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यह वही भारत है दोस्तों, जहां गुजरात का एक चायवाला आज देश का प्रधान मंत्री बना है। लेकिन यह कहानी उसकी नहीं बल्कि गुजरात की एक चायवाली की है, जिसका नाम है सुमित्राबेन। वह गुजरात के वापी गांव में एक चायनाश्ते का ठेला चलाती है। एक साधारण गृहिणी के लिए यह कैसे संभव हो पाया? सुमित्राबेन बनी आदर्श यूपीएल उत्कर्ष स्वयं सहायता गुट (पारड़ी) की सदस्य। अक्टूबर २०१५ में उसने स्वयं के बलबूते पर यह ठेला खोला। यह आत्मविश्वास और साहस उसने जुटाया इस गुट का सदस्य बनने के बाद और गुट से उठाया बीस हजार रुपये का कर्ज। आज सुमित्राबेन अपने पैरों पर खड़ी है, और उसकी दिन की आमदनी ५००-१००० रुपये तक हो जाती है। दोस्तों, ऐसी कई कहानियां मिलेेगीं आपको यूपीएल लिमिटेड की सीएसआर अर्थात कार्पोरेट सोशल रिस्पान्सिबिलिटी के उपक्रम से। यह उपक्रम ग्रामोदय का सपना साकार करने के लिए है और अपने उत्कर्ष के लिए शहर की ओर भागने की बजाए गांव में ही खुशहाल जिंदगी बिताने के नुस्खे उजागर कर रहा है।
आइए, अब सुनते हैं मीराबेन की कहानी। मीराबेन रहती हैं दबदार गांव में अपने पति और तीन बच्चों के साथ। गांव में बने स्वयं सहायता गुट की मीराबेन सदस्य बन गईं। एक बैठक के दौरान मीराबेन ने बोरीबगीचा की संकल्पना सुनी। उसे यह संकल्पना बहुत भा गई। उसने इस संकल्पना में अपनी रूचि दिखाई और टीम ने उसका साथ दिया। इस सलाह पर उसने अमल किया और आज उसके मीठे फल वह चख रही हैं। अपने घर के बगीचे से ही उसकी अपनी हरी शाकसब्जी की जरूरतें पूरी हो गईं। उसे सब्जी खरीदने के लिए अब सब्जी मंडी जाने जरूरत नहीं है और ना ही उस पर कोई खर्च करने की। घर के बगीचे से ही उसे ताजा सब्जी मिल जाती है, जो पोषण से भरपूर भी होती है। उसका यह अनुभव देख कर आसपड़ोस के लोग भी प्रोत्साहित हो गए हैं और बोरीबगीचा संकल्पना पर अमल कर रहे हैं।
अब मोहन भाई की कहानी सुनिए! मोहन भाई हैं साधारण किसान जो डांग जिले के दावदाहद गांव में रहते हैं। उनके परिवार में कुल सात सदस्य हैं और वे सभी कृषि पर ही निर्भर हैं। डांग के अन्य किसानों की भांति मोहन भाई भी नागली, धान, वरई, और अन्य अनाज की फसल परंपरागत तरीके से अपने खेत में लेते थे। एसआरआय के तहत उनके गांव में जागृति का अनोखा दौर चला। मोहन भाई को बेड़ प्रिपरेशन, छोटे अंकुरों का ट्रांसप्लांटिंग, वन सीडलिंग पर हील ट्रांासप्लांटिंग, कोनो वीडर का उपयोग आदि बातें पता चलीं। उनकी रूचि को देख कर टीम ने उन्हें ये सारी बातें समझा कर प्रोत्साहित किया। अपनी केवल पाव एकड़ जमीन में लाइन प्लांटिंग करने के लिए मोहन भाई राजी हो गए। उन्होंने कोनो वीडर का उपयोग किया और उचित दूरी भी रखने का प्रयास किया। केवल १५-२० दिनों में ही परंपरागत पद्धति और इस आधुनिक पद्धति के बीच में अंतर है उन्हें सही-सही पता चला। यह उनके लिए आंखों देखी बन गई। मोहन भाई तो खुशी से फूले नहीं समाए। टीम की सलाह पर अमल करने के फल उनको मिल गए हैं।
अब मिलिए बालू भाई से! वे कहते हैं- ‘‘देखो भाई, ६० से १०० प्रतिशत फसल में वृद्धि तो केवल सिंचाई द्वारा ही लाई जा सकती है। इससे तो मेरी सब्जी की फसल में अच्छी मदद मिल गई है। ड्रीप इरिगेशन तो और भी आगे जाता है। इस सिंचाई पद्धति द्वारा पानी की बचत होती है। केवल ४० प्रतिशत पानी में भी अब मैं कई गुना जादा क्षेत्र की सिंचाई कर सकता हूं!’’
