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भारतीय संस्कृति आरण्यक है! यह ऋषि-मुनियों के आश्रमों से निकल कर जन सामान्य तक पहुंची है। यही कारण है कि हजारों वर्षों की परम्परा त्योहार तथा उत्सव के रूप में ग्राम, वन तथा गिरि प्रदेशों में आज भी विद्यमान है। इस उत्सवों एवं त्योहारों का महत्व अनन्त काल से रहा है। हरेक संस्कार को उत्सव का रूप देकर उसकी सामाजिक स्वीकार्यता को स्थापित करना भारतीय लोक संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता रही है। हमारे देश में प्रत्येक त्योहार तथा उत्सव का सम्बंध किसी न किसी सामाजिक परम्परा, धार्मिक मान्यता, पौरणिक घटना और ऋतुचक्र के अनुरूप कृषि कार्य से जुड़ा होता है। मानव सभ्यता के प्रारम्भ काल से ही मनुष्य ऐसे क्षणों का सृजन करता रहा है, जिसमें वह जीवन के सभी दु:ख, कष्ट और तनाव को भुलाकर सामूहिक रूप से उत्साह, प्रसन्नता और आनन्द का अनुभव कर सके।
भारत कृषि प्रधान ग्रामीण देश है। यहां कृषिकर्म एवं मौसम के साथ त्योहार एवं उत्सव का अटूट सम्बन्ध देखा जाता है। रबी और खरीफ फसलों की कटाई के साथ ही वर्ष के सबसे सुखद दो मौसमों-वसन्त और शरद में तो मानो उत्सवों की बहार आ जाती है! वसन्त में वसन्तोत्सव, सरस्वती पूजा, होली, चैत्र नवरात्र व रामनवमी तो शरद में शारदीय नवरात्र, दुर्गा पूजा, दशहरा, दीपावली, करवा चौथ, गोवर्धन पूजा, इत्यादि की रंगत रहती है। ये उत्सव केवल एक अनुष्ठान ही नहीं है! अपितु इनके साथ सामाजिक समरसता और नृत्य-संगीत का अद्भुत दृश्य भी जुड़ा है। वसन्त ऋतु में चैती, होरी, धमार जैसे लोक संगीत तो शारदीय नवरात्र में माता के जगराता के बीच दुर्गापूजा के पण्डालों में गरबा-डांडिया और रामलीला की धूम रहती है। दशहरे के मेलों में दूर-दूर से लोग सपरिवार सज-धज करके घूमने जाते हैं। इन मेलों में रिश्तेदारों से भेंट-मुलाकात भी होती है। महिलाओं के लिए मेला बहुत महत्व का होता है। इस अवसर पर वे आवश्यक वस्तुओं की खरीदारी कर लेती हैं। बड़े मेलों में घर-गृहस्थी की सारी वस्तुएं मिल जाती हैं।
जिन त्योहारों का सबसे अधिक बेसब्री से इंतजार किया जाता है, वे हैं दशहरा और दीपावली। दशहरा शब्द की उत्पत्ति ‘दश’ और ‘हरा’ के संयोजन से हुई है, जिसका तात्पर्य भगवान श्रीराम द्वारा रावण के दस सिरों को काटने व तत्पश्चात उसकी मृत्यु के साथ ही राक्षस राज के आतंक की समाप्ति से है। यही कारण है कि इस दिन को विजयदशमी अर्थात अन्याय पर न्याय की विजय के रूप में भी मनाया जाता है। दशहरा से पूर्व शारदीय नवरात्र में मातृरूपिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी एवं सिध्दिदात्री रूप में माता दुर्गा की लगातार नौ दिनों तक पूजा होती है। पूरा वातावरण शाक्त परम्परा की पूजा से तेजोमय हो जाता है। नवरात्र के बाद दशमी और उसके इक्कीसवें दिन दीपावली मनाई जाती है। दीपावली अर्थात दीपों की पंक्ति। इसी दिन भगवान राम अपनी भार्या भगवती सीता एवं अनुज लक्ष्मण सहित चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके अयोध्या लौटे थे। उस रात्रि कार्तिक