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ग्रामीण पर्यटन और नागरी पर्यटन ये पर्यटन के दो प्रमुख प्रकार माने जाए तो भी उसमें अनेक उपप्रकार निर्माण हो सकते हैं। उसमें से कुछ प्रमुख प्रकार हैं- धार्मिक पर्यटन, रुग्ण पर्यटन, प्रकृति पर्यटन, जल पर्यटन, क्रीड़ा पर्यटन, विदेश पर्यटन इत्यादि।
भारत को केंद्र में रख कर पर्यटन का विचार करें तो सबसे पहले ‘ग्रामीण पर्यटन’ का विचार करें। पर्यटन मंत्रालय की ओर भारत के सारे राज्य ध्यान दें तो आर्थिक हालात जल्दी सुधर सकते हैं।
भारत का महानगरों की ओर ज्यादा ध्यान है, इस विचार को अहमियत दी जाती है, यह बात स्वतंत्रता पूर्व काल में ही गांधीजी के ध्यान में आई थी। इस कारण उन्होंने ‘गांव की ओर चलो’ जैसा नारा दिया था। इसमें दूरदर्शिता के साथ-साथ उस विचार या सोच के पीछे कई कारण थे।
इतिहास कहता है कि हमारे हमारे देश में गांव अनेक हैं। सात लाख गांवों में भारत की प्राचीन संस्कृति बसी है। देहाती लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी, रहन-सहन, खानपान, कला, रोजगार, यातायात व्यवस्था, सड़कें, आबोहवा और प्रकृति सब अलग- अलग है। सुंदर है और आकर्षक भी।
शहर की भीड़, रहन-सहन, खानपान, प्रदूषण, भागदौड़ करने वाली जिंदगी इससे लोग उब जाते हैं। इससे तंग आकर खुली हवा में सांस लेने के लिए हर नागरिक उत्सुक होता है। वह चाहता है अल्पकालीन पर्यटन। विदेशों में इसे ‘वीक एंड’ रोज के काम से मुक्त होने के लिए सात दिनों में एक दिन छुट्टी होनी चाहिए, इस सोच के कारण रविवार को छुट्टी का दिन (‘हॉली डे’) माना गया। अब नई सोच अस्तित्व में आई है। वह यह कि रोज आठ घंटे से ज्यादा यानी नौ घंटे काम करें और शनिवार के दिन भी छुट्टी लेकर आराम करें। अब ‘वीक-एंड’ दो हुए तो भी लोगों को संतोष नहीं है। वीक एंड का अंतर भी शहर से थोड़ा दूर ग्रामीण इलाके में मिलता है। आने जाने में समय लगता है। रिसॉर्ट या होटल में रात बिताना, खानापीना प्रमुख होता है, सफर की वापसी में आनंद थोड़ा सा ही मिलता है।
इस पर ग्रामीण पर्यटन एक अच्छा उपाय है। सरकार ही सबकुछ करती रहे यह बात ठीक नहीं। सरकार ही आर्थिक या तकनीकी मदद करें, वही गांवों में विज्ञापन दें, खानपान व्यवस्था भी वही करें- ऐसी उम्मीद यदि पर्यटक रखें तो वह पर्यटन शुष्क शासकीय अभियान में हो जाएगा। पर्यटन का प्रमुख उद्देश्य धुल में मिलेगा। इससे मजे उठाना, कुछ अलग करने को नहीं मिलेगा।