बालू भाई हैं एक प्रगतिशील किसान, जो अंकलेश्वर के कसिया गांव में रहते हैं। वे सूर्योदय यूपीएल किसान गुट के सदस्य हैं। यूपीएल अधिकारी तथा ब्लॉक डेवलपमेंट अधिकारी की मदद से मिशन मायक्रो इरिगेशन के तहत आर्थिक सहायता के लिए उनके गुट ने एक प्रस्ताव भेजा। गुजरात सरकार ने साठ प्रतिशत अनुदान मंजूर किया। यूपीएल के सीएसआर टीम ने पंद्रह हजार रुपये इस गुट को मदद के तौर पर दिए। गुट ने ड्रीप इरिगेशन सिस्टम खरीदी। आज बालू भाई इस सिस्टम का लाभ उठा कर अपने खेत में सब्जियों की फसल लेते हैं और उनकी मासिक आमदनी ३००० से ६००० रु. हो गई है। अब तो आप जान ही गए होंगे कि, यह ग्रामोदय का कार्य गतिमान किया है यूपीएल लिमिटेड कंपनी की सीएसआर इनिशिएटिव के द्वारा जो कि यूपीएल प्रगति के नाम से जाना जाता है।
मगर क्या है यह यूपीएल कंपनी?
विश्व की जेनेरिक एग्रोकेमिकल कंपनियों में यह कंपनी पांचवें स्थान पर है। इसके पास १२० से अधिक पेटेंट्स हैं और ४६०० से अधिक पंजीयन विश्व स्तर पर हो गए हैं। एशिया सहित तीन खंडों में २८ मैन्यूफैक्चरिंग लोकेशन्स हैं। इसके व्यवस्थापन में २५ देशों के अधिकारी तथा ३८०० से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं। केवल आर्थिक समृद्धि यही इस कंपनी का लक्ष्य नहीं है। समाज का एकात्म विकास हो इसलिए कंपनी प्रयासरत है। सीएसआर के माध्यम से यह कंपनी विकसित समाज का लक्ष्य पूर्ण करने हेतु कार्यरत है।
यूपीएल लिमिटेड कंपनी के सीएसआर प्रमुख हैं ॠषि पठानिया। वे बताते हैं कि, परंपरागत फसलों को हमने एसआरआय पद्धति के क्षेत्र में लाया है और अगले साल तक एसआरआय को हम करीब २००० किसानों तक ले जाने वाले हैं। डांग में रहने वाले किसान अपने जीवनयापन के लिए खेती पर निर्भर रह सके इस हेतु से डांग धान डेवलपमेंट प्रोजेक्ट पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जाने वाला है। उत्पादन में पाए जाने वाला पोषण-मूल्य बढ़ाने पर भी हम ध्यान देने वाले हैं। इस क्षेत्र के किसानों की आय में उल्लेखनीय बढोत्तरी लाना यही हमारा मुख्य उद्देश्य है।
इन सारी गतिविधियों की प्रेरणा स्रोत हैं यूपीएल की वाइस-चेअरमैन श्रीमती सेंड्रा श्रॉफ। वे बताती हैं- जब हम वापी गए थे तब वहां पाठशाला चलाने की बात इसलिए हमने सोची क्योंकि उस समय वापी में अंग्रेजी माध्यम की एक भी पाठशाला नहीं थी। हमें जरूरत महसूस हुई और ज्ञानधाम पाठशाला का जन्म हो गया। वापी ने नए उद्यमों को जन्म देने का लक्ष्य रख कर वहां आए उद्योजकों के बच्चों के लिए यह पाठशाला आवश्यक ही साबित हुई। यह सारा कालावधि हमें अत्यंत प्रेरणादायी लगा और हमें बहुत ही ऊर्जा उस समय प्राप्त हुई। ऐसा ही सिलसिला आगे चलता रहा और आज हम ऐसा सोचते हैं कि इस सीएसआर द्वारा अगर कोई असल में लाभान्वित हुआ होगा तो वह हैं हम, हम सभी लोग। ’’ जैसा कि हम जानते हैं किसी भी संगठन का बहुत बडा संसाधन होता है मनुष्य। इस प्रयास में यूपीएल के दल ने विशेषज्ञों को तथा अन्य लोगों को भी जोड़ा है और ग्रामोदय का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए यह कारवां आगे बढ़ाया है।
