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मुहावरा तो वैयाकरणों का विषय है। वैयाकरण का अर्थ सरल भाषा में व्याकरण का आचार्य है; लेकिन विज्ञान के इस युग ने इस शब्द को भाषा-विज्ञानी के अर्थ तक पहुंचा दिया है। वर्तमान बोली या लिखित हिंदी से वैयाकरण या व्याकरणाचार्य शब्द तिरोहित होते जा रहे हैं। बहुतों के लिए व्याकरण उबाऊ विषय है। लेकिन, विलक्षण शब्द-शक्ति रखने वाले मुहावरें उबाऊ नहीं हैं; बल्कि इससे बोलचाल तरोताजा, रोचक और लक्ष्यभेदी, लक्षणात्मक, व्यंजनात्मक हो जाती है। लक्षणा को रूपक भी कहा जाता है। कहावतों, लोकोक्तियों या संस्कृत के सुभाषितों या वाक्प्रचारों तथा मुहावरों में यही पतली विभाजन रेखा है। मुहावरों में व्यंजना का मुख्य लक्षण है। अर्थात, शब्दों के मूल अर्थों के बजाय उससे ध्वनितार्थ पृथक होता है और सुनाने वाला या सुनने वाला ठीक उसी अर्थ को त्वरित पकड़ लेता है। मुहावरों की यही विलक्षणता है। कहावतों में व्यंजना या विलक्षणता का पक्ष गौण है या है ही नहीं। कहावतें, लोकोक्तियां अथवा सुभाषित या वाक्प्रचार सीधे-सीधे सत्य को प्रतिपादित करते हैं। इनमें शब्दों के अर्थ वही लिए जाते हैं, जो प्रचलित हैं। व्यंजना या विलक्षणता की इसमें जरूरत नहीं होती। इससे मुहावरों और लोकोक्तियों का भेद मोटी तौर पर स्पष्ट हो जाएगा।
प्रश्न हो सकता है कि आखिर इन मुहावरों की उत्पत्ति कैसे हुई? किसने ये शब्द या शक्तिशाली वाक्यांशों का गठन किया है? भाषा-विज्ञानियों ने इस पर काफी माथापच्ची की है और इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि मुहावरों की उत्पत्ति जनसाधारण के जीवन-व्यवहारों में आवश्यक भाषा की विलक्षणता की देन है। यह जनसाधारण शहरों या महानगरों में नहीं, अपितु ग्रामीण अंचलों में बसता है। अंग्रेजी के प्रसिद्ध भाषा-विज्ञानी लोगन पर्सेल स्मिथ की टिप्पणी इस दिशा में प्रातिनिधिक मानी जानी चाहिए। उन्होंने कहा है, ‘‘…शब्दों की तरह मुहावरों को बनाने का श्रेय भी मुख्य रूप से अशिक्षित वर्ग को ही है और हमारे सर्वथा स्पष्ट और सजीव शब्दों की तरह ही हमारे सर्वोत्तम मुहावरें भी, किसी पुस्तकालय, विद्वन्मंडली अथवा किसी उच्चकोटि के उपवन या नाट्यगृह से न आकर उद्योगशाला, रसोईघर और खेत तथा खलिहान से ही आते हैं। ’’ (‘वर्ल्डस एण्ड ईडियम्स’, दूसरा संस्करण, पृष्ठ २१२)। उनके कथन को पुष्ट करने के लिए बानगी ही देनी हो तो ‘चूल्हे में जाओ’, ‘आटे-दाल का भाव मालूम होना’, ‘कील-कांटा अलग करना’, ‘मिट्टी के मटींगरे होना’, ‘आवा का आवा खराब होना’ जैसे अनगिनत मुहावरें दिए जा सकते हैं।
