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फैशन फिल्मों का अनिवार्य हिस्सा है। युवाओं में वहीं से फैशन चल निकलता है। पेहरावों में तो फिल्मों ने तरह-तरह के नए-नए प्रयोग किए, कुछ तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हावी रहे। फिल्मी गानों में भी झुमके से लेकर पायल तक और बिंदिया से लेकर कंगना तक छाये रहे। फिल्में पीढ़ियां जीती हैं, उनसे निकली फैशन लेकिन पीढ़ी के साथ ही बदल जाती है।

स्त्री के जीवन का एक अविभाज्य अंग है सोलह श्रृंगार फिर चाहे वह उसका उपयोग एक ही समय न करती हो। अपनी आर्थिक-स्थिति के अनुसार स्त्री अपने शरीर पर आभूषण धारण करती है। आभूषणों में सौंदर्य का आविर्भाव है, परंपरा हैै, आर्थिक संपन्नता की वह एक निशानी है।

सोलह श्रृगांर में बिंदी, नेकलेस, इयरिंग, अंगूठी, चूड़ियां, कमरपट्टा, बाजूबंद, पायल, पैर के अंगूठे की रिंग, बालों में गजरा, मेहेंदी, इत्र इ. का समावेश होता है। वर्तमान में नारी ने इनमें से कुछ आभूषणों को धारण करना छोड़ दिया है। पुराने समय में सोलह श्रृंगार को स्वास्थ से जोड़ा जाता था।

बिंदी अर्थात माथे पर कुंकुम का एक गोल टीका या चांदी की विविध आकार की सुंदर बिंदी। बचपन में बालिका के कान छेदे जाते हैं। इसके पीछे धारणा है कि कान छेदने से बालिका पर संमोहन का प्रभाव कम होता है। चूड़ियों के कारण शरीर में रक्त प्रवाह बढ़ता है। चूड़ियों के गोल आकार के कारण शरीर के अंदर की कॉस्मिक एनर्जी शरीर भर प्रवाहित होती रहती है। धातु के कंपन के कारण आभूषण परिधान करने वाली स्त्री स्वस्थ रहती है। कमरपट्टे का उपयोग अब कम किया जाता है परंतु इसके कारण कमर की चरबी कम होने में मदद मिलती है।

उपरोक्त सभी कारणों को आज का मेडिकल सायंस भले ही मान्यता न देता हो, फिर भी परंपरा से, रूढी से प्रयोग किए जा रहे आभूषणों का प्रत्येक स्त्री को आकर्षण होता है। स्त्री के जीवन में इन सोलह श्रृंगारों का महत्व जानकर भारतीय सिनेमा में स्त्री को श्रृंगारित रूप में दिखाया जाता है। इसके कारण सिनेमा में मुजरा, दरबारी नृत्य, शास्त्रीय नृत्य, विवाह समारोहों में होने वाले नृत्य प्रणय गीत इ. की भरभार निर्देशकों द्वारा की जाती है। गीतकारों ने भी इसकी पूर्ति अपने गीतों में विविध आभूषणों का जिक्र कर परदे पर नायिका को किस प्रकार सौंदर्य की प्रतिमा बनाना है इसका गुरूमंत्र दिया है। गीत रचना में बिंदिया, कंगना, चूड़ियां, नवलखा हार, घुंघरू, पायल, छमछम इ. आभूषणों का उल्लेख गीतकारों ने किया है। वैसे बहुत बार उस सिनेमा की पटकथा के साथ गानों का कोई संबंध नहीं होता, परंतु भारतीय संगीत सिने जगत की आत्मा होने के कारण इस प्रकार के गाने सिनेमा में देखे जा सकते हैं। रूपहले परदे पर आभूषणों से सजी नायिका दर्शकों, चाहे फिर वह पुरूष हो या स्त्री, को नयनसुख देती ही है।

सोलह श्रृंगार के अनेक आभूषणों का उल्लेख हिंदी सिनेमासृष्टि की गीत रचनाओं में मिलता है। उनमें से कुछ गानों की ओर हम दृष्टिक्षेप डालें-

