हिंदी विवेक : we work for better world...

अपने गांव और वहां के लोगों की बात ही कुछ न्यारी है। कहीं नवरगांव जैसा नाटक दीवाना गांव, तो कहीं विकास की राह पर निकल कर परिवर्तन लाने वाला हिवरे-बाजार गांव। कहीं अन्ना हजारे द्वारा विकसित रालेगणसिद्धि सभी परंपराओं को तोड़ ग्रामीण
डीलडौल संभालने का प्रयत्न करता है, तो बाबा आमटे द्वारा साकार आनंदवन, समाज सेवा की नई मिसाल निर्माण करता है,
तो पुणे के पास पाबल में निर्माण किया गया विज्ञानाश्रम नई पीढ़ी में आधुनिकता के बीज बोने का प्रयत्न करता है! यहां के लोग भी ध्येयासक्त हैं। कुछ ने कुत्ते-बिल्लियों के लिए अपने-आप को झोंक दिया, तो कुछ ने वेश्या बस्ती के बच्चों की ऊंगली थाम कर उनके जीवन को संवारने की कोशिश की। सुनील देशपांडे जैसा एक इन्सान बांस के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर देता है। ढाई दशकों से मेलघाट के जंगल में रह कर बांस पर आधारित परियोजना को मूर्त रूप देता है, तो पोपटराव पवार की प्रेरणा से हिवरे-बाजार की तरुणाई व्यसन मुक्ति का ललकार करती है। जवानी का मतलब ‘ऐश’ करना मानने वाले युवकों में लीक से हट कर जीवन जीने की नई उम्मीद जगाता है। ऐसे गांवों को प्रसिद्धि मिलने में देर नहीं लगती। कभी वहां रहने वाले लोगों के कारण, तो कभी उनके कार्य के कारण। साबरमती हो या पवनार, कुछ स्थान वहां रह चुके महात्माओं के कारण पावन हुए तो कुछ सामान्य व्यक्तियों के असामान्य कार्य के कारण। वरना प्रकाश आमटे का काम देखने के लिए लोग घने जंगल में बसे हेमलकसा को क्यों कर जाते? ऐसा ही एक गांव है अपशिंगे। किसी इक्के-दुक्के के कारण नहीं अपितु सभी ग्रामवासियों के मिले-जुले प्रयासों के कारण यह गांव अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफल हुआ है। यह है इस गांव का परिचय …
लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व की कहानी है। अनेक लडाइयों के जख्म सीने पर लिए बलवंतराय जिंदगी से जूझते हुए गुजर-बसर कर रहे थे। मटरगश्ती करने वाले गांव के लड़कों को देख उनका खून खौलता था। कहते, जाओ जाकर युद्ध-अस्त्र चलाना सीखो। तलवारें हाथ में लो। लड़ाई पर जाओ। अपनी शूरता की मिसालें कायम करो। देश को तुम्हारे जैसे शूर योद्धाओं की आवश्यकता है। बलवंतराय की उस ललकार से प्रेरित होकर गांव के कुछ लड़के आगे आए और शुरू हुई शौर्य की एक अखंड परंपरा …! गांव की आने वाली पीढ़ियों के लड़कों ने आज भी उस परंपरा को और बलवंतराय की स्मृति को बनाए रखा है। आगे जाकर ग्रामवासियों के सहभाग से बलवंतराय की पादुकाओं को एक मंदिर में स्थापित किया गया। लगातार शत्रुओं से लड़ने वाले बलवंतराय को ग्रामवासियों ने ही संत पद दिया। मंदिर में श्री विष्णु की मूर्ति को अभिषेक होने पर इन पादुकाओं को भी अपने आप अभिषेक होता है… लेकिन ग्रामवासियों का संकल्प केवल अभिषेक करने तक सीमित नहीं बल्कि उनके मंत्र से अभिभूत यहां की तरुणाई आज भी शौर्य प्रदर्शन में पीछे नहीं हटी। मटरगश्ती, आवारगी कब की पीछे छूट चुकी है। देश के लिए मर मिटने के लिए सब अभिमंत्रित हैं। देश के लिए सदा जीएंगे और मरेंगे का मानो बीड़ा उठाया है!
इस परंपरा के चलते यह गांव अब वीर योद्धाओं का गांव बन गया है। उसका इतिहास वैसा ही है रोमांचक, प्रेरक और नस-नस में बहते रक्त को उत्तेजित करने वाला। बेरोजगारी के नाम से रोने वाले अन्य स्थानों की तरुणाई के सामने जीवन को नया अर्थ देने वाला- जीने की नई दिशा देने वाला। देश में जहां क्रिकेट का सर्वत्र बोलबाला है वहां इस गांव के युवक कुस्ती के अखाड़ों में और ‘पट’ (मुद्गल) घुमा घुमाकर शरीर कमाने में लगे दिखाई देते हैं। उनका पहनावा भी दुनिया से अलग ही है। उसे भी सैनिकी गणवेश का रंग चढ़ा दिखाई देता है। वैसे भी सैनिकी गणवेश और कपड़ों की महिमा कुछ और ही होती है। जिसे चढ़ाने मात्र से ही स्फुल्लिंग जाग उठता है। यहां की तरुनाई तो पहले से ठान चुकी है, अत: साधारण टी-शर्ट पर भी सैनिकी लिबास चढ़ जाए तो फिर क्या कहने!
