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धरातल पर भारत भूमि की स्थिति शीतोष्ण कटिबंध में है। अर्थात यहां पर शीत और उष्ण दोनों वातावरण पाया जाता है। तीन ऋतुएं होती हैं। इसलिए जीवन-यापन के साधनों का निर्धारण एवं भोजन भी मौसम के अनुकुल ही पकाया और खाया जाता है। खाद्य पदार्थों को आयुर्वेद के निर्देशों के अनुसार ग्रहण किया चाता है। अपने देश में प्राय: चार प्रकार के भोजन खाये जाते हैं। वे हैं-चर्ब्य अर्थात चबाकर खाया जाने वाला, भक्ष्य अर्थात बिना चबाये सीधे निगल लिया जाने वाला, चोस्य-अर्थात चूस कर खाया जाने वाला और द्रव्य अर्थात पिया जाने वाला। इन्हें स्वाद के अनुसार तिक्त अर्थात तीखा, मीठा, नमकिन, कसैला, खट्टा इत्यादि भागों में बांटा जाता है। पुराणों में छप्पन प्रकार के पकवानों का उल्लेख मिलता है। यही छप्पन भोग हैं। भारतीय परंपरा में पकवानों को व्यापक अर्थों में लिया जाता है। इसीलिए ‘‘यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे’’- छप्पन पकवानों के लिए उतनी ही भावना मन में होनी चाहिए। शास्त्र सम्मत छप्पन्न भोगों का विवरण इस प्रकार है- भात, दाल, चटनी, कढ़ी, दही, खाक की कढ़ी, सिखरन, शरबत, वाटी, मुरब्बा, शक्करपारा, वडा, मठरी, फेनी, पूरी, खजरा, घेवर, मालपुआ, चिला, जलेबी, मेसू रसगुल्ला, चन्द्रकला, रायता, रबड़ी, पापड़, शीरा, लस्सी, सूबत, मोहन, लोंगपूरी, खुरमा, दालिया, पारिखा, सैफयुक्त, लड्डू, साग, सहानी, माठा, खीर, दही, गाय का घी, मक्खन, मलाई, सुपारी, इलायची, फल, पान, खट्टा पदार्थ, कड़वा पदार्थ, तीखा पदार्थ, मीठा पदार्थ, कसैला पदार्थ, नमकिन पदार्थ और मोहन भोग।
इन्हीं के आधार पर भारत के गांवों में आज भी अनेक ऐसे पकवान बनाए जाते हैं, जिन्हें खाकर मन, शरीर और भाव तीनों तुष्ट एवं पुष्ट होते हैं। इनमें कुछ पकवानों का विवरण इस प्रकार से है-
१) बाटी-चोखा- पश्चिमी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बाटी चोखा अर्थात गेहूं के आटे की गोलमटोल टिकिया (अर्थात गाकड़, मराठी में पाणगे) और आलू, बैंगन, टमाटर का भूर्ता बहुत लोकप्रिय पकवान है। यह किसी उत्सव, मेला और सामाजिक जुटाव के समय अवश्य बनाया जाता है। बाटी में चना भून कर उसन बना कर भरा जाता है। इसे कंडी की आग में भून कर तैयार किया जाता है, ताकि खाने में सोधापन बना रहे। किसी समीपी मित्र या मेहमान के घर में आने पर उनके सम्मान

में इष्टमित्रों के साथ बाटी चोखा का कार्यक्रम अवश्य रखा जाता है।
२) सत्तू- गर्मी के मौसम में जबकि शरीर में गरमाहट उत्पन्न हो जाए, पानी की कमी होने लगे, तब सत्तू का घोल पिलाया जाता है, ताकि शरीर का ताप कम हो और जलाल्पता समाप्त हो सकें। उत्तर भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, इत्यादि राज्यों में सत्तू का उपयोग खुब किया जाता है। जौ, चना, अरहर, मटर को अलग-अलग भून कर उसका छिलका निकाल करके पीसा जाता है। सब से ज्यादा जौ का आटा और अन्य को उचित मात्रा में मिला कर रखा जाता है। खाते समय स्वादानुसार नमक मिलाया जाता है। इसे आटे की तरह नरम गूंथ कर अथवा पानी में घोल कर खाया या पिया जाता है। यात्रा के समय पेट की बीमारी में तथा जब भी भोजन उपलब्ध न हो, सत्तू काम आता है। चटनी, अचार, प्यास और हरी मिर्च के साथ खाने में बड़ा आनंद आता है।
३) लाटा- लाटा का चलन प्राय: समाप्त होता जा रहा है। कभी-कभी स्वाद बदलने के लिए ग्रामीण इसको तैयार करते हैं। वस्तुत: लाटा बनाने महुए के सूखे फूल, सफेद तिल और बाजरी को मिलाया जाता है। तिल को बाजरी को भून कर कूटा

