हिंदी विवेक : we work for better world...

भारत कृषि-प्रधान देश है। जय जवान, जय किसान यह हमारा नारा है। किसी भी देश का विकास उसकी कृषि पर निर्भर होता है। भूमि के उत्पादन का देश के विकास में बहुत बड़ा योगदान होता है। कृषि विकास के कारण ही इजरायल जैसे छोटे देश आज अग्रणी बने हुए हैं।
भारत की भूमि सुजलाम् सुफलाम् है। अधिकृत जानकारी के अनुसार भारत की ६० प्र.श. भूमि कृषि भूमि है। फिर भी आज किसान निराशाग्रस्त है। वह आत्महत्या कर रहा है। खेती बेच रहा है। जो किसान सारे देश को अन्न की आपूर्ति कर रहा था, वह अब अपने परिवार का पालन करने में भी असमर्थ है, यह यथास्थिति स्पष्ट दिख रही है।
इस स्थिति के कईं कारण हैं। जलवायु की अनिश्चितता, बढ़ता हुआ प्रदूषण, कृषि-उत्पादन की कम कीमत, दलालों के द्वारा किया जा रहा शोषण, आधुनिक विकास का अभाव, भविष्य का विचार न करते हुए लिए गए निर्णय, महंगाई, व्यसनाधीनता आदि अनेक कारणों से किसान निराशाग्रस्त बना हुआ है। इन सबके साथ, कृषि के साथ अन्य कोई उप-व्यवसाय न होना भी इस दुर्दशा का एक प्रमुख कारण है।
कृषि के साथ-साथ अन्यान्य उप-व्यवसाय या लघु-उद्योग किए जा सकते हैं। इस तरह के व्यवसाय से प्राप्त कमाई का बहुत बड़ा आधार किसान के परिवार को मिल सकता है। किसान इन उद्योगों का स्वयं मालिक होता है, और इनके लिए उसे दलालों पर निर्भर रहना नहीं पड़ता। वैसे ही इनमेंं कुछ व्यवसाय ऐसे भी हैं कि जिन पर जलवायु की अनिश्चितता का विशेष प्रभाव नहीं होता। इसके अलावा इन में शारीरिक श्रम भी कम होते हैं, इसलिए अधिक आयु के और शारीरिक दृष्टि से कमजोर अन्य परिवारजन भी इनमें सहायता कर सकते हैं। चलें, हम ऐसे कुछ लघु-उद्योगों की जानकारी प्राप्त करें।
कृषि का नाम लेते ही हमें स्मरण होता है, बैलजोड़ी का। पहले किसान के पास गाय-बैल होते ही थे। इनके गोबर का उपयोग बहुत बड़ी मात्रा में होता था। जमीन, दीवारें लीपना, जलन के लिए कण्डे बनाना आदि अनेक प्रकारों से गोबर का उपयोग हुआ करता था। इसी के साथ किसानों को गोबर-खाद भी अपने-आप मिला करती थी।
आज किसानों की दीवारें गोबर से लीपी नहीं जातीं। बैलों के स्थान पर ट्रेक्टर आ गए हैं। किसानों को पशुधन की आवश्यकता ही नहीं होती। यह बहुत बड़ी हानि है। किसानों के लिए ‘पशुपालन’ महत्वपूर्ण उद्योग है। गाय, बैलों के साथ बकरी-भेड़ पालन, कुक्कुट पालन जैसे उप-व्यवसाय किसान कर सकता है। पशुपालन से आवश्यक दूध आदि भी सहज उपलब्ध हो जाता है।
उनकी गोबर से, गोमूत्र से उत्कृष्ट स्तर की खाद भी प्राप्त होती है। इस गोबर से गोबर गैस भी बनाई जा सकती है। यह गैस खाना बनाने के लिए उपयुक्त तो होता ही है, आवश्यकतानुसार इससे बिजली भी बनाई जा सकती है। ऐसे गोबर गैस संयंत्र की स्थापना खेत के किसी कोने में सहज ही की जा सकती हैै। इस का मूल्य भी कोई अधिक नहीं होता और इसका तंत्र भी सरल होने से किसान किसी तंत्रज्ञ की सहायता के बिना ही वह उसका रखरखाव कर सकता है।
मधुमक्खी पालन भी किसानों के लिए सरल लघु-उद्योग है। मधुमक्खियों से फलन-क्रिया भी शीघ्रता से होती है, फलत: कृषि-उत्पादन में भी वृद्धि होती है। जिन किसानों ने मधुमक्खी पालन का उद्योग आरम्भ किया है, उन सब की आर्थिक स्थिति में तीव्रता से वृद्धि हुई है।
खेतों की मेड़ों का उपयोग मधुमक्खियों के कृत्रिम छत्तों के लिए किया जा सकता है। इसके लिए भी किसी भी विशेष तंत्रज्ञान की आवश्यकता नहीं होती, और इसके रखरखाव में लगने वाला व्यय भी नगण्य होता है। छोटे बच्चे भी इसका रखरखाव सहज कर सकते हैं। इससे पूरे वर्षभर कमाई हो सकती है। ये मधुमक्खियां प्राकृतिक रूप से अनेक प्रकार के कीड़ों को फसल से दूर रख कर फसल की उनसे रक्षा करती हैं।