सरकारी पर्यटन के कुछ अलग स्थल हम देखते हैं। यातायात के लिए सडकें नहीं, वॉशरुम नहीं, सर्वत्र गंदगी, आवश्यक चीजों की अनुपलब्धता, वहां का हर नौकर ‘नौकरी है’ इसीलिए काम करने की सोच रखने वाला होने से पर्यटन स्थलों का मजा किरकिरा हो जाता है।
शासन अच्छे विकास के लिए कार्यरत रहे। कुछ पाबंदियां, नियम तय करें, पर पर्यटन स्थल सक्षम लोगों के हाथ में सौंपे। कुछ महत्वपूर्ण बातों का विकास शासन प्रशासन की अपेक्षा जनता ही कर सकती है। लोगों को जीने की खुशी प्राप्त करनी है तो ग्रामीण पर्यटन की ओर ध्यान देना चाहिए। लोगों के प्रोत्साहित करने से इस पर्यटन का विकास हो सकता है।
यदि लोग लोगों के लिए, लोगों के ही द्वारा, लोगों से प्रेरणा लेकर विकास करवाए तो पर्यटन को बढ़ावा मिल सकता है।
ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा मिले इसलिए हमें कुछ बातें करना जरूरी हैं-१)सबसे पहले प्राकृतिक स्थल खोंजे, २) वहां के स्थानीय लोगों से संपर्क करें, ३) पर्यटन आय का साधन बन सकता है ये देहातियों को समझाएं, ४) ग्रामीणों और पर्यटकों का प्रबोधन करें, ५) ग्रामीण लोगों के पैसे का योग्य निवेश तथा निवेश का फायदा समझें, ६) गांव के सरपंच को आवेदन देकर सड़कें, यातायात, पानी, बिजली की सुविधा उपलब्ध कराएं। घोड़ागाड़ी, बैलगाड़ी, पंप, नहर का पानी गांव वालों को पैसा उपलब्ध कराने की फायदेमंद तकनिक हैं।
‘‘ग्रामीण युवकों को अगर याद दिलाया जाए सब आपके पास ही है, पर आप कुछ भूल रहे हैं, तो बात बनेगी। यह देशकार्य भी है।
भारत जैसे विकासशील राष्ट्र के लिए ग्रामीण पर्यटन उपयोगी संकल्पना है।
‘गांवों में परमाणु केंद्र, रासायनिक कारखाने, डपिंग ग्राउंड, प्रदूषण फैलाने वाले, पानी दूषित करने वाले कल-कारखाने खोलने से ज्यादा उपरोक्त बातों की ओर ध्यान दिया जाए। ग्रामीण इलाके से दूर इन्हें जगह दी जाए, उससे रोजगार भी प्राप्त होगा।
शहरों का औद्योगीकरण हो चुका है। गांव का औद्योगीकरण ज्यादा ना बढ़े, सारे देश को सांस लेना मुश्किल हो, ऐसा न करें। अगर ऐसा हुआ तो गांव अगली पीढ़ियों को विकलांगता देने वाला गैस चेंबर बनेगा।
जनशक्ति के सामने सरकारी शक्ति झुक जाती है। इसे ग्रामीण ध्यान में रखें। अपना विकास किन बातों में है, इसकी ओर ध्यान दें।
आजकल हाय-वे, महानगर, हवाई-अड्डा, औद्योगिक बस्तियां, बंदरगाह आदि खेती की जमीं पर बनाए जाते हैं। ‘भारत कृषिप्रधान देश है’ यह संकल्पना यहीं पर समाप्त हो जाती है। खेती नहीं तो किसान कैसे रहें? किसानों का विकास किसानों की बलि चढ़ा कर ही क्यों किया जाता है? एक तरफ से आसमानी विपत्ति और दूसरी तरफ से सरकारी विपत्ति। यह आज के किसानों की हालत है। ऐसे समय किसान जाए तो कहां जाएं?
