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हम सभी ने नकलची बंदरों के बारे में जरुर सुना है, उनकी कहानियां भी सुनी हैं पर क्या आप ये जानते हैं की केवल बन्दर ही नहीं तितलियाँ भी नकलची होती हैं.

प्रकृति ने प्रत्येक जाति-उपजाति को उनकी खास विशेषतायें, खास रंग-रूप दिया है। इस रंग-रूप के अंतर के कारण हमें अलग-अलग प्राणी, पक्षी, कीडे-मकोडे, फूल-पत्ती इ. को पहचानने में आसानी होती है। इसी रंग रूप का उपयोग कर प्राणी अपना बचाव करते हैं। परंतु प्रकृति यहीं नही रूकी, उसने कुछ जीवों को अपने स्वत: के बचाव के लिये नकल(मिमिक्री) करने की कला भी सिखाई है। करीब एक सौ साठ वर्ष पूर्व ब्राजील के जंगलो में तितलियों पर अभ्यास करते समय हेन्री वॉल्टर बेट्स नामक प्रकृति अभ्यासक को ज्ञात हुआ कि दो अलग अलग जातियों की तितलियों के पंखो पर की डिजाईन में समानता है। उसके मन में प्रश्न आया कि जब जाति अलग है तो यह समानता क्यों? इस प्रश्न का उत्तर खोजते समय उसके ध्यान में आया कि यह तो विशुध्द नकल है। एक विषरहित तितली दूसरी घातक और विशैली तितली की नकल कर रही है. उसे यह तो पहले से ज्ञात था कि तितलियों में भी विषैली एवं विषरहित दो जातियां होती हैं, परंतु वः यह नहीं जनता था कि विषरहित तितलियाँ अपना जीवन बचाने के लिये विषैली तितलियों की नकल करती हैं.

विषरहित तितलियों द्वारा विषैली तितलियों की मिमिक्री करने को बेटेशियन मिमिक्री कहते हैं। टाईगर श्रेणी की तितलियां जब इल्लियों की अवस्था में होती हैं तब वे रूई के पत्ते खाकर अपना पोषण करती हैं। इसके कारण रूई के पत्तों का टॉक्सिक्स इस इल्ली के शरीर में जमा होता है। इस इल्ली के तितली में रूपान्तर होने के बाद भी यह घातक पदार्थ तितली के शरीर में जमा रहता है। इसके कारण यदि टाईगर प्रजाति की तितलियों को गिरगिट या अन्य पक्षी खा लेते हैं तो उन्हे तकलीफ होती है। भक्षकों को भी यह दैविय गुण प्रकृति ने दिया है, जिससे वे किस जाति की तितली को खाना है और किसे नहीं यह जान जाते हैं। इसी का फायदा डॅनिड पग फ्लाय जाति की मादा तितली उठाती है। इस मादा के पंख के बाहर के रंग बिलकुल प्लेन टायगर तितली जैसे होते हैं। इसके कारण भक्षक उसे घातक समझकर नहीं खाते हैं। अब प्रश्न यह है कि मादा ही यह नकल क्यों करती है? इसका उत्तर यह है कि उसे प्रजोत्पादन करना होता है। यदि मादा जिंदा रही तो ही प्रजोत्पादन होगा।

नकल की जक मजेदार बात यह है की तितलियाँ सिर्फ बाहरी तौर पर ही नकल करती हैं. जेसा इसलिए जिससे डॅनिड एग फ्लाय की नर तितली को अपनी जाति की मादा तितली को आसानी से पहचान जाए. मादा तितली अन्दर से अपनी जाती का ही रंग रखती है.

 

तितलियों के समान ही आर्चनिड जाति की मकडी भी नकलची होती है। स्वत: के बचाव के लिये या भोजन मिलने में सुविधा हो इसलिये यह आठ पैरों वाली मकड़ी छह पैरों वाली चिटियों की नकल करती है। अलग-अलग 300 प्रकार की जातियों की मकड़ियाँ अलग-अलग जातियों की चीटियों की नकल करने में माहिर हैं. इस जाति के नर एवं मादा दोनों ही विव्हर जाति की चीटियों की नकल करती हैं। इस चींटी के काटने से बहुत जलन होती है। पत्ते से पत्ता जोडकर अपना घर बनाने वाली यह चिटियां बहुत ही आक्रमक होती है एवं बडे जोर से काटने के लिये जानी जाती है। यदि किसी भक्षक ने इन्हे खाने की कोशिश की तो ये गंदे स्वाद का फॉर्मिक एसिड नामक द्रव छोडती है। इसके कारण चिटियों का शिकार करने वाले पक्षी-प्राणी इन चिटियों को नहीं खाते हैं। इसी का फायदा आर्चनिड स्पायडर उसे प्राप्त प्राकृतिक गुणों से उठता है। प्रकृति ने उसे हूबहू इस चीटीं जैसा स्वरूप प्रदान किया है, इसके कारण उसकी जान बचती है। इस मकड़ी की मादा बिलकुल चीटीं जैसी दिखती है। यह नकल वास्तविक है यह दिखाने के लिये यह मकड़ी अपने दोनों पांव हवा में उठाकर चिटियों के समान एन्टेना का आभास निर्माण करते हैं। परंतु ये मकडीयां (स्पाईडर) अपनी नकल का फायदा उठाकर चीटियों के घरों में घुसकर उनहे खाने का साहस नही करते हैं।

इस प्रकार ये नैसर्गिक नकलची नकल करके अपनी जन बचाते हैं.

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  1. Rochak

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