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जब मैं १९ जून १९८६ को रेलमार्ग से मुंबई के लिए पहली बार रवाना हुआ तब मैंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि मुंबई महानगरी ही मेरी कर्मभूमि बन जाएगी। वस्तुतः १२हवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के उपरांत मेरे समक्ष उच्च अध्ययन के लिए दो ही विकल्प थे। प्रथम, बड़े भाईसाहब के निर्देशानुसार मुंबई आकर पढ़ना अथवा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश लेकर वहीं रहते हुए अध्ययन करना। दोनों ही स्थितियों में गांव छूटना तय था। मैंने पहले विकल्प का चयन किया और मुंबई आ गया।
इस वर्ष २१ जून को मुझे मुंबई आए हुए ३० वर्ष सम्पन्न हो गए। बावजूद इसके गांव से रागात्मक जुड़ाव यथावत बना रहा। प्रायः हर वर्ष गांव जाता रहा और किसी-किसी वर्ष तो दो-तीन बार भी गया। मेरे गांव का नाम घोरका तालुकदारी है जो उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जनपद में अवस्थित है। मेरा गांव सई नदी के तट पर स्थित ठेठ देहाती गांव है। जहां प्रकृति की राशि-राशि दृश्यावलियां मन पर जादुई प्रभाव डालती हैं। वस्तुतः मेरे पूर्वजों को किसी समय उस क्षेत्र के राजा द्वारा यह गांव दान-स्वरूप मिला था। फलतः यहां आज भी पांच ही परिवार निवास करते हैं जिससे पूरा गांव खेत, बाग-बगीचे, जंगल तथा सई नदी के कछारों से परिव्याप्त है। मैंने स्वयं दसवीं से बारहवीं की पढ़ाई के दौरान आम, अमरूद, कटहल इत्यादि के सैकड़ों पौधे लगाए थे जो अब वृक्ष बन कर फल दे रहे हैं। चूंकि मेरा बचपन गांव में व्यतीत हुआ अतः मेरे आभ्यंतर पर उसका गहरा प्रभाव पड़ा। भले ही, राजनीतिक प्रभावों के चलते गांवों का परंपरागत परिवेश पहले जैसा न बचा हो परन्तु वहां भारतीयता के निर्माणक तत्व आज भी बहुत प्रबल हैं। हमारी लोक संस्कृति, सामाजिक समरसता, एक-दूसरे के सुख-दुःख में सहयोग का भाव यथावत सुरक्षित है। मेरे गांव के दूसरी तरफ नदी के उस पार बाबा बेलखरनाथ का धाम है। जहां शिव का प्राचीन मंदिर है। अब तो वहां सीताराम, गणेश, दुर्गा, हनुमान तथा विश्वकर्मा के मंदिर भी बन गए हैं। यहां हर शनिवार को मेला लगता है। महाशिवरात्रि को तथा अधिक मास में एक महीने तक मेला आयोजित होता है। प्रायः साल के अधिकांश दिनों में यहां कथा-कीर्तन, भजन इत्यादि की अनुगूंज दूर तक सुनी जा सकती है। मैंने स्वयं अपनी आंखों से देखा है कि बेलखरनाथ गाम के आस-पास रहने वाले मुस्लिम परिवार के लोग भी इन मेलों के आयोजन में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। वे स्वयं यहां प्रस्तुत होने वाली कथाओं का श्रवण करके पुण्य लाभ करते हैं। यहां सांप्रदायिक सौमनस्य का अद्भुत उदाहरण देखा जा सकता है। हमारा गांव और क्षेत्र रामचरित मानस के अखण्ड पाठ के लिए भी जाना जाता है। इस क्षेत्र में सर्वप्रथम हमारे पिताजी ने १९६० में रामचरित मानस के अखण्ड पाठ की परंपरा आरंभ की थी जो अब अतिरिक्त त्वरा के साथ गतिशील है। अयोध्या के निकट होने के कारण राम और रामकथा का गहरा प्रभाव यहां के जनजीवन पर परिलक्षित होता है। हमारे देश को सांस्कृतिक, धार्मिक, भावनात्मक और चिंतन के धरातल पर रागात्मक-सूत्र के जरिए जोड़ने का कार्य हमारे गांवों ने ही किया है। हमारे गांवों का विकास भले ही बहुत धीमी गति से हो रहा हो परन्तु वहां की सामाजिकता, देश और समाज के प्रति चिंता बेहद महत्वपूर्ण है। अभी भी वृक्षों-वनस्पतियों, पशु-पक्षियों तक की चिंता, उनमें निहित मनुष्यता और सामाजिक मंगलेच्छा का द्योतक है। डॉ. विद्यानिवास मिश्र ने इस संदर्भ में ठीक ही लिखा है कि, ‘‘हिमालय भारत का मानदंड नहीं है, पृथ्वी का मानदंड है’’ विंध्याद्रि भारत की ही मेखला नहीं, समस्त भू-मंडल की मेखला है। भारत का निर्धारण प्राचीन संस्कृत साहित्य में केवल कुछ भौगोलिक नामों की सूचियों से नहीं है। निर्धारण है एक विशाल कुल की कल्पना के द्वारा जिसमें पर्वत-नदी से लेकर देव, किन्नर तक, पशु-पक्षी से लेकर वनस्पति तक सभी प्राणी बराबर के साझीदार हैं। भारत का सीमा निर्धारण मुख्यतः आचरण और आचरण में निष्ठा से है। इसी कारण वह तप और कर्म की भूमि है। वह सदैव एक चढ़ा हुआ धनुष है, जगती हुई यज्ञ की वेदी है। वह भौगोलिक आकार से काफी ऊपर उठा हुआ मानवीय विश्वास का आकार है। ’’ यहां मिश्रजी भारत के रूपक के तौर पर जिस मानवीय विश्वास की चर्चा कर रहे हैं, कुछेक अपवादों को छोड़ कर उसका मूर्तिमान रूप हमारे गांव ही हैं। हमारी भारतीयता, संस्कृति, सभ्यता, धार्मिकता और लोकनिष्ठा वहां पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित है। गांधीजी ने बड़े अनुभव के बाद ही कहा था कि, ‘‘सच्चा भारत हमारे गांवों में बसता है। ’’ मेरा मानना है कि भारतीय संस्कृति और भारतीयता को अक्षुण्ण रखने के लिए गांवों से निरंतर संपर्क और संवाद आवश्यक है अन्यथा हम महानगरीय बदलावों में भारतीय आत्मा और मनुष्यता के उच्चतम आदर्शों से दूर हो जाएंगे।

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