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‘ध’ का ‘मा’ करना यह हम सबको परिचित है। रघुनाथदादाने नारायणराव पेशवा को ‘धरावे’ अर्थात पकड़ो ऐसा लिखित आदेश दिया। उनकी पत्नी आनंदीबाई ने उस आदेश में ‘धरावे’ का ‘मारावे’ अर्थात मार डालो यह बदल किया। अर्थात ‘ध’ की जगह ‘मा’ करने से पूरे आदेश का आशय ही बदल गया। इसके कारण नारायणराव का खून होता है यह इतिहास है। अक्षर, मात्रा बदलने से अर्थ का अनर्थ हो जाता है यह सच है। कालिदास की एक ऐसी ही कहानी है।

यदि किसी की उन्मति हो रही है तो उससे द्वेष रखने वाले अपने आप पैदा हो जाता हैं। साहित्यिक, कवि, कलाकार अपने से बडे कलाकारों से क्यों जलते हैं? इसका एक ही कारण अर्थात मनुष्य स्वभाव। किसी कलाकार को भारतरत्न से नवाजा जाये तो उस विधा के कलाकारों की कैसी विपरित प्रतिक्रिया होती है यह हम देखते ही हैं। राजा भोज के दरबार में कालिदास का गौरव सहन न करने वाला एक कवि या, “धनंजय”। कालिदास को नीचा दिखाने हेतु उसने एक श्लोक लिखा। श्लोक था,

   अपशब्दं शतं माघे, भारतेच शतयंत्र।

                कालिदासो न गण्यंते, कविरेको धनंजय:॥

इसका अर्थ है – माघ कवि के काव्य में सौ अपशब्द है। महाभारत काव्य में तीनसौ अपशब्द हैं तो कालिदास के काव्य में अगणित अपशब्द है। धनंजय कवि के काव्य में केवल एक अपशब्द है। (अर्थात हे राजन्, मुझे केवल एक ही अपशब्द का प्रयोग कर आपको यह बताना पड़ रहा है।

यह श्लोक लेकर धनंजय कवि का सेवक दरबार में जा रहा था। रास्ते में उसे कालिदास मिले। सेवक ने अपने मालिक का काव्य कालिदास को दिखाया। उसे पढ़कर कालिदास ने सेवक से कहा, “तुम्हारे मालिक ने श्लोक बहुत अच्छा लिखा है परंतु उसमें एक गलती रह गई है, उसे सुुधारना आवश्यक है।”

सेवक ने कहा, “मै तो पढ़ा लिखा नही हूं, आप ही सुधार दिजीये।” कालिदास ने उस श्लोक में सुधार किया-

आपशब्द शतं माघे, भारतौ शतत्रयम्।

                कालिदासे न गण्यंते, कविरेको धानंजय॥

‘अ’ की जगह ‘आं’ करके कालिदास ने अपशब्दं का आपशब्दं कर दिया। इस एक मात्रा के बदल से पूरे श्लोक का अर्थ ही बदल गया। वह ऐसा कि संस्कृत मे आप याने पानी। इसके कारण श्लोक का अर्थ हो गया- माघ कवि के काव्य में पानी इस अर्थ सौ शब्द हैं, महाभारत में तीन सौ शब्द है तो कालिदास के काव्य में ऐसे अगणित शब्द हैं। परंतु मेरे धनंजय के काव्य में पानी यह एक ही शब्द है।

यह श्लोक जब राजा भोज पढ़ते हैं तो उन्हे हंसी आ जाती है। स्वयं की बदनामी करवाने वाले कवि धनंजय पर उन्हे तरस आता है। अकारण दूसरे से द्वेष करने से अपनी ही हंसी होती है।

 

 

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  2. हिंदी विवेक सुविचार.
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