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यह संसार विसंगतियों से भरा है। किसी व्यक्ति को किसी विषय में आनंद आता है वही दूसरे के लिये दु:खदायक होता है। किसी को चाय बहुत अच्छी लगती है तो दूसरे के लिये वही कुपथ्य है। किसी के स्वास्थ के लिये दूध बहुत अच्छा होता है तो दूसरा कहता है कि दूध की अपेक्षा मठा अच्छा। संसार की इस विसंगति पर इसाप ने बराबर इंगित किया है।

एक व्यक्ति की दो लडकियां थी। दोनो की शादी होती है। एक का पति फलों के एक बडे बगीचे का मालिक होता है तो दुसरी का कुम्हार होता है। अपने लडकियों की गृहस्थी कैसे चल रही है यह देखने वह एक बार घर से निकलता है। सबसे पहले वह अपनी बडी बेटी के घर जाता है।

बेटी से पूछता है, “बेटा तुम्हारी गृहस्थी कैसे चल रही है?” बेटी उत्तर देती है, “पिताजी हमारी गृहस्थी बहुत अच्छी चल रही है। हमने फलों के बहुत से वृक्ष लगाये हैं। बगीचे की अच्छी देखभाल की है। अच्छी खाद डाली है। अब हम बरसात का इंतजार कर रहे हैं। जल्द ही अच्छी बरसात हो, ऐसी प्रार्थना मै भगवान से कर रही हूं।”

अपनी बेटी प्रसन्न है. सुखी है यह देखकर वह भी प्रसन्न होता है और अपनी छोटी बेटी के यहां जाता है। वहां भी, बेटा तू कैसी है, प्रसन्न है ना, सब ठीक चल रहा है ना, ऐसा पूछता है।

बेटी भी उत्तर देती है कि पिताजी हमारी गृहस्थी बहुत अच्छी चल रही है। अभी अभी हमने मिट्टी के बर्तन, घड़े इ. बनाये हैं। वे जब सूख जायेंगे तब हमें उनकी अच्छी कीमत प्राप्त होगी। अब अत्यंत कडी धूप की आवश्यकता है। मै भगवान से प्रार्थना करती हूं कि बरसात जल्द न हो।

दोनो पुत्रियों की भगवान से प्रार्थना को सुनकर पिता असमंजस में पड जाता है। भगवान ने किसकी प्रार्थना सुननी चाहिये, ऐसा प्रश्न उसके सामने आता है। मुझे भी यह प्रश्न है कि मै किस पुत्री के लिये प्रार्थना करूं?

ऐसी असमंजस पूर्ण परिस्थिति में क्या करना चाहिये? आराम से बैठे रहिये एवं जो जो होता है उसे देखते रहिये। दोनों अपनी ही लडकियां हैं परंतु भगवान से दोनों का मांगना कितना विरोधाभासी है! यह विचार करते हुए पिता शांतचित्त से अपने घर जाता है।

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