मैलिनोवस्की नामक एक प्रसिद्ध रूसी भाषा-विज्ञानी हुए। उन्होंने आदिवासियों की बोलियों का गहरा अध्ययन किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि किसी भाषा के मुहावरों पर ‘आदिम जातियों के रहन-सहन और विश्वास तथा कल्पनाओं की गहरी छाप होती है। ’ शब्दों में मंत्र-सामर्थ्य की जो बात संस्कृत में कही गई है, उसका तात्पर्य भी यही है। मुहावरों के इतिहास पर ही जाना हो तो उसे चार चरणों में बांटा जा सकता है। पहला चरण ॠग्वेद तक के काल की बोलियों/भाषाओं के मुहावरें, दूसरा चरण ॠग्वेद से मुगलों के आक्रमणों तक, तीसरा चरण मुगलों से अंग्रेजों के हावी होने तक और चौथा चरण स्वाधीनता के बाद के काल में बोलियों/भाषाओं में आए परिवर्तन। यह बहुत विस्तृत और गहन विषय है, जो इस लेख का विषय न होने से इसे यहीं छोड़ देते हैं। ऐतिहासिक चरणों का उल्लेख केवल इस उद्देश्य से किया गया है कि इससे पता चले कि स्वर से वाणी, वाणी से शब्द, शब्दों से वाक्यांश, इससे बोली और भाषा के विकास के क्रम में मुहावरें ही नींव के रत्न रहे हैं, स्तंभ रहे हैं। मुहावरों के महत्व एवं उनकी शक्ति का परिचय निम्न दोहे से यथार्थ रूप से हो जाता है-
भाषा मॉंहि मुहावरे, ज्यों नाविक के तीर।
बाहर से छोटे लगें, घाव करें गंभीर॥
मुहावरा मूलतः अरबी शब्द है। अरबी विद्वानों ने इसे गुफ्तगू, सवाल-जवाब इस अर्थ में लिया है। इसलिए वह ‘हौर’ शब्द से निर्मित माना जाता है। और उसमें मुंह शब्द आरंभ में जोड़ देने से वह ‘मुहावरा’ शब्द में तब्दील हो गया। हिंदी में यह शब्द ‘महाविरा’, ‘महावरा’, ‘मुहाविरा’, ‘मुहव्वरा’ या ‘मुहबुरा’ इत्यादि भिन्न-भिन्न रूपों में लिखा दिखाई देता है। अरबी के र्हस्व स्वर-संकेत चिह्नों की सर्वथा उपेक्षा करने या अरबी का व्याकरण ठीक से न समझने के कारण ये भिन्न-भिन्न रूप दिखाई देते हैं; लेकिन विद्वानों की राय है कि सही शब्द ‘मुहावरा’ ही है और हिंदी में इसी रूप का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। अंग्रेजी में मुहावरों को लिए ‘इडियम’ शब्द का इस्तेमाल होता है। माना जाता है कि यह शब्द लैटिन और फ्रेंच से होता हुआ ग्रीक भाषा में पहुंचा तथा वहां से छलांग लगाकर अंग्रेजी में रूढ़ हो गया। संस्कृत में भी आधुनिक काल में मुहावरे के पर्यायी शब्द निर्मित किए गए जैसे वाक्पद्वति, वाक्-रीति, वाक्-व्यवहार, वाक्-सम्प्रदाय, वाक्-धारा आदि। मराठी में ‘म्हण’ शब्द प्रचलित है। काका कालेलकर ने ‘वाक्प्रचार’ शब्द दिया है। इस तरह ‘म्हणी आणि वाक्प्रचार’ शब्द मराठी में लोकप्रिय हुए हैं।
मुहावरों पर हिंदी, मराठी, उर्दू और अन्य भारतीय भाषाओं में मीमांसात्मक, विश्लेषणात्मक, ऐतिहासिक अध्ययन बहुत कम हुआ है। रामदहिन मिश्र की ‘हिंदी मुहावरे’, रामचंद्र वर्मा की ‘अच्छी हिंदी’, हरिऔंधजी की ‘बोलचाल’ तथा कामताप्रसाद गुरु की ‘हिंदी व्याकरण’ जैसी किताबों की भूमिकाओं में मुहावरों पर मौजूं टिप्पणियां अवश्य हैं; लेकिन वे मुहावरों की गवेषणा को पूर्णतः समर्पित किताबें नहीं हैं। हिंदी में इसका एकमात्र अपवाद डॉ. ओमप्रकाश गुप्त का ग्रंथ ‘मुहावरा-मीमांसा’ है। उर्दू में इस विषय में मौलाना हाली की ‘मुकदमा शेरो-शायरी’, मुहम्मद