ग्रामीण इलाके के ये सेवक सच्चे अर्थ में धरती माता के सेवक हैं। मां को अगर छीन लिया जाए तो ये बिन मां के बच्चे कहां जाएं? फिर खाद्यान्न की कमी, जनता के लिए विशेष अनाज मंगवाना, वह खाद्यान्न भी निकृष्ट दर्जे का होना और वह भी रेशनिंग पर ही उपलब्ध होना आदि समस्याएं होती हैं। ऐसे समय में ग्रामीण जनों को और किसानों को केवल पर्यटन ही बचा सकता है। इसीसे किसान खुश होगा। ऐसा नहीं कि स्मार्ट सिटी सिर्फ शहरों की ही हो सकती है। ग्राम भी स्मार्ट हो सकते हैं। इससे देश का तो होगा ही, विदेशी पर्यटक भी ग्रामीण इलाकों की ओर आकर्षित होंगे। इसी से महात्मा गांधी का सपना साकार लेगा। ग्रामीण पर्यटन जादू की वह छड़ी है, जिससे गांवों की समस्याएं सुलझती हैं।
आज भी ग्रामीण इलाके में इतिहास व संस्कृति कुछ प्राचीन अवशेष हैं। गांवों में प्रकृति की शोभा है। अच्छी खेती जहां है वहीं पर समृद्धि होती है। ऐसी जगहों पर पर्यटन को बढ़ावा मिल सकता है। पर इसके लिए तीव्र इच्छाशक्ति की जरूरत है। विख्यात, सुंदर, समृद्धि से युक्त, अच्छी भौगोलिक परिस्थिति वाले स्थल पहले सैटेलाइट की मदद से चुने जाए।
आज भी ग्रामीण इलाकों में कहीं बिजली नहीं, पानी नहीं, सड़कें नहीं, सरकारी गाड़ियों का आना जाना नहीं, सिर पर गठरी लेकर देहाती पैदल जाते हैं। छात्र बचपन से ही कीचड़ सने पैर लेकर स्कूल जाते हैं। सारे भारतीयों का सिर लज्जा से झुक जाएगा ऐसे ये हालात हैं। यह हालत बदलनी हो तो मंत्रालय से लेकर जिला कलेक्टर के दफ्तर तक प्रशासन को ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देना होगा। चुनाव के समय सिर्फ नारे लगाना या बढ़ी-चढी बातें करने की अपेक्षा निधि उपलब्ध करके काम शुरू करना जरूरी है। सिर्फ बातों से खेती फलती-फूलती नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार शुरु हो जाता है। ऐसा भ्रष्टाचार सरकार नहीं मिटा पाती।
‘ग्रामीण पर्यटन’ यह संकल्पना और परिभाषा पहले समझ लें। जिस ग्रामीण भाग में सुंदर वातावरण, प्राकृतिक सौंदर्य, पारंपारिक भवन, संस्कृति, परम्परा होती है-उस जगह के नागरिकों का स्वतंत्र, सामाजिक, आर्थिक जीवन समृद्ध हो सकता है। ऐसी जगहों पर बाहर के पर्यटक आते हैं। उनकी अनेक जरुरतें पूरी करने हेतु कई बार रोजगार निर्मिति अपने आप होती है। इसीसे आर्थिक लेन-देन बढ़ता है। इसी को ग्रामीण पर्यटन, इको टूरिज्म, सांस्कृतिक पर्यटन, साहसी पर्यटन, प्राकृतिक पर्यटन जैसे विविध नामों से जाना जाता है।
ग्रामीण जीवन का अनुभव प्राप्त करना ग्रामीण पर्यटन का मूल है। आज की हालत में शहरी और ग्रामीण जीवन में दरार है, जिसे इस पर्यटन के द्वारा घटाया जा सकता है। ग्रामीण इलाका यानी पिछड़ा हुआ इलाका यह समझ, यह भावना दृढ़ हो गई है। ग्रामीण पर्यटन का मजा शहरी लोगों को भी उठाना चाहिए। इसी से पारंपारिक जीवन समझ में आएगा, आपस के संबंधों में मिठास आएगी। शहर की जिंदगी में पड़ोसी का नाम भी नहीं मालूम होता। इसके विपिरित गांव में होता है, वहां के लोग ज्यादा संवेदनशील होते हैं।