1959 की ‘इन्सान जाग उठा’ फिल्म में आशा भोसले एवं गीता दत्त द्वारा गाए गए गीत ‘जानू जानू रे काहे खनके है तोरा कंगना’ में कंगन इस आभूषण का उल्लेख है। यह गाना नायिका मधुबाला एवं डान्सर मिनू मुमताज पर चित्रित किया गया था। प्रेम के आविर्भाव का सहजता से मजाक उड़ाते हुए चूड़ियों को हाथ हिलाकर प्रदर्शित कर रही हैं। गाने में दोनों अपने-अपने प्रेमियों (नायक सुनील दत्त एवं कॉमेडियन सुंदर) का मजाक बनाते हुए नृत्य कर रही हैं। और दोनों प्रेमी उनको निहार रहे हैं। इस गाने में बिंदिया झुमका और पायल का भी उल्लेख आया है। परंतु जोर मुख्य सौंदर्य प्रसाधन कंगन पर दिया गया है।

सन् 1960 में प्रदर्शित रामानंद सागर की फिल्म ‘घूंघट’ ने अपने गानों के कारण शोहरत हासिल की। फिल्म के संगीतकार रवि थे। फिल्म की नायिका बीना राय पर चित्रित ‘मेरी छम छम बाजे पायलिया’ में नायिका पैर में पायल पहने हैं और नाचते समय पायल की होने वाली छम छम ध्वनि नायिका के प्रसन्न स्वभाव का प्रतीक है। नायिका का विवाह होने के बाद भी उसका पति किसी अनपेक्षित घटना से उससे दूर चला जाता है, वह अब वापस आने वाला है इसकी खुशी में नायिका नायक भारतभूषण की तस्वीर हाथ में लेकर पायल की छुम छुम आवाज करते हुए अपना आनंद व्यक्त रही है। इस फिल्म के लिए बीना राय को बेस्ट एक्ट्रेस का फिल्म फेयर अवार्ड मिला था। इस फिल्म का दूसरा प्रसिध्द गीत था- ‘लागे ना मोरा जिया।’

1961 की फिल्म ‘गंगा जमुना’ के सभी गाने लोकप्रिय हुए थे। इस फिल्म के गीत ‘ढूंढो ढूंढो रे साजना मेरे कान का बाला’ में कान के इयररिंग्स का उल्लेख है। ‘बाला’ यह आभूषण इयररिंग्स से थोड़ा अलग है। बाला यह गोलाकर इयररिंग्स है। साधारणत: बचपन में ही लड़की के कान छिदवाकर उसमें इयररिंग्स पहनाए जाते हैं। परंतु उम्र बढ़ने के साथ ही इयररिंग्स का आकार भी बदलता जाता है। इस गाने में बचपन के मासूम प्रेम को व्यक्त किया गया है। इसके साथ ही सुहागरात को नववधु की बाली पति के कुर्ते में फंस जाती है। इससे प्रतीत होता है कि नायिका का बाल्यकाल समाप्त होकर उसका रूपांतर एक स्त्री में हो गया है। फिल्म के इस गाने में नायिका वैजयंतीमाला की गुम हुई बाली की खोज नायक दिलीप कुमार के कुर्ते पर जाकर समाप्त होती है।

1965 की ‘काजल’ फिल्म में ‘छम छम घुंघरू बोले’ इस गाने में ‘घुंघरू’ इस आभूषण का उल्लेख किया गया है। मीना कुमारी पर चित्रित इस गाने पर पद्मिनी डान्स कर रही है। दीवानखाने में दो  कलाकार धर्मेन्द्र और राजकुमार नाच का आनंद ले रहे हैं। मोती (राजकुमार) ने माधुरी (मीनाकुमारी) के भाई राजेश (धर्मेन्द्र) ने मोती (राजकुमार) को अपनी विवाह की वर्षगांठ पर बुलाया है। इस उपलक्ष्य में किए जाने वाले नृत्य में पद्मिनी अपने पैरों में बांधे हुए घुंघरूओं के पदन्यास से मीनाकुमारी (माधुरी) के गाने को साथ दे रही है।