मास की अमावस्या थी। उस रात में अयोध्यावासियों ने उनके स्वागत में अयोध्या को दीपों के प्रकाश से जगमग करके मानो पृथ्वी पर आसमान के तारों को उतार दिया था। तभी से दीपावली का त्योहार मनाने की परम्परा चली आ रही है। इस दिन चित्रकूट में मंदाकिनी में स्नान करके कामदगिरी की परिक्रमा करके दीपदान करने का बड़ा महत्व है। एक पौराणिक मान्यता के अनुसार दीपावली यक्षों का उत्सव है। दीपावली की रात में यक्ष अपने राजा कुबेर के साथ हास-विलास तथा अपनी यक्षणियों के साथ आमोद-प्रमोद करते हैं। आज दीपावली के समय जो स्वादिष्ट पकवान बनाने, रंग-बिरंगी फुलझड़ी करने और मनोरंजन के विविध कार्यक्रम होते हैं, वे यक्षों की ही देन हैं। सभ्यता के विकास के साथ यह त्योहार मानवीय हो गया और धन के देवता कुबेर के स्थान पर धन की देवी लक्ष्मी की पूजा होने लगी। कई जगहों पर आज भी लक्ष्मी के साथ-साथ कुबेर की भी पूजा होती है। श्री गणेश भगवान को पूजा में मंचासीन करने में शैव पंथ की परम्परा का निर्वाह होता है।
भारतीय पारिवारिक जीवन में ‘रक्षाबंधन’ प्रमुख त्योहार है। यह श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह त्योहार रक्षा-सूत्र के रूप में राखी बांध कर केवल रक्षा का वचन ही नहीं देता है, अपितु प्रेम, समर्पण, अपनत्व, बंधुता, निष्ठा और संकल्प के माध्यम से दिलों को जोड़ने का भी वचन देता है। भारतीय जीवन-मूल्यों में विश्वास का बंधन सर्वोपरि है और रक्षाबंधन विश्वास का बंधन है। इस दिन बहन अपनी रक्षा के लिए भाई को राखी बांधती है। अब इसका विस्तार हो गया है। ‘श्रीमद भगवद्गीता‘ में कहा गया है कि जब संसार में नैतिक मूल्यों में र्हास होने लगता है, तब प्रजापति ब्रह्माजी द्वारा ज्योतिर्लिंगम् भगवान शिव पृथ्वी पर पवित्र धागा भेजते हैं, जिन्हें बहनें मंगल कामना के साथ भाइयों को बांधती है और भगवान शिव उन्हें नकारात्मक विचारों से दूर रखते हुए दु:ख और पीड़ा से मुक्ति दिलाते हैं। राखी से जुड़ी हुईं कई कथायें पुराणों में मिलती हैं। सर्व प्रथम कथा के अनुसार असुरों से पराजित होकर अपनी रक्षा से निर्मित सभी देवता इन्द्र के नेतृत्व में गुरु वृहस्पति के पास पहुंचे, तो इन्द्र ने दु:खी होकर कहा, ‘‘अच्छा होगा कि अब मैं अपना जीवन समाप्त कर दूं। ’’ इन्द्र के इस नैराश्य भाव को सुन कर गुरु वृहस्पति के निर्देशानुसार रक्षा-विधान हेतु इन्द्राणी ने श्रावण पूर्णिमा के दिन इन्द्र सहित सभी देवताओं की कलाई पर रक्षा- सूत्र बांधा और अन्तत: इन्द्र ने युद्ध में विजय प्राप्त की। वर्तमान काल में बहन अपने भाई की कलाई में राखी बांध कर, तिलक लगाकर आरती उतारते हुए उसकी दीर्घ आयु की कामना करती है। भाई अपनी बहन को आजीवन स्नेहपूर्ण सुरक्षा का विश्वास दिलाता है।