हुसेन आजाद की ‘सखून दाने फारस’, ‘इल्लाह जबान उर्दू’, ‘बाजारी जबान’ जैसी पुस्तकों का जिक्र पढ़ने में आया है; लेकिन प्रस्तुत लेखक के उर्दू साहित्य एवं व्याकरण की अनभिज्ञता के कारण बहुत कुछ आधिकारिक रूप से नहीं कहा जा सकता। उर्दू में इस विषय पर और भी अच्छे ग्रंथ हो सकते हैं। हां, अंग्रेजी में अवश्य कुछ अच्छे ग्रंथ हैं जैसे कि लोगन पर्सेल स्मिथ की ‘वडर्स एण्ड ईडियम्स’, जेम्स डिक्सन की ‘इंग्लिश ईडियम्स’,
द ऑक्सफर्ड डिक्शनरी ऑफ इंग्लिश प्रोवर्ब्स’, फाउलर की ‘इंग्लिश यूसेज एण्ड ईडियम्स’ इत्यादि दसों ग्रंथों की सूची मिल जाएगी। मराठी में भी मुहावरों पर संग्रहों तक सीमित काम हुआ दिखाई देता है, विवेचनात्मक या गवेषणात्मक काम बहुत अल्प।
हिंदी में भी मुहावरों पर गवेषणामक या अनुसंधानात्मक काम का टोटा है। जो कुछ थोड़ा-बहुत काम हुआ है, वह मुहावरों के संग्रहों तक ही सीमित है। ये कोश या संग्रह भी सीमित हैं। अनेकों में केवल उन्हीं-उन्हीं मुहावरों का दुहराव है। हरेक में कुछेक नए मुहावरें हैं। इन कोशों में मुहावरों का हिसाब लगाया जाए तो वे अधिकतम ८ हजार ही होते हैं। इसे उजागर करते हुए डॉ. ओमप्रकाश गुप्त ने कहा था कि ‘मुहावरा-मीमांसा’ पर काम करते समय उन्होंने ३२ हजार से अधिक मुहावरे संग्रहीत किए थे। उनका कहना था कि यह संख्या भी बहुत कम है और इस क्षेत्र में और विशाल काम होना है।
मुहावरा आखिर किसे कहते हैं? कहावतों, लोकोक्तियों, सुभाषितों, सूक्तियों, वाक्प्रचारों से वे किस तरह पृथक हैं? इन प्रश्नों को समझे बिना ही हिंदी में बहुत से लोग इन सभी को एक ही तराजू में तौलते हैं। माना कि यह भाषा-विज्ञान या व्याकरण का विषय है, और उसकी जटिलताएं उकताने वाली होती हैं, फिर भी बोली या भाषा में इनका प्रयोग करते समय उनके स्वरूप को समझना नितांत आवश्यक है। रामदहिन मिश्र ने मुहावरों के बारह लक्षण गिनाए हैं और कहा है, ‘‘जिन शब्दों, वाक्य-खंडों से वाक्यों या उनके साधारण शब्दार्थों से भिन्न कोई विशेष अर्थ निकले वे मुहावरें हैं। ’’ रामचंद्र वर्मा की परिभाषा है, ‘‘शब्दों और क्रिया-प्रयोगों के योग से कुछ विशिष्ट पद बना लिए जाते हैं, जो मुहावरें कहलाते हैं। अर्थात, मुहावरा उस गठे हुए वाक्यांश को कहते हैं, जिससे कुछ लक्षणात्मक अर्थ निकलता है और जिसकी गठन में किसी प्रकार का अंतर होने पर वह लक्षणात्मक अर्थ नहीं निकल सकता। ’’ इन परिभाषाओं के व्याप्ति-दोष को उजागर करते हुए डॉ. ओमप्रकाश गुप्त ने एक व्यापक परिभाषा प्रस्तुत की है, ‘‘प्रायः शारीरिक चेष्टाओं, अस्पष्ट ध्वनियों, कहानी और कहावतों अथवा भाषा के कतिपय विलक्षण प्रयोगों के अनुकरण या आधार पर निर्मित और अभिधेयार्थ से भिन्न कोई विशेष अर्थ देने वाले किसी भाषा के गठे हुए रूढ़-वाक्य, वाक्यांश अथवा शब्द इत्यादि को मुहावरा कहते हैं। ’’ (मुहावरा – मीमांसा, पृ.