कुछ लोगों के अनुसार, पायल यह अलंकार नहीं है। वह केवल नृत्य के पदन्यास के अनुसार छम छम ध्वनि से नृत्य में निखार लाती है। परंतु इससे घुंघरू का दो प्रकार से उपयोग होता है। घुंघरू नृत्य का एक अविभाज्य अंग है इसमें कोई संदेह नहीं है, परंतु इसी के साथ घुंघरू की शोभनीय अलंकारों में भी गणना हो सकती है। मीनाकुमारी पर चित्रित इस गाने में कहीं कहीं पद्मिनी भी गीतों के बोलों पर लिपसिंग (होंठ चलाना) करती दिखती है परंतु गायिका मात्र एक ही है। संगीतकार रवि एवं गीतकार साहिर की गीत रचना पर पद्मिनी ने उत्कृष्ट पदन्यास किया है।

1966 में आई फिल्म ‘मेरा साया’ के ‘गीत झुमका गिरा रे, बरेली के बाजार में’ ने तहलका मचा दिया था। साधना द्वारा  किए गए इस नृत्य में ‘झुमका’ का उल्लेख आया है परंतु प्रत्यक्ष फिल्मीकरण के दौरान साधना ने झुमका पहना है ऐसा कहीं दीखता नहीं है। कुछ लोग इसका ऐसा समर्थन करते हैं कि झुमका तो गुम हो गया है, रास्ते में कहीं गिर गया है तो फिर वह दिखेगा कैसे? सभी सिनेरसिकों का मानना है कि ‘झुमका’ आभूषण के उपयोग का यह पहला गीत होगा परंतु 1947 के ‘देखोजी’ फिल्म में शमशाद बेगन द्वारा गाए गए गीत के बोल थे ‘झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में’। केवल शेेष गाने के बोल एवं स्वररचना अलग है।

इस गाने की पार्श्वभूमि ऐसी है कि डाकुओं की टोली में शामिल रैना (साधना) नामक नर्तकी फिल्म की नायिका गीता (साधना) जैसी ही दिखती है। गांव-गांव जाकर नृत्य करने वाली रैना (साधना) अपने नृत्य के माध्यम से लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती है और इस दौरान उसके साथी, जो डाकू हैं, गांव में डाका डालकर लूट मचाते हैं। पुलिस के छापे में डुप्लिकेट साधना- याने रैना पकड़ी जाती है। परंतु वह पुलिस को बताती है कि वह ठाकुर राकेशसिंह (सुनील दत्त) की पत्नी गीता है। फिल्म की कहानी उदयपुर की है परंतु इस गाने पर फिल्माए गए नृत्य की लोकेशन गाने के शब्दों के अनुसार बरेली है।

नृत्य निर्देशक सोहनलाल की सहायक सरोज खान ने ‘झुमका गिरा रे’ गाने पर आधारित नृत्य का निर्देशन किया है। इस नृत्य के कारण सरोज खान को फिल्म जगत में नृत्य निर्देशक के रूप में मान्यता मिली। साधना का सौंदर्य माथे की बड़ी बिंदी के कारण भी अधोरेखित होता है।

कहा जाता है कि एक समय था कि स्क्रू से कान में फिट किए हुए झुमके कान से गिरकर गुम जाने के लिए बरेली प्रसिध्द था। झुमका गिरने की संभावना अत्यंत कम होती है। पर यदि ऐसा हुआ तो बड़ा आर्थिक नुकसान होता है। बरेली के एक एस.पी. ने झुमके गिरने के रहस्य को जानने का प्रयास किया। उसने खोज निकाला की झुमका कान से गिरने की संभावना बहुत कम होती है। यह चोरों के गिरोह का कारनामा है। वे इस तरह झुमका चुराते कि स्त्रियों को उसका पता ही नहीं चलता था। उस एस. पी. ने इस पर एक ग्रंथ लिखा। ग्रंथ का नाम उेपश ेष ीपरींलहळपस गर्हीाज्ञर था। वह ग्रंथ उसने नेशनल एकेडमी ऑफ पुलिस को भेजा। उन्होंने इस ग्रंथ को मान्यता दी। बरेली के रहने वाले पुराने बुजुर्ग लोगों कहते हैं कि यह परंपरागत लोकगीत है। हिन्दी सिनेमा के एक कलाकार अन्नू कपूर ने एफ. एम. पर एक कार्यक्रम में बताया कि बरेली की गलियां इतनी संकरी हैं कि एक दूसरे को धक्का लगने पर भी झुमके गुम होने की घटनाएं होती हैं।