इस दल के उद्देश्य हैं- जीवनयापन की सुविधा, पर्यावरण रक्षा, समाज सेवा, ग्रामविकास। जो भी विकास की योजना बनाई जाती है उसे अंजाम तक ले जाने के लिए इस दल का हरेक व्यक्ति अपने साथ जानकार एवं विशेषज्ञ को जोड़ता है, जोकि योजनाओं को अच्छा आकार देने में तथा उस पर सटीक तरीके से अमल करने के लिए अच्छा मददगार साबित होता है। लक्ष्य तक पहुंचने के लिए विभिन्न संस्थाओं एवं संगठनों को भी सहयोगी बनाया जाता है। इसके कुछ उदाहरण इस तरह हैं- यूपीएल एकेआरएसपी-एसआरआय प्रोजेक्ट में सहयोगी बना आगा खान रूरल सपोर्ट प्रोगाम, यूपीएल-उद्यमिता प्रोग्राम में सहभागी बनी उत्कर्ष महिला एसोसिएशन, महिला सशक्तिकरण में सेवा ग्रामीण संस्था सहयोगी बनी, एग्रीप्रिनिअरशिप डेवलपमेंट प्रोगाम में गुजरात सरकार का द सेंटर फॉर आंत्रेप्रिनिअरशिप डेवलपमेंट सहयोगी बना। कौशल्याधारित उद्योजक विकास उपक्रम में कौशल्य वर्धन केंद्र-आयटीआय, बैंक ऑफ बड़ौदा, द गुजरात केलवाणी अने वैद्यकीय राहत मंडल सहभागी बने।
यूपीएल लिमिटेड ने इस कार्य में नया परिप्रेक्ष्य प्रदान करने वाले इंटर्नी के योगदान को भी हमेशा सराहा है। विकास यात्रा में शामिल होने के लिए विद्यार्थी इंटर्नी के नाते जुड़ जाते हैं। संस्था और उन्हें भी मूल्यवर्धित अनुभव प्राप्त हो इस हेतु से सुचारू ढंग से नियोजित उपक्रम उन्हें सौंपे जाते हैं। वर्ष २०१५-१६ में तीन विभिन्न महाविद्यालयों से ९ इंटर्नी इस प्रयास में जुड़ गए थे।
स्थानीय लोगों के लिए कृषि और पशुपालन से भिन्न पूरक उद्योग का विकल्प खोजना, एनिमल हजबंड्री इकोनॉमी और प्रोडक्टिविटी के मैपिंग का अध्ययन करना, वापी के ग्रामीण भाग में निजी शौचालयों के इस्तेमाल करने के लिए जागृति लाना, यूपीएल उद्यमिता प्रोग्राम के तहत स्वयं सहायता गुटों द्वारा उत्पादित वस्तुओं के लिए मार्केटिंग स्ट्रेटजी बनाना आदि विभिन्न उपक्रमों के लिए इंटर्नी द्वारा अच्छा कार्य किया गया है।
स्वयंसेवा यह यूपीएल के सीएसआर स्ट्रेटजी का महत्वपूर्ण घटक है। व्हीएयू (वुई आर यूनायटेड) स्वयंसेवक यह संस्था के वालिंटियर प्रोगाम का शीर्षक है। यूपीएल के कारखाने तथा कार्यालयों से आने वाले इन स्वयंसेवकों का अच्छा संयोजन इस प्रोग्राम द्वारा किया जाता है और समाज तथा पर्यावरण के विकास हेतु उनमें मौजूद गुणों एवं कुशलता का उपयोजन किया जाता है। स्थानीय क्षेत्र की आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर निर्धारित उपक्रमों को आगे बढ़ाना इन स्वयंसेवकों के ही भरोसे हो पाया है। हर वर्ष व्हीएयू महोत्सव का आयोजन किया जाता है। ग्रामीण विद्यार्थियों में छिपे कलागुणों को उजागर करने का यह अत्यंत उत्तम माध्यम होता है। करीब एक मास तक इसकी तैयारियां चलती हैं। विभिन्न प्रतियोगिताओं के लिए विद्यार्थियों को तैयार करने में स्वयंसेवक तनमन से जुट जाते हैं। समाज और यूपीएल कर्मचारियों के बीच समन्वय, सामंजस्य और समरसता का यह अनोखा संगम होता है।
