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गांव मनुष्य जाति की प्रथम विश्रामस्थली है। मानव सभ्यता का अभ्युदय और विकास गांवों में ही हुआ है। गांव में रहते हुए ही मनुष्य ने प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का जीवन यापन की सामग्री के रूप में उपयोग करना सीखा। भूख- प्यास की व्याकुलता, जंगलों-बीहड़ों की वीरानी, पहाड़ों और खंदक-खाइयों की दुर्गमता, धूप की तपन, आंधी-तूफ़ान और जंगली जानवरों की भयावहता जैसे प्राथमिक जीवनानुभवों के साथ चन्द्रमा की शीतलता, नदियों की कल-कल, पक्षियों की चहचहाहट, फलों का स्वाद, फूलों की सुगंध, सागरों की विशालता, घाटियों की हरीतिमा, वर्षा की फुहारों का रोमांच, इन्द्रधनुष का विविध वर्णी सौन्दर्य, हिंसक-अहिंसक पशुओं और जीव-जंतुओं का सहजीवन आदि असंख्य अनुभूतियों का संचयन भी मनुष्य ने ग्राम्य वातावरण में किया है। जीवन की ये आदिम अनुभूतियां ही भावरूप होकर कालांतर में साहित्य की सृष्टि का माध्यम बनीं। आदिम मानव से आज के सभ्य मनुष्य की सहस्रों वर्ष की यात्रा में भारतीय साहित्य ने अनेक रूप बदले लेकिन गांव उसकी आत्मा से प्रत्यक्षतः अथवा अप्रत्यक्षतः सदैव जुड़ा रहा है। आधुनिक साहित्य में गांव लोक के रूप में उपस्थित है।
सामाजिक जीवन में शास्त्र की अपेक्षा लोक को प्रधानता दी गई है। महर्षि पतंजलि ने तो यद्यपि सिद्धं लोक विरुद्धं, नाकरणीयं नाकरणीयं कह कर शास्त्रोचित किन्तु लोकविपरीत कार्यों को अनुचित घोषित किया है। जीवन का अनुगामी होने के कारण लोकानुरक्ति और लोकरंजन श्रेष्ठ साहित्य की कसौटी माना जाता है। अतः, शहरी रहन-सहन और पाश्चात्य प्रभाव के कारण आज जो साहित्य अपनी लोकचेतना से विमुख जा रहा है उससे पाठकों की दूरी भी बढ़ती जा रही है।
गांव के भोलेपन, श्रमजीविता, ईमानदारी, धर्मनिष्ठा को वहां रहने वाली गरीब जनता के शोषण एवं कष्ट से जोड़ देने तथा पुष्प की पंखुड़ी पर गिरी ओस की बूंद की अपेक्षा रोटी कमाने में बहे पसीने को अधिक सुन्दर मानने के कारण ही प्रेमचंद हिंदी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासकार बन सके। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ग्रामीण भारत की सीमित साधनों में जीवन यापन दक्षता पर मुग्ध हैं-
अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है
क्यों न इसे सबका जी चाहे
थोड़े में निर्वाह यहां है
ऐसी सुविधा और कहां है।
कविवर सुमित्रानंदन पंत ग्राम्य प्रकृति में भारत माता के दर्शन करते हैं-
भारत माता ग्राम वासिनी
खेतों में फैला दृग श्यामल
शस्य भरा जन-जीवन आंचल।
जयशंकर प्रसाद ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा/ जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा तथा हिमाद्रि तुंगश्रंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती/ स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती’ गीत पंक्तियों में अपनी ग्राम्यचेतना को राष्ट्रभक्ति का आधार देते हैं।