शायद इसीलिए 1973 के ‘जुगनू’ में झुमका गुम होने से संबधित गीत नहीं है। उस गीत के बोल हैं-

गिर गया झुमका, गिरने दो

खो गयी मुंद्री, खोने दो

इस गीत में झुमका एवं मुंद्री इन दो गहनों का उल्लेख है। यह एक प्रेम गीत है जो धर्मेन्द्र एवं हेमा मालिनी पर फिल्माया गया है।

1967 में प्रदर्शित ‘छोटी सी मुलाकात’ नामक फिल्म में ‘छोटी सी मुलाकात प्यार बन गई, प्यार बनके गले का हार बन गई’ इस गाने पर नायक उत्तम कुमार एवं नायिका वैजयन्तीमाला ने वेस्टर्न डान्स किया है। गाने में ‘हार’ इस आभूषण का प्रतीकात्मक उल्लेख है। ‘प्यार बनके गले का हार बन गई’ इसका अर्थ नायिका नायक की अत्यंत प्रिय व्यक्ति बन गई है, ऐसा सूचित करना है।

1968 की फिल्म ‘मेरे हुजुर’ के गीत ‘झनक झनक तोरी बाजे पायलिया’ में ‘पायल’ का उल्लेख है। नवाब का मुखौटा धारण किया हुआ नायक राजेन्द्र कुमार दरबार में यह गीत प्रस्तुत कर रहा है। शास्त्रीय संगीत का आधार लिए हुए इस गाने को गायक मन्ना डे ने सहजता से गाया है। इस गाने पर लक्ष्मी छाया एवं मधुमती ये दो नृत्यांगनाएं पैर में पहनी हुई पायल के पदन्यास से नायक को गाने मे साथ दे रही हैं।

1960 की ‘परख’ में अभिनेत्री साधना पर ‘मिला है किसी का झुमका’ चित्रित किया गया है। इस गाने में वास्तविक इयररिंग्स नहीं दिखाए गए हैं। नायिका साधना गांव में नदी किनारे पड़े हुए फूल को उठाकर उसे ही इयररिंग समझ कर गाना गा रही है। फूल को ही झुमके का प्रतीक माना गया है।

1969 में आई फिल्म ‘अंजना’ में नायिका बबीता की ओर इशारा कर ‘आ मेरी रानी ले जा छल्ला निशानी’ यह गीत फिल्माया गया है। इस गाने में नायक राजेन्द्र कुमार रूठी हुई नायिका बबीता को मनाने के लिए जबरदस्ती उसके कान में छल्ला (रिंग) पहनाने का प्रयत्न करता है। इस गाने में छल्ले का दर्शन बहुत कम होता है। साधारणत: स्त्री कान में रिंग आभूषण परिधान करती है। गोल रिंग में चाबियां फंसाकर कमर में चांदी का छल्ला लगाने की फैशन भी रूढ़ है।

1969 के ‘दो रास्ते’ फिल्म में –

बिंदिया चमकेगी, चूड़ी खनकेगी

तेरी नींद उड़े तो उड़ जाये?

यह लोकप्रिय गीत था। नायिका मुमताज साड़ी पहनकर, बिंदी लगाकर नायक राजेश खन्ना पर प्रेमजाल फैलाते नजर आती है। इस फिल्म में राजेश खन्ना एवं मुमताज दोनों ही कॉलेज के विद्यार्थी हैं। मुमताज जब तंग पैन्ट एवं टी शर्ट पहन कर आती हैं तब राजेश खन्ना उसे उसके कपड़ों पर से भलाबुरा कहता है। तब वह पूर्ण भारतीय पारंपरिक श्रृंगार कर साड़ी पहन कर आती है एवं राजेश खन्ना को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयत्न करती है। गाने की कड़ी के बोल हैं, ‘बोले कंगना किसी का सजना, जवानी पे जोर नहीं’। इस प्रकार इस गाने में कंगना, घुंघरू, पायल, बिंदिया ऐसे अनेक आभूषणों का संदर्भ आया है।