४९) डॉ. गुप्त की परिभाषा भाषा-मर्मज्ञों की दृष्टि से उपयोगी हो सकती है, लेकिन उसका चोला इतना ढीला-ढाला है कि याद रखना ही आम जनों को मुश्किल हो जाए। अतः सुगमता की दृष्टि से मिश्र जी एवं वर्मा जी की व्याख्याओं को भी आम पाठक समझ लें तो काफी है। आखिर इस लेख की भी सीमा यह है कि यह किसी साहित्यिक शोध-पत्रिका के लिए मुहावरों पर लिखा गया शोध-निबंध, प्रबंध या मीमांसा नहीं है। इसका उद्देश्य केवल विषय की आम पाठकों को पहचान कराना है।
चूंकि मुहावरें मूलतः ग्राम्य जीवन और बोली से उपजे, इसलिए उसमें शिष्टता एवं अशिष्टता की बात ज्यादा माने नहीं रखती। अक्सर इनका उपयोग बोलचाल में, दो व्यक्तियों के बीच होता है इसलिए दोनों की उम्र, अनुभव, घनिष्ठता, परिवेश, मनोविज्ञान आदि के आधार पर भले अशिष्ट मुहावरों का उपयोग हो, लेकिन बोलने वाले या सुनने वाले को कोई असभ्यता महसूस नहीं होती। हां, बोली में असभ्य कहे जाने वाले मुहावरें, लिखित भाषा में सभ्यता का रूप ले लेते हैं। मराठी में अ.द.मराठे ने ‘असभ्य म्हणी आणि वाक्प्रचार’ (ग्रंथाली प्रकाशन) शीर्षक से लगभग पौने दो सौ पृष्ठों की एक पुस्तक प्रकाशित की है। उन्होंने अपनी भूमिका में किसी भी मुहावरे या वाक्प्रचार को असभ्य मानने से इनकार किया है। उनका कहना है, ‘‘मुहावरा या वाक्प्रचार असभ्य हो या सभ्य, उसकी दुनिया में जीना बेहद आनंद देने वाली बात है। …(यह आनंद) उत्कट साहित्य से प्राप्त होने वाले आनंद के दर्जे का होता है। ’’ (पृ.२) लेकिन, हिंदी या उर्दू अथवा अंग्रेजी में इस तरह का कोई संकलन देखने में नहीं आया है, और न इसे जायज माना गया है। हिंदी के कतिपय विद्वानों की राय है कि जो मुहावरा अशिष्टता के दायरे में आता है, वह दो व्यक्तियों के बीच की गुफ्तगू तक सीमित हो जाता है इसलिए वह मुहावरे की सामाजिक परिभाषा खो देता है। अतः हिंदी में शिष्ट मुहावरों की ही चर्चा होती है और हम भी अपनी सीमा वहीं बांध देते हैं।

जैसा कि पहले ही कह चुके हैं, जीवन के हर व्यापार से मुहावरों का निकट रिश्ता है। मनुष्य के अस्पष्ट स्वरों को भी मुहावरों में बांध दिया जाता है; जैसे कि-
१. दुख मेंः हाय-हाय करना, आह निकल पड़ना, सी-सी करना इत्यादि।
२. क्रोध मेंः धत् तेरे की, धत्ता बताना इत्यादि।
३. भय मेंः घिग्घी बंधना, सुबकियां भरना इत्यादि।
४. घृणा मेंः थू-थू करना, छिः छिः करना इत्यादि।
५. प्रसन्नता मेंः ऊं-ऊं, वाह वाह, आह-हा इत्यादि।
६. उद्दण्डता मेंः हुंकार भरना, हील-हुज्जत करना इत्यादि।
७. रुग्णावस्था मेंः दवा पी लो, अन्यथा टीं-टीं करते फिरोगे, खो-खो करते रहोगे, हाय-हाय मचाते रहोगे इत्यादि।

उद्गारों की तीव्रता के कारण मनुष्य के मुंह से ये ध्वनियां निकलती हैं। मनुष्य के आंतर-जगत के अलावा बाह्यजगत की ध्वनियों को भी मनुष्य ने मुहावरेदार बना दिया। देखिए निम्न नमूने-
१. पशुओं की ध्वनियों सेः टें-टें करना, टर-टर करना, भौं-भौं करना, कुंकडू-कूं होना, चपड़-चपड़ करना इत्यादि।
