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मध्यप्रदेश के शहडोल जिले के अमरकंटक के मैकल पर्वत से उद्गमित नर्मदा गुजरात के भरूच के पास मिठीतलाई में अरब सागर में विलीन होती है। नर्मदा की घाटी विंध्य और सतपुड़ा पर्वत तक फैली है। इसका कुल क्षेत्रफल ९८७६ वर्ग किमी है। घाटी का ८६% भूभाग मध्यप्रदेश में है। १२% गुजरात में और २% महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले में आता है।
नर्मदा में कुल ४१ उपनदियां आकर मिलती हैं। इनमें से २२ सतपुड़ा पर्वत से बहती हैं। शेष १९ उपनदियां विंध्य पर्वत से बहती हैं। नर्मदा को हिंदू धर्म में दूसरी नदियों की तरह पवित्र माना जाता है। उसके उद्गम से लेकर समुद्र में विलीन होने तक किनारे पर कई तीर्थक्षेत्र हैं। यही एकमात्र नदी है, जिसकी परिक्रम कर सकते हैं। हिंदू धर्म में जैसे तीर्थस्थानों की यात्रा का महत्व है, वही महत्व नर्मदा परिक्रमा का है। नर्मदा परिक्रमा युगों से चल रही है। आद्य शंकराचार्य से लेकर श्रीपाद-श्रीवल्लभ, स्वामी नरसिंह सरस्वती, गजानन महाराज, गो.नी दांडेकर, जगन्नाथ कुंटे जैसे संत श्रेष्ठ लोगों ने नर्मदा परिक्रमा की है। उन्होंने यह यात्रा ३ वर्ष ३ महीने और १३ दिनों के समय में पूरी की है। नर्मदा परिक्रमा को अनन्यसाधारण महत्व प्राप्त है। हमारा भारतवर्ष महान तीर्थ के समान ही है। ‘भा’ यानी ज्ञान और ‘रत‘ यानी मग्न होना। ज्ञान संपादन करने में जो मग्न हैं, वे भारतीय हैं।
नर्मदा परिक्रमा करते वक्त उसके किनारे बसे छोटे-छोटे अविकसित गांव- ग्रामीण क्षेत्र और ग्रामीण जन दिखाई देते हैं। वे सब नर्मदा-मैया के बालक हैं। जो नर्मदा परिक्रमा करते हैं, उन लोगों की सेवा ग्रामीण बड़ी श्रध्दा और आत्मीयता से करते हैं। वे मानते हैं कि हम सब उस नर्मदा-मैया के ही बच्चे हैं, तीर्थयात्रियों की सेवा यानी नर्मदा मैया की सेवा। वह उनका लक्ष्य है। ग्रामीण जनों के पास धन-दौलत नहीं फिर भी वे सबकी नि:स्वार्थ भाव से सेवा करते हैं। इस दृष्टि से वे धनवान हैं। नर्मदा किनारे कई गांव हैं। सब से पहला गांव रावेर-खेड़ी। ओंकारेवर में नर्मदा परिक्रमा का संकल्प करने के बाद मोरटक्का गांव से ३५ किमी पर यह गांव स्थित है। यहां पर पहले बाजीराव पेशवा की समाधि है। इस गांव के लोग बड़े दिलदार हैं। इस गांव के बड़े-बूढ़े अशिक्षित हैं, फिर भी व्यावहारिक दृष्टि रखते हैं। जीवन की पाठशाला का उनका तत्वज्ञान ऊंचा है।
आगे ओंकारेवर से बड़वानी के बीच ऊन गांव है। परिक्रमा करने वाले व्यक्तियों के प्रति उन्हें बड़ा आदर है। यहां के गांव वाले परिक्रमावासियों को ‘मूर्ति’ कहते हैं। गांव के लोग यहां पर आने वाले हर परिक्रमावासी के पांव धोते हैं। अपनी- अपनी है स्थिति के अनुसार चाय, दूध, फल या नाश्ता भी देते हैं।