गीतकार गोपाल सिंह नेपाली गांव के खेतों में उपजे अन्न को स्नेह तथा गांव की धूल को सोने कि संज्ञा देते हुए लिखते हैं-
यहीं के खेतों में उत्पन्न/ हुआ करता है मधुर सनेह/
धूल में लोट-लोटकर यहीं/ हुआ करती सोने की देह।
गांव के सौन्दर्य से अभिभूत किशोर काबरा जिंदगी को पहाड़ी गांव की संज्ञा प्रदान करते हैं-
एक सीढ़ी धूप, सीढ़ी छांव रे,
जिंदगी जैसे पहाड़ी गांव रे।
आज की महानगरीय सभ्यता में गांव अपना आकर्षण खोते जा रहे हैं। सूखा-बाढ़ की मार सहते, कर्ज की चक्की में पिसते किसान के लिए खेती-किसानी बोझ बन कर रह गई है तो बुंदेली कवि पं. बाबूलाल द्विवेदी के लिए अपने गांव के अच्छे दिनों की याद करने के अलावा कोई रास्ता भी तो नहीं बचता। वे लिखते हैं-
सोरा गोटी खेलत ते जब बैठे-बैठे छांव में।
कहां हिरा गए वे नौने दिन भैया अपने गांव के।
समर्थ गीतकार मयंक श्रीवास्तव अपने बचपन के गांव को इन शब्दों में स्मरण करते हैं-
क्या पता है कब मिलेंगे, गांव की चौपाल वाले दिन।
नीम, पीपल, नहर, पनघट, झील, पोखर, ताल वाले दिन।
राही ग्वालियरी को शहर आधुनिक सुविधा पूर्ण निवास के स्थान नहीं, वरन वे गांव की सहज-सुन्दर जिंदगी को जला डालने वाली यांत्रिक सभ्यता की भट्टी प्रतीत होते हैं-
गांव गुम शहर की जमीनों में
आदमी खो गए मशीनों में
हर तरफ आग ही लगी क्यों है?
देश के सावनी महीनों में।
गांव के वातावरण को दलगत राजनीति ने इतना प्रदूषित कर दिया है कि एक पढ़ा-लिखा समझदार व्यक्ति गांवों को रहने लायक भी नहीं मानता। यदि वह अपने पुरखों की थाती के मोह में अपने पैतृक गांव का रुख करता भी है तो उसे, जैसा कि कैलास गौतम लिखते हैं, उलटे पांव भाग जाना पड़ता है-
गांव गया था, गांव से भागा।
रामराज का हाल देखकर
पंचायत की चाल देखकर
आंगन में दीवाल देखकर
सिर पर आती डाल देखकर
नदी का पानी लाल देखकर
और आंख में बाल देखकर
गांव गया था, गांव से भागा।
गांव में रहने को मजबूर पिता अपने नौकरी-पेशा शहरी बेटे को डॉ. रामसनेही लाल यायावर के शब्दों में यही नसीहत देता है कि-
भूखे रह लेना या आधी खाकर सो जाना
हीरामन कुछ भी कर लेना, गांव नहीं आना
खुशियों की चिड़ियों ने पहले ही मुंह मोड़ा था
अब वह गांव नहीं है जिसको तुमने छोड़ा था
खेतों में अब फसल नहीं बंदूकें उगती हैं
आतंकित हैं, सहमी हुई हवाएं बहती हैं
नहीं सुनेगा तेरा कोई राम-राम गाना।
यद्यपि डॉ. श्रीराम परिहार के शब्दों में –
ख़तम हुए गावों के हाट
याद रह गयीं,
सिर्फ कथाएं, उजड़े ठाठ।
फिर भी मानवीय उदारता, त्याग, समर्पण, परदुख कातरता आदि जीवन मूल्यों की चर्चा होगी तो उन्हें अकबर इलाहाबादी के इस शेर के मुताबिक गांव कि कसौटी पर ही कसा जाएगा-
रकबा तुम्हारे गांव का मीलों हुआ तो क्या रकबा तुम्हारे दिल का दो इंच भी नहीं।
महानगर चाहे स्वर्ग के सौन्दर्य और सुविधा की सीमा तक स्मार्ट क्यों न हो जाएं, नईम गुहारते ही रहेंगे-
आओ हम पतवार फेंककर
कुछ दिन हो लें नदी ताल के

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