२. पक्षियों या कीट-पतंगों सेः कांव-कांव करना, गुटुर-गुटुर करना, फूं-फां करना, भिनभिनाना इत्यादि।
३. सख्त चीजों सेः चर्र-मर्र होना, खट-खट होना, तड़ा-तड़ी होना इत्यादि।
४. कोमल वस्तुओं सेः फुस-फुस होना, फुस्स होकर रह जाना इत्यादि।
५. हवा की गतिशीलता सेः सांय-सांय होना, सरसराहट होना इत्यादि।
६. प्रतिध्वनि सेः टन-टन होना, झनझनी मारना इत्यादि।
७. तरल पदार्थों सेः कल-कल करना, बुद-बुद होना, गड़-गड़ करना इत्यादि।
इस तरह सृष्टि के अन्य जड़-जीवों के विभिन्न पहलुओं को लेकर भी असंख्य मुहावरें गढ़े गए हैं। कइयों में शब्दों के उलट-फेर भी कर दिए जाते हैं जैसे ये शेर देखिए-
उसका खत देखते हैं जब सय्याद
तोते हाथों के उड़ा करते हैं।
इस शेर में मुहावरे की क्रिया ‘उड़े जाते हैं’ की जगह ‘उड़ा करते हैं’ का इस्तेमाल हुआ है। मुहावरे के शब्दों के उलट-फेर से ही एक मामूली शेर इस तरह पाकीजा मुहावरा बन गया। लाक्षणिक आधार पर भी कई मुहावरें प्रचलित हैं जैसे कि गधे को गुड़ की जलेबी, बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद, अपना उल्लू सीधा करना इत्यादि। ये रूपकात्मक हैं, लेकिन इसका लक्ष्य-कथन दूसरा है। विकास के क्रम में भी मुहावरों में बदलाव हो जाते हैं जैसे कि- तिलांजलि देना, अर्धचन्द्र देना, दांत-काटी रोटी देना, दांत खट्टे करना, दांत निपोरना इत्यादि। इसी तरह ‘बीड़ा उठाना’ है। यह किसी दुष्कर कार्य का उत्तरदायित्व उठाने से सम्बंध रखता है। महाराष्ट्र में किसी को निमंत्रण देने या स्वीकार करने को भी ‘विडा देणे’ या ‘विडा घेणे’ कहते हैं। तमाशा मंडली को निमंत्रित करने आदि के लिए इस मुहावरे का इस्तेमाल होता है। परंतु, ‘विडा उचलणे’ मूल अर्थ में ही प्रयुक्त होता है। इस तरह प्रांतीय स्थितियों से भी मुहावरों में अर्थ-बदलाव आता है। एक ही तरह का मुहावरा एक प्रांत या क्षेत्र में एक अर्थ में तो दूसरे क्षेत्र में भिन्न या परम्परागत अर्थ में अथवा दोनों रूपों में प्रयुक्त होगा। इसी तरह विकास के क्रम में शब्द बदल जाने का एक और माकूल उदाहरण है- कटे पर नून (नमक) छिड़कना, जो भ्रमवश हो गया ‘जले पर नमक छिड़कना’। यह नमक अब इतना छिड़कने लगा कि उर्दू में निम्न शेर खूब चल गया-
नमक छिड़को, नमक छिड़को, मजा कुछ इसमें आता है।
कसम ले लो, नहीं आदत मेरे जख्मों को मरहम की॥
कुछ मुहावरे हमारे अध्यात्म-चिंतन पर आधारित होते हैं जैसे कि लोक-लोकान्तर, धर्मराज होना, यम-लोक पहुंचना, स्वर्ग की हवा खिलाना, यमदूत आना, यमराज के सोंटे (डंडे) खाना, सात समुंदर पार जाना, सात जनम में भी न कर सकना, सात घाट का पानी पीना इत्यादि। ज्योतिष-शास्त्र पर भी अनेक मुहावरें मिलेंगे जैसे कन्या राशि का होना, ग्रह-नक्षत्र खराब होना, मीन मेख निकालना। राशियां बारह होती हैं और ज्योतिषी गणना करते समय राशियों की संख्या उंगलियों पर गिनते हैं। कोई देर कर दें तो लोग कहने लगे वह मीन राशि की संख्या खोज रहा है अर्थात मीन मेख निकाल रहा है। यह मुहावरा अब बाल की खाल उधेड़ना के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है। राशियों के लाक्षणिक प्रयोग वाले मुहावरे निम्न चौपाई में मिलते हैं-