नर्मदा मैया के दक्षिणी तट की अपेक्षा उत्तरी तट पर ज्यादा गरीबी है। वहां के ग्रामवासी परिक्रमावासियों को कुछ दान करते हैं। जीवनदायिनी नर्मदा के प्रेम के कारण खातिरदारी करने वाले लोग इतने खुश होते हैं कि मारे खुशी के उनकी आंखों में आंसू आ जाते हैं। देनेवाले हाथ हजारों हैं; लेनेवाले हाथों की कमी है’ ये संस्कार परिक्रमा से मिलते हैं।
सितंबर २००० के महीने में लगभग ३० लोगों का ग्रुप लेकर नर्मदा-परिक्रमा चल रही थी। अचानक बारिश शुरू हुई। चाबी नामक गांव में हमारी बस खराब हो गई। रात बहुत थी, सड़कें भी खराब थीं। १६ साल पहले इतनी सुविधाएं भी नहीं थी। जिस गांव में हम अटक गए थे, वहां पर शाम के सात बजे ऐसा लगता था जैसे रात के दस बज गए हो। हमारा किचन यूनिट होने पर भी हम कुछ नहीं कर सकते थे। इतने में हमारा ध्यान छोटे से स्टेज की ओर गया। वह कोई आधुनिक मंच नहीं था, पर शायद ग्राम पंचायत की बैठक होती होगी। वहां पर हमारे सारे वरिष्ठ नागरिकों को बिठाया। इतने में वहां पर रामदास भगत नामक ग्रामवासी आया। उसने पूछताछ की। हम नर्मदा परिक्रमावासी हैं, ऐसा उसे जब पता चला तब उसने दौड़ कर सबसे कहा-परिक्रमावासी आए हैं, फंसे हैं, मदद करेंगे। शीघ्र ही १५-२० ग्रामवासी इकट्ठा हुए। उन्होंने बड़ा सा चूल्हा जलाया। पतीला रखा। दाल-चावल की खिचड़ी और सूजी का हलुवा आधे घंटे में बना लिया। हमें परोसा। इसे इंसानियत कहें या देवों का गांव! हमारे यहां आजकल ९-१० रिश्तेदार आए तो उनके लिए बाहर से खाना मंगवा कर परोसते हैं। यहां पर तो हमें तीस जनों को बिना किसी तकरार के प्यार से खिलाया जा रहा था। हमारे साथ श्रीमनी जोगदेव नामक पुणे की एक कीर्तनकार महिला थी। उन्होंने गांववालों के सामने मराठी नौ-गजी साड़ी पहन कर हिंदी में सुंदर कीर्तन किया। हर आदमी दूसरे की अंतरात्मा को पहचानें। जब आपस में मिले तो इंसानियत भरे दिल हों। उनमें अपनेपन का लेन-देन होता है, एक दूसरे की पहचान होती है- इंसानियत के झरने फूट पड़ते हैं। इस प्रकार के अपनेपन का अनुभव नर्मदा किनारे के गांवों में प्राप्त होता है।
२००७ के वर्ष में मेरे साथ ३५ तीर्थयात्री थे। इस यात्रा पर आने वाले जिज्ञासु जन साठ से अधिक उम्र के थे। कुछ बहुत पढ़े-लिखे, भाविक, उसाही और वरिष्ठ नागरिक भी थे। राजपिपला से हम गरुडेश्वर की ओर जा रहे थे। शूलपाणी का जंगल पार करके हम आए, और हमारी बस अचानक पंक्चर हुई। कोई पार्ट भी खराब हो गया था। रात के साड़े-आठ बज रहे थे। नीचे उतर कर मैंने ड्राइवर से पूछा कि कितना वक्त लगेगा? उसने कहा- कह नहीं सकते, डेढ़-दो घंटा जाएगा। उस गांव का नाम महुवा था। आसपास नजर डाली। वहां पर चार घर थे। मैंने एक घर का दरवाजा खटखटाया। अंदर से सफेद गुजराती साड़ी पहनी हुई एक स्त्री आई। उसने पूछा- ‘क्या हुआ बेटा?’ समझदार को कुछ कहना नहीं पड़ता इस कहावत के अनुसार वह समझ गई कि नर्मदा परिक्रमावासी आए हैं। उसने बेटे से कहा कि चलो बेटा परिक्रमावासी पधारे हैं, उनकी व्यवस्था देखो। दोनों मां-बेटे ने मिल कर उनका छह-सात कमरों का घर खोल दिया। दरी बिछाई। बाथरुम खोल कर पानी की बालटी भर कर रख दी। सबसे कहा- ‘‘आप लोग यहां आराम से बैठें, कोई चिंता नहीं। ’’ मैं कुछ कहती कि उसके पहले ही वह बोल उठी- ‘‘देखो बेटा, यहां आंगन में तुम अपना चूल्हा जलाओ और खाना बनाओ, घर के अंदर परोसो, यह ठीक रहेगा। हमारे नाते-रिश्तेदार भी नहीं करते उतनी हमारी मदद की। मेरी और उसकी पहचान भी नहीं थी। हम कहां से आए हैं? यह भी उसे पता नहीं। वैसे तो दरवाजे पर खड़े आदमी को भी हम अपनी दहलीज पार नहीं करने देते। पानी भी नहीं पूछते। कहा जाता है कि जिनके घर बड़े होते हैं, उनके दिल छोटे होतेे हैं। इस स्त्री ने दिखा दिया कि हम नर्मदा मैया के किनारे रहते हैं और उसी की तरह विशाल ह्दय भी रखते हैं।
नर्मदा के किनारे बसे छोटे-छोटे गांवों में गांव वालों के मन में अपरिमित संतोष है। वे ऐसा नहीं कहते कि इन परिक्रमावासियों के पास अपार धनसंपत्ति है। हम उसके किनारे, उसके समीप रहते हैं पर हम क्यों गरीब हैं? नर्मदा पर उनका विश्वास है। नर्मदा वैराम्यदायिनी है। वह उसके आसपास रहने वाले हर जीव को वासना से मुक्ति दिलाती है। बैराग्य देती है। बैराग्य लेना यानी संसार त्यागना नहीं तो संसार कीलठमार का त्याग करना। लोगों के हृदय पर विजय प्राप्त कर संतोष पाना। यह बात नर्मदा-किनारे के गांव-गांव में देखने को मिलती है।
नर्मदा के दक्षिणी तट पर डिंडोरी, महाराजपुर, होशंगाबाद, ओंकारेश्वर जैसे मशहूर शहर बसे हैं। उत्तरी तट पर भरुच, गरुडेश्वर, माहवर, नेमावर (नर्मदा का नाभिस्थान), जबलपुर, मंडला जैसे अनेक विख्यात शहर हैं।
१३ फरवरी २०१३ की यात्रा में मेरे साथ बुजुर्ग व्यक्ति थे। उनके बीच ७४ साल की शेटे चाची, उम्र में सब से बड़ी, दुबली पर सक्षम थी। ३५ लोगों का गु्रप था। नर्मदा परिक्रमा के मार्ग पर महत्वपूर्ण स्थान यानी कटपोर। जहां से बोट में बैठ कर अरब सागर पार किया जाता है। लगभग चार घंटे का समुद्र्री सफर करके हम मिठीतलाई गांव पहुंचे। उस दिन हमारी बोट सुबह तीन बजे निकली थी। उसमें बैठ कर सब तीर्थयात्री निकले। चार घंटे बाद हम जहां उतरे। वहां पूरा कीचड़ था। कीचड़ में बीस-पचीस मिनट पैदल चलना पड़ता है। कीचड़ उस दिन घुटनों तक था। मेरे सामने समस्या यह थी कि मैं शेटे चाची को कैसे ले जाऊं? वे नाटे कद की थीं। उनके पांव कीचड़ में धंस जाते तो उन्हें बाहर निकालना मुश्किल होता। हमारे साथ बोट से उतरे कुछ गांव वालों ने शेटे चाची के दोनों कंधे