प्रश्न पहेली, भाषण प्रतियोगिता और नाटक मंचन में विद्यार्थियों का अच्छा सहभाग प्राप्त हुआ है। गीत तथा नृत्य प्रतियोगिता में भी उन्होंने अच्छे कलागुणों का प्रदर्शन किया है। इस महोत्सव को सफल बनाने के लिए ५९ स्वयंसेवकों ने अपने ११३७ घंटे समर्पित किए और यह उत्सव कारगर सिद्ध हुआ।
अब ग्राम विकास पर एक दृष्टिक्षेप । डांग की लगभग ८८ प्रतिशत जनसंख्या कृषि और कृषिपूरक व्यवसाय पर ही जीवनयापन के लिए निर्भर है। यहां की कृषि सिंचाई के लिए बारिश पर ही पूर्णतया निर्भर है। रागी, खरसानी और अरहर जैसी परंपरागत फसलों से अब चावल के उत्पादन पर किसानों का ध्यान जा रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में ‘यूपीएल खेडूत प्रगति प्रोग्राम’ के तहत डांग में मुहिम छेड़ी गई। कृषि के विभिन्न आयामों से किसानों को परिचित कराने हेतु २००० में एक किसान प्रशिक्षण शाला शुरू की गई, जो अब ‘यूपीएल खेडूत नियोजनीय केंद्र’ के नाम से जानी जाती है। नाहुली में १२५ एकड़ के विक्रम फार्म पर यह केंद्र चलाया जाता है। फसल में बढोत्तरी के गुर किसानों को सिखाना यह इस केंद्र का लक्ष्य है। आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों से तथा फसल लेने के अत्याधुनिक यंत्रों एवं औजारों से किसानों को परिचित कराया जाता है। फार्म की साइट पर प्रात्यक्षिक भी दिखाया जाता है। वर्ष २०१५-१६ में १८ प्रशिक्षण कार्यक्रम हुए जिनमें ४५९ किसानों ने सहभाग लिया था। अब तक इस उपक्रम से १२००० से अधिक किसान लाभान्वित हुए हैं।
डांग के गरीब परिवार को धान अन्न सुरक्षा का कवच देती है। राज्य का धान का औसत उत्पादन १.८६ मेट्रिक टन प्रति हेक्टर है। मगर डांग इसमें पिछड़ा है। वहां केवल ०.६ से १ मेट्रिक टन प्रति हेक्टर तक उत्पादन मिलता है। यहां यूपीएल एकेआरएसपी एसआरआय (सिस्टम आफ राइस इंटेंसिफिकेशन) प्रोजेक्ट का जनता को बड़ा लाभ पहुंचा है। एसआरआय की पद्धति बताने हेतु ग्राम स्तर पर बैठकों का आयोजन किया जाता है। इस पद्धति से किसानों को अवगत कराया जाता है। अब तो एसआरआय गुजरात सरकार के वार्षिक कृषि महोत्सव का अभिन्न अंग बन गया है। हाल ही में संपन्न इस महोत्सव में १७ गांव सहभागी बने थे और ७८५ किसानों को इस प्रशिक्षण का लाभ मिला है। इस उपक्रम का चौथा वर्ष चल रहा है और अब १८ गांवों में से ११५६ किसान इस मॉडल को लेकर काम कर रहे हैं। इस पद्धति में पानी की लागत में कमी आती है।