हरी- भरी, सुहानी ऋतु की अनुभूति गांव में ही होती है। शहर में तो सालभर प्रदूषण की ऋतु है ऐसा लगता है। संस्कृति यानी क्या है? उसका जतन कैसे करें? यह सिर्फ गांव देख कर ही समझ आता है।
ग्रामीण इलाके में कुम्हार मिट्टी रौंद कर पहिये पर सुंदर काम करता है। खेतिहर खेती करता है, बढ़ई बैलगाड़ी बनाता है, लुहार भट्टी तपा कर लोहे की चीजें बनाता है। मोची चमड़े की वस्तुए बनाता है, चुड़ीवाला चूड़ियां बेचता है, ब्राह्मण पूजा-अर्चा में मग्न होता है। ऐसे उद्योग शहर में नहीं देखे जाते।
राष्ट्रीय एकात्मता शहर में देखने को मिलती है। भिन्न-भिन्न जातियां मिल कर त्योहार मनाते हैं। शादी-ब्याह में एकसाथ भोजन का आनंद उठाते हैं। एक ही इमारत में कई लोग रहते हैं। वे मिल कर एक दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते हैं। शहर में हमेशा पत्थरबाजी होती रहती है। ग्रामीण इलाके में पेड़ के नीचे रखे बड़े पत्थर में हिंदुओं के भगवान और मुसलमानों के पीर मिलते हैं। शहर में सारी जातियां मिल जुलकर रहती हैं। इसी से सच्ची भारतीय संस्कृति देखने को मिलती है।
ग्रामीण इलाके का डॉक्टर है ‘इंसानियत’। प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से सारी बीमारियां दूर होती हैं, वहां जचकी भी दाई कर लेती है। जिसका प्रसव होता है वह स्त्री और जो प्रसव कराने का काम करती है वह स्त्री, भिन्न-भिन्न जाति या धर्म की भी होती है। उस पल दोनों मिलती हैं। बच्चों का जन्म जाति-पाति से परे होता है। यही एकता खून में और गुण में उतरती है।
मराठी दोहा है- ‘‘परिसाच्या संगे लोह बिघडले, लोह बिघडले सुवर्णचि झाले’’ (पारस के साथ रहने से लोहा भी स्वर्ण बन गया)। ग्रामीण जीवन में कोई सिखाने वाला नहीं मिलता, बल्कि वहां की प्रकृति, मनोहर वातावरण ही हमें शिक्षा देते हैं। ग्रामीण इलाकों में पर्यटन विकसित करना आवश्यक है। इसमें कुछ बाधाएं जरूर आती हैं। उन्हें ग्रामीण पर्यटकों को सुलझाना मुश्किल होता है जैसे कि १) स्थानीय लोगों का अज्ञान, २) सुविधाओं का अभाव, ३)उबड़-खाबड़ सडकें, ४) खर्च में कमी, ५) इच्छाशक्ति का अभाव, ६) बिजली की कमी, ७) होटल, खानपान, आवास योग्य नहीं होते, ८) गाइड्स की कमी, ९) संस्कृति के प्रति पूरा ज्ञान नहीं रखते, १०) शिक्षा पद्धति में अंतर, ११) सूखाग्रस्त इलाका होना और १२) लॅड स्लायडिंग का खतरा।
ग्रामीण पर्यटन से लाभ- १) ग्रामीण इलाके में सुधार होने से देश का विकास, २) ग्रामीणों को रोजगार, ३) यातायात सुविधा तथा ४) गरीबी हटाओ के नारे को बल।
महाराष्ट्र शासन ग्रामीण विकास के लिए कोंकण को ज्यादा महत्व दें। परशुराम भूमि में गोवा भी शामिल है। गोवा में समुद्र के तट, हरीभरी वनश्री, संस्कृति, गढ़-दुर्ग, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, नदियों और पहाड़ों की शोभा है, पश्चिम महाराष्ट्र में धार्मिक पर्यटन, ऐतिहासिक गढ़-किले बड़े पैमाने पर देखने को मिलते हैं। नाशिक, खानदेश की भूमि, विदर्भ में नागपुर, वर्धा के आसपास का भूभाग, मराठवाड़ा में औरंगाबाद, उसके पड़ोस में दौलताबाद, अजंता-एलोरा जैसा बुद्धकालीन भूभाग जैसे कई स्थल विकसित होना जरूरी है।