मीन राशि का मीन बिछौना, वृष से रहे अधाय।
मेष देखि हर्षित रहे, मिथुन देखि बुझाय॥
कन्या से कन्या भिड्यो, सिंही देखि अकुलन्त।
बार-बार सिंही कहे, कुम्भी छोड़ो कन्त॥
मुहावरों का विभिन्न आधारों पर वर्गीकरण किया जाता है। यह वर्गीकरण ही इतना विशाल बन जाता है कि उनकी उत्पत्ति और विकास का संदर्भ खोजें तो कई ग्रंथों की आवश्यकता पड़ेगी। यहां केवल कुछ नमूने दिए जा रहे हैं-
१. समुद्र, नदी या पानी से सम्बंधितः अगम पानी होना, उल्टी गंगा बहना, किनारा काटना, किसी घाट लगना, गोता लगाना, डूबते को तिनके का सहारा, एक ही नाव में सवार होना, बेड़ा पार लगाना, लंगर डालना, सिर से पानी गुजरना इत्यादि।
२. कुआं एवं भूमि से सम्बंधितः ऐन समय कुआं खोदना, कुएं की मिट्टी कुएं में, खाक छानते फिरना, सौ-सौ घड़े पानी पड़ना, पानी फेर देना, मुंह में पानी आना इत्यादि।
३. जल-जन्तुओं, जल-पदार्थों से सम्बंधितः केकड़े की चाल, जाल फैलाना, जोंक होकर लिपटना, जल बिन मछली, मोती चुगना, सिंघाड़े काटना, भिगो-भिगोकर मारना इत्यादि।
४. पालतू पशु, पक्षी, खेती-बाड़ी से सम्बंधितः खुशामदी टट्टू होना, गधे पर झूल पड़ना, गधे का हल चलाना, गुड़-गोबर कर देना, गोबर-गणेश होना, मिट्टी के माधो, तेली का बैल, दहलीज का कुत्ता, धोबी का कुत्ता- घर का न घाट का, दुलत्ती झाड़ना, छठी का दूध, मिमियाते फिरना, बावले कुत्ते का काटना, जुगाली करना इत्यादि।
५. जंगली पशु, शिकार आदि से सम्बंधितः भूखा भेड़िया, पंजे मारना, फंदा लगाना, रंगा सियार होना, शेर का शिकार करना, शेर के मुंह में हाथ डालना, शेर की मांद में घुसना, सूकरों के आगे मोती फेंकना इत्यादि।
६. चिड़ियों, मुर्गी, अंडों से सम्बंधितः अंडे का शहजादा, अंधे के हाथ बटेर लगना, आधा तीतर आधा बटेर, उड़ती चिड़िया पहचनना, कागा हाथ संदेश भेजना, चूं तक न करना, झपट्टा मारना, तिनका-तिनका करना, उल्लू बोलना इत्यादि।
७. मक्खी, मच्छर, सांप-छुछूंदर आदि से सम्बंधितः आस्तीन में सांप पालना, कान पर जूं तक न रेंगना, चिऊंटी (चींटी) के पर निकलना, गुड़ होगा तो मक्खियां बहुत, घर में चूहे डंड पेलना, सांप को दूध पिलाना, सांप की तरह केंचुल बदलना, मक्खीचूस होना इत्यादि।
८. वन, कृषि आदि से सम्बंधितः अंगूर खट्टे होना, ऊसर में बीज डालना, खेती लेट जाना, खीरा-ककड़ी होना, चलती गाड़ी में रोड़ा अटकाना, ढाक तले की फूहड़, ढाक के तीन पात, नया गुल खिलाना, भुस के भाव होना, सरसों फूलना, पेड़ गिनना या आम खाना, फूल-कांटे का साथ होना, मूली-गाजर की तरह काटना इत्यादि।
