक्षम थी। उस समय आज जैसी ग्राम से नगर की ओर पलायन की समस्या नहीं थीं। धीरे-धीरे गांवों की हैसियत कमजोर पड़ी, जबकि वे राज्य के लिए आर्थिक स्रोत ठीक उसी प्रकार से बने रहे, जैसे वे पहले रहे थे। आज़ादी के बाद बहुत कुछ बदला लेकिन गांव अपनी पुरानी हैसियत प्राप्त नहीं कर पाए। परिणाम यह हुआ कि ग्रामीण युवा ग्रामीण उद्यमिता के अभाव में अपने भविष्य की तलाश करने शहरों की ओर निकाल पड़ा। शहरों की ओर पलायन की यह गति लगातार तेज ही होती जा रही है। अब यहां पर तीन प्रश्न हैं- प्रथम यह कि क्या ग्रामीण युवा में उद्यमिता की संभावनाएं वैसी ही हैं, जैसी शहरी युवा में? द्वितीय-क्या गांव युवा उद्यमिता के मौलिक आधार बन सकते हैं अथवा नहीं? और तृतीय-क्या सरकारें नगरों की तरह गांवों में भी उद्यम स्थापना के प्रति प्रतिबद्ध हैं, जहां ग्रामीण युवा संभावनाएं तलाश सकें।
यदि ग्रामीण अंचलों में गंभीरता से झांक कर देखा जाए तो स्पष्ट हो जाएगा कि अभी भी ग्रामीण इलाके के लिए उद्यम का प्रमुख क्षेत्र कृषि ही है। यदि ‘सामजिक, आर्थिक एवं जाति आधारित जनगणना-२०११‘ के अंतिम आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि देश के ६४० जिलों में रहने वाले शहरी और ग्रामीण परिवारों की कुल संख्या २४.३९ करोड़ है। इसमें से ग्रामीण क्षेत्रों में कुल १७.९१ करोड़ परिवार रहते हैं, अर्थात लगभग ७३ प्रतिशत परिवार ग्रामीण हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि ५.३७ करोड़ यानी २९.९७ प्रतिशत ग्रामीण परिवार भूमिहीन हैं और ५१.१४ प्रतिशत ग्रामीण परिवार दैनिक मजदूरी पर तथा ३०.१० प्रतिशत ग्रामीण परिवार कृषि पर निर्भर हैं। उम्मीद की जा सकती है कि कृषि पर लोगों की निर्भरता और सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की हिस्सेदारी के बीच जितना बड़ा अंतर है, उसी अनुपात में गांव का युवा कार्य से वंचित है या वंचित होने की संभावना से ग्रस्त होगा। वैसे सामान्य स्थिति में भी कृषि में वर्ष भर रोजगार निर्मिति नहीं होती इसीलिए ग्रामीण युवाओं को बेरोजगारी/ अर्ध-बेरोजगारी की समस्या का सामना करना पड़ता है। अतिरिक्त आय का निर्माण न हो पाने के कारण, उद्यमों की ओर ग्रामीण युवाओं का रुझान नहीं हो पाता। परिणाम यह होता है कि यह ग्रामीण युवा शहर की ओर उद्यम की तलाश में प्रवर्जित होता है। लेकिन इसके लिए कुशलता की जरूरत है, अकुशलों के लिए नगरों में भी संभावनाएं नहीं होती हैं। पलायन के बाद भी उनकी कठिनाइयां दूर नहीं होतीं जिससे कभी-कभी वे कुंठा के शिकार होते हैं जिससे उनकी उद्यमिता की जो विशेषता विद्यमान होती है, उसका भी धीरे-धीरे क्षय होने लगता है। इस विपरीत परिणाम देने वाली स्थिति का निर्माण इसलिए अधिक हुआ है क्योंकि भारतीय युवाओं में जिस मनोविज्ञान का निर्माण हुआ है अथवा किया गया है, उसके केन्द्र में नौकरी है, उद्यम नहीं। जबकि वास्तविक राह उद्यमिता के विकास से ही होकर जाती है। इसलिए आज की जरूरत यह है कि हमारा युवा वर्ग एक सफल उद्यमी बनने का मनोविज्ञान विकसित करें या स्वप्न देखें ताकि वह स्वयं रोजगार तलाश न करें बल्कि रोजगार पैदा करें।