लेख के आरंभ में जिस गुजराती शब्द ‘बोरीबगीचा’ उपक्रम का उल्लेख किया गया है, उसे हिन्दी में आंगन-बगिया या अंग्रेजी में किचन गार्डन के नाम से भी जाना जाता है। उसमें आहवा के १० गांवों में से ११५२ किसान सम्मिलित हो गए हैं। इस उपक्रम से डांग की जनता का अन्न सुरक्षा का इंतजाम हो गया है। अच्छे पोषण-मूल्यों वाले पौधों को पहचानने में यह उपक्रम उपयोगी सिद्ध हुआ है।
गुजराती में जिसे मोरिंगा (ड्रमस्टिक्स) और हिंदी में सहजन कहते हैं यह बहुत पोषण-मूल्य वाली सब्जी मानी जाती है। इसके पत्ते, बीज, फूल आदि से कई विटामिनों की पूर्ति होती है। पूरक आय देने वाले व्यवसाय के रूप में मोरिंगा उत्पादन पर बल देना, महिला और बालकों में मौजूद कुपोषण दूर करना आदि उद्देश्यों को लेकर डांग मोरिंगा विकास प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है। वर्ष २०१५-१६ में ९ गांवों में १०४ किसानों ने मोरिंगा की फसल लेना आरंभ कर दिया है।
यूपील द्वारा वर्ष २०१५-१६ में ग्रीन फॉडर डेवलपमेंट बाय हायड्रोजनिक मेथड नामक एक नया कार्यक्रम चलाया गया। इस पद्धति में जमीन के अभाव में भी वर्टिकल फार्मिंग पद्धति के अनुसार खेती की जाती है। विशेष प्रकार के ट्रे में बीज रख कर निश्चित अंतराल में उनको पानी दिया जाता है। दुधारू जानवरों के लिए अच्छे पोषण-मूल्यों वाला हरा चारा इससे मिल जाता है और यह तो साल भर उपलब्ध होता है। ३ किसानों ने इस योजना का लाभ उठाया है।
किसानों के लिए कैपेसिटी बिल्डिंग प्रोग्राम भी चलाया जाता है। क्रॉप टेक्नोलॉजी से लेकर हॉर्टिकल्चर तक के प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाते हैं। सूरत में गुजरात सरकार द्वारा आयोजित कृषि मेले में भी सहभाग लिया जाता है। २१ प्रशिक्षण कार्यक्रमों में ४६२ किसानों का सहभाग रहा है। १८ किसानों को बुक किपिंग (हिसाब-किताब रखना) के प्रशिक्षण का लाभ मिला है।
‘लैब टू लैण्ड प्रोग्राम’ के तहत २ डेमोस्ट्रेेशन फार्म का निर्माण किया गया है। एक गन्ना एवं हरी सब्जियों का है। वाडी (छोटी बगिया) मॉडल्स का भी निर्माण किया गया है। जिसमें फलों अथवा अन्य वनस्पतियों के वृक्ष लगाए जाते हैं। ९५ किसानों को वाडी में सफर पर लाया गया तथा इसका डेमोस्ट्रेशन किया गया।
इसके साथ मायक्रो इरिगेशन प्रणाली का विकास एवं प्रसार, तथा जानवरों के स्वास्थ्य शिविरों का भी आयोजन किया जाता है। कुल ५ पशु स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन किया गया जिसमें १०६२ जानवरों की जांच की गई।
वर्ष २०१४-१५ में रोजगार के बारे में कुल ५ क्षेत्रों के जो आंकड़ें एकत्रित हुए उन से यह तथ्य सामने आया कि क्षेत्र में उद्योग होने के बावजूद स्थानीय जनता में बेरोजगारी की मात्रा अधिक है एवं डांग और अंकलेश्वर में गरीबी रेखा के नीचे वाली जनता का प्रतिशत भी अधिक था। इसलिए ग्रामीण युवकों को रोजगार मुहैया कराने हेतु ‘यूपीएल नियोजनिय केंद्र’ के माध्यम से कुशलता विकास केंद्र कार्यान्वित किए गए। हाल ही में फेब्रिकेशन, केमिकल और इलेक्ट्रिकल क्षेत्र पर ध्यान दिया जा रहा है। वर्ष २०१५-१६ में कुल ३८० सहभागियों को प्रशिक्षित किया गया है और उन में से २१५ युवकों को रोजगार मिल गया है। बाहर से आने वाले विद्यार्थियों के लिए छात्रावास सुविधा भी है।