रबी की फसल की कटाई के बाद वसन्त पर्व में मादकता के भावों के बीच मनाया जाने वाला होली त्योहार उत्साह और उल्लास का परिचायक है। अबीर-गुलाल और रंग में रंगे हर आयु और वर्ग के लोग फगुआ गाते, ढोल की थाप पर थिरकते द्वार-द्वार पर जाकर ‘सदा आनंद रहै यह द्वारे‘ की मंगल कामना व्यक्त करते हैं। वसन्त पंचमी के दिन होलिका दहन की भूमि की पूजा करके अरण्डी (रेंड) का वृक्ष गाड़ दिया जाता है। लगभग महीने भर लकड़ी, कंडा तथा अन्य जलावन वहां इकट्ठा किया जाता है। होली के दिन शुभ काल में होलिका का दहन किया जाता है। उसके चतुर्दिक परिक्रमा करते हुए नृत्य किया जाता है। यह नाच-गान पूरे दिन भर चलता ही रहता है। पौराणिक कथा के अनुसार दैत्यराज ने अपने पुत्र प्रह्लाद की जीवनलीला समाप्त करके दण्डित करने की इच्छा से अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि वह अपनी गोद में प्रह्लाद को लेकर अग्नि में प्रवेश करे। होलिका ने ऐसा ही किया। उसके पास एक दिव्य चुनरी थी, जिसे ओढ़ने से अग्नि में भस्म न होने का वरदान प्राप्त था। किन्तु भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गए, और होलिका अग्नि में जल कर भस्म हो गई। दृष्ट होलिका की मृत्यु पर नगरवासियों ने उसकी राख को उड़ा कर प्रसन्नता व्यक्त की। आधुनिक युग में राख के प्रतीक के रूप में अबीर-गुलाल उड़ाया जाता है।
मथुरा की पवित्र वीथियों से निकल कर जन्माष्टमी का त्योहार पूरे देश में मनाया जाने लगा है। भादौं मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। उनके पिता ने अपने पुत्र कृष्ण को यमुना के उस पार परममित्र बाबा नन्द के यहां पहुंचा दिया था। वही पर कृष्ण का लालन-पालन हुआ। पूरे उत्तर भारत में कृष्ण जन्मोत्सव धूम-धाम से मनाया जाता है। गुजरात और महाराष्ट्र में इसका उत्साह देखते ही बनता है। जन्माष्टमी के दिन ऊंचे मानव ‘पिरामिड‘ बनाते हैं। जो टोली मटकी को फोड़ने में सफल हो जाती है, उसे पुरस्कृत किया जाता है। महाराष्ट्र के गांव-गांव, नगर-नगर में मटकी फोड़ने के लिए अनेक क्रीडा मण्डल बने हैं। ये मण्डल ‘पिरामिड’ बनाने के लिए निरंतर अभ्यास करते रहते हैं।
महाराष्ट्र के कोंकण प्रांत से लेकर गोवा तक गाणपत्य पंथ द्वारा भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को भगवान गणेश की स्थापना की जाती है। बड़े-बड़े सार्वजनिक मण्डलों, आवासीय समितियों के साथ ही घर-घर में गणपति बप्पा की स्थापना होती है। स्त्री-पुरुष, बाल-वृध्द सभी इसमें शामिल होते हैं। शाम को होने वाली आरती विशेष दर्शनीय होती है। गणेश भगवान का आगमन जिस प्रकार से ढोल-मजीरों की झंकार के साथ होता है, वैसे ही डेढ़ दिन, पांच दिन, सात दिन और ग्यारह दिनों के पूजन-अर्चन के उपरांत उनकी विदाई भी समारोह पूर्वक की जाती है। सामुदायिक एकीकरण का इतना सुंदर उदाहरण बंगाल की दुर्गापूजा के अतिरिक्त अन्यत्र नहीं मिलता है।
इन बड़े त्योहारों के साथ ही भारत में पर्व-उत्सवों की एक लम्बी श्रंखला है। ये पर्वोत्सव और त्योहार समाज की जीवंतता को बनाए रखते हैं। इनसे आपसी सम्बंधों को स्नेहयुक्त और प्रगाढ़ बनाने में सहायता मिलती है। राम नवमी, महाशिवरात्रि, छठपूजा, मकर संक्रान्ति, नाग पंचमी, गंगा दशहरा, भैयादूज, वट सावित्री, करवा चौथ, धन तेरस, पोंगल, ओणम, बिहू न जाने कितने पर्व एवं त्योहार मनाए जाते हैं। इन सबके साथ कोई न कोई हेतु जुड़ा होता है। जीवितपुत्रिका पर्व पर माता अपने पुत्र-पुत्री के चिरायु होने की कामना करती है। ये सारे व्रत परिवार के सदस्यों के बीच आपसी प्रेम, समर्पण और त्याग की भावना को जागृत करते हैं। आधुनिक युग में ढीले पड़ते रिश्तों और सम्बंधों को प्रगाढ़ करते हुए एक नवीन स्फूर्ति और ऊर्जा के संचार करते हैं।