९. आंधी, तूफान, वर्षा, ॠतु आदि से सम्बंधितः चार दिन की चांदनी- फिर अंधेरी रात, सिर मुंडाते ही ओले पड़ना, उजाले का तारा, छाती का पत्थर या पहाड़, ढेले बरसाना, तूफान खड़ा करना, तूफानी दौरा, तपन का महीना, सूरज को दीपक दिखाना, हवा का रंग देखना इत्यादि।
१०. खेल आदि से सम्बंधितः अठ्ठे-पंजे लड़ाना, कच्ची गोटी न खेलना, चौसर का बाजार, पांसा फेंकना, पौ-बारह होना, अंटा चित होना, अंटी मारना, आंख-मिचौनी करना, उठे-उठे फिरना, बल्ले पर गेंद नाचना इत्यादि।
११. अखाड़ा, कुश्ती आदि से सम्बंधितः अखाड़े में उतरना, कमाई हुई हड्डी, खम ठोकना, छाती पर चढ़ना, ताल ठोकना, दो-दो हाथ करना, भांजी मारना, लंगोट कसना इत्यादि।
१२. शस्त्रास्त्र, युद्धादि से सम्बंधितः कमान खींचना, किलेबंदी करना, केसरिया बाना पहनना, चक्रव्यूह में फंसना, तलवार पर हाथ रखना, मोरचेबंदी करना इत्यादि।
१३. कलाओं से सम्बंधितः अपनी ही गाना, आवाज में आवाज मिलाना, घुंगरू बांधना, चंग बजाना, चित्र उतारना, छम्मो कहीं की, जितनी ढफली उतने राग, राग अलापना, सुर चढ़ाना, कुची लगाना, रंग भरना, पंचम सुर में अलापना इत्यादि।
१४. मकानादि से सम्बंधितः काजल की कोठरी, ढाई दिन का झोंपड़ा, घर फूंक तमाशा देख, ड्योढ़ी दिखाना, डेरा-डंडा उखाड़ना, शीश-महल का कुत्ता इत्यादि।
निष्कर्ष यह कि जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है, जिसके मुहावरें न बने हो और चले भी खूब न हो। ये इतने अपरिमित हैं कि उनकी नमूने की सूची तक देना इस लेख की सीमा से बाहर है, फिर तो पूरे संकलन की बात ही क्या! काल के प्रवाह में कुछ मुहावरों के रूपकों का अस्तित्व अब यदा-कदा ही रहा है, लेकिन उनके व्यंजना पक्ष में कोई अंतर नहीं आया है और आज भी यथावत् चल रहे हैं जैसे बिल्ली के भाग से छींका टूटा। अब गांव/शहरों में बिल्लियां ही कितनी रह गई हैं और डेयरी उत्पादनों व आधुनिकता के कारण छींकें भी कहां रह गए हैं! वैसे ही ‘अपने मियां मिट्ठू (तोता) होना’- अब न मियां का जमाना है, और न तोते घर में कानूनी रूप से पालतू बनाकर रखे जा सकते हैं! इसी तरह न पुराने धोबी रहे हैं, न उनके घाट, न कुत्ता, न उनके गदहे! लोमड़ियों के लिए भी अब अंगूर न मीठे हैं और न खट्टे हैं। अंगूरों के बागान तो हैं, लोमड़ियां कितनी रह गई हैं! लेकिन, मुहावरें हैं कि लक्षणा और व्यंजना के पक्ष को लेकर अब भी अमरता लिए हुए हैं और मनुष्य है तब तक उनके अमरत्व को कोई आंच भी नहीं आने वाली। मनुष्य का ऊर्जा स्थल गांव है और जहां गांव है वहां मुहावरा भी है।
पाठक कृपया ध्यान रखें कि यह आलेख साहित्य का कोई शोध-निबंध नहीं है, विभिन्न हिंदी विद्वानों ने मुहावरों की अलग-अलग ग्रंथों या स्थानों में जो विवेचना की है, उसके आधार पर मुहावरों की प्रस्तुत की गई यह प्राथमिक पहचान भर है। मुहावरों की मीमांसा, गवेषणा और शोध का अब भी विशाल क्षेत्र है, जो हिंदी मनीषियों के लिए एक चुनौती

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