किसान कृषि के साथ व्यवसाय के रूप में मेड़ों पर फलों के पेड़ भी लगा सकते हैं। केले, पपीता जैसे फलदार वृक्षों से किसान की आय में वृद्धि तो होती ही है, साथ में भूमि को क्षरण से बचाया जा सकता है। वैसे ही सहजन के पेड़ों से भी बहुत लाभ हो सकता है। सहजन की फल्लियां बेच कर आय तो बढ़ती ही है, साथ में उसके पत्तों की सब्जी भी खाने के लिए उपलब्ध होती है। सहलन के पेड़ो का रखरखाव भी सहज होता है।
मेड़ों पर कुमारी, निर्गुण्डी, वज्रदन्ती, कंटकारी आदि औषधीय वनस्पतियां उगाई जा सकती हैं, जिससे आर्थिक आय तो होती ही है, खेत की रक्षा भी होती है। आजकल अपने पूर्वोत्तर क्षेत्र में कुछ स्थानों पर धान की खेती के साथ मछलीपालन भी किया जा रहा है। धान की खेती के लिए संग्रहित पानी में ही केकड़े और मछलियों की खेती की जाती है। इन मछलियों के मल से धान की खेती को भी लाभ होता है और खाद देने की आवश्यकता नहीं होती और मत्स्यखेती भी भरपूर कर होती है। आर्थिक लाभ प्रदान करने वाला यह भी अच्छा व्यवसाय है।
धान की खेती के लिए ही किया जा सकने वाला पर सम्पूर्ण उपेक्षित व्यवसाय है – मशरूम उत्पादन। यह थोड़े से परिश्रम से साध्य होने वाला व्यवसाय है। मशरूम के लिए आवश्यक धान का पैरा धान खेती में पर्याप्त मात्रा में होता है। इस पैरे पर ही केंचुओं का उत्पादन किया जाता है। आज पूरे विश्व में मशरूम के लिए बहुत मांग है। मशरूम की मांग की तुलना में उसका उत्पादन काफी कम है इसलिए उसे बाजार में अच्छा मूल्य मिलता है। सरकार ने सब दूर मशरूम उत्पादन के लिए नि:शुल्क प्रशिक्षण की व्यवस्था की है।
वृक्षारोपण करना किसान के स्वभाव में ही है। उनके द्वारा रोज पेड़ लगाए जा रहे हैं, बढ़ाए जा रहे हैं। आज मुंबई और अन्यान्य शहरों में नर्सरी स्वतंत्र व्यवसाय बना हुआ है। यह व्यवसाय अपनाने से किसान भाइयों के लिए यह आय का बड़ा स्रोत बन सकता है। विभिन्न प्रकार के फूलपौधे, फलवृक्षों के पौधे छोटी थैलियों में लगा कर बढ़ाए तो उन्हें अच्छा मूल्य मिल सकता है। किसानों को इन पौधों की उचित जानकारी मिली तो अनेकानेक पौधें बनाए जा सकते हैं।
इससे आगे का चरण है – बोन्साय बनाना। बोन्साय याने ‘कुण्ठित वृक्ष’। इनकी मांग भी है, मूल्य भी मिलता है। किसानों द्वारा कृषि कार्य करते हुए यह उद्योग सहज ही किया जा सकता है। इसके साथ कुछ और व्यवसाय भी किए जा सकते हैं जैसे – खेत में और आसपास उगे हुए फूलों के पराग कणों को भी काफी मांग है। ये पराग कण एलर्जी की औषधियों के निर्माण में प्रयुक्त होते हैं। इन्हें देशविदेश की कम्पनियों की ओर से बड़ी मात्रा में मांग है। पराग कणों को इकट्ठा करने के लिए किसी विशेष तंत्रज्ञान या शिक्षा की आवश्यकता नहीं होती है। किसान परिवार के सभी लोग इन्हें सहज एकत्र कर सकते हैं।
इन लघु-उद्योगों का राजा जिसे कह सकते है वह है, कृषि पर्यटन या एग्रो-टूरिज्म। शहर के लोगों को खेती का पर्यटन कराने वाले ये केन्द्र दिनोंदिन बढ़ ही रहे हैं। इन यात्राओं से किसान और समाज परस्पर जुड़ता जा रहा है। शहर निवासियों को कुछ समय के लिए प्रदूषणमुक्त हवा, वातावरण, निसर्ग सानिध्य का लाभ मिलता है और उसके लिए वे पैसे देने के लिए भी तैयार रहते हैं। इस अवधि में उनकी कुछ अधिक अपेक्षाएं भी नहीं होती और वे लौटते समय कोई कृषि उपज बाजार भाव से खरीद भी सकते हैं। इस तरह से इस कृषि यात्रा का किसानों को तिहरा लाभ होता है।
किसान अपने नियमित कृषि कार्य के साथ ऐसे अनेक सहायक व्यवसाय कर सकते हैं। आवश्यकता है तो किसी एक व्यवसाय को प्रारम्भ करने की। इसे करते समय एक बात का हमेशा स्मरण रहें- ये सारे सहायक व्यवसाय हैं। अपना मूल व्यवसाय है खेती, क्योंकि हम हैं तो किसान ही ना।

आपकी प्रतिक्रिया...

Close Menu