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जब हम गांवों की बात करते हैं तो दिमाग में लहलहाते हुए हरे- भरे खेत कौंधते हैं और सरकारी विज्ञापनों या पुरानी हिंदी फिल्मों में हंसते-गाते दिखने वाले किसान और ग्रामीण याद आ जाते हैं। लेकिन उन्हीं गांवों-खेतों की दूसरी तस्वीर यह भी है कि साल २०१४ में ५,६५० किसानों ने मौत को गले लगा लिया। उनमें २,८०० से ज्यादा तो महाराष्ट्र में ही थे। अगले साल आंकड़ा बढ़ गया और २०१५ में केवल महाराष्ट्र में ३,२२८ किसानों ने जान दे दी। जान देने की वजहें एक जैसी थीं – सूखा पड़ना, फसल बर्बाद हो जाना और कर्ज चुकाने में नाकाम रहना। तस्वीर का यह रुख बता रहा है कि गांवों में सब कुछ उतना अच्छा नहीं है, जितना वहां से दूर बैठे हम लोग मानते हैं। अगर इतने किसान खेती में सब कुछ डूब जाने या गले तक कर्ज में फंसे रहने के कारण जान दे रहे हैं तो इसका मतलब है कि उनके पास रोजगार के साधन एकदम नाकाफी हैं।
वाकई समस्या यहीं से शुरू होती है। भारत के कृषि प्रधान देश होने के कारण हम मान लेते हैं कि ग्रामीणों को खेती से ही भरपूर रोजगार मिल जाता होगा। लेकिन जमीनी हकीकत अलग है और उसे इस साल पेश की गई आर्थिक समीक्षा बखूबी बयां करती है। २०१५-१६ की इस समीक्षा में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के आंकड़ों का हवाला दिया गया था और बताया गया था कि २०११-१२ में गांवों में बेरोजगारी की दर २.३ प्रतिशत थी, जो २०१३-१४ में बढ़कर ४.५ प्रतिशत हो गई।
सच कहा जाए तो आंकड़े और भी बदतर हो सकते हैं क्योंकि रोजगार की तलाश में शहर चले गए ग्रामीण अक्सर इन सर्वेक्षणों में शामिल ही नहीं हो पाते अन्यथा बेरोजगारी की दर ज्यादा भी हो सकती है। आंकड़े नहीं होते तो भी हममें से लगभग हर व्यक्ति जानता है कि शहरों के मुकाबले गांवों में बेरोजगारी ज्यादा सालने वाली है। दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में उत्तर प्रदेश और बिहार से आए ऐसे तमाम रिक्शे-ठेले वाले मिल जाएंगे, जो असल में किसान हैं, लेकिन साल के चार या छह महीने जब फसल नहीं होती है तो कमाई के लिए शहर चले आते हैं। कई बार परिवार बड़ा और खेती लायक जमीन छोटी होने पर भी ऐसा ही होता है। महानगरों की ही नहीं, छोटे शहरों में भी गांव से आए बेरोजगारों की ऐसी जमात नजर आ जाती है।
लेकिन सवाल यह उठता है कि देश भर का पेट पालने वाले गांवों की तस्वीर ऐसी क्यों है और इसे बदलने का क्या तरीका है? सरकार के पास इस तस्वीर को बदलने का एक ही ठोस तरीका है, जिसे वह आजमा भी रही है और वह है मनरेगा। इसके लिए चालू वित्त वर्ष में बजट भी बढ़ा कर ३८,५०० करोड़ रुपये कर दिया गया है, जो पिछले वित्त वर्ष में ३५,७६६.७५ करोड़ रुपये था। मनरेगा के तहत ग्रामीणों को निश्चित दिनों तक रोजगार दिया जाता है ताकि उन्हें निश्चित आय हो सके। बेशक सूखे आदि से परेशानी में घिरे ग्रामीण क्षेत्र को इससे फौरी मदद मिल जाती है, लेकिन असल में यह चोट पर ‘बैंड-एड’ चिपकाने जैसा ही है, जिससे चोट छिप तो जाती है, ठीक नहीं होती। जिन दिनों में मनरेगा के तहत काम नहीं मिलेगा, उन दिनों में वही ग्रामीण क्या खाएगा? इसलिए ग्रामीण बेरोजगारी की तह तक जाना होगा।