भारत की संस्कृति विभिन्नताओं से भरी पड़ी है। ‘पग-पग बदले बोली, पग-पग बदले भेष ‘वाले इस देश में साल भर कोई न कोई उत्सव-व्रत-त्योहार मनाया जाता रहता है। लोक संगीत, नृत्य, नाट्य, लोक कथा, लोक गीत, किस्सा-कहानी, मुहावरा, लोकोक्ति, प्रहसन इत्यादि में भी पर्व एवम् उत्सव तथा उनके पीछे छिपे संस्कारों, मान्यताओं और परम्पराओं की झलक मिलती है। इनके साथ ही प्रतिवर्ष विभिन्न महापुरूषों की जयन्ती और राष्ट्रीय महत्व के दिवस भी पर्वोत्सव की ही भांति मनाए जाते हैं, जो इस बात के प्रतीक हैं कि आज भी उनके आदर्शों की मान्यता समाज में व्याप्त है। पर्वोत्सवों की ही भांति नदियों के संगम, तीर्थस्थलों तथा स्थान विशेष पर साल में लगने वाले मेलों की शोभा और महत्व निराला ही होता है। ग्रामीण और वनवासी क्षेत्रों में इन मेलों के जुटाने के पीछे ऐतिहासिक घटनाएं जुड़ी होती हैं। मेला देखने और घूमने के लिए पूरा गांव सज-धज कर उमड़ पड़ता है। अनेक गृहोपयोगी वस्तुओं की खरीदारी, खेल-तमाशों का देखना, परम्परागत पकवानों का स्वाद लेना और नाते-रिश्तेदारों से मिलना-जुलना सब कुछ यहां पर होता है। कुछ मेले हर सप्ताह या महीने में तो कुछ पर्व विशेष पर लगते हैं। बच्चों के लिए इन मेलों में घूमना, कठपुतली के खेल, लिल्ली घोड़ी का नाच, तमाशे, नटों का कलात्मक प्रदर्शन, टेन्ट में सिनेमा देखना बहुत ही उल्लासकारी होता है। सही अर्थों में ग्रामीण मेले सामाजिक एकत्रीकरण का बहुत सुंदर पर्व होते हैं। कुम्भ एवं सिंहस्थ के मेले दुनियाभर में चर्चित और प्रशंसित रहे हैं।
मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्तियों को ध्यान में रख कर हमारे पूर्वजों ने त्योहार, पर्व, उत्सव, मेले, यात्रा इत्यादि के आयोजन की परम्परा शुरू की थी। इनके आयोजन में विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति के साथ मनुष्य की रुचि, प्रकृति और प्रवृत्ति का भी पूरा ध्यान रखा गया। इसलिए ये पर्व-उत्सव-मेले-त्योहार केवल आनंद भोग के लिए ही नहीं हैं, अपितु इनके पीछे का मुख्य मंतव्य जीवन को दिशा देना एवं सामाजिकता के भाव को सुगठित करना है। आज के इस भौतिकवादी, परिवर्तनशील व अति स्वार्थपरक समाज को राजनीतिक, व्यावहारिक, सामाजिक, नैतिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक दिशा बोध की आवश्यकता है। आदिकाल से पर्वोत्सव, मेले, यात्राएं समाज-जीवन के क्षेत्र में क्षति को पुष्ट एवं तुष्ट करते आए हैं। यधपि वर्तमान युग में इनमें कालगत बदलाव आया है, किन्तु इन आयोजनों के पीछे यह प्रयास होना चाहिए कि भविष्य में इनके माध्यम से भारतीय सामाजिक संरचना को नव दिशा, नव विधा, नव छन्द, नव आनन्द और नव उत्साह सतत प्राप्त होता रहे।

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