जाता है। उसी के साथ महुआ के फूल को भी मूसल से कांडी में कूटा जाता है। फिर तीनों को साथ मिला कर कूटते हैं। वर्तमान समय में महुए के सूखे फूल के बजाय गुड़ का प्रयोग किया जाता है। ठंडी के मौसम में प्रात: कालीन नाश्ते के समय इस मीठे खाद्य पदार्थ का प्रयोग किया जाता है। एक बार बना लेने से एक दो सप्ताह तक यह खराब नहीं होता। लाटा बहुत ही पौष्टिक और सर्दी से बचाने वाला खाद्य है।

४) दही चिउड़ा- पूर्वोत्तर उत्तर प्रदेश तथा पश्चिमोत्तर बिहार की लम्बी पट्टी में दही चिउड़ा गुड़ को खूब आनंद लेकर खाया जाता है। कुछ अवसरों पर भोज भात में यह अनिवार्य पकवान होता है। मोटे चावल का चिउड़ा, उसके उपर गाढ़ी दही और ऊपर से गुड़ का चूरा या खांड मिलाया जाता है। तीनों को मिला कर खाने से भरपेट भोजन तो होता ही है, बनाने -पकाने का झंझट भी नहीं होता है। यात्रा के समय तथा ऐसी परिस्थिति में जबकि भोजन पकाना सम्भव न हो, इस स्वादिष्ट और पौष्टिक पकवान का भरपूर उपयोग किया जा सकता है। भोज भात के समय पहले दही चिउड़ा परोसा जाता है और बाद में दाल भात रोटी सब्जी इत्यादि परोसा जाता है।

५) ठोकवा- बरसात के दिनों में नागपचंमी और उसके बाद पड़ने वाले त्योहारों में ठोकवा बनाने की परंपरा है। महुआ के सूखे फूल को पानी में भिगो दिया जाता है। खूब फूल जाने पर उसका पानी छान कर भीतर का जरए साफ करके सिल-लोढ़ा से महीन पीसा जाता है। तत्पश्चात उसमें चावल अथवा गेहूं का आटा मिला कर गूंथा जाता है। यह खट्टी चटनी, अचार और सिरका के साथ खाया जाता है। ठोकवा एकसाथ बहुत सा बना कर रखा जा सकता है। यात्रा के समय ले जाया जा सकता है। यह पांच-छह दिनों तक खराब नहीं होता। आजकल महुआ का फूल न मिलने पर गुड़ मिला कर भी बनाया जाता है।

६) माल-पुआ- गेहूं के आटे को दूध के साथ गूंथ कर नरम किया जाता है। इसमें स्वाद के अनुसार चीनी अथवा गुड़ मिलाया जाता है। नरम आटे की छोटी-छोटी पूरी बना कर तेल में छाना चाता है। वस्तुत: माल-पुआ मीठी पूरी की तरह ही बनाया जाता है किन्तु दुध में आटा गूंथने के कारण यह मुलायम टिकाउ और स्वादिष्ट हो जाता है। प्राय: इसे दो-तीन दिनों तक सामान्य तरीके से रखा जा सकता है। आम के अचार के साथ इसका सेवन किया जाता है।

७) गुलगुला- जैसा कि इसका नाम ही है यह पकौड़े की तरह गोल और गुलगुल होता है। गेहूं के आटे में गुड़ मिला कर खूब फेंटा जाता है। आटा और पानी जब अच्छी तरह से मिल जाता है, तब कड़ाही में खौलते तेल में इसे छाना जाता है। मीठा, स्वादिष्ट और कई दिन तक अच्छा रहने वाला पकवान है गुलगुला।