तह में जाने पर ग्रामीणों की बेरोजगारी की पांच मुख्य वजहें नजर आती हैंः खेती पर हद से ज्यादा निर्भरता, अशिक्षा, कौशल या हुनर की कमी, पूंजी की कमी और बाजार की कमी। सबसे बड़ी वजह तो खेती पर हद से ज्यादा निर्भरता ही है। गांवों में जो परिवार खेती करते हैं, वहां अक्सर दूसरा कोई व्यवसाय देखने को नहीं मिलता। पूरा परिवार खेती पर ही निर्भर होता है। ऐसे में यदि फसल बर्बाद हो जाए या हद से ज्यादा अच्छी फसल होने पर दाम एकदम जमीन पर आ जाएं तो पूरे परिवार को झटका लगता है और भुखमरी की नौबत भी आ सकती है। अगर वही परिवार साथ में वैकल्पिक रोजगार पर नजर जमाए और कोई अन्य व्यवसाय करे तो फसल खराब होने या बाजार की हालत बिगड़ने पर भी उसके पास एक आर्थिक स्रोत बना रहेगा।
वैकल्पिक रोजगारों में भी कुछ तो परंपरागत हैं जैसे मवेशी चराना, दूध का कारोबार करना, हस्तशिल्प तैयार करना। इन्हें किसान परिवारों ने आजकल लगभग पूरी तरह छोड़ दिया है। लेकिन कुछ दूसरे रोजगार भी हो सकते हैं। मसलन महिलाएं कुटीर उद्योग के रूप में या स्वयं सहायता समूह गठित कर अचार-मुरब्बे बना सकती हैं, खादी तैयार कर सकती हैं, शिल्पकारी कर सकती हैं। इसी तरह पुरुष खिलौने तैयार कर सकते हैं, खाद्य प्रसंस्करण की इकाई लगा सकते हैं। खाद्य प्रसंस्करण की अभी भारतीय विनिर्माण में १० फीसदी हिस्सेदारी भी नहीं है, जबकि गांव-देहात के लिए यह सबसे अनुकूल कारोबार है। अमेरिका में लगभग ९० प्रतिशत फल-सब्जियां इसी उद्योग में इस्तेमाल हो जाते हैं। चीन भी ऐसे ४० प्रतिशत उत्पादों का इस्तेमाल कर लेता है, लेकिन भारत में बमुश्किल २-५ प्रतिशत फल-सब्जियों का प्रसंस्करण होता है।
यह काम भी बड़ी कंपनियां करती हैं, जो अक्सर किसानों की फसल सस्ते में खरीद कर और उससे अचार-मुरब्बे, चटनी, केचप, प्यूरी, जैम बनाकर कंपनियां मोटा मुनाफा बना लेती हैं। यह सारा कच्चा माल गांवों-खेतों में ही मौजूद रहता है। अगर कंपनियों के बजाय यही काम ग्रामीण इलाकों में होने लगे तो क्रांति आ सकती है। गांवों में महिलाओं को रोजगार देने और युवाओं को उद्यमी बनने का मौका देने के लिए इससे ज्यादा कारगर कुछ भी नहीं होगा।
लेकिन यहां अशिक्षा और हुनर की कमी आड़े आ जाती है। गांवों में ‘मध्याह्न भोजन योजना’ के कारण बच्चे स्कूलों में नाम चाहे लिखा लें, लेकिन शिक्षा को लेकर अब भी वहां एक तरह की बेपरवाही है। यही बेपरवाही आगे जाकर आड़े आती है, जब रोजगार नही मिलता। मोदी सरकार ने ग्रामीण बीपीओ को बड़े जोर-शोर से आगे बढ़ाने की योजना बनाई है, जिसमें गांव के युवाओं को भारी तादाद में रोजगार मिल सकता है। अगले २-३ साल में करीब ४५,००० ग्रामीणों को ऐसे बीपीओ में रोजगार देने का केंद्र सरकार का इरादा है। लेकिन खटका यह है कि उतनी योग्यता वाले ग्रामीण ही मुश्किल से मिलेंगे क्योंकि जो उच्च शिक्षा हासिल कर लेते हैं, वे शहर का रुख कर लेते हैं।
अच्छी शिक्षा नहीं मिलने पर भी दिक्कत नहीं होगी, यदि ग्रामीणों के पास हुनर हो। यह दूसरी बड़ी बाधा है क्योंकि अक्सर उन्हें खेती करने के अलावा कोई और काम नहीं आता। यदि गांव के युवा तकनीकी काम सीख लें या मशीनों पर काम करने लगें तो उनके लिए गांव के भीतर ही छोटा कारखाना खोल कर या लघु उद्यम लगा कर दर्जन भर और युवाओं को रोजगार देना कितना आसान हो जाएगा। यह जरूरी भी है कि लघु उद्यमों से रोजगार के मामले में भारत बहुत पीछे है। सीआईआई-केपीएमजी की रिपोर्ट ‘दि न्यू वेव इंडियन एमएसएमई- २०१४’ के मुताबिक ब्राजील में लगभग ६७ प्रतिशत रोजगार एमएसएमई से ही मिलता है। इसी प्रकार फ्रांस में आंकड़ा ६३ प्रतिशत और जर्मनी में ६२ प्रतिशत है। यहां तक कि अमेरिका जैसी विकिसित अर्थव्यवस्था में भी लगभग ५३ प्रतिशत रोजगार के मौके एमएसएमई से ही मिलते हैं। इनकी अपेक्षा भारत में केवल २८ प्रतिशत रोजगार इन उद्यमों से प्राप्त होता है, जबकि सही माहौल मिले तो दशक भर में आंकड़ा ५० प्रतिशत हो सकता है।