पकड़ कर उठाया और फटाफट दूसरे तट पर छोड़ दिया। दूसरे व्यक्तियों की मदद भी गांव वालों ने की। किसी को डर लगा तो उसे गांव वाले सांत्वना देते थे। वे कहते थे, देखो माताजी, डरना नहीं, यह कीचड़ नहीं, नर्मदाजी का प्रसाद है। कीचड़ न होकर दवा का लेप है। नर्मदा के पानी में विशेष प्रकार के मिनरल्स, रसायन हैं। नदी की कीचड़ दवा के समान है यह कह कर वे कीचड़ पूरे बदन पर लगा लेते थे। सच बात तो यह है कि इसे मैंने भी अनुभव किया। कीचड़ एकदम मृदु-मुलायम था, हरे रंग का था। महिलाएं मुलतानी मिट्टी का जो लेप लगाती है, वह नर्मदा की घाटी से ही मिलती है। हमें जो काम मुश्किल लग रहा था, वह नर्मदा मैया पर असीम श्रध्दा से आसान होता है, यह गांव वालों ने हमें दिखा दिया। उन्होंने हमें ना डराया, ना नाउम्मीद किया। हम सबको धीरज बंधा कर, हमारी मदद करते हुए उन्होंने हमें मुश्किल सफर से पार किया। नर्मदा मैया पर उनकी अपार श्रध्दा और निष्ठा दिखाई देती है। इस तरह हमारा कटपोर से मिठीतलाई तक का सफर, अरब सागर में उठने वाली हवा के झोंकों पर सागर में चलने वाली बोट! जीवन-सागर में डुबकी लगाने वाले सांसारिक आदमी की तरह दिखाई देती थी। भवसागर में इस तरह गोते खाने वाले आदमी को अगर सतगुरू रूपी मांझी मिल जाए, तो उसकी नैया किनारे लगती है। कब लगती हे यह स्वयं उसकी समझ में भी नहीं आता। नर्मदा हर! नर्मदा हर!!
एक और तीर्थयात्री का अनुभव- पिपरिया गांव में महादेव मंदिर में निवास की व्यवस्था की गई थी। वहां जाते समय किसी आटे की चक्की वाले ने हम यात्रियों को आटे का सदावर्त (पैदल परिक्रमा करते वक्त भिक्षा मांग कर जो खाद्यान्न प्राप्त किया जाता है, वह सदावर्त कहलाता है। ) दिया। इसके पीछे भी इंसानियत ही थी। जब चक्की में आटा पीसा जाता है, तब एकाध किलो आटा नीचे गिर जाता है, वह आटा व्यर्थ न जाए इसलिए चक्की वाला परिक्रमावासियों को भिक्षा के रूप में दे देता है। यह उसकी उदारता है, अच्छी सोच है। रातभर रह कर पैदल चलने वाले यात्री सुबह उठ कर बिछीयाला गांव की तरफ निकले।
नर्मदा परिक्रमा केवल पर्यटन न होकर अलग अनुभूति है। आध्यात्मिक अनुभव है, इसके लिए नर्मदा मैया पर अपार श्रध्दा होना जरूरी है। चाहे पैदल जाओ, या कोई वाहन लेकर रास्ता कठिन है, जंगल तो कहीं वीरान है। जिस जगह पर इस शक्ति का वास है, जहां पर यह शक्ति होती है, उस स्थल पर चराचर में अलग चैतन्य प्रतीत होता है। जो चैतन्य अपनी अंतरात्मा में है, वही बाहरी वातावरण में अनुभव होता है, अलग ब्रह्मानंद इस देह में भर जाता है। यह नर्मदा- परिक्रमा हर भारतवासी एक बार जरुर करें। श्रध्दा और भक्ति हो तो मानो तो मां नर्मदा न मानो तो बहता पानी! अपनी-अपनी श्रद्धा!

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