महाराष्ट्र में मुंबई -ठाणे-नवी मुंबई जैसे शहर पूर्णतया विकसित हैं। इन शहरों से सट कर ग्रामीण पर्यटन का विकास होना बेहद जरूरी है। आर्थिक समृद्धि इन शहरों में है। मिसाल के तौर पर मैं किसी ग्रामीण भूभाग का उदाहरण देना चाहूंगा। बोरिवली, भाईंदर, वसई, विरार, पालघर, कल्याण, डोंबिवली, ठाणे, नवी मुंबई इन शहरों से एक-डेढ़ घंटे में पहुंचा जा सके ऐसा गांव यानी ‘वज्रेश्वरी’। इस गांव में गर्म पानी के झरने (कुंड) हैं, जो कि प्रकृति की देन है। पास ही में ‘स्वर्गाश्रम ध्यान मंदिर’ भी बनाया गया है। इस मंदिर में देवी-देवताओं, साधु संतों की स्थापना हुई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माननीय माधव सदाशिव गोलवलकर उपाख्य श्रीगुरुजी की छहफुट ऊंची प्रतिमा है। यह सिर्फ मंदिर न होकर इसमें हिंदू धर्म का दर्शन कराया है। पर्यटकों के रहने और खानेपीने का इंतजाम है।
ग्रामीण इलाके में ऐसे पर्यटन-स्थलों को एम.टी.डी.सी को बढ़ावा देना चाहिए।
निम्नलिखित राज्यों में कुछ स्थलों का विकास पर्यटन व्यवसाय के लिए होना चाहिए- १) आंध्र- अ) नलगोंडा (सिल्क कॉटन), ब) प्रगति, क) चित्तूर-(कलमकारी), ड) विशाखापट्टन-लकड़ी का काम, इ) कुचिपुड़ी-नृत्य।
२) अरुणाचल- अ) रेंगो-बांस काम, ब)चंगलंग-स्थानीय संस्कृति।
३) असम- गोलघाट-बांस काम, ट्रेकिंग, इको टूरिज्म, अशरीकंडी-टेराकोट शिल्प।
४) बिहार- नालंदा (सिल्क)।
५) छत्तीसगढ़- अ) चित्रकुट (जलप्रपात), ब) माना-दुहा-साहसी पर्यटन।
६) दिल्ली- ऐतिहासिक स्थल।
७) गुजरात- जामनगर -प्राचीन अवशेष)
८) हरियाणा- कुरूक्षेत्र आध्यात्मिक स्थल
९) जम्मू-कश्मीर- अ) बारामुल्ला-साहसी पर्यटन, ब) श्रीनगर- संस्कृति, क) अनंतनाग-यात्रा और लोकनृत्य, ड) उधमपुर-संस्कृति और क्राफ्ट, इ) मानसबल-कारपेट तैयार करना, फ) तेगार और समूर- हैण्डलूम।
१०) कर्नाटक- बेल्लूर-इको टूरिज्म, स्टोन एवं वूड कार्विंग।
११) केरला- अ) अर्नामुला- म्यूरल पेंटिग्ज, ब) बलरामपुर- साड़ी उत्पादन, क) अनक्कारा- मसाला बनाने की चीजें।
१२) मध्यप्रदेश- अ) देवपुर-आध्यात्मिक, ब) कल्पना -मच्छी मारना, क)बुधनी-वुडक्राफ्ट।
१३) मेघालय- लालोंग-साहसी क्रीड़ा।
१४) मिजोरम- हैण्डलूम संस्कृति।
१५) नगालैंड- आदिवासी संस्कृति।
१६) ओड़िशा- अ) रघुराजपुर-पत्थर पर नक्काशी, ब) पिपली-समृद्ध क्राफ्ट।
१७) पंजाब- शीशा काम, छाट- कशीदाकारी।
१८) राजस्थान- समोदे- लाख काम, रंगीन स्टोन काम।
१९) सिक्किम- राचेन-रग और कार्पेट।
२०) तमिलनाडु- करलकुडी-सोने के जेवरात।
२१) पश्चिम बंगाल- अंतपुर -साडी बुनाई काम।
उपरोक्त राज्यों के कुछ गांवों में चल रहे रोजगार वर्णित है। जिस पर्यटक को जो शौक होगा, वह उस राज्य के विशेष गांव में जा सकता है।
सुशिक्षित और बेरोजगार युवक मिल कर सहकारिता पर बल देकर अपने गांव में ग्रामीण पर्यटन शुरू करें। उसके लिए लगातार कोशिश जारी रखें। प्रधान मंत्री मोदी जी ने ‘स्टार्ट अप’ परियोजना शुरु की है। विकास की इस पालकी को राष्ट्रप्रेमी, आधुनिक नागरिक जिम्मेदारी के साथ उठाएं और आगे बढ़े, यह शुभकामना।

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