माहौल देने के लिए केंद्र सरकार कोशिश तो कर रही है। राष्ट्रीय कौशल विकास एवं उद्यमिता नीति २०१५ तैयार की है, जिसमें नवोन्मेष को बढ़ावा देने के लिए युवाओं को हुनरमंद बनाने की बात है। इसके तहत प्रधान मंत्री कौशल विकास योजना में २४ लाख युवाओं को प्रशिक्षित करने का सरकार का लक्ष्य है, जो ग्रामीण युवाओं के लिए संभावनाओं के नए दरवाजे खोल सकता है। इसी तरह सरकार खास तौर पर गरीब ग्रामीण युवाओं के लिए दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना चला रही है, जिसमें उन्हें प्रशिक्षण देने के बाद काम पर भी लगवाया जाता है। लेकिन सरकार को यह योजना और व्यापक बनानी होगी। इसके लिए कंपनियों को कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) के तहत कुछ गांवों को गोद लेने और वहां के युवाओं को प्रशिक्षण देने के लिए कहा जा सकता है। उस सूरत में सरकार का खर्च भी घट जाएगा और निजी क्षेत्र के पेशेवरों से प्रशिक्षण हासिल करने वाले ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार तलाशना भी आसान हो जाएगा।
प्रशिक्षण की जरूरत तो महिलाओं को भी होती है। इसलिए सरकार को गांव-गांव में प्रशिक्षण केंद्र खोलने चाहिए या चार गांवों के बीच एक कौशल विकास केंद्र खोलना चाहिए ताकि कामगारों को काम सीखने के लिए दूर नहीं जाना पड़े। यदि प्रशिक्षण केंद्र नजदीक होगा तो उसमें बड़ी तादाद में महिलाएं भी पहुंच पाएंगी और परिवार को सहारा दे सकेंगी।
हुनर की कमी पूरी हो भी जाए तो असली कमी आड़े आती है और वह है पूंजी की किल्लत। जिन गांवों में एक या दो साल फसल बर्बाद होने पर खस्ताहाल किसानों को आत्महत्या करनी पड़ जाती है, उनमें युवाओं के उद्यमों के लिए पूंजी होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। ऐसे में ग्रामीणों के पास बहुत अधिक विकल्प भी नहीं होते। उन्हें छोटे उद्यमों के लिए कर्ज हासिल करने में भगीरथ प्रयत्न करने पड़ते हैं। उन्हें पर्याप्त रकम नहंी मिलती और मिली भी तो समय पर नहीं मिलती। ऐसे में उन्हें रिश्तेदारों से उधार लेना पड़ता है। चूंकि गांवों में इसकी गुंजाइश भी कम है, इसलिए उद्यम शुरू करने के लिए युवाओं को साहूकारों या असंगठित ऋण बाजार के चंगुल में फंसना पड़ता है, जहां ३५-४० प्रतिशत सालाना तक ब्याज देना पड़ सकता है। ऐसे में कई बार कारोबार शुरू करने के कुछ महीनों में ही कर्ज की किस्तें भारी पड़ जाती हैं और तालाबंदी की नौबत आ जाती है।