वर्तमान में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का शुद्ध घरेलू उत्पाद १३,७०,००० करोड़ रुपये या ३०४ बिलियन डॉलर से अधिक है और ग्रामीण सकल घरेलू उत्पाद करीब १५,४६,०१८ करोड़ रुपये या ३४३ बिलियन डॉलर है। सूचना तथा संचार प्रौद्यागिकी ग्रामीण जनता तक तेजी से पहुंच रही है। और भारत के गांव सूचना, प्रौद्यगिकी तथा बाजार तक पहुंच के संदर्भ में निरंतर समानता हासिल कर रहै हैं। संभावनाओं के दोहन के लिए उचित दक्षता निर्माण तथा प्रौद्योगिकी के मिश्रण से यह इलेक्ट्रॉनिक संपर्क ज्ञान और आर्थिक रिटर्न के निर्बाध प्रवाह का रास्ता साफ कर सकता है। हालांकि वित्तीय सेवाओं के संदर्भ में ग्रामीण आधार को मजबूत करने के लिए नीति-स्तर पर महत्वपूर्ण जोर रहा है, लेकिन हाल में सम्पन्न हुई सामाजिक-आर्थिक जनगणना काफी भिन्न निष्कर्षों के लिए जगह बनाती हुई दिख रही है। विकास की नई व्यवस्था में संपर्क साधनों में सुधार, बेहतर माहौल तथा आर्थिक कारकों के कारण कई उद्योग तथा शैक्षणिक संस्थान गांवों की ओर आकर्षित हुए हैं।
वर्तमान समय में करीब ४० प्रतिशत कॉलेज और २० प्रतिशत प्रोफेशनल कॉलेज ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं। यही नहीं यह हिस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है। खास बात यह है कि इन संस्थाओं में कई विद्वान स्वयंसेवक तथा भावी उद्यमी होते हैं जो दक्षताओं को आमदनी तथा मानव विकास में बदलने के लिए बेहतर प्रौद्योगिकी, वृहद् एकीकरण तथा अधिक सक्षम प्रबंधन का इस्तेमाल कर सकते हैं। यदि शैक्षणिक संस्थानों, व्यावसायिक संस्थानों और स्वयंसेवकों का ओर पलायन हो रहा है, इसके अर्थ दो हुए। एक यह कि वे ग्रामीण युवाओं में कुशलता, दक्षता एवं उद्यमिता की संभावनाओं का निर्माण करने के लिए यत्नशील हैं। अब आवश्यक यह है कि ग्रामीण युवा तकनीक व कौशल के क्षेत्र में दक्षता हासिल करने के लिए आगे आए; क्योंकि तकनीकी दक्षता हासिल किए बिना आज के युग में उद्यम प्रतियोगिता में सफलता अर्जित कर पाना बेहद मुश्किल होगा।
दरअसल उद्यमिता किसी वर्ग, किसी स्थान, किसी जाति, धर्म या क्षेत्र से प्रेरित और उस पर आधारित नहीं होती है। यह वैयक्तिक गुणों कें साथ -साथ सामूहिक प्रयासों पर निर्भर करती है। लेकिन इसके साथ-साथ युवाओं में उद्यमिता की भावना का भरना बेहद जरूरी है। हालांकि इसके लिए ठोस एवं नियोजित ढंग से कदम उठाने की आवश्यकता होगी। इसके लिए ग्रामीण युवाओं को संगठित करके उनमें कौशल का विकास करना होगा, उन्हें शहरी युवाओं के साथ लाना होगा, उन्हें डिजिटल कनेक्ट करना होगा और इस सबसे पूर्व ग्रामीण युवाओं के अभिभावकों की सोच में परिवर्तन लाना होगा। उद्यमिता की संभावनाओं के निर्माण के लिए यह जरूरी है कि पहले ग्रामीण युवाओं तक उद्यमों से संबधित नए ज्ञान, नई सूचनाएं एवं आवश्यक जानकारियां पहुंचाई जाएं ताकि उनमें उद्यमिता के प्रति अभिरूचि एवं ज्ञान पैदा हो। उद्यमिता के विकास के लिए उनमें कुछ आवश्यक गुणों का निर्माण जरूरी होगा, जैसे-नई उपलब्धियों और संभावनाओं के प्रति संचेतना, जोखिम उठाने की प्रवृत्ति, सकारात्मक सोच, पहल करने का साहस, चुनौतियों से निपटने की क्षमता, वातावरण को विश्लेषित करने की इच्छा, प्रयासों की सातत्यता, सूचनाओं को संकलित करते रहने की विशेषता, अवसरों की तलाश आदि।