1970 के ‘सावन भादों’ सिनेमा में ‘कान में झुमका, चाल में ठुमका, कमर पे चोटी लटके’ यह गाना फिल्मी दुनिया में प्रथमत: पदार्पण किए हुए नवीन निश्चल एवं रेखा पर चित्रित है। यह एक प्रेमगीत है। इसमें गांव की छोरी रेखा का अल्लड़पन, ठुमकते हुए चलने की अदा, उसके नखरे दिखाने के अलावा ‘झुमका’ इस आभूषण का कोई संबंध नहीं है।

1973 की ‘अनोखी अदा’ में ‘हो गई, गुम गई, गुम गई, मेरी नथनी गुम गई’ इस गाने में, जो आशा भोसले ने गाया है, पद्मा खन्ना गांव वालों के सामने अपनी नथनी गुम होने की शिकायत कर रही है। इन गांव वालों में हास्य कलाकार महसूद एवं चरित्र अभिनेता कन्हैयालाल भी बैठे नजर आते हैं।

1973 की फिल्म ‘अभियान’ में ‘तेरी बिंदिया रे’ यह युगल गीत अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी पर फिल्माया गया है। फिल्म में सुबीर (अमिताभ बच्चन) एक व्यावसायिक गायक है। इतनी जल्दी शादी नहीं करना है यह निश्चित किया हुआ यह गायक अपनी मौसी के पास गांव में जाता है। मौसी उसको जल्दी शादी करने को बहुत कहती है पर वह नकार देता है। गांव में नदी किनारे मंदिर के पास अमिताभ गांव की लड़की उमा (जया भादुड़ी) के मुहं से ‘नदिया किनारे’ यह गाना सुनता है। उसकी आवाज पर फिदा होकर अमिताभ उससे शादी करने को राजी हो जाता है। औरं‘चंद मंगनी पट शादी’ तर्ज पर गांव में ही उनका विवाह हो जाता है। नववधु के साथ अमिताभ मुंबई लौटता है तो उसका सचिव असरानी गांव में हुए इस विवाह पर नाराजी प्रगट करता है एवं शादी के उपलक्ष्य में भव्य पार्टी की योजना बनाता है। इस विवाह समारोह में शास्त्रीय संगीत के ज्ञाता रायसाहेब (डेविड) भी मौजूद होते हैं। वे अमिताभ को गाना गाने की फर्माईश करते हैं। तब अमिताभ कहते हैं कि मेरे साथ मेरी पत्नी भी गाएगी। और अमिताभ ‘तेरी बिंदिया’ यह गाना गाना शुरू करते हैं। यहीं पर जलन की पहली चिंगारी फूटती है। क्योंकि युगल गीत समाप्त होने पर रायसाहेब (डेविड) टिप्पणी करते हैं कि जया की आवाज अमिताभ की तुलना में अधिक मधुर है। आगे चलकर संगीत क्षेत्र में अमिताभ गिरने लगते हैं एवं उनकी पत्नी की आवाज का जलवा बिखरने लगता है। जया  सफल गायिका के रूप में उभरती है और यही से दोनों के वैवाहिक जीवन में संकट के बादल आने प्रारंभ हो जाते हैं।

वैसे देखा जाए तो यह गाना कहानी का एक भाग ही है। इस गाने के कारण लोगों को जया की आवाज की पहचान होती है। इस फिल्म के लिए जया भादुड़ी को श्रेष्ठ नायिका का फिल्मफेयर अवार्ड मिला है। इस गाने में बिंदिया का उपयोग नवविवाहिता की पहचान के रूप में किया है। सिंदूर, बिंदिया का उपयोग एकदम उचित लगता है।