अपशिंगे- सातारा के दक्षिण में १८ किलोमीटर की दूरी पर बसा एक छोटा-सा गांव। गिने-चुने घरों वाले इस गांव की जनसंख्या अधिक से अधिक आठ-दस हजार की है। पूरा का पूरा गांव देश के लिए लड़ने के लिए सज्ज था। इस गांव के हर घर से कम से कम एक सदस्य ने भारतीय सेना में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है और आज भी दे रहा है। सेना में भर्ती होकर युद्ध में देश के लिए मर मिटने की धुन से प्रेरित इस गांव को अंग्रेजों ने ‘अपशिंगे मिलिट्री’ का नाम दिया था। अंग्रेजों की ओर से पहले महायुद्ध में लड़ने का अनुभव लिए अपशिंगे की तत्कालीन युवाओं पर चीनियों द्वारा घेरे जाने और उनके कारावास में दो वर्षों तक बंदी बनाए जाने की नौबत भी आई थी। चीन और पाकिस्तान के विरुद्ध लड़ाई में इस गांव के युवक न केवल सहभागी हुए बल्कि उन्होंने अपने प्राणों की भी आहुति दी। भारतीय सेना में शामिल यहां के जवानों ने चीन के विरुद्ध चार और पकिस्तान के विरुद्ध दो जवानों का बलिदान दिया है। शौर्य की इस अक्षुण्ण परंपरा का ध्यान करते समय अपशिंगे वासियों की आंखों में पानी नहीं बल्कि उन शहीदों के प्रति सार्थ अभिमान होता है। विभिन्न युद्धों में शहीद जवानों की स्मृति में निर्माण किए गए स्मारक नई पीढ़ी को सेना में भर्ती होने की प्रेरणा देते हैं। शायद इसीलिए यहां के युवकों को अन्य किसी नौकरी की आवश्यकता नहीं पड़ती। क्योंकि सेना में भर्ती होने के लिए ही जीना है ऐसी धुन अपशिंगे गांव के युवकों पर सवार रहती है। यही कारण है कि ये लोग कभी कुस्ती के अखाड़ों में तो कभी कसरत करने में व्यस्त रहते हैं। इसलिए यहां के खेतों में अनाज उगने से अधिक वहां की माटी से सैनिक तैयार होते हैं।
अपशिंगे गांव का युद्ध में सहभाग महायुद्ध ही क्यों, बल्कि सुभाष चन्द्र बोस की आज़ाद हिन्द सेना में भी था। कहा जाता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज के मावलों की सेना में भी अपशिंगे गांव के युवकों का सहभाग था। राजपूतों की लड़वैया परंपरा की विरासत चलाने का दावा करने वाले निकम उपनाम के लोगों की बड़ी संख्या इस गांव में है। सेना में योदान देने की इस गांव की परंपरा को ध्यान में लेते हुए, माउंटबैटन से लेकर जनरल करिअप्पा तक अनेक बड़े-बड़े मान्यवरों ने अपशिंगे आकर इस योगदान की सरहाना की है।
सीना तान कर सीमा पर लड़ने के लिए जाने वाले लड़के तो आखिर लड़के होते हैं, लेकिन अत्यंत शांत चित्त से उन्हें युद्ध पर भेजने वाली माताएं उतनी ही दृढ़निश्चयी होती हैं। पांच दशक पूर्व की वह घटना, मानो अभी-अभी की है। आज भी शायद ही उसे कोई भुला पाया। वैसे देखा जाए तो अपने पति के प्रति का गर्व कभी कम नहीं हुआ था। इस गांव के लिए विशेष उल्लेखनीय बात यह कि उस शहीद की वीर विधवा के प्रति सम्मान कम नहीं होने दिया। और तो और वह भी इस बात का उल्लेख उतने ही गर्व से करती है कि गांव वालों ने उसकी ओर सदैव सहायता का हाथ आगे बढ़ाया और गांव हमेशा उसके साथ खड़ा रहा। क्योंकि सेना में जाने वाले युवकों की माताएं जितने फौलादी इरादों की थीं उतनी ही पत्नियां भी थीं। वरना आज की तारीख में इतने छोटे से गांव के कम से कम पांच सौ युवक सेना में नहीं जाते। सेना से लौटे भूतपूर्व सैनिकों की संख्या दो हजार के आसपास है। हर घर से कम से कम एक सदस्य सेना में भेजने वाला यह एक निराला गांव है। परिवार के दोनों बेटे सेना में हैं ऐसे परिवारों की संख्या भी कम नहीं है। कुछ गिने-चुने परिवार ऐसे भी हैं जिनके घरों के सदस्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी सेना में गए हैं। अंग्रेजों ने मिलट्री का नाम जिस विश्वास से इस गांव को दिया उसे धक्का न पहुंचाने की गांव वालों ने ठान ली है। वैसे देखा जाए तो इस गांव में कोई सैनिकी प्रशिक्षण केंद्र नहीं। और न ही अपशिंगे ग्रामस्थों को किसी ने उन्हें इस निराले शौक को बनाए रखने का आग्रह किया है। लेकिन, गांव के मौजूदा और भूतपूर्व सैनिकों से सीख लेते हुए नई पीढ़ी आकार ले रही है। साथ ही लड़ने की प्रेरणा देने के लिए गांव के शहीद स्मारक हैं ही …!

आपकी प्रतिक्रिया...

Close Menu