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समाज में कार्य करते समय अलग अलग प्रकार, प्रवृत्ति, स्वभाव के व्यक्तियों से हमारी भेंट होती है। कुछ हमारे अनुकूल होते हैं, कुछ प्रतिकुल होते हैं। कुछ भगवान, धर्म, धर्मग्रंथों को गालियां देने वाले होते हैं। हमेशा विपरित व्यवहार करने वाले होते हैं।

ऐसे सब मनुयों को सहन करना सीखना होगा। उनसे घृणा नही करनी है। यह सृष्टि यदि परमेश्वर ने बनाई है तो यह सब उसी का खेल है यह मानकर व्यवहार करना सीखना होगा। विपरित व्यवहार से हमारा ही मूल्यभय होगा। हमारी ही हानि होगी। एक सत्पुरूष द्वारा बताई गई कहानी का यही अर्थ है।

एक व्यक्ति का रोज अन्नदान करने का व्रत रहता है। दोपहर के भोजन के समय जो आयेगा, उसे वह अन्नदान करता है। भोजन परोसने के बाद वह भगवान का नाम लेता है, अतिथि से भी कहता है कि वह कहे, “पार्वतीपते हर हर महादेव!”

एम बार उसके घर एक अत्यंत बूढ़ा व्यक्ति आता है। बुढ़ापे के कारण उसका सारा शरीर झुक गया था। उम्र भी 80-90 के आसपास होगी। गृहस्थ उसे भोजन परोसने लगता है, पहिला ग्रास थाली में परोसते ही वह वृध्द परोसा हुआ सब एक ग्रास में ही मुंह में डालता है। कभी भोजन न मिला हो इस प्रकार वह खाने लगता है।

खाने के पूर्व भगवान का नाम भी नही लेता। उस गृहस्थ को बहुत गुस्सा आता है। वह भोजन परोसना बंद कर देता है एवं अपशब्द कहते हुए उस वृध्द को घर से बाहर निकाल देता है और कहता है, “तुम भीख मांगकर खाने लायक हो। आदरपूर्वक खाना खिलाने की लायकी तुम्हारी नही है।”

उस रात देवी अन्नपूर्ण उसके सपने में आती है और उसे कहती है, “भक्त! आज दोपहर तूने उस वृध्द व्यक्ति को भोजन की थाली से उठाकर अच्छा नही किया। वह भगवान का कभी भी नाम नही लेता। वह नब्बे वर्ष का वृध्द है। वह मेरा नाम नही लेता इसलिये मैने उसे कभी सजा नही दी। उसकी जीवनरेखा भी कम नही की। तुम यदि उसे कुछ क्षण सहन कर लेते तो कोई आकाश नही गिरने वाला था!”

 

 

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  1. हिंदी विवेक …कहाणी.

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