1979 की ‘सरगम’ फिल्म का गाना-

पर्वत के इस पार, पर्वत के उस पार,

गूंज उठी मेरी पायल की झंकार

इस गीत में बहुत साज-श्रृंगार की हुई, आभूषण पहनी हुई, केशरचना में भी विविध आभूषणों का उपयोग की हुई नायिका जयाप्रदा पहाड़ों की पृष्ठभूमि में नृत्य कर रही है और नायक ऋषि कपूूर डफली बजाते हुए उसका साथ दे रहे हैं।

1982 की फिल्म ‘नमक हलाल’ के गीत ‘के पग घुंघरू बांध मीरा नाची री’ ने बहुत धूम मचाई थी। इस सुपरहिट गाने में अनेक सुंदर नृत्यांगनाएं नायक अमिताभ के साथ पदन्यास करती दिखाई दे रही हैं।

1989 की ‘चांदनी’ फिल्म के ‘मेरे हाथों में नौ नौ चूड़ियां हैं’ के गाने में नायिका श्रीदेवी ने दोनों हाथों में अलग-अलग रंगों की नौ-नौ चूड़ियां पहनी हैं और एक विवाह समारोह में सुन्दर नृत्य प्रस्तुत करती हुई देखी जा सकती है। अति श्रृंगारित इस चांदनी का सौंदर्य नृत्य के साथ उभर उठता है। विवाह समारोह में इस गाने का प्रचलन बहुत अधिक है।

गान कोकिला लता मंगेशकर जब-जब विदेश में गाने के कार्यक्रम में जाती थी, तब-तब इस गाने की फर्माईश श्रोताओं की ओर से होती थी। लता दीदी गाने के शब्दों के विषय में अति जागरूक है। यह गाना गाते समय वे उस कड़ी को टाल जाती थी जिसके बोलों में अरलीलता झलकती थी।

1995 की ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ इस फिल्म के गीत ‘मेहंदी सजा के रखना, डोली सजा के रखना’ ने सिने रसिकों पर जादू किया है, जो आज तक नहीं उतरा। प्रत्येक विवाह समारोह का यह एक मुख्य गाना बन गया है। इस गाने में ढोल एवं भारतीय पारंपरिक पहनावे का मिलाप है। यह फिल्म फैशन एवं परंपरा मिलाप है। टिपिकल पंजाबी पहनावे में छत पर फिल्माया गया गीत-नायक शाहरूख खान एवं नायिका काजोल पर चित्रित किया गया है। काजोल के माथे पर का टीका, नेकलेस और झुमका साथ ही मेहेंदी से सजे हाथ के कारण नायिका के चेहरे पर एक विशिष्टता तथा चमक आई थी। परंतु नायिका ने बहुत कम मेकअप कर उसको कम किया।

इस गाने में चमकदार हरे रंग का पंजाबी ब्लाउज एवं लहंगा पहनी हुई सिमरन (काजोल) का यह टिपिकल भारतीय पेहराव फिल्म के प्रदर्शन के बाद अनेक नववधुओं की पहली पसंद बना। काजोल ने अपनी स्वयं की शादी में भी इसी प्रकार का ड्रेस परिधान किया था। शाहरूख के पठानी सूट ने भी नया फैशन ट्रेंड शुरू किया था। सिनेमा में नायक-नायिका द्वारा पहने गए ड्रेस, आभूषण एवं अन्य प्रसाधन सर्वसामान्य सिने दर्शकों पर कितना प्रभाव डालते हैं इसका उत्तम उदाहरण याने काजोल-शाहरूख का यह सिनेमा है।

इसी प्रकार मल्टीस्टार फिल्म ‘वक्त’ में साधना ने तंग चूड़ीदार सलवार और कुर्ता इस प्रकार का पेहेराव किया था। परंतु यश चोपड़ा को वह ड्रेस पसंद नहीं आया। परंतु नायिका साधना ने ड्रेस मेकर अथैया की मध्यस्थी से यश चोपड़ा को इसी ड्रेस के लिया मना लिया। फिल्म रिलीज होने के बाद युवतियों में यह पहनावा बहुत लोकप्रिय हुआ। साधना ने हालीवुड की अभिनेत्री अमिता हेपबर्न की केशरचना की कॉपी की और यह केशरचना युवतियों में साधना कट के नाम से प्रसिध्द हुई। आज यदि 60-70 के दशक का वातावरण फिल्मों में दिखाना हो तो साधना के पहनावे का अक्सर उपयोग किया जाता है। ‘ओम शांति ओम’ फिल्म में नायिका दीपिका पदुकोण का पदार्पण साधना की केशभूषा की याद दिलाने वाला है।