विदेशी हुकूमत ने अनजाने ही क्यों न हो, शिक्षा के क्षेत्र में अपने काम की शुरूआत बिना चूके बिल्कुल छोटे बच्चों से की है। हमारे यंहा जिसे ‘प्राथमिक शिक्षा’ कहा जाता है वह तो एक मजाक है, उसमें गांवों में बसने वाले हिन्दुस्थान की जरूरतों और मांगों का जरा भी विचार नहीं किया गया है; और उसमें शहरों का भी कोई विचार नहीं हुआ है। बुनियादी शिक्षा का उद्देश्य दस्तकारी के माध्यम से बच्चों का शारीरिक, बौद्धिक और नैतिक विकास करना है। लेकिन मैं मानता हूं कि कोई भी पद्धति जो शैक्षणिक दृष्टि से सही है, जो अच्छी तरह चलाइ जाए, आर्थिक दृष्टि से भी उपयुक्त सिद्ध होगी।
बुनियादी शिक्षा की विशिष्ट बातें
* पूरी शिक्षा स्वावलम्बी होनी चाहिए, यानी आखिर में पूंजी को छोड़ कर अपना सारा खर्च उसे खुद देना चाहिए।
* इसमें आखिरी दर्जे तक हाथ का पूरा-पूरा उपयोग किया जाए।
* सारी शिक्षा विद्यार्थियों की प्रांतीय भाषा द्वारा दी जानी चाहिए।
* इसमें साम्प्रदायिक, धार्मिक शिक्षा के लिए कोई जगह नहीं होगी। लेकिन बुनियादी नैतिक शिक्षा के लिए काफी गुंजाइश होगी।
* यह शिक्षा विद्यार्थियों के घरों तक पहुंचेगी।
चूंकि इस शिक्षा को पाने वाले लाखों -करोंड़ों विद्यार्थी हिन्दुस्तान के नागरिक ही होंगे, इसीलिए उन्हें एक अंतर-प्रांतीय भाषा सीखनी होगी। सारे देश की यह एक भाषा देवनागरी या उर्दू में लिखी जाने वाली हिन्दुस्तानी हो सकती है। दुर्भाग्यवश आज के ग्रामीण युवा में इन चीजों का अभाव है। आज के युवा का सम्पर्क तकनीक से है, लेकिन बुनियादी शिक्षा के अभाव के कारण वह उसका प्रयोग उत्पादन साधन के रूप में न करके उपभोगवादी वस्तु के रूप में करता है। ऐसे में उसकी संभावनाओं का क्षरण होता है ना कि संवृद्धि; फलत: उसमें उद्यमिता संभावनाएं कमतर होती जाती हैं। हालांकि केन्द्र और राज्य सरकारों की तरफ से बहुत से ऐसे कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं जो ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षण, शिक्षण एवं संवादों के जरिए उद्यमिता के लिए प्रेरित व प्रशिक्षित करते हैं, विशेषकर स्वरोजगार के लिए प्रशिक्षण, कौशल्य विकास कार्यक्रम आदि। कौशल विकास एवं उद्यमिता के लिए राष्ट्रीय नीति २०१५ का वजन ‘‘उच्च मानकों सहित रफ्तार के साथ बड़े पैमाने पर कौशल प्रदान करते हुए सशक्तिकरण की व्यवस्था तैयार करना और उद्यमिता पर आधारित नवाचार की संस्कृति को बढ़ावा देना है, जो देश में सभी नागरिकों की स्थायी आजीविका सुनिश्चित करने के लिए धन एवं रोजगार का सृजन कर सके। ’’ किसी भी देश के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए कौशल और ज्ञान दो प्रेरक बल होते हैं। वर्तमान वैश्विक माहौल में उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुख्य चुनौती से निपटने में वे देश आगे हैं, जिन्होंने कौशल का उच्च स्तर प्राप्त कर लिया है। कौशल विकास ही युवाओं को उद्यमिता की ओर प्रेरित कर सकता है और उद्यमिता में उनकी सहभागिता विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहयोगी हो सकती है। भारत के पास लगभग ६० करोड़ लोग २५ वर्ष से कम आयु के हैं। ये भारत की वह पूंजी है, जिसे लाभांश के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन यह तभी संभव है जब इनकी सम्बद्धता उद्यमिता से हो अन्यथा यह विनाशकारी भी साबित हो सकती है।