८) पराठा – यद्यपि पराठा ऐसा खाद्य पदार्थ है, जो किसी न किसी रूप में देश भर में पकाया खाया जाता है। किन्तु उत्तर भारतीय पराठों के स्वाद का क्या कहना। पंजाबी पराठे तो जगजाहिर हैं ही। पराठे कई तरह के बनते हैं। सादा पराठा, आलू पराठा, मूली पराठा, गोभी पराठा, पनीर पराठा, मसाला पराठा, पालक पराठा, इत्यादि खूब लोकप्रिय हैं। गेहूं के आटे को गूंथ कर उसमें मसाला भर कर गरम तवे पर घी लगा कर सेंका जाता है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तरी राजस्थान, उत्तर प्रदेश में पराठे प्रिय पकवान हैं।
९) दाल पूरी या पूरण पूरी- यह पकवान किसी न किसी स्वाद के साथ पूरे उत्तरी, पश्चिमी एवं मध्य भारत में पकाया खाया जाता है। उत्तर भारत में इसे दाल पूरी कहते हैं। चने की दाल को शाम को ही भिगो दिया जाता है। सुबह यह खूब फूल जाती है, तब इसे खूब पकने तक उबाला जाता है। ठंडा होने पर सिल-बट्ठा से पीसा जाता है। स्वाद के अनुसार नमक, जीरे का पाउडर मिला कर गूंथे हुए गेहूं के आटे में भर कर रोटी की तरह बेला जाता है। तवे पर तेल लगा कर सेंका जाता है। महाराष्ट्र, गुजरात में नमक के स्थान पर चीनी का पाउडर मिलाया जाता है। सेंकने का तरीका एक जैसा होता है। विशेष अवसरों पर दाल पूरी अवश्य बनाई जाती है। उत्तर भारत में परम्परा है कि बेटी के ससुराल से मैके आने पर उसके स्वागत में शाम को यह पूरी अवश्य बनाई जाती है।

१०) खिचड़ी-उत्तरी भारत में एक कहावत प्रचलित है-‘‘माघ पुस घिड खिच्चड खाय, प्रात: उठि के गंग नहाय। ’’ शीतकाल में सुबह-सुबह चावल की साधी खिचड़ी खाने का चलन है। नए चावल तथा काला उडद की खिचड़ी ढीली बना कर उसमें घी मिला कर खाना चाहिए। यद्यपि वर्तमान समय में तरह-तरह की खिचड़ी पूरे देश में बनाई जाने लगी है, किन्तु उत्तरी भारत में जो खिचड़ी बनाई खाई जाती है, वह वहां का एक विशेष पकवान माना जाता है।

११) साग रोटी- ठंडी के मौसम में रबी की फसल में चना, सरसों, मटर बोए जाते हैं। इसी समय सनई भी तैयार हो जाती हैै। सनई के अनखुले फूल तथा चना और सरसों के साग के साथ बाजरे की रोटी का स्वाद कुछ और होता है। तेल में भुना हुआ साग, प्याज और रोटी खाने में स्वादिष्ट, बनाने में सरल और पचने में सुपाच्य होती है। पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तरी राजस्थान का यह अत्यंत प्रिय पकवान है।

१२) फरा (गोइठा)- चावल के आटे में उड़द की पीठी भर कर इसे बनाया जाता है। यह इस तरह बनाया जाता है कि एक तरफ खुला रहता है और पीठी दिखाई जाती है। इसे उबलते पानी की भाप पर पकाया जाता है। कहीं-कहीं फरा और कहीं इसे गोइठा कहा जाता है। घी और चटनी के साथ स्वाद लेकर बड़े चाव से खाया जाता है।

इनके अलावा रसियाव, गुझिया, कचौरी, पूरी, अनर्सा, बड़ा पना, गजक, रबडी, साग-पहिती इत्यादि न जाने कितने पारम्पारिक पकवान हैं, जिन्हें भारत के गांवों में पकाया, खाया, खिलाया जाता है। हर मौसम का एक अलग पकवान अवश्य होता है। त्योहार पकवानों के खाने खिलाने का विशेष अवसर होते हैं।

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