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भारतीय सिनेमा के १०३ वर्ष के इतिहास पर नजर दौडाए तो एक बात विशेष रूप से सामने आती है कि ग्रामीण फिल्मों ने इस इतिहास को अत्यंत सुंदरता से समृद्ध किया है। आज हिंदी फिल्म जगत की भाषा और जीवन शैली पर अंग्रेजियत का भारी प्रभाव दिखाई देता है या यूरोपीयन और अमेरिकी मानसिकता का प्रभाव दिखाई देता है लेकिन फिर भी ग्रामीण फिल्मों का महत्व जरा भी कम नहीं होता।
हिंदी फिल्मों की अब तक की दस सर्वोत्तम फिल्मों के नाम चुने जाएं तो उनमें से कम से कम पांच-छह तो ग्रामीण होंगी ही और ग्रामीण जीवन का काफी हद तक दर्शन दिलाने वाले होंगी इस बात में कोई संदेह नहीं। महबूब खान की ‘मदर इंडिया’, नितिन बोस की ‘गंगा जमुना’, बिमल रॉय की ‘दो बीघा जमीन’, ‘सुजाता’, ‘बंदिनी’, राज कपूर की ‘जिस देस में गंगा बहती है’, सत्यम् शिवम् सुन्दरम्’, ‘राम तेरी गंगा मैली’, बी. आर. चोप्रा की ‘नया दौर’, मनोज कुमार की ‘उपकार’, रमेश सिप्पी की ‘शोले’, आशुतोष गोवारीकर की ‘लगान’, ‘स्वदेस’, नागेश कुकनूर की ‘इक्बाल’ आदि ग्रामीण फिल्मों के महत्वपूर्ण नामों की सूची लंबी है। मोनी भट्टाचार्य के ‘मुझे जीने दो’ से लेकर ‘पिपली लाइव’ तक बहुत कुछ कहा जा सकता है। फिल्मों के इन कुछ नामों से ही यह स्पष्ट होता है कि किस प्रकार से और कितने पैमाने पर इन फिल्मों में हमारे देश के दूरदराज की जीवन व्यवस्था का सुंदर और सूक्ष्म दर्शन दिखाई देता है। गांवों में बांधों से लेकर जमीनों के बंटवारों पर होने वाले अंत:कलह तक अनेक विषय फिल्मों में दिखाई दिए और उनसे ग्रामीण जीवन की ये फ़िल्में सफल रहीं हैं। वास्तविक भारत देहातों में बसता है इस सामाजिक विशेषता को इन फिल्मों से सकारात्मक साथ भी मिली।
१९९० के अंत में इन ग्रामीण फिल्मों का प्रभाव बहुत अधिक था। हो सकता है कि किसी को इस मालिका में ‘शोले’ का उल्लेख खटके। लेकिन डाकू- डकैती आदि ग्रामीण जीवन की वास्तविकता है और इसीलिए उसे नकारा नहीं जा सकता। शोले से पहले मुझे जीने दो, मेरा गांव मेरा देश, कच्चे धागे आदि डाकू-डकैती की फिल्मों को दर्शकों ने काफी सराहा था। उसके बाद दिग्दर्शक शेखर कपूर की फूलन देवी के जीवन पर आधारित ‘बैंडिट क्वीन’ फिल्म ने सामाजिक सांस्कृतिक क्षेत्र में बवाल मचा दिया था। इस फिल्म को अनेक पुरस्कार मिले और ग्रामीण विषय को अधोरेखित करने का सिलसिला बना रहा। इसके बावजूद ग्रामीण पृष्ठभूमि में बनाई जाने वाली फिल्मों की निर्मिति में कुछ चुनौतियां आती गईं। सत्तर के दशक में ‘बॉबी’ जैसी हल्की-फुल्की प्रेम कथा और ‘जंजीर’ जैसी प्रतिशोध कथाओं के नए ट्रेंड ने जन्म लिया। फिर भी ग्रामीण फिल्मों ने अपना वजूद बनाए रखा। दिग्दर्शक के.ए. अब्बास, मृणाल सेन, श्याम बेनेगल की समांतर अथवा कलात्मक फिल्मों के प्रवाह और प्रभाव में ग्रामीण भाग के विभिन्न विषय फिल्मों में आते रहे। मृगया, आक्रोश, खंडहर जैसी फ़िल्में उल्लेखनीय रहीं। कुछ अंतराल के बाद सूरज कुमार बडजात्या द्वारा दिग्दर्शित ‘हम आपके हैं कौन’ (१९९४) और आदित्य चोप्रा द्वारा दिग्दर्शित ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ (१९९५) फिल्मों ने एक के बाद एक लगातार सफलता की ऊंची उड़ान भरी और चकाचक फिल्मों का ट्रेंड स्थापित किया। विदशों में भी भारतीय फिल्मों की बढ़ती मांग को देखते हुए ग्रामीण फिल्मों की गति थोड़ी धीमी पड़ गई। देश में खुली अर्थ व्यवस्था अपनी जगह बना रही थी। शहरों का आधुनिकरण बढ़ रहा था। छोटे शहर बड़े होते गए। ऐसे दौर में ग्रामीण फिल्मों को पुन: आगे लाना कठिन काम था। लेकिन हिंदी फिल्मों ने उसे कर दिखाया।