उल्लेखनीय है कि कौशल विकास एवं उद्यमिता नीति में चार प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान दिया गया है। यह नीति कम अपेक्षित मूल्य, औपचाीरक शिक्षा से एकीकरण का अभाव, निष्कर्ष पर ध्यान देने का अभाव, प्रशिक्षण के लिए अच्छी बुनियादी सुविधाओं और प्रशिक्षकों का अभाव आदि सहित कौशल सम्बंधी प्रमुख बाधाओं को दूर करती है। वर्तमान खामियों को दूर करने के साथ-साथ यह नीति उद्योग से सम्बंध को बढ़ावा देते हुए गुणवत्तापूर्ण भरोसेमंद प्रारूप के परिचालन, प्रौद्योगिकी को बल प्रदान करने और प्रशिक्षण के व्यापक अवसरों को बढ़ावा देकर कौशल्य के लिए आपूर्ति एवं मांग को व्यवस्थित करती है। नीति में निष्कक्षता पर विशेष ध्यान दिया गया है, जो सामाजिक/ भौगोलिक रूप से हाशिये पर रहने वालों और वंचित वर्गोें के लिए कौशल अवसरों पर लक्षित है (इसमें महिलाएं भी शामिल हैं)। इस नीति में उद्यमियों को परामर्शदाताओं/ सहायकों और ऋण बाजारों से जोड़ने, नवाचार एवं उद्यमिता संस्कृति को प्रोत्साहन देने, कारोबार करने को और सुगम बनाने तथा सामाजिक उद्यमिता पर ध्यान केंद्रित करने को बढ़ावा दिया जाना भी शामिल है। इसके तहत इस वर्ष २४ लाख युवाओं को प्रशिक्षण के दायरे में लाया जाएगा। कौशल प्रशिक्षण नेशनल स्किल क्वालिफिकेशन फे्रमवर्क (एनएसक्यूएफ) और उद्योग द्वारा तय मानदंडों पर आधारित होगा। इसका जैसे ग्रामीण क्षेत्र में प्रसार होगा, ग्रामीण युवा स्वयं को उद्यमिता के लिए वर्क स्पेस का निर्माण स्टार्टअप, मेक इन इंडिया, स्टैंडअप, उज्ज्वला, अमृत जैसी स्कीमों के द्वारा करेंगे। इसमें सब से महत्वपूर्ण भूमिका डिजिटल इंडिया योजना निभा सकती है। डिजिटल इंडिया योजना के ९ स्तंभों, यानी -ब्रॉडबैंड हाइवे, यूनिवर्सल एक्सेस टू फोन्स, सार्वजनिक इंटरनेट एक्सेस कार्यक्रम, ई-गवर्नेस, ई-क्रांति, इंफोर्मेशन फॉर ऑल, इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन, आईटी फॉर जॉब्स और अर्ली हार्वेस्ट प्रोग्राम में से कम से कम ६ स्तम्भ ऐसे हैं जो ग्रामीण युवाओं में आज की व्यावसायिक शिक्षा, प्रशिक्षण एवं बाजार व्यवस्था से तेजी से जोड़ने का कार्य कर सकते हैं। भारत निर्माण जैसी योजनाओंं ने ग्रामीण इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास किया है, वह गांव से शहरों को कनेक्ट करेगा जिससे उद्यानिकी, मत्स्यिकी, खाद्य प्रसंस्करण, कृषि अनुसंधान, हस्तशिल्प, पशुधन, हस्तकुटीर, ग्रामीण क्षेत्र में पैदा हो रही सेवाओं की मांग युवाओं के लिए उत्प्रेरक का कार्य करेगी। लेकिन इसके लिए जरूरी होगा कि बॉटम अप गवर्नमेंट में सुधार हो।
बहरहाल प्रत्येक युवा चाहे वह शहरी हो या ग्रामीण उसमें उद्यमिता के प्रति रुझान बढ़ रहा है, जिसकी पुष्टि स्टार्टअप्स की बढ़ती हुई संख्या से भी की जा सकती है। रही बात ग्रामीण युवा की तो पहले गांव में उद्यमिता की बुनियाद रखनी होगी, तत्पश्चात युवाओं को कौशलयुक्त बना कर उस दिशा में मोड़ने की जरूरत होगी। अभी समस्त प्रक्रिया में समय लगेगा, लेकिन ऐसा करना होगा; क्योंकि यही श्रेष्ठ विकल्प है।

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