हिन्दी सिनेमा में स्त्रियों के आभूषणों का उल्लेख करने वाले अनेक गाने हैं। जैसे-

सन् 1956 -नया अंदाज-सैय्या राजा ला दो गले का हार

सन् 1965 -चांद और सूरज-झनन झनन बाजे बिछुआ

सन् 1963 -फौलाद-पांव में झांझर, झांझर में घुंघरू

सन् 1970 -सास भी कभी बहू होती है-ले ले चुडियां नीली, पीली, लाल, हरी, आसमानी

सन् 1970 -गंवार-हमसे तो अच्छी तेरी पायल गोरी

सन् 1970 -रामावतार-उंगली में अंगूठी, अंगूठी में नगीना

तेरे बिन एक दिन भी मुश्किल हो गया जीना।

सन् 1971 -गेम्बलर-चूड़ी नहीं मेरा दिल है ये

सन् 1993 -हम है राही प्यार के-घूंघट की आड से दिलबर का

सन् 1996 -प्रेमग्रंथ-बाजूबंद बाजूबंद दिल का पंछी नैनों के पिंजरे में हो गया बन्द

सन् 1991 -लम्हे-

1) मोरनी बागा में बोले आधी रात को

छनन छन चूड़ियां खनक गई देख साहिबा

2) मेरी बिंदिया तेरी निंदिया ना उड़ा दे तो कहना

सन् 1996 -कृष्णा-झांझरिया उसकी छनक गई

सन् 1992 -दीवाना-पायलिया ओ हो हो हो, पायलिया शोर मचाये

सन् 2001 -कभी खुशी कभी गम-बोले चूड़ियां, बोले कंगना

है मैं तो हो गई तेरी सजना

मोहरा-ना कजरे की धार ना मोतियों का हार

कुछ फिल्मों के नामों में आभूषणों का उपयोग किया गया है- जैसे कंगन- यह फिल्म तीन बार बनी; सन् 1939, 1959, 1971 में। इन तीनों फिल्मों में अशोक कुमार ने काम किया था। पहली में लीला चिटणीस, दूसरी में निरूपा रॉय और तीसरी में संजीव कुमार और माला सिन्हा के साथ।

कुछ अन्य नाम हैं, पायल की झंकार, दो बार सन् 1968 और सन् 1980 में, तेरी पायल मेरे गीत, बिंदिया दो बार सन् 1955 और सन् 1960 में, भाभी की चूड़ियां, बिंदिया और बंदूक, बिंदिया चमकेगी, पत्थर और पायल, घुंघरू, घुंघरू की आवाज इ.।

कुल मिलाकर यदि देखा जाए तो हिन्दी सिनेमा के नामों एवं गानों में आभूषणों के नामों का उपयोग व्यर्थ ही किया जाता है। केवल नायिका या मुजरा डान्सर को अलग-अलग आभूषण पहनाकर रूपहले पर्दे पर नचाना जिससे दर्शकों का मनोरंजन हो सके। इस हिट फार्मूले पर नाच रखकर ऐसे गानों को फिल्मों में दिखाया जाता है। फिल्मों में विवाह समारोह, जन्मदिन की पार्टी, हॉटेल में कैब्रे, खलनायक का अड्डा ऐसे प्रसंग निश्चित ही फिल्माए जाते हैं। इसके लिए इस प्रकार के गानों का समावेश निर्देशक को करना ही पड़ता है। कुछ निर्देशक इन गानों का उपयोग कल्पनाशीलता से करते हैं।

हिन्दी सिनेमा में फैशन सिनेरसिकों के लिए अनिवार्य हिस्सा बन गया है यह मात्र त्रिवार सत्य है।

 

 

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