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किसी ने सच ही कहा है- गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा, मैं तो गया मारा आ के यहां रे। सचमुच गांव बहुत प्यारे होते हैं। जो लोग अपनी जिंदगी रोजी-रोटी के चक्कर में शहरों को सौंप देते हैं उनसे हम शहरों में रहने वाले गांवों की कहानियां बड़े मजे लेकर सुनते हैं और वे भी मजे लेकर सुनाते हैं। हम शहर में पले-बढ़े लोग उनकी बातें गंभीरता से सुनते हैं और हमारे मन में गांवों के प्रति आकर्षण उत्पन्न होता है। क्यों न हो? जब हमारे गांव वाकई इतने सुंदर हैं।
गांव का वह खुला नीला आसमान, वह खुली-खुली जगह, वे खुले मैदान, बड़े-बड़े हरे-भरे खेत, पेड़-पौधे, वे पहाड़, उससे बहते झरने, पहाड़ के पीछे से निकलता केसरिया सूरज, कलकल बहती नदियां, सुबह की वह ठंडी-ठंडी हवा, वे कच्चे-पक्के मकान, उनकी छतों से निकलता धुआं, घरों के सामने-पीछे छोटे-बड़ेे आंगन जिनमें लगे नीबू, मिर्ची, कढ़ी पत्ते के पेड़, तुलसी, गुलाब, सदाफूली, गुडहल, चमेली के साथ केले, आम, कटहल आदि के पेड़। यही नहीं बल्कि गाय, भैंस के छोटे-बड़े तबेले, उसके आसपास दौड़ती-भागती मुर्गियां, उनके पीछे भागते,-खेलते नन्हें बच्चे-बच्चियां, उनका खुशी से आंगन में उछलकूद करना, किलकारियों से घर-आंगन का गूंजना ये सब देख कर बहुत अच्छा लगाता है। गांव के लोग सीधा सादा जीवन जीते हैं। दिन भर खेतों में मेहनत, मजदूरी करके शाम को घर लौट कर सब चाय-नाश्ते के बाद चौपाल पर इकट्ठा होकर कुछ देर गपशप करके अपने घर लौट कर खाना खाकर सो जाते हैं। यहां की कुछ औरतें दिनभर खेती में काम करके, शाम को घर लौट कर सारे काम करके घर के सारे सदस्य सोने के बाद सब किसी कुए के पास चांदनी रात में मिल कर गपशप करतीं और कुछ देर बाद वे भी जाकर सो जाती हैं। ऐसे उनके दिनरात बीत जाते हैं।
हमें ऐसे लगता है कि वे कितने खुश हैं। पर इनकी खुशी तात्कालिक होती है। जिस दिन काम मिलता है, मजदूरी मिलती है उस दिन वे भरपेट खाना खाकर चैन की नींद सोते हैं। पर जिस दिन काम नहीं मिलता उस दिन उन्हें न मजदूरी मिलती है न खाना। ये जहां काम करते हैं वहां उनको तनख्वाह नहीं मिलती। रोज के काम के रोज पैसे मिलते हैं। इसलिए वे अपनी जरूरत के हिसाब से ही घर का सामान जैसे आटा, दाल, चावल, सब्जी-तरकारी, खरीदते हैं। अगर दूसरे दिन के लिए कुछ बचता है तो ठीक है वरना जब तक मजदूरी नहीं मिलती, चूल्हा भी नहीं जल पाता। वैसे गांव में छोटी-मोटी दुकानें होती हैं पर उनमें हर चीज दुकानदार अपने मुनाफे के लिए भाव बढ़ा कर ही बेचता है। पर दुकानदार का भाव सब की सीमा में नहीं होता। ऐसे महंगे दामों की वजह से दुकानों से कुछ खरीद नहीं सकते। आपतकाल में ही दुकानदारों से खरीदने के लिए मजबूर हो जाते हैं। वहां न ही शहरों की तरह रोज बाजार लगता है, न ये लोग कुछ खरीद पाते हैं।
जैसे कि हम सब को पता है कि गांवों में खेती होती है तो अनाज की कमी नहीं, खुली जगह बहुत है। घर के बाहर आंगन में और घर के पिछवाड़े जगह की तो कमी नहीं है। तो समझदार लोग अपने ही आंगन का इस्तमाल सब्जी-तरकारी, फल- फूलों की पैदावार भी कर लेते हैं। चूंकि गांवों की जमीन उपजाऊ बहुत होती है, भरपूर मात्रा में पैदावार भी होती है। गांवों में भी छोटे-बड़े उद्योग होते हैं। जैसे कुम्हार मिट्टी के बर्तन बनाते हैं, लोहार लोहे की चीजें जैसे रोटी सेंकने का तवा, कलची, रोटी सेंकने के लिए उलतना आदि भी बना लेते हैं। दर्जी सभी तरह के कपड़े सिलता है। वैद्य जड़ी और वनस्पतियों से दवाइयां बना लेते हैं। हर कोई अपने-अपने काम में माहिर है और जरूरत से ज्यादा जो है उसे खराब होने से पहले इस्तेमाल करने की कोशिश करता है। पर कभी-कभी कुछ बच ही जाता है। ऐसे में उसे बेच कर अपना गुजारा करते हैं।