केवल कश्यप द्वारा दिग्दर्शित ‘शहीद’ फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार लेने जब मनोज कुमार दिल्ली गए तब तत्कालीन प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने मनोज कुमार को एक अच्छी सलाह देते हुए कहा, देश की ‘जय जवान जय किसान’ नीति के अनुरूप वे एकाध फिल्म का निर्माण करें और देश की अधिकाधिक जनता तक पहुंचाने का प्रयास करें। मनोज कुमार ने इस सलाह को सकारात्मक रूप से लिया और नई दिल्ली से मुंबई की राजधानी एक्सप्रेस की यात्रा के दौरान ‘उपकार’ फिल्म का प्रारूप तैयार किया। इस फिल्म में चित्रित ‘मेरे देश की धरती सोना उगले’ इस गीत ने रसिकों के मन पर ऐसा जादू किया कि लगभग पचास वर्षों में इस गीत ने हर राष्ट्रीय त्यौहार में सम्मान का स्थान प्राप्त किया और फिल्मों में ग्रामीण फिल्मों का महत्व लगातार अंकित किया। वहीं दूसरी ओर बिमल रॉय की फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ में कर्ज के बोझ तले पिसते किसानों का साहूकार द्वारा होने वाला शोषण और उससे उकताया हुआ एक किसान किस तरह कोलकाता शहर में आकर रिक्शा चला कर कितनी भयानक हालात में पैसे कमाता है और उसे किस तरह से संघर्ष करना पड़ता है इसका अत्यंत भावपूर्ण चित्रण किया है।
‘स्वदेस’ फिल्म में आशुतोष गोवारीकर ने दिखाया है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पचास पचपन वर्षों के बाद भी देश के पांच हजार गांवों में बिजली नहीं पहुंची है। आज भी वहां जाति-पांति छुआछूत का बोलबाला,श्रद्धा-अंधश्रद्धा का कुप्रभाव आदि बातों का वास्तवदर्शी चित्रण किया है। हाल ही में बनी कुछ ग्रामीण फिल्मों में जरा हट के बातें देखने को मिलीं। विशेष उल्लेख ‘उड़ता पंजाब’ फिल्म का करना होगा। इसमें पंजाब के ग्रामीण इलाकों तक ड्रग्ज ने किस तरह अपना शिकंजा कसा है यह बात डंके की चोट पर दिखा कर सेंसार बोर्ड के सामने ही चुनौती खड़ी कर दी। निर्देशक प्रकाश झा ने बिहार के सामाजिक राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में अनेक भली-बुरी बातों पर ‘फोकस’ किया है। गंगाजल, अपहरण, आरक्षण फिल्मों का विशेष रूप से उल्लेख करना होगा। ग्रामीण विभाग की विभिन्न बातों में आशय और मनोरंजन का उचित संतुलन बनाए रखने से क्या सामाजिक प्रतिक्रिया उभरती है यह उस समय सब ने अनुभव किया। ग्रामीण फिल्मों में अनेक बार विभिन्न राज्यों की संस्कृति भी देखने को मिलती है। बिमल रॉय, शक्ति सामंत (अमानुष, आनंद आश्रम) ने बंगाल के ग्रामीण जीवन को चित्रित किया तो निर्देशक पी. दत्ता ने ‘बंटवारा’ में राजस्थान की झलक दिखलाई। निर्देशक रोहित शेट्टी ने चेन्नई एक्सप्रेस में तमिलनाडु के प्राकृतिक सौंदर्य को चित्रित कर के बहार ला दी। अन्य अनेक फिल्मों ने भी देश के ग्रामीण इलाके की विविधता को परदे पर दिखाया है। साथ ही इन फिल्मों द्वारा लोक संगीत नृत्य का भी मनोरम दृश्य देखने को मिलता है। महाराष्ट्र की ‘लावणी’ से लेकर पंजाब के ‘भांगड़ा’ तक इन विशेषताओं को अनुभव किया जा सकता है। सच है, ग्रामीण फ़िल्में बहु-सांस्कृतिक होती हैं।

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