शिक्षा और सशक्तिकरण के क्षेत्र में श्रीमती सुंदराबेन श्रॉफ ज्ञानधाम पाठशाला, वापी; ज्ञानधाम एकलव्य मॉडल रेसिडेंशियल स्कूल, आहवा; श्रॉफस् रोटरी इन्स्टिट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी, वटारिया; जीआडीसी राजू श्रॉफ रॉफेल इन्स्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज, वापी; श्रीमती पुष्पावती देवीदास श्रॉफ संस्कारदीप विद्यालय, अंकलेश्वर; द मोबाईल एज्युकेशन वैन प्रोजेक्ट, अंकलेश्वर आदि उपक्रम चल रहे हैं।
पर्यावरण और प्रकृति संरक्षण में यूपीएल वसुधा प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है। इसमें इको क्लब के तहत युवा पीढ़ी में पर्यावरण सुरक्षा के बारे में जागरूकता बढ़ाने का कार्य चल रह रहा है। सारस कंजर्वेशन प्रोजेक्ट, वडोदरा इस उपक्रम में इस प्रजाति के न होने के खतरे के बारे में लोगों में जागृति लाई जा रही है तथा उनका अधिवास एवं प्रजनन के बारे में अध्ययन किया जा रहा है, जिसके अनुसार इस प्रजाति के संवर्धन के लिए ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। उसी तरह प्लास्टर ऑफ पेरिस के स्थान पर मिट्टी की पर्यावरणपूरक गणेश मूर्ति बनाने के बारे में वर्कशॉप लिए गए जिनमें कुल १४७० विद्यार्थियों ने सहभाग लिया।
जरूरतमंदों को स्वास्थ्य विषयक सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए यह उद्देश्य ध्यान में रखते हुए यूपीएल द्वारा संचालित २५० बेड्स का मल्टिस्पेशालिटी अस्पताल रोटरी हॉस्पीटल नाम से वापी में कार्यरत है। तथा सेंड्रा श्रॉफ रॉफेल कॉलेज ऑफ नर्सिंग भी वापी में चलाया जा रहा है। उसीके साथ यूपीएल स्कूल सैनिटेशन प्रोग्राम भी हाथ में लिया गया है। स्वच्छ भारत अभियान में २३ यूपीएल स्वयंसेवकों ने सहभाग लिया है। १५ स्कूलों में स्वच्छता के बारे में जागरूकता बढ़ाने हेतु ९० कूड़ादानों का वितरण किया गया है। इसी के साथ राष्ट्रीय तथा स्थानीय स्तर पर कुछ आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए भी आवश्यक उपक्रम चलाए जा रहे हैं। प्राकृतिक आपदा के समय में सहायता करने के लिए यूपीएल आगे आई है। तथा भारत को बेहतर राट्र बनाने हेतु झुग्गी-झोपड़ियों का विकास प्रकल्प, क्रीड़ा विकास, पारंपरिक कला एवं हस्त-व्यवसाय का विकास एवं संवर्धन, पथ सुरक्षा और नारी सुरक्षा के लिए यूपीएल सुरक्षा अभियान ऐसे कई उपक्रम यूपीएल द्वारा चलाए जा रहे हैं।
सबल, सशक्त समाज और ग्रामोदय का सपना पूरा करना ही यूपीएल की उड़ान का लक्ष्य है। बंजर जमीन में भी हरियाली खिल सकती है यह यूपीएल का विश्वास है, और वही प्रेरणा भी!

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