जिनको इसकी जानकारी है वे घर जाकर अपनी जरूरत के अनुसार चीज या तो बदल लेते हैं या फिर खरीद भी लेते हैं। ये तो एक गांव की बात हुई। वैसे हमारे गांव की कोई कमी नहीं है। हर गांव में यही सब होता है। थोड़ा बहुत फेरबदल होता है। गांव में सप्ताह के एक दिन खुले मैदान में बाजार लगता है। इसे ‘हाट’ कहते हैं। इसका नजारा मेले के जैसा ही होता है। इस दिन आसपास के सारे गांव के लोग सामान बेचने या खरीदने वहां आते हैं। यहां सब चीजें मिलती हैं। न केवल जरुरत के सामान बल्कि खाने-पीने की चीजें भी होती हैं। हाट में सब जाना पसंद करते हैं। क्योंकि यहां बच्चों से लेकर बड़ों की, औरत, मर्दों की भी पसंद और जरूरत की हर चीज सस्ते दामों में मिल जाती है। यहां आकर सब बहुत खुश होते हैं। क्या बच्चे, क्या बूढे, क्या जवान, क्या लड़कियां, क्या औरतें, सब के चेहरों पर मुस्कान होती है। ये ‘हाट’ सिर्फ सामान बेचने और खरीदने के लिए ही नहीं लगता है बल्कि इसी बहाने कई ने लोगों से, व्यापारियों से जानपहचान भी हो जाती है। नए दोस्त, नई सहेलियां बन जाते हैं। जिनसे रोज मिलना-जुलना, बातचीत नहीं हो पाती है, वे इस ‘हाट’ में जरूर मिलते हैं। इसका सब से बड़ा फायदा इन छोटे-मोटे व्यापारियों को होता है। इसमें अधिक से अधिक माल उनका थोक में ही बिक जाता है। गांव की छोटी-छोटी दुकानें चलाने वाले इनसे थोक में सामान खरीद लेते हैं और हफ्तेभर वही अपने मुनाफे से बेच कर अपनी जरूरत के अनुसार सामान खरीदने वापस ‘हाट’ में जाते हैं। ऐसे इनका व्यापार चलता रहता है। वैसे सब इस ‘हाट’ में जाना पसंद करते हैं। इसमें सब आजादी महसूस करते हैं। सब अपने दोस्तों के साथ मजे करते हैं। औरतें अक्सर साड़ियों और सिंगार के सामान की दुकानों पर जैसे टूट पड़ती है। किसी-किसी को खरीदने से ज्यादा मजा देखने में आता है। जो खरीद सकती है वे खरीद लेती हैं और जो देख कर मन बहलाना चाहती है देख कर मन बहला लेती है। गांव की औरतें जो घर के बाहर निकलती नहीं या बहुत कम निकलती हैं, उनकी सहेलियों के लिए उन्हें जरा घर के बाहर की दुनिया दिखाने और घुमाने का यह एक अच्छा बहाना बन जाता है। नए शादीशुदा जोड़े भी थोड़ी आजादी के लिए घुमने निकल जाते हैं। क्योंकि गांवों में हनीमून जैसी कोई बात नहीं होती है इसलिए वे इस तरह घुमकर मन बहला लेते हैं।
इस हाट में चूंकि दूसरे गांवों के लोग भी आते जाते हैं तो जानपहचान बन ही जाती है। ऐसे अगर किसी को अपने बेटे या बेटी या बहन, भाई के लिए रिश्ता देखने लिए भी कोई दिक्कत नहीं होती। ये हाट सप्ताह में एक दिन के लिए ही होते हैं, लेकिन कभी-कभी जिंदगी बना जाते हैं। पर कभी-कभी उल्टा भी हो सकता है अगर होशियारी से काम
न लिया जाए। क्योंकि जरूरी नहीं कि सब अच्छे ही हो, बुरे लोग भी मिल सकते हैं। अच्छे-बुरे लोग दुनिया के हर कोने में मौजूद हैं। कभी-कभी हाट की भीड़-भाड़ में लुटेरे, जेब-कतरों से भी पाला पड़ सकता है। कोई गुंडा या मवाली भी पीछा कर सकता है या फिर किसी डाकू का हमला भी हो सकता है। इसलिए संभल कर रहने में ही समझदारी है। शहर के लोग कभी-कभी धोखा भी खा सकते हैं। क्योंकि गांव के लोग शहर के लोगों को बहुत जल्दी पहचान लेते हैं। उन्हें लगता है कि शहर वालों के पास पैसों का पेड़ लगा रहता है और वे बेवकूफ भी बना सकते हैं। सिर्फ पैसे की खातिर कोई कुछ भी कर सकता है और पैसा ऐंठ सकता है। अत: सावधान होना जरूरी है। इसका मतलब यह नहीं है कि गांव या हाट बुरे होते हैं। नहीं, बिल्कुल नहीं; गांव में जाइए,‘हाट’ में भी जाइए। मजे कीजिए पर अपनों के साथ। क्योंकि इनका मकसद ही मिलना-मिलाना होता है।

 

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