केंद्र सरकार बेशक मुद्रा योजना के तहत युवाओं और छोटे उद्यमियों को वित्तीय मदद देना चाहती है, लेकिन शहरी मुख्यालयों से दूर गांव में रहने वाले युवाओं के लिए इसे हासिल करना अब भी टेढ़ी खीर है। कागजी औपचारिकताएं इतनी अधिक हैं कि कर्ज लेने के बजाय वे उसे दूर से ही नमस्ते करना पसंद करते हैं। दूसरे सरकारी संस्थानों के पास जाएं तो अक्सर छोटे कुटीर उद्योग उनके कर्ज देने के पैमानों पर खरे ही नहीं उतरते। यह विडंबना नही ंतो और क्या है कि विजय माल्या जैसे उद्योगपति हजारों करोड़ रुपये का कर्ज होने पर भी बैंकों से और कर्ज पा जाते हैं, लेकिन महज कुछ लाख रुपये में कोई काम-धंधा जमाने की ख्वाहिश रखने वाले गांव के युवा को ठेंगा दिखा दिया जाता है। अगर सरकार बैंकों और वित्तीय कंपनियों के लिए प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में कुटीर एवं ग्रामोद्योग को भी शामिल कर दे तो गांवों में उभरते उद्यमियों को कर्ज मिलना आसान होगा।
बहरहाल पूंजी हाथ लग भी जाए तो बाजार में प्रतिस्पर्धा ग्रामीण रोजगार की बुनियाद को हिला देती है। अक्सर लघु या कुटीर उद्योग के लिए कच्चा माल सस्ते में नहीं मिल पाता क्योंकि कम मात्रा में माल उठाया जाता है। उनके उलट बड़े उद्योग या विनिर्माण इकाइयां भारी मात्रा में कच्चा माल लेती हैं और उनकी लागत कम पड़ती है। पहली चोट तो यहीं लग जाती है। उसके बाद जब तैयार माल बाजार में पहुंचाया जाता है तो नामी-गिरामी कंपनियों से मुकाबला करना पड़ता है। अब तो यह आलम है कि बड़ी रिटेल कंपनियों ने अपने स्टोर में अपना लेबल लगा कर वैसा छोटा-मोटा सामान बेचना भी शुरू कर दिया है, जिसका स्रोत कभी ग्रामोद्योग या कुटीर उद्योग ही होते थे। पापड़, अचार, मुरब्बे, नमकीन से लेकर अगरबत्ती, मोमबत्ती, इत्र, खिलौने, कैंची, झाड़ू तक इनमें शामिल हैं। चूंकि उनकी पैकेजिंग अच्छी होती है और दाम कम तो ग्राहक गांव के स्वयं सहायता समूह या कुटीर उद्योग के हाथ से बना सामान छोड़ कर उसे ही खरीद लेता है।
एक और समस्या ब्रांडिंग की भी है। ग्रामीण अंचल में रहने वाले अक्सर अच्छा सामान बनाना तो जानते हैं, लेकिन उनकी मार्केटिंग करना उन्हें नहीं आता। यहां सरकार को ही मदद करनी होगी और मार्केटिंग के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तैयार करना पड़ेगा। इसके अलावा उसे अपने विभागों के लिए ग्रामीण उद्यमों से तैयार माल खरीदना अनिवार्य करना पड़ेगा। हालांकि पिछले महीने केंद्र सरकार ने इस तरह का एक पोर्टल शुरू किया है, जिसके तहत छोटे उद्यमियों से ही अधिक सामान लेना पड़ेगा। लेकिन अगर इसमें खास तौर पर ग्रामीण उद्यमों का माल निर्धारित कर दिया जाए तो गांवों में रोजगार को बहुत बढ़ावा मिल सकता है। इतना ही नहीं, सरकार बहुराष्ट्रीय खुदरा कंपनियों के लिए ३० प्रतिशत माल छोटे उद्योगों से खरीदने के लिए कह रही है। उसमें से कम से कम ३०-४० प्रतिशत माल ग्रामीण उद्यमों से खरीदना अनिवार्य करार दिया जा सकता है। इससे इन उद्यमों को बहुत ताकत मिलेगी।
मगर बाजार की समस्या इतने से ही नहीं सुलझेगी। अगर उद्योग लगाने हैं तो गांवों में समुचित बुनियादी ढांचा भी मुहैया कराना होगा। जिस देश में अभी हजारों गांवों तक बिजली ही नहीं पहुंच पाई है, वहां मशीनें कैसे चलेंगी। बिजली आ गई, उत्पादन हो गया तो अच्छी सड़कों और यातायात संपर्क के बगैर माल बाजार में कैसे पहुंचेगा। सरकार को इन सब पर भी विचार करना पड़ेगा। लब्बोलुआब यही है कि अगर प्रशिक्षण, पूंजी और बाजार के सवालों को सरकार ने हल कर दिया तो गांवों में रोजगार की तस्वीर ही बदल जाएगी। इससे पलायन की समस्या भी रुकेगी और किसानों को जान भी नहीं गंवानी पड़ेगी।

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